The-immortal-star

-    Text Size    +

Content on this page requires a newer version of Adobe Flash Player.

Get Adobe Flash player

हर कहानी की एक शुरुआत होती है और एक अंत. और इन दोनों के बीच जो होता है वह है एक अनवरत, अनथक यात्रा, एक सफर. यह सफर अगर जिन्दगी का हो तो सबसे अहम यह हो जाता है कि इस सफर को न सिर्फ खुद के लिए बल्कि दूसरों के लिए भी आप कितना खूबसूरत और यादगार बना पाते हैं.

यहां हम जिस जीवन-यात्रा का जिक्र करने जा रहे हैं वह एक नन्हीं-सी लड़की की कहानी है जो इस क्रूर और निष्ठुर संसार में ता-जिन्दगी प्रेम की तलाश में भटकती रही. यह छोटी-सी, खूबसूरत लड़की मर्लिन मुनरो की कहानी है. यह कहानी मुहब्बत और जुनून की, सौंदर्य और अवसाद की, छलावे और मृत्यु की जद्दोजहद भरी जिन्दगी का सफरनामा है.

मर्लिन ने एक बार कहा था,” मेरा विश्वास है कि हर घटना के पीछे कोई कारण जरूर होता है, लोग बदल जाते हैं ताकि वे अतीत को भुलाना सीख सकें, चीजें गलत इसलिए होती हैं कि जब वे सही हों तो आप उनकी तारीफ कर सकें, आप झूठ पर इसलिए भरोसा करते हैं ताकि अंत में आप केवल खुद पर विश्वास करना सीख सकें, और कभी-कभी अच्छी चीजें दूर छिटक जाती हैं ताकि बेहतर चीजें हमारे पास आ सकें.” गरिमा और आत्मविश्वास से भरपूर सौंदर्य की साक्षात् प्रतिमूर्ति थी मर्लिन. उनके संबंध, उनके अंदर का स्त्रीत्व, उनकी एक्टिंग, उनका प्रभाव, उनकी बालसुलभ निर्दोषता और सहजता सबकुछ आमजन के लिए किसी करिश्मे से कम न था. उन्होंने बहुत छोटा जीवन जीया लेकिन उस छोटी-सी अवधि में उनकी हासिल उपलब्धियां उनके समर्पण, दृढ़ता और महत्वाकांक्षा उनकी असीम क्षमता को प्रमाणित करने के लिए काफी हैं. हालांकि कुछ लोगों के अनुसार उनकी महत्वाकांक्षा की अति ही उनके दुखद अंत का कारण बनी लेकिन आज भी वे गोरे रंग और सुनहरे बालों वाली हॉलीवुड की सबसे मादक और खूबसूरत अदाकारा के रूप में याद की जाती हैं. एक ऐसी अभिनेत्री जो अपनी दृढ इच्छाशक्ति के बल पर सफलता के शीर्ष पर जा पहुंची.

बगैर किसी गॉडफादर के फिल्म इंडस्ट्री में एक गंभीर अभिनेत्री के तौर पर अपना मुकाम बनाने के लिए मर्लिन को बहुत मेहनत करनी पड़ी. जब उन्होंने अपना एक्टिंग कैरिअर शुरू किया तो फिल्म इंडस्ट्री ने उनका इस्तेमाल या तो फिल्म में ग्लैमर का पुट डालने के लिए किया या फिर रंगी-चुंगी उत्तेजक गुड़िया जैसे किरदार निभाने के लिए. ये सिर्फ उनकी अंतहीन उद्दीप्त प्रेरणा का ही परिणाम था जो वे ग्लैमर-गुड़िया की अपनी छवि बदलकर एक संजीदा अदाकारा के रूप में अपनी पहचान बनाने में कामयाब होने के साथ-साथ बेहतरीन अदाकारी के लिए अनेकों पुरस्कार भी हासिल कर सकीं. इन सबके लिए उन्हें जाने कितनी ही बार अपने लुक और अदाकारी में आमूलचूल बदलाव का कठिन श्रम करना पड़ा लेकिन इन सबसे वे कभी घबराई नहीं. उनके तई कोई भी बदलाव इतना हतोत्साहित करने वाला नहीं था जो न किया जा सके, कोई भी चुनौती इतनी बड़ी नहीं थी कि निभाया न जा सके, ऐसा कोई जोखिम नहीं जिससे डरने की जरूरत हो. ऐसा निडर व्यक्तित्व था उनका.

वे हमेशा मानती थीं कि वे पूरी तरह आजाद हैं- आजाद पंछी. अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा में उनका सफलतम समय सिर्फ 1954 से 1957 तक ही रहा लेकिन मर्लिन के वजूद को परिभाषित करने के लिए सिर्फ इतना ही काफी नहीं है. उनका व्यक्तित्व बेहद खास था. यही वो शख्स थीं जिन्होंने बिना आगा-पीछा सोचे बेहद महत्वपूर्ण सार्वजनिक समारोह में अत्यधिक तंग और बेहद छोटे कपड़े पहनने का दुस्साहस किया था. यही वो अदाकारा थीं जिन्होंने अपने हर किरदार को जीवंत बना दिया. उन्हीं की मुस्कराहट थी जो आज भी देखने वालों के होठों पर मुस्कान खींच लाती है. शरारत से भरपूर उनकी लुभावनी आंखें देखकर आज भी मर्दों के दिल बल्लियों उछलने लगते हैं. और-तो-और, ये ही वो शख्स है कि मरने के 50 साल बाद भी जिनका नाम गूगल पर सबसे ज्यादा खोजा गया है.

the-controverial-childhood

‘लॉस एंजिल्स काउंटी हॉस्पिटल’ के एक चैरिटी वार्ड में श्रीमती ग्लैडिस मोर्टेसें की बेटी के रूप में 1 जून 1926 को मर्लिन का जन्म हुआ था. मर्लिन बचपन से ही विवादों से घिरी रही. जन्म के समय से ही कोई-न-कोई बखेड़ा उनके साथ लगा रहा. हर व्यक्ति का बचपन उसकी जिन्दगी का सबसे खूबसूरत वक्त होता है. हर किसी की यही ख्वाहिश होती है कि अपने बचपन को हर संभव संजो कर रख सके. लेकिन दुर्भाग्य से मर्लिन के साथ ऐसा नहीं हो सका. उन्हें तो अपना नाम तक छोड़ना पड़ा. उनका असली नाम था नोर्मा जीन मोर्तेंसें. वैसे तो उनके पिता के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है, उनकी मां जान-बूझकर मोर्तेसन का गलत उच्चारण मोर्तेंसें के रूप में किया करती थी. इसलिए मर्लिन के सभी प्रमाणपत्रों में नोर्मा जीन मोर्तेंसें ही दर्ज मिलता है. बचपन में मर्लिन के पास कम मूंछों वाले किसी व्यक्ति की तस्वीर थी, जो उनकी मां ने जन्मदाता पिता की छवि के तौर पर उन्हें दिया था. चूंकि तस्वीर वाली छवि मशहूर अमेरिकन एक्टर क्लार्क गाब्ले से बहुत ज्यादा मिलती-जुलती थी, इसलिए खुद को क्लार्क गाब्ले की बेटी के रूप में उद्धत कर मर्लिन बहुत संतोष पाती थीं. जीवन जीने का उनका तरीका आज हमें भ्रान्ति का अहसास जरूर करा सकता है, लेकिन, इतना तो तय है कि वे खुद को खुश रखने का कौशल जानती थीं.

जिन्दगी ने मर्लिन को सहज और खुशनुमा बचपन नहीं बख्शा, जो किसी भी व्यक्ति के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अमूल्य संपत्ति होती है. सच तो यह है कि उनका बचपन एक कष्टप्रद अग्निपरीक्षा ही थी. उनके जन्म के तुरंत बाद ही उनकी मां ग्लैडिस मानसिक रूप से बीमार होकर नवजात शिशु की देख-भाल करने के अयोग्य करार दी गयी. इस कष्टप्रद परिस्थिति के कारण मर्लिन को बच्चे पालने वाले एक पालक दंपत्ति के संरक्षण में भेज दिया गया. कैलिफोर्निया के पालक दंपत्ति इडा और अलबर्ट वेने बोलेंडर, जो तब हौथ्रों में रह रहे थे, ने मर्लिन को गोद ले लिया.

the-controverial-childhood01

सात साल की नाजुक उम्र तक मर्लिन उनके साथ रही थीं. इस दंपत्ति के साथ बिताया हुआ समय मर्लिन की जिन्दगी के सबसे खुशगवार दिन थे. इडा बेहद अनुशासनपसंद थीं जबकि अलबर्ट बहुत प्यारे और उदार हृदय के पिता थे. इडा और अलबर्ट मर्लिन के आलावा भी कई बच्चों को पाल रहे थे. रिकॉर्ड बताते हैं कि मर्लिन जब अलबर्ट को ‘डैडी’ पुकारती थी, तो इडा आंटी बहुत खफा होती थी. इडा हमेशा ही मर्लिन का भला चाहती थी. वो नहीं चाहती थी कि मर्लिन कोई झूठी खुशफहमी पाले. इसलिए उन्होंने मर्लिन और दूसरे पालित बच्चों के सामने हमेशा ही यह साफ रखा कि वे और अलबर्ट उनके असली मां-बाप नहीं हैं. इसके बावजूद मर्लिन का अलबर्ट से जुड़ाव कभी कम नहीं हुआ. मर्लिन के लिए अलबर्ट ही उसके पिता थे. उस पालक केंद्र की मर्लिन की एक मुंहबोली बहन, नैंसी जेफरी याद करती हैं, ” नोर्मा बेहद जिज्ञासु बच्ची थी… बाथ टब के पास एक स्टूल रखा होता था और जब भी डैडी दाढ़ी बनाते थे, नोर्मा उस स्टूल पर बैठकर तरह-तरह के सवाल पूछा करती थी. जैसे: उत्तर और दक्षिण किस तरफ है? …फूल कैसे खिलते हैं? …दुनिया में कितने लोग रहते हैं?” वे तमाम तरह के सवाल पूछती रहती थी. इस विश्वास के साथ कि उनके डैडी को दुनिया के सभी सवालों के जवाब पता है. बदकिस्मती से प्यार भरे इस रिश्ते की उम्र बहुत छोटी साबित हुई. दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं ने कुछ अजीब मोड़ लिए. मर्लिन की मां ग्लैडिस ने अपनी असंतुलित मानसिक अवस्था में इडा और अल्बर्ट के घर से अपनी बेटी को चुराने की कोशिश की. हालांकि उस दिन उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही लेकिन बाद में ग्लैडिस किसी तरह खुद को संतुलित साबित कर अपनी बेटी का संरक्षण पा लेने में कामयाब हो गईं, जब उन्होंने 1933 के अगस्त में एक घर खरीद लिया. मर्लिन अब अतीन्द्रिय दृष्टि संपन्न, कुछ विक्षिप्त अपनी मां और उनकी सहेली ग्रेस मकी के साथ रहने लगी. वैसे तो मर्लिन को अपने घर का-सा अहसास दिलाए रखने में ग्लैडिस और ग्रेस ने अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं रखी लेकिन मर्लिन बस यही सोचा करती थी कि कब और कैसे वो अपने डैडी से मिल सकेगी. साथ ही उनकी मां की मानसिक स्थिति बिगड़ती ही जा रही थी. उनके पागलपन की घटनाएं नन्हीं मर्लिन को भयभीत करती जा रही थीं. इन परिस्थितियों में मर्लिन की निगरानी राज्य का कर्तव्य घोषित कर दिया गया. बाद में, मर्लिन की अस्थिर और डांवाडोल परवरिश को देखते हुए ग्रेस ने कानूनी रूप से उनका अभिभावक बनने का फैसला किया.

मर्लिन जो बन पाईं या जो कुछ सीख सकीं, बहुत हद तक उसका श्रेय उनके जीवन के उस शुरुआती पक्ष को जाता है जो उन्होंने ग्रेस के साथ बिताए. ग्रेस उनके बालों को घुंघराला बनातीं, फिल्में दिखातीं और उनके बाल-मन में इस आकांक्षा का बिरवा रोपतीं कि किसी दिन वो भी एक मशहूर एक्ट्रेस बन सकती है.

the-controverial-childhood02

बचपन की इन्हीं प्रेरणाओं के कारण मर्लिन के मन में ग्लैमर की दुनिया के प्रति घनघोर आकर्षण पैदा हुआ. सबकुछ ठीक चलता रहा, लेकिन 1935 में दुर्भाग्य का एक और झटका मर्लिन को तब लगा जब ग्रेस ने किसी ‘डॉक गोडार्ड’ से शादी रचा ली. एक बार फिर मर्लिन अकेली और बेसहारा हो गई और उन्हें किसी पालक केंद्र में रखे जाने की जरूरत आन पड़ी. काफी सालों के बाद इस वक्त को याद करती हुई मर्लिन ने बताया था कि उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें जेल में भेजा जा रहा हो. इस दौरान इडा ने मर्लिन का संरक्षण पाने और उन्हें वापस लाने की काफी कोशिश की थी, लेकिन ग्लैडिस और ग्रेस दोनों ही ऐसा नहीं चाहती थीं. उनके अनुसार मर्लिन पर इडा का प्रभाव अच्छा नहीं था. दरअसल उन्हें डर था कि दुबारा मर्लिन अगर इडा के पास चली गई, तो इन्हें हमेशा के लिए मर्लिन से हाथ धो देना पड़ेगा. आखिर में नौ साल की मर्लिन को लॉस एंजिल्स के एक अनाथालय में भेज दिया गया. दूसरी तरफ इडा बोलेंडर अब भी मर्लिन से संपर्क रखने का हर संभव प्रयत्न कर रही थी. वे मर्लिन से मिलने के लिए अक्सर अनाथालय जाती रहती थीं जो ग्रेस को बेहद नागवार गुजर रहा था. आखिरकार 1937 में इन दो औरतों के बीच का संघर्ष इस हद तक बढ़ा कि ग्रेस ने मर्लिन को अपने घर, जहां वो अपने पति के साथ रह रही थीं, लाने का फैसला कर लिया. लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग थीं. डॉक गोडार्ड बेहद मुश्किल आर्थिक तनावों से गुजर रहे थे और उनका बहुत ज्यादा शराब पीना सबके लिए एक मुसीबत बन चुका था. उनके बारे में काफी सालों बाद मर्लिन ने बताया था कि कभी-कभी वो बहुत अस्वाभाविक स्थिति में पड़ जाती थी. वो मर्लिन पर उन्हें किस करने के लिए दबाव डाला करते थे. इन सच्चाइयों को जानने के बाद ग्रेस इतनी परेशान हो गई कि उन्होंने मर्लिन का बोरिया-बिस्तर बंधवा कर उत्तर हॉलीवुड में रहने वाली उनकी दूर की एक आंटी ओलिव मुनरो के पास रहने को भेज दिया. मर्लिन का यह प्रवास बहुत कटु अनुभवों वाला साबित हुआ क्योंकि ओलिव इतनी गरीब थीं कि बमुश्किल ही वो अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाती थीं. ऐसे में एक और प्राणी का पालन-पोषण कर पाना किसी बोझ से कम नहीं था.

इसी दौरान पहली बार मर्लिन को पता चला कि बर्निस नाम की उनकी एक सौतेली बहन भी है. मर्लिन की मां ग्लैडिस को पिछली शादी से दो बच्चे थे. शादी टूटने के बाद उन दो बच्चों की देख-रेख का जिम्मा ग्लैडिस के पूर्व पति निभा रहे थे. बीमारी की वजह से ग्लैडिस को कभी मौका ही नहीं मिला कि वे मर्लिन से इन सब का जिक्र करतीं. लेकिन जब सेनेटोरियम में ग्लैडिस का ईलाज चल रहा था तब उन्होंने अपने बिछड़े परिवार को अपनी जानकारी देना उचित समझा था. बर्निस जो अब 19 साल की हो चुकी थी, मां की खबर पाकर हर्षित हो गई. वे तो मान चुकी थीं कि उनकी मां अब इस दुनिया में है ही नहीं. जब ग्लैडिस ने बर्निस के बारे में ग्रेस को बताया, तो ग्रेस ने इस बात पर काफी दबाव डाला कि बर्निस को जरूर मर्लिन के पास पत्र भेजना चाहिए. और जैसा उन्हें अनुमान था, मर्लिन यह जानकर फूली नहीं समाई कि उसके परिवार का कोई और सदस्य भी इस दुनिया में है. वे अपनी बहन के बारे में और जानना चाहती थीं. आने वाले वर्षों में बर्निस और मर्लिन एक-दूसरे की बेहद करीबी बन गईं. वे अच्छी दोस्त और एक-दूसरे की राजदार हो गईं.

इस बीच आंटी ओलिव के साथ मर्लिन का जीवन दिन-पर-दिन बद-से-बदतर होता जा रहा था. इसलिए 1938 की शुरुआत में ग्रेस ने मर्लिन को लॉस एंजिल्स के निकट ही उसकी एक और आंटी ऐना लोवर के पास भेज दिया. मर्लिन अगले चार वर्षों तक ऐना लोवर के साथ नेम्ब्रसका अवेन्यु में उनके दुमंजिले मकान में रहीं. ऐना लोवर एक तलाकशुदा महिला थी. वे एक पेशेवर ईसाई विज्ञानवेत्ता होने के साथ ही बड़ी दयालु और विदुषी भी थीं. उनके साथ मर्लिन का जीवन बहुत शांतिपूर्ण और सुखपूर्वक गुजरा. इन दिनों को वे हमेशा ही ख़ुशी से याद करती थीं. अक्सर उसके बारे में बातें किया करती थीं. मर्लिन की उनसे बड़ी घनिष्ठता थी, लेकिन ऐना के बिगड़ते स्वास्थ्य की वजह से 16 साल की उम्र में मर्लिन को उनसे बिछड़ना पड़ा.

एक बार फिर मर्लिन वक्त के क्रूर थपेड़ों की चपेट में असहाय खड़ी थी. जबकि उन्हें अपने सिर पर एक दृढ़ और सुरक्षित छत के साथ ही जिन्दगी में स्थायित्व के अहसास की बेहद जरूरत थी बदकिस्मती से वे इधर-उधर भटकती फिर रही थीं. ऐसी खानाबदोश जिंदगी जीने की मजबूरी ने पैसे और सत्ता के महत्व के प्रति उनके विश्वास को दिनोंदिन दृढ़ बनाया.

ऐना के घर से लौटने के बाद मर्लिन फिर से ग्रेस के साथ रहने लगीं. वान नुस हाई स्कूल में मर्लिन का दाखिला हुआ, जहां उनकी मुलाकात भविष्य में बने उनके पति जेम्स डॉघर्टी (जिन्हें जिम या जिम्मी भी कहा जाता था) से हुई. जिम्मी और मर्लिन के बीच डेटिंग शुरू हो गई और उनका सम्बन्ध परवान चढ़ने लगा. इसी बीच डॉक गोडार्ड को वर्जीनिया से ऊंची तनख्वाह वाली किसी नौकरी का प्रस्ताव मिला और वे नई जगह जाने की तैयारी करने लगे. पर वे मर्लिन को कतई अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थे. उनका तर्क था कि जब वे अपने पूरे परिवार के साथ एक अनजान जगह पर जा रहे हैं, तो किसी ‘अतिरिक्त’ बोझ को साथ ले जाना मूर्खता ही होगी. इन घटनाओं के मद्देनजर 1942 में मर्लिन और जिम्मी ने कमउम्र में शादी कर ली. इस वक्त मर्लिन की उम्र विवाह के वैधानिक उम्र से दो वर्ष कम थी. इसी वजह से विवाह के बाद उनका मां बनना संभव नहीं हो सका. जिम्मी भी मर्लिन की कम उम्र के प्रति काफी सचेत थे. इसलिए वे उन्हें समझा-बुझा कर 1943 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मर्चेंट मरीन की नौकरी में अपनी सेवाएं देने के लिए चले गए.

the-multi-faceted-diva

बुरे वक्त में देश की सेवा के लिए पति के चले जाने के बाद मर्लिन ने भी परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करते हुए रेडिओप्लेन के लिए युद्ध-सामग्री बनाने वाले एक कारखाने में काम करना शुरू किया. 1945 का यही वो समय था, जब मर्लिन को मॉडलिंग का पहला प्रस्ताव मिला. हुआ यूं कि डेविड कोनोवर नाम के एक अधिकारी की युद्ध के सम्बन्ध में योगदान देने की इच्छुक युवतिओं की खोज के दौरान मर्लिन पर नजर पड़ी.

the-multi-faceted-diva01

वे मर्लिन की सुन्दरता, फोटोजेनिक चेहरा और मुस्कराहट के कायल हो गए. उन्होंने मर्लिन को ब्लू बुक मॉडलिंग एजेंसी में नाम दर्ज करवाने का सुझाव दिया. इसी एजेंसी के साथ मॉडलिंग का एक काम करते हुए मर्लिन ने अपने बालों को अभिजात्य स्टाइल के बदले छोटा और हल्का सुनहला ब्लोंड रूप दिया था.

एक मॉडल के रूप में मर्लिन ने काफी वाहवाहियां बटोरीं. सच तो ये है कि वे ब्लू बुक की सबसे सफल और लोकप्रिय मॉडल थीं. उन्होंने जीन हर्लों और लाना टर्नर जैसे प्रसिद्ध मॉडलों के कार्यों को जानना-पढ़ना शुरू किया. यही वो वक्त था जिसने मर्लिन को रूपहले परदे की कालजयी देवी के रूप में बदलने की शुरुआत की. पत्र-पत्रिकाओं में मर्लिन पर छपे असंख्य आलेखों ने बेन ल्योन का ध्यान खींचा, जो तब 20th सेंचुरी फॉक्स के एक अधिकारी थे. वे मर्लिन के लुक और उनकी प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए और यह कहकर उनकी प्रशंसा के कसीदे पढ़ने से खुद को रोक नहीं सके कि उन्हें देखकर जीन हर्लों की याद ताजा हो जाती है. 20th सेंचुरी फॉक्स की ओर से मर्लिन को छह महीने के अनुबंध और प्रति सप्ताह 125 डॉलर के सम्मानजनक मेहनताने का प्रस्ताव मिला. इस वक्त तक मर्लिन अपने वास्तविक नाम नोर्मा के रूप में ही काम कर रही थीं. बेन ल्योन चाहते थे कि उनका नाम बदला जाए. काफी चर्चा-परिचर्चा और कई लोगों से विचार-विमर्श के बाद नोर्मा के लिए मर्लिन मुनरो का नाम सुनिश्चित किया गया. इस नाम में दो ‘म’ होने की वजह से बेन को पक्का विश्वास था कि यह नाम बहुत ही भाग्यशाली सिद्ध होगा. कुछ हद तक यह सही भी रहा. नाम बदलने के बाद ही मर्लिन को पहले दौर की फिल्में मिलीं. कई फिल्मों में छोटी और प्यारी भूमिकाएं निभाने की वजह से उन्हें कोलम्बिया पिक्चर्स की ओर से छह महीने का अनुबंध हासिल हुआ. वहीं 10 मार्च, 1948 को उनका परिचय नताशा लिटेस से हुआ, जो मर्लिन के समूचे एक्टिंग कैरिअर के दौरान उनकी कोच बनी रहीं. कोलम्बिया पिक्चर्स द्वारा 1948 में बनी मर्लिन की पहली फिल्म का नाम था “लेडीज ऑफ़ द कोरस”. यह फिल्म अच्छी नहीं चली. परिणामस्वरूप कोलम्बिया पिक्चर्स ने मर्लिन से किया अनुबंध तोड़ दिया. लेकिन मर्लिन इससे विचलित नहीं हुईं. वे फिल्मों के प्रस्ताव मिलने का इंतजार करती रहीं, जो काफी समय से मिलना बंद हो चुकी थीं. मर्लिन ने फिर से मॉडलिंग करने का फैसला किया. इस समय तक वे हॉलीवुड स्टूडियो क्लब के दो कमरों वाले एक घर में रहने लगीं थीं, जिसका खर्च 12 डॉलर प्रतिदिन था. उनके खर्चे आसमान छू रहे थे, जबकि कैरिअर और काम लगभग ठप्प था. अगले एक साल तक उनकी स्थिति यूं ही डांवाडोल-सी बनी रही कि नए वर्ष की पूर्व-संध्या की पार्टी में उनकी मुलाकात जॉनी हाइड से हुई.

मर्लिन की जिन्दगी का बेहद यादगार अध्याय रहे थे जॉनी हाइड. जब वे दोनों पहली बार मिले थे तब जॉनी की उम्र 53 साल थी. वे दिल के मरीज थे. उनकी बीमारी की गंभीरता का पता अधिकांश लोगों को नहीं था लेकिन उनका मर्ज इस कदर गंभीर और घातक था कि सप्ताह में दो बार उन्हें कार्डियोलॉजिस्ट के पास जाना पड़ता था. जॉनी और मर्लिन के बीच की केमिस्ट्री पार्टी में पहली मुलाकात से ही जाहिर होने लगी थी. इसका साफ-साफ पता चल रहा था कि मर्लिन की सुन्दरता पर जॉनी का दिल चारों खाने चित्त हो चुका था, दूसरी ओर मर्लिन उनकी पद-प्रतिष्ठा और रसूख को अच्छी तरह समझ चुकी थीं. वे जान चुकी थीं कि जॉनी ही मझधार में फंसी उनकी कैरिअर की नैया के खेवनहार हो सकते हैं. जॉनी के आस-पास बने रहना मर्लिन की जरूरत थी. उनके गुजर जाने के बाद लोग जब भी मर्लिन और जॉनी की बातें किया करते थे, तो वे मर्लिन को एक खूबसूरत गूंगी गुड़िया के रूप में याद करते थे जिनका एकमात्र काम जॉनी के हर कहे पर सहमति में सर हिलाना था. हालांकि बाद में यह साफ हो गया कि जॉनी की आज्ञाकारिणी गूंगी गुड़िया बनी रहने के पीछे उनके कुछ खास मकसद थे. इस रिश्ते की वजह से ही मर्लिन को हॉलीवुड में अगला मौका मिल सका. जॉनी की मदद से मर्लिन को मिली कई फिल्में बुरी तरह विफल रहीं. धीरे-धीरे मर्लिन को अहसास हुआ कि जॉनी पर उनकी निर्भरता से उन्हें कोई फायदा नहीं हो रहा था. जॉनी भी तबतक मर्लिन से शादी कर लेने के प्रति दृढ हो चुके थे जबकि मर्लिन अभी भी दुविधा में थीं.

1949 में मशहूर फोटोग्राफर टॉम केली का मर्लिन पर ध्यान गया. टॉम ने मर्लिन को निर्वस्त्र होकर फोटो खिंचवाने पर राजी कर लिया. उस जमाने में किसी भी औरत के लिए अंग-प्रदर्शन और अपने स्त्रीत्व का इस तरह इस्तेमाल करने को बहुत नीची नजरों से देखा जाता था. वैसे इस वाकये का परिणाम आगे चलकर मर्लिन को भुगतना ही पड़ा.

मर्लिन की अगली सफल फिल्म थी ‘द अस्फैल्ट जंगल’, जो 1950 में प्रदर्शित हुई थी. यह फिल्म भी उन्हें जॉनी की मदद से ही मिली थी. इस फिल्म की काफी सराहना हुई और मर्लिन की अदाकारी की सबने खूब प्रशंसा की. इसके बाद आई एक और सफल फिल्म “ऑल अबाउट ईव”. 1950 के ख़त्म होने तक मर्लिन की झोली में दो सफल फ़िल्में और 20th सेंचुरी फॉक्स के साथ सात फिल्मों का करार आ चुका था. इन सबके मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि साल 1950 मर्लिन के फिल्मी कैरिअर के लिए उद्भव का साल था. लेकिन उनका भाग्यचक्र ही कुछ ऐसा था कि यह साल भी वे सुख से नहीं बिता सकीं. इस साल का अंत उनके लिए एक ऐसा आघात लेकर आया जिससे वे कभी उबर नहीं पाईं. साल के अंत में जब क्रिसमस का त्यौहार अपने चरम पर था, मर्लिन और उनकी एक्टिंग कोच नताशा ने तिजुआनिया जाकर क्रिसमस के लिए खरीदारी करने की योजना बनाई. इस बीच जॉनी भी सप्ताहांत की छुट्टियां मनाने पाम स्प्रिंग्स गए हुए थे. वहीं उन्हें एक जबर्दस्त दिल का दौरा पड़ा जो जानलेवा साबित हुआ. जैसे ही यह खबर फैली, मर्लिन लॉस एंजिल्स की ओर दौड़ पड़ी. पर वे वक्त रहते नहीं पहुंच सकीं. वे सिर्फ दूसरों के मुंह से सुन सकीं कि मृत्यु-शैय्या पर पड़े जॉनी केवल उन्हीं को पुकार रहे थे.

जॉनी के गुजर जाने के बाद मर्लिन उनका घर छोड़कर नताशा के साथ रहने आ गईं. जॉनी की मौत के आघात से मर्लिन कभी उबर न सकीं. वे बहुत दुखी, अकेली और असंयत हो गईं. उन्हें हमेशा यही लगता था कि जॉनी द्वारा की जाने वाली शादी के गुहारों का प्रत्युत्तर नहीं दे पाने के कारण ही जॉनी कमजोर होकर आखिर दम तोड़ दिए. इस घटना से उनका अपराध-बोध बहुत ज्यादा बढ़ गया. साथ ही उनकी आत्महत्या की कोशिशों का भी सबको पता चल गया. उनके पड़ोसी बताते थे कि वे घर की जरूरतों के सामान खरीदती तो थीं लेकिन दुकान से लेकर आना भूल जाती थीं. उनकी जिन्दगी में काफी लम्बे समय तक यह अवसाद घिरा रहा. एक दिन नताशा जब काम से घर लौटी तो मुट्ठी भर नींद की गोलियां मुंह में घुलाती मर्लिन को फर्श पर पड़ी पाया.

the-multi-faceted-diva02

जब वे ठीक हुईं तो नताशा को बताया कि वे नींद की गोलियां बस इसलिए आजमा रही थी ताकि चैन की नींद सो सकें. कह सकते हैं कि जॉनी के वियोग ने मर्लिन को बाहर-भीतर हर तरफ से सोख लिया था. इसके बाद वे एक से दूसरी तबाही में खुद को झोंकती ही रहीं.

1951 में मर्लिन ने अपनी ज़िन्दगी के उस हिस्से पर फिर से ध्यान देना शुरू किया जो जेम्स के साथ कमउम्र में शादी करने की वजह से अधूरा ही रह गया था. नाजुक उम्र से ही घर की जिम्मेदारियां उठाने की वजह से उनकी शिक्षा पूरी नहीं हो सकी थी. अब उन्होंने लॉस एंजिल्स स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में साहित्य और कला की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया.

1952 में उनकी वे निर्वस्त्र तस्वीरें लीक हो गईं जो उन्होंने 1949 में खिंचवाई थीं. मीडिया में जोरदार हंगामा मच गया.

the-multi-faceted-diva03

तस्वीर की मॉडल के लुक, पहचान और उसका मर्लिन से मिलता-जुलता होने पर शक-ओ-सुबहे की तमाम कवायदें चलती रहीं. ऐसी विषम परिस्थिति में मर्लिन ने साहस और जज्बे का परिचय देते हुए अपने अतीत को स्वीकार किया और प्रेस और मीडिया में इसे कबूल किया कि वे तस्वीरें उन्हीं की हैं. उन्होंने यह भी बताया कि इस न्यूड फोटो खिंचवाने के एवज में उन्हें जो पैसे मिले थे, उसी से तब वे घर का किराया चुका पाई थीं. उस वक्त एकमात्र यही विकल्प बचा था उनके सामने, जिसका उन्हें कोई मलाल नहीं था. हालांकि इस घटना से मर्लिन के आत्मविश्वास पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन उनके कैरिअर के रास्ते में कठिनाइयां जरूर पैदा हुईं. फोट लीक की घटना से मीडिया में बन गई उनकी नकारात्मक छवि की वजह से 20th सेंचुरी फॉक्स का अनुबंध टूट गया. इस घटना के लिए सार्वजनिक माफ़ी मांगकर उन्होंने अपने फैन्स की काफी सहानुभूति भी बटोरी. इस पूरे घटनाक्रम के बाद वे काफी मशहूर हो गईं. यह तथाकथित बुरी घटना मर्लिन के लिए आशीर्वाद बन गई. इसी ने लोगों के मन-मस्तिष्क में उन्हें सेंसुअलिटी की वर्जित लुभावनी रोशनी से दीप्त एक देवी का दर्जा दिला दिया. बिना शक अब वे सेक्स की देवी बन चुकी थीं.

अन्य फिल्मों में मिली कामयाबी की बदौलत 1954 में मर्लिन फिर से 20th सेंचुरी फॉक्स का विश्वास जीतने में सफल हो गईं. उन्होंने मर्लिन के साथ फिर से फिल्मों के लिए करार किया. इसके बाद मर्लिन का कैरिअर एकरस चल रहा था कि 1955 में आई “द सेवेन इयर इच” बड़ी हिट साबित हुई. इस फिल्म से मर्लिन लाखों लोगों के दिल-ओ-दिमाग पर छा गईं. न्यूयॉर्क के लेक्सिंग्टन अवेन्यु पर उनका स्कर्ट उड़ाता हुआ जगत प्रसिद्ध दृश्य हॉलीवुड के इतिहास का एक कालजयी मील का पत्थर बन गया.

जबकि फिल्में और कैरिअर मनचाही मंजिल की ओर बढ़ रहे थे, मर्लिन की जाती जिन्दगी और निजी रिश्ते कमजोर पड़ते जा रहे थे. 1954 में 28 साल की उम्र में मर्लिन ने जो डीमागियो से शादी कर ली. उनकी यह दूसरी शादी परिशुद्ध प्रेम का परिणाम थी. प्रेस रिपोर्टों में मर्लिन और जो का प्रेम में पगे खूबसूरत जोड़े के रूप में बखान किया जाता था. ये तो “द सेवेन इयर इच” की शूटिंग के दौरान स्कर्ट उड़ाने वाले दृश्य का वाकया था जब इन दोनों को आपस में बात-बेबात झगड़ते देखा गया और इनका रिश्ता पूरी तरह टूट गया. तलाक की अपील में मर्लिन ने जो पर मानसिक क्रूरता बरतने का इल्जाम लगाया. जून 1955 में मर्लिन और जो डीमागियो कानूनन अलग हो गए.

the-egg-head-and-the-hourglass

जो के साथ विवाह के ठीक डेढ़ साल बाद लेकिन तलाक से पहले ही मर्लिन की प्रसिद्ध नाटक लेखक आर्थर मिलर से नजदीकियां बढ़ने लगी थीं. मर्लिन और आर्थर की दोस्ती 1950 से चली आ रही थी. किसी फिल्म की शूटिंग में आर्थर पहली बार मर्लिन से मिले थे.

उस जमाने में फिल्मी महकमे के बीच मर्लिन और आर्थर “द एग हेड एंड द आवर ग्लास” यानी “अंडे का सिर और रेत घड़ी” के नाम से जाने जाते थे. इनका साथ-साथ होना देखनेवालों के लिए एक दिलचस्प नजारा हुआ करता था. 1956 में शादी कर लेने तक इन दोनों ने मीडिया में कभी भी अपने रिश्ते को स्वीकार नहीं किया. तीसरी शादी के बाद भी मर्लिन फिल्मों में लगातार काम करती रहीं. उनकी फिल्म “बस स्टॉप” में उन्होंने एक कम अक्ल गायिका का बेहतरीन किरदार निभाया था. यह किरदार उनकी पिछली सभी फिल्मों के कॉमिक किरदारों से बिल्कुल अलग था. उनकी कमाल की अदाकारी की बदौलत 1957 में उन्हें अगली फिल्म मिली “द प्रिंस एंड द शो गर्ल”. इस फिल्म में वे अभिनेता लॉरेन्स ओलिवर की को-स्टार थीं. इस फिल्म की रिलीज के बाद उन्हें बेहतरीन अदाकारी के लिए पहला एवार्ड मिला. उन्हें डेविड डी डोनाटेलो अवार्ड से नवाजा गया, जो इटली के एकेडेमी अवार्ड जितना ही सम्मानजनक होता है. इस फिल्म के लिए उन्हें फ्रेंच क्रिस्टल स्टार अवार्ड भी मिला और उनका नाम बाफ्टा (ब्रिटिश अकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन आर्ट्स) अवार्ड के लिए भी नामांकित हुआ. पति की मदद और प्रोत्साहन से मर्लिन हॉलीवुड में अपनी जड़ें जमाने में कामयाब हो रही थीं.

1958 में मर्लिन ने एक बेहद महत्वाकांक्षी फिल्म “सम लाइक इट हॉट” की जिसने उनकी अदाकारी की धूम मचा दी. क्या आम जनता और क्या आलोचक, सभी ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की. इस फिल्म ने कामयाबी के झंडे बुलंद करते हुए एकेडमी अवार्डों के छह वर्गों में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी. मर्लिन ने इस साल ‘बेस्ट एक्ट्रेस इन अ मोशन पिक्चर’ का गोल्डेन ग्लोब अवार्ड जीता.

the-egg-head-and-the-hourglass01

इस बेहतरीन कामयाबी के बाद मर्लिन ने 20th सेंचुरी फॉक्स के साथ 1955 में किए करार के अनुसार चार फिल्मों पर काम करना शुरू किया. इस कड़ी की अगली फिल्म थी ‘लेट्स मेक लव’. इस फिल्म के बनने के दौरान उनकी दोस्ती फ्रेंच एक्टर और गायक य्वेस मोंटंद से हुई. इसी बीच आर्थर को बिजनेस के सिलसिले में यूरोप जाना पड़ा. आर्थर की गैरहाजिरी का मर्लिन पर बहुत बुरा असर पड़ा. उनके मूड का उतार-चढ़ाव और गुस्से का दौरा काफी गंभीर रूप से प्रकट होने लगा. वे सेट पर भी समय से नहीं पहुंचतीं. उनकी असंयत दशा से फिल्म के क्रू के सदस्य हमेशा डरे रहते थे. आखिरकार ये परेशानियां को-स्टार मोंटंद के हस्तक्षेप से कुछ सुधरीं. इस वक्त मर्लिन में उजागर होने वाली परेशानियां सभी को वक्ती लगा था लेकिन असल में ये तो उनके लिए गंभीर समस्याओं की शुरुआत भर थी. सच्ची तस्वीर दिखनां तो अभी बाकी था. इस बीच मोंटंद और मर्लिन के रिश्ते में एक नया मोड़ आया. मोंटंद की पत्नी सिग्नोरेट किसी फिल्म की शूटिंग के लिए यूरोप चली गईं. इस दौरान मोंटंद और मर्लिन एक-दूसरे के काफी करीबी बन गए. ऐसी खबरें आईं कि इन दोनों के बीच दोस्ती से बहुत ज्यादा की साझेदारी चल रही थी. जो भी हो, यह सिलसिला लम्बा नहीं टिक सका. इस रिश्ते के खत्म होने के पीछे कारण यह बताया गया कि मोंटंद अपनी पत्नी को छोड़ने के लिए राजी नहीं थे. दूसरी ओर आर्थर के साथ मर्लिन की शादीशुदा जिन्दगी की डोर भी कमजोर पड़ती जा रही थी. इनकी शादी चार सालों तक चल सकी. जनवरी 1961 में इन दोनों का तलाक हो गया. इसी साल 35 वर्ष की उम्र में मर्लिन ने अपनी आखिरी फिल्म, “द मिसफिट”, पूरी की. यह फिल्म नेवेडा के कुछ स्थानीय निवासियों पर लिखी गयी आर्थर की एक कहानी पर आधारित थी. कुछ रिपोर्टों के अनुसार आर्थर मर्लिन के साथ अपनी शादीशुदा जिन्दगी पर आंच नहीं आने देना चाहते थे. “द मिसफिट”, की स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले मर्लिन के लिए आर्थर का वेलेंटाइन गिफ्ट था परन्तु आर्थर को अहसास हो गया था कि उनका आपसी रिश्ता इस कदर बिगड़ चुका है कि सुधरने की गुंजाईश नहीं बची है. फिल्म “द मिसफिट” को कुछ प्रशंसा भी मिली तो कुछ आलोचना भी, लेकिन मर्लिन की अदाकारी की आलोचकों ने भी दिल खोल कर तारीफ की. इस फिल्म के लिए उन्हें वर्ल्ड फिल्म फेवरिट की कैटेगरी में गोल्डेन ग्लोब अवार्ड से नवाजा गया. यह मर्लिन के जीवन की विडम्बना ही थी कि एक ओर जहां रूपहले पर्दे पर दिनोंदिन उनकी अदाकारी और प्रतिभा निखरती जा रही थी, वहीं दूसरी ओर उनकी निजी जिंदगी बवंडरों में घिरी थी. उनकी तीन शादियां टूट चुकी थी लेकिन अब भी वे सच्चे प्रेम की तलाश में भटक रही थीं. इसके साथ ही उनका मानसिक स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं था.

शुरू से ही मर्लिन का कैरिअर उतार-चढ़ावों से भरा रहा. बुरे व्यवहार और खराब अभिनय के कारण जाने-माने फिल्म प्रोड्यूसरों के साथ उनके करार टूटते रहे. शुरू में तो उन्हें ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए वे ज्यादा-से-ज्यादा जरूरतमंद होती गईं. मशहूर होने की उनकी महत्वाकांक्षा उन्हें गलत दिशाओं में भटकाती रही. वे न तो खुद के प्रति ईमानदार रह सकीं, न अपने उन अजीज दोस्तों के प्रति जो समय विशेष में उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण थे. उन्होंने कुछ बेवजह के फैसले लिए जो काफी हद तक वर्जित माने जाते थे. दो पतिओं को छोड़ना और कैरिअर में गलत चुनाव करने का उन्हें काफी खामियाजा भुगतना पड़ा. फिल्म शेड्यूलों का ठीक से पालन नहीं करना और बेवजह गैरवाजिब लोगों को महत्व देने जैसे कारणों से फिल्म निर्माता भी उनसे बचना चाहने लगे थे.

walking-the-unsteady-path

Content on this page requires a newer version of Adobe Flash Player.

Get Adobe Flash player

किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व पर उस परिवेश का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है जिसमें वह जन्म लेता और पलता-बढ़ता है. एक वयस्क इन्सान में उसका बचपन झलकता है. मर्लिन के बचपन की परिस्थतियां तो काफी कष्टप्रद थीं, जबकि, बड़ी होकर उनकी पहचान एक जगत प्रसिद्ध अदाकारा के रूप में बनी. बचपन की कष्टदायक स्मृतियों से वे खुद को कभी आजाद नहीं कर सकीं जो आगे चलकर उनकी सेहत के लिए जानलेवा परेशानियों का सबब बन बैठी. उनका बचपन बहुत अकेलेपन में गुजरा. उन्होंने जब-तब झकझोर देने वाली स्थितियों का सामना किया. उनका न तो कोई एक अभिभावक रहा, न ही उन्हें एक स्थायी छत नसीब हुई. मां की ममता और पिता की सुरक्षा की तलाश में वे एक से दूसरे घर में भटकती रहीं. जन्म से लेकर किशोर होने तक के सभी नाते-रिश्ते उनपर जबर्दस्ती थोपे गए थे. चाहे वो बच्चे पालने वाले माता-पिता हों, अपनी मां का लौटना हो, ग्रेस आंटी हों, या ऐना आंटी हों, इनमें से किसी को भी मर्लिन ने खुद नहीं चुना था. उन्होंने वही किया, जो दूसरों ने करने को कहा. बचपन में जिन परिस्थितियों से वे गुजरीं, चाहे सिर पर एक स्थायी छत का न होना हो या खुद पर हो रहे अन्यायों को न रोक पाना हो या निरंतर एक परिवार की तलाश हो; हर वाकये ने बार-बार उन्हें एक ही तथ्य समझाया कि इस दुनिया में जिन्दा रहने की सबसे बड़ी जरूरत सत्ता और प्रसिद्धि ही है. निजी संबंधों के मामले में भी वे हमेशा ऐसे लोगों के पीछे भागती रहीं जो शक्तिसंपन्न हों और उन्हें सुरक्षा की गारंटी देने में समर्थ हों. जीवन के उत्तरार्ध में जब उन्हें अपनी मंजिल हासिल हो गयी, तब यश और दोस्त, दोनों की उन्हें कोई कमी नहीं रही थी. बस एक ही चीज बदली थी कि अब उन्हें समझ-बूझ की शक्ति हासिल थी. कई नामचीन व्यक्तियों से उनके रिश्ते जुड़े. कुछ उनके बड़े करीबी रहे तो कइयों के साथ उनका रिश्ता बेहद छोटे समय तक ही रहा. उनके दोस्तों की संख्या बहुत अधिक थी, लेकिन उससे भी ज्यादा थी उनके छिटपुट प्रेम-संबंधों की संख्या.

the-batched-marriages

पिता के प्यार की कमी ने मर्लिन के भीतर कभी न भरने वाला एक खालीपन पैदा किया था. मर्लिन की जिंदगी में आए सभी पुरुष उनके लिए इसी कमी को पूरा करने का जरिया थे. खास तौर से पहले पति जिम्मी को तो वे डैडी ही संबोधित करती थीं. मर्लिन को याद करते हुए जिम्मी बताते थे कि किस तरह वे उन्हें आत्महत्या कर लेने की धमकी दिया करती थीं अगर उनकी बात नहीं सुनी गई. कई बार उन्होंने चेतावनी दी थी- ” डैडी, यदि हमारी शादी में कुछ भी बुरा हुआ तो मैं पुल से कूद जाउंगी.” उनकी पहली शादी टूटने का कारण उनके कैरिअर और सपनों की राह का बोरियत भरा होना माना जाता है. मर्लिन पर बन रही डॉक्युमेंटरी के दौरान उनके पहले पति ने बताया था- “हमारी शादी के बीच उनके लुभावने सपनें आ गए.” उन्होंने यह भी कहा कि वे हमेशा ही मर्लिन को प्यार करते रहे और वे उनकी सबसे अनमोल दोस्त थीं. मर्लिन की कुछ अजीब खासियतें थीं जिनकी वजह से उनकी शादियां टिक न सकीं. एक बार उन्होंने कहा था, “एक बुद्धिमान लड़की किस करती है, प्यार नहीं, सुनती है पर विश्वास नहीं करती और कोई दूसरा उसे छोड़ दे, इससे पहले वह खुद दूसरे को छोड़कर चल देती है.” भले ही वे बहुत खूबसूरत और आकर्षक रही हों लेकिन धीरज और विश्वास जैसे गुण उनमें नहीं थे. निर्णय लेने में वे बहुत जल्दबाज थीं और निर्णयों को तुरंत लागू करने में यकीन करती थीं. जो डीमागियो से उनकी शादी कुछ छोटे-मोटे झगड़ों और गलतफहमियों की वजह से टूटी. उनके मरने के बाद कई प्रशंसकों ने राय जाहिर की थी कि जो के साथ उनका रिश्ता सच्चा था और अगर यह शादी नहीं टूटती तो शायद मर्लिन की जिंदगी कुछ और होती.

मानसिक असंतुलन, तनाव और चिंता शुरू से ही उनके जीवन के अभिन्न अंग थे. 16 साल की उम्र में जब उन्होंने जिम्मी से पहली शादी की थी तो अपने पति से वे अक्सर तरह-तरह की आवाजें सुनाई पड़ने और किसी के द्वारा खुद का पीछा किए जाने की शिकायत किया करती थीं.

the-batched-marriages01

बाद में हॉलीवुड में आने के बाद जॉनी हाइड से उनकी गहरी छनने लगी थी. जॉनी भी बहुत शक्तिसंपन्न और प्रतिष्ठित थे. वे मर्लिन को न सिर्फ बहुत चाहते थे, बल्कि उनकी इन परेशानियों को दूर करने में काफी मदद भी करते थे. जॉनी ने ही मर्लिन को नशीली दवाओं का इस्तेमाल करना सिखाया. चिंता और अवसाद से निबटने के लिए जॉनी ने डॉक्टरों से कहकर मर्लिन को बार्बीट्यूरेट्स (डॉक्टरों द्वारा दी जाने वाली दवा) देने की व्यवस्था करवाई. शुरू में तो इस दवा ने मर्लिन पर अच्छा प्रभाव दिखाया, लेकिन धीरे-धीरे इस दवा पर उनकी निर्भरता बढ़ती गई और आखिर जानलेवा बन गई.

1950 में जॉनी के मरने के बाद मर्लिन बिल्कुल टूट गईं. किसी भरोसेमंद और सुरक्षा का वादा देने वाले व्यक्ति की छाया में हर वक्त रहने की उनकी चाहत उन्हें दिनोंदिन लोगों पर ज्यादा-से-ज्यादा निर्भर बनाती गई. छोटे-मोटे झगड़े या जरा- सी भी आलोचना उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं हो पाती थी. इसका कारण था उनका हर वक्त नशीली दवाओं के प्रभाव में होना, जो उन्हें जीवन की सच्चाइयों से दूर धकेलती रहीं. वे कभी भी पूरे होशोहवास में नहीं रहती थीं. मुश्किलों से पार पाना उनके लिए असंभव हो जाता. तब वे और ज्यादा दवाओं का सहारा लेतीं.

बाद में जब उन्होंने खुद से दस साल से भी ज्यादा बड़े आर्थर मिलर से विवाह किया, तो यह साफ जाहिर हो गया कि विद्वान और आर्थिक रूप से सबल पुरुषों के प्रति उनके मन में गहरा आकर्षण था. उनके लिए आर्थर की भी पिता जैसी शख्सियत थी. इस शादी के बाद जब उनका गर्भपात हो गया, तो अपने बच्चे को खो देने का उन्हें इतना गहरा सदमा लगा कि वे पूरी तरह बिखर गईं. यह उनकी सेहत के लिए बहुत खतरनाक साबित हुआ. इसी बीच उनकी मां की लिखी एक निष्ठुर चिट्ठी आई जिसमें मर्लिन को एक गैरजिम्मेदार मां होने की खातिर खूब धिक्कारा गया था. यह चिट्ठी उनकी स्थिति को और ज्यादा नाजुक बनाने के लिए काफी थी. वे और ज्यादा दवाएं लेने लगीं. इस दौरान जब वे बुरी तरह बीमार पड़ गईं तो लॉस एंजिल्स के डॉ. राल्फ ग्रीन्सन से उनका इलाज चला. उनके मुताबिक मर्लिन हमेशा अनिद्रा की शिकायत किया करती थीं और साथ ही आर्थर को कोसा करती थीं कि वे उनकी अच्छी तरह देख-भाल नहीं कर रहे हैं. दूसरी ओर मर्लिन की असंयत मानसिक दशा से आर्थर बहुत विचलित हो गए थे. मर्लिन बेवजह उनपर चीखना-चिल्लाना शुरू कर देती थीं. वे पहले से ही जानते थे कि मर्लिन को मनोचिकित्सक की जरूरत है. एक दिन वे किसी रेस्टोरेंट में बैठे थे कि मर्लिन का फोन आया. वे आर्थर से आकर उन्हें बचा लेने की गुहार कर रही थीं. तब आर्थर को समझ में आ गया कि उन्हें मर्लिन की ज्यादा सुरक्षा करनी चाहिए थी. उधर डॉ. ग्रीन्सन मर्लिन का दवाओं पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे थे, क्योंकि ये दवाएं मर्लिन की स्थिति और बिगाड़ रही थीं.

1961 में आर्थर से अलग हो जाना भी मर्लिन के लिए बर्बादी की ओर बढ़ा एक अगला कदम ही था. उस वक्त उनका इलाज डॉ. मरियन क्रिस कर रही थीं. मर्लिन का आत्महत्या के प्रति जुनून से वे अच्छी तरह वाकिफ थीं. मर्लिन की दवाएं बिल्कुल बंद कर दी गईं. ऐसे में पूरी निगरानी रखने के लिए छद्म नाम से उन्हें न्यूयॉर्क हॉस्पिटल में भरती किया गया. उन्हें जबर्दस्ती हॉस्पिटल के पेन ह्वाईटनी साइकियाट्रिक डिविजन में रखा गया. जब वे इस डिविजन से गुजर रही थीं तो एक के बाद एक स्टील के दरवाजों को देखकर वे काफी उत्तेजित हो गई थीं और जब उन्हें भी एक कैबिनेट में बंद किया जाने लगा तो जी-जान से उन्होंने इसे रोकने की कोशिश की. जब सारी कोशिशें नाकाम रहीं तो उन्होंने खिड़की का एक कांच तोड़ डाला. कांच के टुकड़े को अपनी कलाई पर रखकर डॉक्टरों को खुद को मार डालने की धमकी देने लगीं.

the-batched-marriages02

जैसे-तैसे उस वक्त स्थिति को संभाला गया और उन्हें उस पागलखाने की किसी अन्य मंजिल पर रखा गया जो ज्यादा गंभीर रोगियों के लिए था.

इलाज के दौरान उन्हें अपनी पसंद के किसी एक व्यक्ति को फोन करने की इजाजत मिली थी. मर्लिन किसी ऐसे भरोसेमंद शख्स को फोन करना चाहती थी जो हर हाल में वहां से उन्हें मुक्त करा सके. उन्होंने जो डीमागियो को फोन किया. जो के एक दोस्त बताते हैं कि जब मर्लिन का फोन आया तब वे फ्लोरिडा के अपने मोटल में थे. पहले तो उन्होंने इसे दवाओं के ओवरडोज का असर समझते हुए मर्लिन का भ्रम ही समझा, लेकिन उनकी आवाज में उभरते दर्द और बार-बार आकर बचा लेने की याचना सुनकर वे बिना कुछ आगा-पीछा सोचे बस चल पड़े. वे बस इतना जानते थे कि इस वक्त मर्लिन को उनकी जरूरत है. वे न्यूयॉर्क जाकर मर्लिन को पागलखाने से बाहर निकाल लाये.

अगले तीन सप्ताह तक डीमागियो के भरोसे पर उस हॉस्पिटल में मर्लिन का इलाज चला. उस वक्त मर्लिन के अटॉर्नी ने कुछ दस्तावेज बनाए जिसके मुताबिक जो डीमागियो उनके कानूनन अभिभावक बन गए. जो डीमागियो की इजाजत के बगैर किसी और का मर्लिन के सन्दर्भ में कोई भी निर्णय लेना कानूनन दंडनीय अपराध था. कुछ दिनों बाद जब मर्लिन इतनी संतुलित हो गयीं कि खुद अपनी देखभाल कर सकें, तब उन्हें पागलखाने से छुट्टी दे दी गई.

the-kennedy-kitsch

मर्लिन का पुरुषों के साथ बनाए गए रिश्तों से एक बात जरूर जाहिर होती है कि सभी रिश्ते किसी रूहानी प्रेम की तलाश का परिणाम थे. वे ऐसे पुरुषों के प्रति आसक्त हो जाती थीं जो बड़े रसूख वाले और वाकपटु होते थे. उनके धुंधले बचपन ने जो खालीपन दिया था उसकी भरपाई किसी समर्थ, पिता-तुल्य शख्स से ही हो सकती थी.

मर्लिन के सर्वनाश का शिलान्यास उस दिन हुआ जब पागलखाने से निकलने के बाद ही लॉस एंजिल्स में उनकी मुलाकात पेट्रिसिया केनेडी लॉफोर्ड से हुई. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी की बहन थीं पेट्रिसिया. मर्लिन उन्हें प्यार से पैट बुलाती थीं. वे दोनों बड़ी जल्दी ही सहेलियां बन गईं. बाद में पेट्रिसिया के पति पीटर लॉफोर्ड से भी मर्लिन की दोस्ती हो गयी. पीटर लॉफोर्ड पेशे से अभिनेता थे. धीरे-धीरे वे पूरे केनेडी खानदान की आत्मीय बन गईं. जॉन एफ. केनेडी हमेशा से ही हॉलीवुड की संस्कृति और खूबसूरती के प्रशंसक थे. पहले भी कई हसीनाओं से उनकी रंगरलियों की चर्चा आम हो चुकी थी.

1962 की शुरुआत में पीटर ने मर्लिन को केनेडी हाउस में रात्रि-भोज के लिए आमंत्रित किया. इस पार्टी का नियत समय 8 बजे रात्रि का था, लेकिन मर्लिन जान-बूझकर देर से पहुंची. वे जानती थीं कि कोई उनका बेसब्री से इंतजार कर रहा है. जैसे ही वे पहुंचीं, वहां मौजूद हर किसी ने जॉन और मर्लिन के चहरे पर उत्कंठा के भाव देखे. पार्टी-हॉल में मर्लिन के दाखिल होते ही राष्ट्रपति के साथ बाकी सभी उनके सम्मोहक सौन्दर्य को देखकर अवाक रह गए. उनका आगे बढ़ना बिलकुल फिल्मी दृश्य की तरह बन गया. उनका रास्ता बनाने के लिए मौजूद सभी लोग जैसे दो दिशाओं में खींच लिए गए. उनके गुजरने तक महफिल थम गई. उनसे परिचित होने के लिए लोग मरे जा रहे थे.

the-kennedy-kitsch01

इस पार्टी में पहली बार मर्लिन और जॉन को आपस में बात-चीत करने का मौका मिला. इससे पहले कई बार इनकी आपस में देखा-देखी तो हुई थी, लेकिन चुहलबाज नजरों के अलावा और कोई आदान-प्रदान नहीं हो सका था. इसी पार्टी में जॉन ने मर्लिन के साथ पाम स्प्रिंग्स, फ्लोरिडा में सप्ताहांत की छुट्टियां बिताने की इच्छा जाहिर की थी.

उस सप्ताहांत के बाद जॉन एफ. केनेडी और मर्लिन के रिश्ते में तूफानी मोड़ आया. मर्लिन की मौत के बाद अखबार, पत्रिकाएं और टीवी के समाचार उस सप्ताहांत की छुट्टियों को लेकर तरह-तरह की अफवाहों से रंग गए. लॉस एंजिल्स के एक भूतपूर्व विशेष सलाहकार और काउंटी को पहली बार मर्लिन से तब मिलने का मौका मिला था, जब वे राष्ट्रपति के साथ पाम स्प्रिंग्स में छुट्टियां बिता रही थीं. काउंटी की माने तो मर्लिन बहुत ही आरामदायक मुद्रा में थीं और एक रोब के सिवा कुछ नहीं पहनी हुई थीं. उन्होंने मर्लिन और जॉन एफ. केनेडी के बीच दिख रही अंतरंगता के बारे में भी बताया. इसमें कोई शक नहीं कि वे दोनों एक-दूसरे के साथ का भरपूर लुत्फ उठा रहे थे. यह मिलन उस सप्ताहांत तक बड़ी मधुरता से चला, लेकिन उसके बाद जो कुछ भी हुआ, वह बेहद विषादपूर्ण था. मर्लिन के लिए यह एक खूबसूरत रिश्ते की शुरुआत थी, जबकि केनेडी के लिए यह आम रंगरलियों की अगली कड़ी भर थी, जिसका थोड़े समय बाद खत्म हो जाना लाजिमी था.

मर्लिन अपने पिछले सभी टूटे रिश्तों से अलग इस बार उस सप्ताहांत की छुट्टियों में केनेडी के साथ अनुभूत खुशनुमा यादों की डोर थामे बैठी थीं, जबकि केनेडी अपने राजनैतिक कैरिअर को और मजबूत बनाने में पूरी तरह निमग्न थे. वैसे मीडिया, आम जनता और प्रेस, सभी को उनकी इश्कबाजियों का बखूबी पता था. उनके लिए उनकी सूची में एक और नाम का इजाफा भर थी मर्लिन. ज्यादा-से-ज्यादा एक कीमती नाम भर. इसके सिवा कुछ नहीं. सच तो यह है कि एक बार उन्होंने मर्लिन से कहा भी था, “तुम देश की प्रथम महिला बनने योग्य नहीं हो प्रिय.” उनका कहा यह एक वाक्य मर्लिन के लिए पुल से कूद जाने के लिए काफी था. इससे न सिर्फ मर्लिन के मन में केनेडी को खो देने का डर समा गया, बल्कि इसने उन्हें अस्वीकृत कर दिए जाने का असह्य दुःख भी दिया. साथ ही यह अहसास भी कि उनके पास इस असहनीय स्थिति को बदल डालने का कोई सामर्थ्य नहीं है. परिस्थितियों के इस कदर उलट-पुलट हो जाने में बमुश्किल दो से तीन सप्ताह का ही वक्त लगा था.

केनेडी के एक बेहद करीबी दोस्त, जॉर्ज स्मैदर्स ने एक बार बताया था, ” पाम स्प्रिंग्स से लौटने के बाद से ही केनेडी के लिए मर्लिन का अस्तित्व गैर महत्वपूर्ण हो चुका था, लेकिन मर्लिन उन्हें बार-बार फोन करती रहीं और वे फोन टालते रहे.”

the-kennedy-kitsch02

केनेडी के साथ मर्लिन की अगली गुप्त मुलाकात वाशिंगटन डीसी में हुई थी जब वे अचानक ह्वाईट हाउस पहुंच गई थीं. यह मुलाकात बहुत छोटी रही थी और उन्हें तत्काल मोटर-बोट में बिठाकर वापस भेज दिया गया था.

पहले से ही असंतुलित और दवाओं के नशे से प्रभावित मर्लिन इन घटनाओं से तिलमिला गईं. जॉन की ओर से कभी कोई सन्देश आए, इसका हर प्रयत्न करके हार गईं वे, लेकिन कुछ नहीं हुआ. सबसे दुखद तो यह था कि जॉन ने कभी भी खुद नहीं कहा कि वे उनसे कोई ताल्लुकात नहीं रखना चाहते हैं. हर बार कोई अन्य व्यक्ति दूत बनकर यह सन्देश पहुंचाता रहा. इससे मर्लिन का पारा और चढ़ जाता था. मर्लिन के दुखद अतीत, उनकी चिंता और तनावों के बारे में जॉन केनेडी को सबकुछ पता था. वे जानते थे कि एक और रिश्ते का टूटना मर्लिन के लिए बर्दाश्त से बाहर होगा. ठुकरा दिया जाना उन्हें कतई कबूल नहीं होगा, यह जानते हुए भी केनेडी ने ठीक वही किया. वह भी बड़े भद्दे तरीके से. वे हमेशा मर्लिन को गलत रास्तों पर धकेलते रहे. वे बस उनसे खेलते रहे लेकिन यह भूल गए कि वे किसी भयानक विस्फोटक से खेल रहे हैं. 19 मई 1962 को मेडिसन स्क्वायर गार्डेन में उत्तेजक रेशमी आवाज में मर्लिन का गाया गीत “हैप्पी बर्थडे मिस्टर प्रेसिडेंट” अमेरिका की पूरी जनता के सामने राष्ट्रपति से अपने रिश्ते का इजहार तो था ही, साथ ही कातिल अदाओं की मीठी छूरी से वार करते हुए यह भी साफ कर देना था कि राष्ट्रपति के लिए उनसे पीछा छुड़ाना इतना आसान भी नहीं. इस घटना से ह्वाईट हाउस की मालकिन, जॉन की पत्नी जैकी केनेडी, भभक उठीं. मर्लिन ने सार्वजनिक रूप से जो किया था, वह जैकी के फट पड़ने के लिए काफी था. उन्होंने धमकी दी कि यदि मर्लिन का अध्याय यहीं-का-यहीं खत्म नहीं हुआ तो वे जॉन को तलाक दे देंगी. आने वाले चुनावों को देखते हुए जॉन अपनी साख पर और अधिक बट्टा नहीं लगवाना चाहते थे. इसलिए पूरे होशोहवास से उन्होंने अपनी जिंदगी से मर्लिन को हमेशा के लिए उखाड़ फेंकने का निर्णय लिया. इस काम को अंजाम देने के लिए उन्होंने अपने भाई रॉबर्ट, जो बॉबी केनेडी के नाम से मशहूर थे, को मर्लिन के पास भेजा. रॉबर्ट ने सबकुछ खत्म होने का सन्देश कह सुनाया. उनका यह कहना मर्लिन की ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ. यह सुनना मर्लिन के लिए होशोहवास खो देने और खुद को जर्रा-जर्रा खत्म कर देने के लिए काफी था. वे बेहिसाब दवाएं लेने लगीं. उन्हें ऐसा गहरा सदमा लगा कि वे कभी ठीक नहीं हो सकीं. उन्होंने ह्वाईट हाउस में अनगिनत फोन किए. अपनी कोशिशों में लगातार असफल होने से उन्हें भी अहसास हो गया कि अब कोई चमत्कार नहीं होने वाला. चूंकि वे हमेशा दवाओं पर निर्भर रहतीं, इसलिए दवाओं की अधिकता और विभ्रम के दौरे अब उनके लिए रोज की बात हो गयी. यह सब उनके लिए एक खतरनाक चक्र बन गया. वे अपनी मां की तरह एक मानसिक रोगी बनने से डरती थीं. इसलिए और ज्यादा दवाएं लेने लगीं. दवाओं की ज्यादा मात्रा उनके मानसिक स्वास्थ्य को और बिगाड़ता गया. हॉस्पिटल से निकलने के बाद मर्लिन की स्थिती में जो भी अच्छी शुरुआत हुई थी, गलत लोगों की दोस्ती की वजह से उनकी मौत का कारण बन गई.

the-curtain-comes-down

मर्लिन की मौत पर काफी कुछ कहा-सुना गया. वे 5 जून 1962 को लॉस एंजिल्स के अपने घर में मरी पाई गईं. उनकी मौत बेहद रहस्यमय परिस्थितियों में हुई थी. मीडिया में उनकी मौत को आत्महत्या की एक और कोशिश के रूप में उछाला गया. एक कामयाब कोशिश. ऑटोप्सी के दौरान उनके खून में सिर्फ दवाएं-ही-दवाएं पाई गई. इन दवाओं ने उनके शारीरिक तंत्र को बेहद जहरीला बना दिया था जो उनकी मौत का कारण बनीं. यह भी पता चला कि मौत से ठीक पहले उन्होंने ह्वाईट हाउस में जॉन केनेडी को आखिरी फोन किया था. यह खबर मीडिया में रह -रह कर उछलने वाले उनके बनते-बिगड़ते रिश्ते की पुष्टि के लिए काफी थी. हालांकि मर्लिन की मौत को काफी लम्बे समय तक आत्महत्या ही माना जाता रहा लेकिन बाद में उजागर हुई सच्चाइयों से यह साफ हो गया कि असल में ऐसा नहीं था. इस घटना के एक और कोण का तब पता चला जब यह खबर आई कि मौत की रात मर्लिन के ब्रेंटवुड हाउस में बॉबी केनेडी उनसे मिलने गए थे.

‘मर्लिन मुनरो- डेथ बाई कंसेंट” नामक किताब के लेखक डॉ. जैक हैटम दावा करते हैं कि एफबीआई ने मर्लिन की मौत के 20 सालों के बाद कुछ दस्तावेज जारी किए थे. उन दस्तावेजों में कुछ ऐसी सच्चाइयों का जिक्र है, जिनपर तब ध्यान दिया जाना चाहिए था. यह किताब इशारा करती है कि बॉबी केनेडी और पीटर लॉफोर्ड ने मिलकर कुछ ऐसा उपाय किया जिससे कि मर्लिन उस रात आत्महत्या कर लें. उन्होंने मर्लिन को आत्महत्या का नाटक करने का सुझाव दिया ताकि उन्हें मीडिया और 20th सेंचुरी फॉक्स की सहानुभूति मिल सके जो उनकी बीमारी और अस्थिरता की वजह से उनसे किनारा कर चुका था. इस कदर खूनी योजना के पीछे मर्लिन का केनेडी परिवार के बारे में कुछ बेहद गोपनीय राज जान लेना था, जिसे उन्होंने लाल रंग की एक डायरी में लिख रखा था. यह डायरी आज तक लापता है. डॉ. जैक हैटम अपनी किताब में यह भी लिखते हैं कि यह डायरी बॉबी अपने साथ ले गए, जब वे मर्लिन की मौत के बाद उनके घर आए थे. उनकी किताब में एफबीआई के दस्तावेजों में दर्ज रॉबर्ट केनेडी और पीटर लॉफोर्ड के बीच की एक बातचीत का भी हवाला है, जिसके अनुसार रॉबर्ट ने पीटर से पूछा था, “क्या अबतक वो मर गई होगी…?”

एफबीआई के रिपोर्टों के अनुसार मर्लिन को केनेडी परिवार द्वारा की गयी कुछ बड़ी बेईमानियों का पता था. यदि केनेडी परिवार ने उन्हें तवज्जो देने से कतराना बंद नहीं किया तो वे उन बेईमानियों को मीडिया में उजागर कर देने की धमकी दिया करती थीं. एफबीआई की मर्लिन पर तब से नजर थी जब उन्होंने आर्थर मिलर से शादी की थी. एफबीआई आर्थर को वामपंथी मानकर उनपर पूरी निगरानी रख रहा था कि कहीं आगे चलकर वे कोई खतरा न पैदा करें. आर्थर के बारे में जानकारी हासिल करने के सिलसिले में एक और चौंकाने वाली नई खबर पता चली कि रॉबर्ट और मर्लिन के बीच कोई साझेदारी थी. ऐसा समझा जाता है कि रॉबर्ट और मर्लिन के बीच भी नजदीकी ताल्लुकात थे. डॉ. जैक हैटम की किताब बताती है कि एक अंतरंग क्षण में रॉबर्ट ने मर्लिन को किसी क्यूबन मिसाइल मामले का राज बताया था. बाद में रॉबर्ट को यह राज बताने का अफसोस हुआ कि कहीं बदला लेने के लिए मर्लिन इसे जाहिर न कर दे. ऐसे में उन्हें अपने ही परिवार के गुस्से का सामना करना पड़ता.

the-mystery-prevails

सवाल कई थे जो जब-तब उठते रहे. यदि मर्लिन की मौत में रॉबर्ट का शामिल होना स्पष्ट था जिसका प्रमाण एफबीआई की फाइलों में भी सुरक्षित था, तो इसपर कार्यवाही क्यों नहीं की गयी? डॉ. हैटम कहते हैं कि ऐसा शायद इसलिए था कि कहीं-न-कहीं सभी इस बात को मानते थे कि मर्लिन की मौत का जिम्मेदार केनेडी परिवार ही है. हालांकि इस घटना के बारे में न तो जवाब दिए गए, न ही प्रमाण लेकिन कई तरीकों से यह स्पष्ट था कि जानबूझकर या अनजाने केनेडी परिवार ने ही मर्लिन के लिए कब्र खोदी लेकिन मर्लिन के अंतिम सर्वनाश में शामिल व्यक्तियों को किसी भी परदे में छुपाया नहीं जा सकता था.

मर्लिन ने एक बार कहा था, ” मैं स्वार्थी, अधीर और असुरक्षा की भावना से भरी हुई हूँ . मैं गलतियां करती हूँ. कई बार मैं इतनी अनियंत्रित हो जाती हूँ कि संभाले नहीं संभलती. लेकिन यदि आप मुझे बुरे वक्त में नहीं संभाल सकते तो मेरे लिए आपका कोई मतलब नहीं है और न ही अच्छे दिनों में आप मेरी नजदीकी के काबिल हैं.” सभी जानते हैं कि जॉन एफ. केनेडी ने मर्लिन से कभी प्यार नहीं किया, न ही वे इसके योग्य थे. लेकिन दूसरे पति जो डीमागियो एक ऐसे शख्स थे, जिनपर मर्लिन को अपने अच्छे-बुरे हर वक्त में पूरा भरोसा था. हर कदम पर मर्लिन का साथ देते रहे जो क्योंकि वे उन्हें बेइंतिहां प्यार करते थे. उनकी कब्र पर 20 साल बाद तक भी वे फूल चढ़ाते रहे.

the-mystery-prevails01

उनके हिस्से मर्लिन का बुरा वक्त ही आया. चाहे उनके इल्जामात हों या खराब सेहत या दर्द; जो के हिस्से में मर्लिन के खुशनुमा पल कभी नहीं आए. वे खुशनुमा पल जिनके सिर्फ वही हकदार थे लेकिन हमेशा ही जिससे वे वंचित रहे.

जाहिर है कि मर्लिन भावावेश में व्यवहार करती थीं और हमेशा ही आकर्षण का केंद्र बनी रहना चाहती थीं. उनका डर और किसी के द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने का विभ्रम सिर्फ इस चिंता से उपजा था कि हालात उन्हें कहीं उनकी मां जैसा न बना दे. बचपन में उन्होंने अपनी मां को पागल हो जाते देखा था और उनके जैसा ही हो जाने का डर उनके दिलोदिमाग और आत्मा की शान्ति लील रहा था.

वे एक ऐसी निर्दोष आत्मा थीं कि अपने प्यार करने वालों पर उन्होंने खुद को कुर्बान कर दिया. उनके साथ गड़बड़ी बस ये थी कि वे किसी भी चीज पर टिक नहीं सकीं. प्यार की उनकी तलाश कभी पूरी नहीं हो सकी. इसी वजह से उन्होंने उन व्यक्तियों से दूरी बना ली जो उन्हें बहुत चाहते थे. जैसा कि उन्होंने खुद कहा था, “मैं अच्छी हूँ लेकिन परी नहीं हूँ. मुझसे पाप भी हुए हैं लेकिन मैं दानव नहीं हूँ. इस बड़े संसार में मैं वह छोटी-सी बच्ची हूँ जो प्यार करने के लिए किसी को तलाश रही है.”

what-we-saw

जिन्दगी केवल एक यात्रा ही नहीं, एक ऐसी सवारी है जिसकी न सिर्फ दिशा तय करनी होती है बल्कि उसकी लगाम पर नियंत्रण भी रखना होता है. नामी दार्शनिकों ने जिन्दगी की उपमा एक रथ से दी है, जिसका सारथी इन्सान का दिमाग होता है. जबतक इस रथ को सारथी हांकता है, यह सही तरीके से चलता है. लेकिन मर्लिन के सन्दर्भ में ऐसा नहीं हुआ. मर्लिन की जिन्दगी उनकी इच्छाओं से नियंत्रित होती रही और पूरी जिन्दगी ही तबाह हो गयी. उनके असुरक्षा-बोध को समझ पाना बहुत मुश्किल है. कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने अपने दिमाग में तरह-तरह के विचार ठूंस रखे थे, जबकि कुछ का मानना है कि यह सब वंशानुगत प्रभाव के कारण था. कारण चाहे जो रहा हो, वे एक बेमिसाल शख्स थीं जिन्हें कई बार अपनी नादानी के चलते कइयों की उंगली पर नाचना पड़ा.

उनके गुजरे 50 साल से भी ज्यादा हो गए हैं लेकिन आज भी यह यकीन करना मुश्किल है कि निष्कलंक और प्रदीप्त सौन्दर्य की स्वामिनी मर्लिन अब हमारे बीच नहीं हैं. आज भी लोग उनके कार्य, उनकी जिन्दगी और रहस्यमय मौत की चर्चा किया करते हैं. वे नितांत आकर्षक सिर्फ सुन्दर चहरे की वजह से नहीं, बल्कि अपनी निष्कपटता और सरलता की वजह से भी थीं.
उनकी जिन्दगी और मौत दोनों ही हमें अपने जीवन को जीने और परखने का बिलकुल अलग नजरिया देती है. उनकी उपलब्धियां हमें बड़े सपने देखने और उन्हें साकार कर लेने का हौसला देती है तो साथ ही उनका हश्र हमें जमीनी बने रहने का महत्त्व भी समझाती है. उनकी जीवन-यात्रा हमें यह अहसास कराती है कि स्थिर बचपन और माता-पिता का योगदान हमारे अस्तित्व के लिए क्या मायने रखता है.
मर्लिन हमेशा कहा करती थीं, “सफलता आपके लिए कई लोगों की घृणा की वजह बन जाती है. मेरी कामना है कि अगर ऐसा नहीं हो. तब किसी की आंखों में ईर्ष्या देखे बगैर सफलता का लुत्फ उठाने में कितना आनंद आएगा.” सफलता की कमान संभाल कर रखने का गुण उनमें नहीं था. उन्हें अपने अच्छे-बुरे किसी भी कर्म पर कभी पछतावा नहीं हुआ. लेकिन इतिहास गवाह है कि कभी-कभार अपनी गलतियां सुधार लेने से किसी का बुरा नहीं होता है. जैसा कि कहा जाता है, “सिर्फ इन्सान में ही अच्छे-बुरे दोनों का समावेश होता है.” मर्लिन यदि कुछ दिन और जिंदा रहतीं, तो शायद उन्हें भी इसका अहसास हो जाता.
वे अपने ही शब्दों की प्रतिछवि हो गईं, “अनगढ़ता में ही सुन्दरता है, पागलपन प्रतिभाशीलता की पहचान है और बोरियत भरा होने की बजाय बेतुका होना बेहतर है.” अपनी मान्यताओं पर विश्वास करती मर्लिन अनगढ़ नहीं, सुन्दर थीं. वे विक्षिप्त नहीं, प्रतिभाशाली थीं. उन्हें किसी और का नहीं, सिर्फ अपनी खुदी का भरोसा था. और वे बोरियत से भरी तो कतई नहीं थीं. जिसने भी उनके साथ थोड़ा भी वक्त बिताया हो, उनके कहे शब्दों के बारे में बातें करने से खुद को रोक नहीं सकता.
मर्लिन एक चकाचौंध भरा नाम था जिसने रुपहले परदे को जगमगाए रखा. उनका जिक्र हमेशा ही होंठो पर मुस्कान जगा देने के लिए काफी है. वे एक ऐसी स्वप्नसुंदरी हैं जिनकी छवि हमारे दिलोदिमाग में हमेशा ताजा बनी रहेगी.

प्रसिद्ध उद्धरण

“मैं स्वार्थी, अधीर और असुरक्षा की भावना से भरी हुई हूँ. मैं गलतियां करती हूँ. कई बार मैं इतनी अनियंत्रित हो जाती हूँ कि संभाले नहीं संभलती. लेकिन यदि आप मुझे बुरे वक्त में नहीं संभाल सकते तो मेरे लिए आपका कोई मतलब नहीं है और न ही अच्छे दिनों में आप मेरी नजदीकी के काबिल हैं.”

“मैं अच्छी हूँ लेकिन परी नहीं हूँ. मुझसे पाप भी हुए हैं लेकिन मैं दानव नहीं हूँ. इस बड़े संसार में मैं वह छोटी-सी बच्ची हूँ जो प्यार करने के लिए किसी को तलाश रही है.”

“यदि आप एक लड़की को हंसा सकते हैं तो आप उससे कोई भी काम करवा सकते हैं.”

“जिन्दगी तो जैसा चाहें, आप खुद बनाते हैं. कई बार इसमें सबकुछ बिगड़ जाता है. ऐसा होना शाश्वत है. लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि इसे किस तरह बिगाड़ना है, यह निश्चित करना आपके वश में होता है. लड़कियां आपकी दोस्त होती हैं- वे किसी भी तरह लड़कियां ही रहेंगी. बस इतना याद रखें कि कुछ आएंगी, कुछ जाएंगी. जो आपका हर परिस्थिति में साथ दे, वही आपके सच्चे मित्र होते हैं. उन्हें कभी न खोएं. यह भी याद रखें कि दुनिया में सबसे अच्छी दोस्त बहनें होती हैं. प्रेमी आते-जाते रहते हैं और प्यारे! यह कहना मुझे बेहद नापसंद है कि अक्सर अधिकांश ही नहीं बल्कि लगभग सभी प्रेमी दिल तोड़ने के लिए ही आते हैं, लेकिन आपको हार नहीं मानना चाहिए. हार मान जाने से आप अपना सोल-मेट कभी नहीं पा सकेंगे. आप अपना अर्धांश नहीं पा सकेंगे जिसके मिल जाने से पूर्णता का अहसास होता है और यह तथ्य हर चीज पर लागू होता है. यदि आप एक बार असफल होते हैं, तो इसका माने यह नहीं कि आप हर मोर्चे पर असफल ही होंगे. कोशिश करते रहिए और हमेशा-हमेशा खुद पर विश्वास कीजिए. अगर आप ही खुद पर विश्वास नहीं करेंगे तो भला दूसरा क्योंकर करने लगा? तो अपना सिर ऊंचा कीजिए, ठुड्डी उठाइए और सबसे अहम है कि हमेशा मुस्कुराते रहिए. जिन्दगी बहुत खूबसूरत शै का नाम है, जिसमें मुस्कुराने की अनगिनत वजहें हैं.”

“वह पुरुष सच्चा प्रेमी होता है जो आपका माथा चूमकर या आपकी आंखों में देखते हुए मुस्कुरा कर या सिर्फ आकाश में घूरता रहकर भी आपको रोमांचित कर दे.”

“यदि आपके दो चहरे हों तो उनमें से कम-से-कम एक को सुन्दर जरूर बनाएं.”

“किसी के साथ नाखुश होने से बेहतर है अकेले नाखुश रहना.”

“क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि ‘क्या मुसीबत है’ हमेशा ही सही जवाब होता है?”

“मेरे कारनामों पर जिसे जो मन आए सोचे. मुझे परवाह नहीं. यदि कोई मेरे किए को लेकर परेशान है तो मैं उससे बेहतर स्थिति में तो हूँ ही.”

“मैंने कभी किसी को बेवकूफ नहीं बनाया. मैंने उन्हें खुद बेवकूफ बनने दिया. उन्होंने कभी भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मैं कौन और क्या थी. इसके बदले वे मेरे लिए कोई किरदार गढ़ लेते थे. मैं उनसे बहस नहीं करती. जाहिर है कि वे उस किरदार को प्यार करते हैं जो बेशक मैं नहीं होती.”

“वह ऐसी लड़की थी जो उदासियों में भी खुश रहना जानती थी और दरअसल यही महत्वपूर्ण है.”

“मेक-अप की परतों के नीचे और मुस्कुराहटों के पीछे मैं दुनिया के लिए दुआएं मांगने वाली लड़की हूँ.”

“मर्दों की दुनिया में जीने से मुझे कोई परेशानी नहीं यदि मैं इसमें औरत होकर जी सकूं.”

“छोटी लड़कियों को बताना चाहिए कि वे बहुत सुन्दर हैं भले ही सच में वो हों नहीं.”

“आप झूठ पर इसलिए भरोसा करते हैं ताकि अंत में आप केवल खुद पर विश्वास करना सीख सकें”

मर्लिन मुनरोकी बायोग्राफीज | 0 टिप्पणी >>

0 टिप्पणी

एक टिप्पणी छोड़ दो

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा| आवश्यक क्षेत्रः चिह्नित कर रहे हैं|


*:

*:

:

*:



Proudly owned by Aatman Innovations Pvt. Ltd. Mumbai, India.   |   प्रायवेसी पॉलिसी   |   डिस्कलेमर   |   साइट मैप   |   Best View - (1280x720) Latest Browsers
Feedback/Testimonials
* इस वेबसाइट के किसी भी विवरण का किसी भी रूप में अंशतः या पूर्णतः निजी हित में उपयोग करते पाए जाने वाले व्यक्ति/कंपनी/संस्था के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।