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ऊपरी पर्तों के पार
रहस्य के धुंध में था
जो विस्मय का संसार
उसे आर-पार बेधने में
सफल हुई हमारी दृष्टि
जब से अस्तित्व में आईं
धृष्ट किरणें रोंटजन की।
हमारी ही रूप-रेखा प्रस्तुत
करने को उद्धत
ये रहस्यमयी किरणें
हमें हमसे ही बोल गईं
हमारी ही आंखों में
हमारा पुर्जा-पुर्जा खोल गईं।
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क्या आप अपने आतंरिक अवयव प्रदर्शित कर सकते हैं ? हां ! एक्स-रे की मदद से तो जरूर ! लेकिन क्या हम उस व्यक्ति के बारे में कभी सोचते हैं जिन्होंने इन किरणों की खोज की ? हम सभी 'एक्स-रे' से तो बखूबी परिचित हैं, लेकिन इस विस्मयकारी और नायाब अन्वेषण के आविष्कारक विल्हेम कॉनरेड रोंटजन से आज भी हम अपरिचित ही हैं। एक प्रज्ञावान वैज्ञानिक होने के साथ ही वे एक विनम्र इन्सान भी थे। उन्होंने एक बार कहा था, "मैंने विचार नहीं, प्रयोग किए।" इस प्रतिभाशाली पर्यवेक्षक के असाधारण प्रयोगों के बिना यह दुनिया निश्चित रूप से आज जैसी नहीं होती। उनकी महान खोज ने शरीर की आतंरिक संरचना को दृश्यमान कर असंभव को संभव कर दिया। इस खोज ने न सिर्फ हमारे शरीर के भीतरी रहस्यों को उजागर किया बल्कि हमारी शारीरिक असामान्यताओं का पता लगा सकने में इसकी कामयाबी की वजह से यह चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक 'वरदान' साबित हुआ। आइए, इन 'चमत्कारी' एक्स-किरणों की खोज करने वाले शख्स की दिलचस्प जिंदगी पर एक दृष्टि डालें:

विल्हेम कॉनरेड रोंटजन की कहानी पूर्वी प्रशिया के लेने नामक एक छोटे से शहर से शुरू होती है। सन 1845 में 27 मार्च को एक वैभवपूर्ण सुसंपन्न घर में विल्हेम नाम के एक प्यारे-से बच्चे ने जन्म लिया। विल्हेम को फ्रेडरिक कॉनरेड के रूप में बेहद प्रतिष्ठित पिता और चार्लोट फ्रोवेन के रूप में एक खूबसूरत माता का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पिता कपड़े के व्यापारी थे और मां भी एक व्यावसायिक घराने की बेटी थी। उन दिनों प्रशिया गंभीर राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। नतीजतन 23 मई, 1848 को जब विल्हेम की उम्र तीन वर्ष की थी, उनका परिवार हॉलैंड के अपेल्दूर्न शहर में जा बसा, जहां उनका ननिहाल था। इस स्थानांतरण की वजह से रोंटजन परिवार की प्रशिया की नागरिकता खत्म हो गई लेकिन उन्हें डच नागरिकता प्रदान की गई। यह परिवार अब 171 हूफ्डस्ट्राट पर रहने लगा। अपेल्दूर्न में विल्हेम को एक बोर्डिंग स्कूल में भेज गया, जहां पढ़ाई-लिखाई में उन्होंने कोई खास रुचि नहीं जाहिर की। जबकि प्रकृति के रहस्यों का जान लेने में वे जुनून की हद तक जिज्ञासु थे और इसीलिए खुली जगहों और जंगलों में उनका लगातार भटकना जारी था जिसने उनमें आत्म प्रशांति का भाव पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बचपन से ही विल्हेम में यांत्रिक उपकरण बनाने के प्रति विशेष झुकाव था, जो आखिरी सांस तक उनके स्वभाव का अभिन्न अंग बना रहा। 1862 में 17 साल के विल्हेम ने युट्रेचेट टेक्नीकल स्कूल में दाखिला लिया जो गंजेनमार्केट में स्थित था। उन दिनों वे डॉ। गनिंग के साथ 62, न्यूवेग्रेचेट पर रहा करते थे। डॉ। गनिंग उस जमाने के एक प्रसिद्ध रसायनशास्त्री थे। वे ही रोंटजन में छुपी प्रतिभा की पहचान करने वाले पहले व्यक्ति और मार्गदर्शक थे। उन्होंने ही रोंटजन को आगे पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित किया। लेकिन एक ऐसी घटना घटी जिसने बड़ी बेतरतीबी से उनके इन प्रयासों पर हमेशा के लिए पानी फेर दिया। एक बार रोंटजन पर आरोप लगा कि उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर अपने एक शिक्षक का कार्टून बनाया है। हालांकि वे सचमुच निर्दोष थे और सहपाठियों ने जानबूझ कर उन्हें फंसाया था, लेकिन सही अरोपी की जानकारी होने के बावजूद उन्होंने उसका नाम नहीं बताया और इसी वजह से रोंटजन को विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया। विश्वविद्यालय से निकाल दिए जाने की दुर्घटना को रोंटजन सहजता से झेल गए। हालांकि उन्होंने मौखिक प्रवेश परीक्षा के माध्यम से दुबारा युट्रेचेट विश्वविद्यालय में दाखिला ले सकने की कोशिश की लेकिन इस बार भी भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया। दुर्योग से रोंटजन के परीक्षक के रूप में वही शिक्षक उपस्थित थे जिनका कार्टून बनाया गया था। परिणाम स्वरूप विल्हेम को फिर से अपने सौम्य आचरण की कीमत चुकानी पड़ी। उन्हें इस प्रवेश परीक्षा में असफल घोषित कर दिया गया।

18 जनवरी, 1865 को 20 वर्षीय विल्हेम कुछ पाठ्यक्रमों के लेखा-परीक्षण के लिए विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए। यहां उन्होंने स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में स्थित एक ऐसे स्कूल के बारे में सुना जहां दाखिला लेने के लिए टेक्नीकल स्कूल के डिप्लोमा की अनिवार्यता नहीं थी, जो रोंटजन के पास नहीं था। आखिरकार माता-पिता के सलाह-मशविरा और प्रोत्साहन के संबल के साथ उन्होंने ज्यूरिख पॉलीटेक्निकल स्कूल के मेकेनिकल टेक्निकल डिविजन में दाखिला लिया। प्रसन्नवदन विल्हेम 16 नवम्बर, 1865 को युट्रेचेट से ज्यूरिख के लिए रवाना हुए। वहां एड्जेंसिस्चेन टेक्निस्क हॉकस्कूल वॉन ज्यूरिख में बतौर विद्यार्थी बाकायदा उन्होंने अपना पंजीकरण करवाया जहां उनकी ज्ञान-पिपासा बढ़ती ही गई। ज्यूरिख में उनका ठिकाना बना- 7 सेलग्रावें। इस दौरान तकनीकी विषयों के सन्दर्भ में उनका ज्ञान-कोष तो बढ़ता ही रहा; अपना कुछ खाली वक्त वो पास ही के ज्यूरिख विश्वविद्यालय में भी गुजारने लगे। पढ़ाई के अलावा विल्हेम को साहसिक व रोमांचक कारनामें और आसपास के पर्वतों का आरोहण करना बहुत पसंद था। पर्वतों के बीच घुम्मकड़ी करते हुए जम ग्रनेन ग्लास नामक एक स्थानीय होटल में खाना उन्हें खास तौर से अच्छा लगता था। इस होटल के मालिक थे लुडविग। एक दिन इस पसंदीदा होटल में खाना खाते हुए विल्हेम की नजर मनमोहक वेट्रेस अन्ना बर्था पर टिक गई। होटल के मालिक की बेटी थी अन्ना। वैसे तो अन्ना उनसे छः साल बड़ी थीं लेकिन उन दोनों के बीच प्रेम की एक बिजली-सी कौंधी और देखते-ही-देखते रोमांस परवान चढ़ने लगा। खुशियां जैसे सखी-सहेलियों-सी विल्हेम के आगे-पीछे डोल रही थीं क्योंकि इस दौरान उनका ग्रेड भी बेहतर होता गया और वे अधिकतम अंकों के साथ अपनी पढ़ाई का अंतिम वर्ष उतीर्ण कर गए। 6 अगस्त 1868 विल्हेम की जिंदगी का सबसे खुशनुमा दिन था। इस दिन उन्हें मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री तो मिली ही, उन्होंने बर्था के सामने शादी का प्रस्ताव भी रखा।
इंजीनियरिंग की उपाधि और बर्था जैसी मंगेतर पाने के बाद विल्हेम ज्यूरिख विश्वविद्यालय में रहने लगे। यहां उनकी मुलाकात उस व्यक्ति से हुई जिनका विल्हेम की प्रतिभा के उन्मेष में अभूतपूर्व योगदान रहा। ये शख्स थे महान प्रयोगविद और सैद्धांतिक भौतिकवेत्ता डॉ। ऑगस्ट कंडेट। रोंटजन ने डॉ। कंडेट के साथ कुछ कोर्सेज किए। डॉ। कंडेट ने ही सैद्धांतिक भौतिकवेत्ता के रूप में रोंटजन की प्रतिभा और क्षमता का परिष्कार किया। डॉ। कंडेट के निर्देश पर रोंटजन ने 'स्टडीज ऑन गैसेज' शीर्षक से एक शोध-निबन्ध भी लिखा जिसके लिए उन्हें विश्वविद्यालय से 22 जून, 1869 को डॉक्टरेट इन फिलॉसॅफी यानी पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई। रोंटजन की क्षमताओं को सराहते हुए बाद में प्रोफेसर कंडेट ने भौतिकी के क्षेत्र में उन्हें अपना सहयोगी बना लिया। प्रोफेसर कंडेट के प्रोत्साहन से रोंटजन गैसों पर कार्य करने के प्रति बेहद आकर्षित हुए और अपनी प्रतिभा व प्रयोगों को उत्तरोत्तर उन्नत करते हुए एक सुविज्ञ वैज्ञानिक पर्यवेक्षक के रूप में अपना सम्माननीय स्थान बनाया।
1870 के वसंत में डॉ। कंडेट को जुलियस मैक्सीमिलिअंस युनिवर्सिटी ऑफ वुर्जबर्ग, जर्मनी की तरफ से भौतिकी का अध्यक्ष पद ग्रहण करने का आमंत्रण आया और इस आमंत्रण में उन्होंने रोंटजन को भी अपना सहभागी बनाया। तबतक डॉ। कंडेट और रोंटजन एक-दूसरे के काफी करीबी हो चुके थे और डॉ। कंडेट ने यह तय किया कि वुर्जबर्ग का पद वे तभी संभालेंगे जब वह विश्वविद्यालय रोंटजन को भी उनके साथ आने का आमंत्रण देगा। इस प्रकार 1870 के पतझड़ के दिनों में डॉ। कंडेट के साथ रोंटजन मुख्य नदी के तट पर बसे सुरम्य शहर वुर्जबर्ग जा पहुंचे जहां विएटस्चेमर स्ट्रास पर स्थित आरामदायक आवासों में उनका ठिकाना बना। इस दौरान उनकी मंगेतर बर्था जर्मन पकवान और घर का रख-रखाव सीखने के लिए उनकी (रोंटजन की) मां के पास अपेल्दूर्न चली गईं।
वुर्जबर्ग से लौटने के बाद 19 जनवरी, 1872 को अपेल्दूर्न के आलीशान घर में विल्हेम ने खुशी-खुशी बर्था से शादी रचाई। जल्द ही वे दोनों वुर्जबर्ग वापस आकर हेडिंग्सफेल्डर स्ट्रास पर स्थित एक बेहद आरामदायक घर में रहने लगे। विल्हेम फिर से अपने प्रयोगों और न्यूबुस्ट्रास स्थित जुलियस मैक्सीमिलिअंस युनिवर्सिटी में अध्यापन कार्य में रत हो गए। लेकिन युनिवर्सिटी की आधारभूत संरचना और आर्थिक स्थिति संतोषजनक नहीं होने की वजह से डॉ। कंडेट और रोंटजन दोनों निराश थे। ऐसे में हाल ही में नवीनीकृत हुए स्ट्रासबर्ग स्थित कैसर विल्हेम्स युनिवर्सिटी की ओर से उच्च पद ग्रहण करने का प्रस्ताव पाकर ये दोनों वैज्ञानिक बेहद खुश हुए। 1 अप्रैल, 1872 को डॉ। कंडेट, रोंटजन और बर्था तीनों अल्सास लोरेन के खूबसूरत शहर की ओर रवाना हो गए जो उस समय जर्मनी के अधिकार क्षेत्र में था। यहां आकर रोंटजन प्राइवेटडोजेंट (प्राइवेट लेक्चरर) का स्तर प्राप्त करने की तैयारी के सिलसिले में अपने परीक्षणों और आंकड़े जुटाने में लग गए।
उन दिनों डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त किसी व्यक्ति के वेतनभोगी प्रोफेसर बनने के लिए यह अनिवार्य था। आखिरकार 13 मार्च, 1874 को उनकी परीक्षा का दिन तय हुआ। उत्कृष्ट वैज्ञानिकों के एक दल (बोर्ड) द्वारा सघन पूछताछ और परीक्षण के बाद रोंटजन सफलता का परचम लहराते हुए प्राइवेटडोजेंट पद के अधिकारी घोषित किए गए। हालांकि उनके पद के लिए कोई वेतनमान का प्रावधान नहीं था लेकिन अब वे अपनी कक्षा के छात्रों से फीस प्राप्त करने के अधिकारी थे। साथ ही अब वे असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के काबिल भी करार दिए गए थे जो एक वेतनमान युक्त पद था। यह पद अकादमिक सीढ़ी की अगली कड़ी था। जहां लोगों को सामान्यतः किसी वेतनभोगी अकादमिक पद पर पहले बुलावे के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ता था; रोंटजन बड़े भाग्यशाली साबित हुए कि एक वर्ष के अंतराल के बाद ही उन्हें ऐसा बुलावा मिल गया।
1 अप्रैल,1875 को 30 साल के रोंटजन को वुर्टेमबर्ग स्थित एग्रीकल्चरल एकेडमी ऑफ स्टुट्गार्ट-होहेनेम की तरफ से भौतिकी और गणित के लिए पूर्णकालिक प्रोफेसरशिप का प्रस्ताव मिला। उन्होंने इस शानदार मौके को हासिल कर लेने का फैसला किया। एक ओर तो यह उनके लिए नई चुनौती थी दूसरी ओर अच्छा वेतनमान होने के साथ ही इससे उन्हें प्रशासनिक पदाधिकारी का मान भी प्राप्त होने वाला था। हालांकि उन्होंने यह पद बेहद अनिश्चितताओं के साथ ग्रहण किया था क्योंकि इस प्रस्ताव के अनुसार उनका अपने परिवार और दोस्तों, खासतौर से प्रोफेसर कंडेट से सम्बन्ध विच्छेद कर लेने का प्रावधान शामिल था। इस पद के साथ उन्हें स्वाभविक रूप से जर्मनी की नागरिकता तो हासिल हो गई लेकिन निवास के लिए दिया गया नगण्य सुविधायुक्त एक कमरे का आवास उनके और बर्था के लिए नाकाफी था। रोंटजन की जिंदगी उनकी इच्छानुसार तो आगे नहीं बढ़ रही थी फिर भी वे संतुष्ट भाव से जीवन-यापन कर रहे थे। जल्दी ही शुभ समाचार ने उनके दरवाजे पर दस्तक दी। करीब डेढ़ साल के बाद प्रोफेसर कंडेट ने सैद्धांतिक भौतिकी में एक नए पद (चेयर) का सृजन किया और इस पद के लिए उन्होंने रोंटजन का नाम प्रस्तावित किया। बेहद खुशी-खुशी, सुकून की सांस लेते हुए रोंटजन ने यह प्रस्ताव मंजूर किया और 1 अक्टूबर, 1876 को बर्था के साथ स्ट्रासबर्ग वापस चले आए।
यह रोंटजन के कैरियर के स्वर्णिम काल-खंड की शुरुआत थी। वापस लौट आने के बाद वे भौतिकीय प्रयोगों से संबंधित अपनी तकनीकों को परिष्कृत करने और शिक्षण का अनुभव प्राप्त करने को टूट पड़े। उन्होंने पंद्रह महत्वपूर्ण आलेख (पेपर्स) प्रकाशित करवाए और अपने व्यवसाय में एक उभरती हुई प्रतिभा के तौर पर अपना मुकम्मल स्थान बनाने में कामयाब रहे। और फिर प्रसिद्ध जर्मन भौतिकविदों जैसे वोन हेल्मोट्ज, किर्चोफ और कंडेट के अनुमोदन से वे गिसेन में पूर्णकालिक प्रोफेसरशिप प्राप्त कर सके।
1 अप्रैल,1879 को रोंटजन गिसेन के ख्यातिलब्ध जस्टस वोन लिबिग युनिवर्सिटी के लिए रवाना हुए। हालांकि रोंटजन की शुरुआती प्रयोगशाला किसी निजी मकान के तंग कमरों में थी, लेकिन उन्हें एक नए विभाग का डिजाइन बनाने को कहा गया और जिसे उन्होंने 1880-1881 के जाड़े में अधिकृत कर लिया। उन्होंने अपना विशेष प्रयोग करना जारी रखा। खासतौर से क्रिस्टलों के विभिन्न गुणों से संबंधित प्रयोग। इन वर्षों में, जब वे पूरी तन्मयता से प्रयोगों में डूबे हुए थे, उनकी निजी जिंदगी दुःख के एक के बाद दूसरे आघातों से छलनी होती रही थी। सबसे पहला आघात 1880 में मां की मृत्यु के रूप में आया, तो 1884 में पिता चल बसे। माता-पिता को खोने की पीड़ा ने रोंटजन के मन में बच्चे की चाहत पैदा कर दी। लेकिन बदकिस्मती से नियति ने उन्हें बच्चे की नेमत नहीं बख्शी और आखिरकार 1887 में उन्होंने बर्था की 6 साल की भतीजी, जोसफिन बर्था डोंगेस, को गोद ले लिया। गिसेन में रहते हुए रोंटजन ने 18 वैज्ञानिक आलेख (पेपर्स) प्रस्तुत किए जिनकी वजह से उन्हें असाधारण वैज्ञानिक होने की ख्याति तो मिली ही, वुर्जबर्ग विश्वविद्यालय में नवनिर्मित भौतिकी संस्थान (फीजिकल इंस्टीट्यूट) में भौतिकी के प्रोफेसर और संस्थान के निदेशक के पद का प्रस्ताव भी मिला।

अंततः 1 अक्टूबर 1888 को रोंटजन परिवार के साथ वुर्जबर्ग लौट आए। यह नया संस्थान वृक्षों की कतारों से सज्जित प्लिचर रिंग पर अवस्थित था जिसका नाम रोंटजन के सम्मान में बाद में बदल कर रोंटजन रिंग रखा गया। यह दुमंजिली इमारत थी जिसमें प्रयोगशाला और व्याख्यान-कक्ष के लिए काफी स्थान था, ठीक वैसा ही जैसा रोंटजन की चाहत थी। वुर्जबर्ग में रहते हुए उन्होंने सत्रह बेहद महत्वपूर्ण विज्ञान-आलेख प्रस्तुत किए। ये उनके जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण आलेख थे। इनके बदौलत ही उनकी अकादमिक उत्कृष्टता का परचम लहराने लगा और वे जूलियस मैक्सिमिलिअंस युनिवर्सिटी ऑफ वुर्जबर्ग के द्विवार्षिक (1894 और 1895) रेक्टर (अध्यक्ष) चुने गए। कहीं उनके चयनकर्ताओं को भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान तो नहीं हो गया था?
1895 का आखिरी चरण वह महत्वपूर्ण दौर था जब कई प्रसिद्ध वैज्ञानिक कैथोड-किरणों की विशिष्टताओं पर अनेक तरह के प्रयोग कर रहे थे और परस्पर विरोधी परिणामों का अनिश्चितता भरा माहौल बना हुआ था। संभवतः वह अक्टूबर का महीना था जब विल्हेम रोंटजन उन विस्मयकारी किरणों के प्रयोगों में पूरी तरह डूब गए थे जिनपर उनसे पहले हिटोर्फ, क्रुक्स हर्ट्ज और लेनार्ड प्रयोग कर चुके थे। जैसे-जैसे रोंटजन का प्रयोग आगे बढ़ता गया, उनकी तन्मयता बढ़ती गई। धीरे-धीरे काम में वे इतने डूब गए कि उन्हें रात-दिन का ख्याल ही नहीं रहा। कैथोड-किरणों के प्रयोगों से जुड़े उनका कार्य इन किरणों के योग्य समुचित उपकरण को जुटाने से शुरू हुई। रोंटजन द्वारा उपयोग में लाए गए उपकरण में बिजली की पूर्ति के लिए एक काफी बड़ा रम्कोर्फ इंडक्शन क्वायल लगा था। यह क्वायल डेप्रेज इंटरप्टर से जुड़ा था जिससे उच्च स्तर की ऊर्जा का प्रवाह और व्यतिक्रम होता था। उन्होंने विभिन्न क्षमताओं वाले कई हिटोर्फ-क्रुक्स और लेनार्ड ट्यूब भी इकठ्ठा किया। लेनार्ड ट्यूब शीशे का गोलाकार कैथोड-किरण ट्यूब था। इसमें एल्युमिनियम के पतरे से ढंका एक छोटा-सा छेद बना होता था जिसके माध्यम से कैथोड-किरणें गुजर सकती थीं। हिटोर्फ-क्रुक्स ट्यूब अंडाकार होता था और उसमें किसी छेद की बजाय शीशे का एक 'लक्ष्य-क्षेत्र' (टार्गेट एरिया) होता था। विल्हेम के पास एक रैप्स वैक्युम पंप भी था, जो इस्तेमाल से पहले ट्यूबों को खाली (शून्यीकृत) करने के काम में आता था। ऐसा करना प्रयोगों के बेहतर नतीजों के लिए जरूरी था। सभी उपकरणों को सही तरीके से व्यवस्थित कर उन्होंने औपचारिक विधि से अपने परीक्षण शुरू किए।

यह 8 नवम्बर, शुक्रवार 1895 का अविस्मरणीय दिन था। विल्हेम के प्रयोग लेनार्ड द्वारा पहले किए गए कार्यों पर मुहर लगा रहे थे। वे कम क्षमता (आउटपुट) वाले लेनार्ड ट्यूब का उपयोग कर रहे थे जो कार्डबोर्डों और टिन के पतरों से अच्छी तरह लपेटा गया था ताकि किसी तरह का प्रकाश बाहर न आ सके। फिर उन्होंने बेरियम प्लेटिनोसाइनाइड से आवृत एक छोटे कार्डबोर्ड पट (स्क्रीन) को ट्यूब के पास रखकर इसपर कैथोड-किरणों का आघात करने से प्राप्त होने वाली प्रतिदीप्ति (अलग तरंगदैर्ध्य वाले विकिरण को अवशोषित करने के कारण उत्सर्जित होने वाला प्रकाश) प्रदर्शित किया। इसके बाद उन्हें इसी प्रयोग को दूसरी विधि से अंजाम देने की सूझी। उन्होंने उच्च क्षमता वाले सभी शीशे के हिटोर्फ-क्रुक्स ट्यूबों पर यह प्रयोग करने की सोची। अगर अब भी वही परिणाम मिले तो? शायद! उन्होंने एक बड़ा ट्यूब लिया। इसे कार्डबोर्ड से लपेटकर रम्कोर्फ क्वायल से जोड़ दिया। कमरे में बिल्कुल अंधेरा कर उन्होंने क्वायल को सक्रिय (एक्टिवेट) किया ताकि ट्यूब में विद्युत-प्रवाह जारी हो सके।सबसे पहले तो उन्होंने इस बात की ताकीद रखी कि किसी तरह का प्रकाश बाहर न निकले। पिछले प्रयोग की तरह इस बार भी उन्होंने ट्यूब के पास कार्डबोर्ड पट पर प्राप्त प्रतिदीप्ति का परीक्षण किया। वे अगले चरण का प्रयोग करने के लिए विद्युत-प्रवाह रोकने ही जा रहे थे कि अचानक ट्यूब से करीब एक मीटर की दूरी पर कार्य करने वाले एक टेबल से कम रोशनी वाले प्रकाश की परछाई-सी किरण पर उनकी नजर पड़ी। इस रोशनी ने तुरंत उनका ध्यान खींचा और वे ट्यूब की ऊर्जा लगातार बढ़ाने लगे। धीरे-धीरे विद्युत ऊर्जा की घट-बढ़ के अनुसार उन्हें धुंधले हरे रंग के प्रकाश के बादलों का अस्थिर तरंग-नृत्य जैसा अनोखा दृश्य देखने को मिला। खुशी की उत्तेजना में उन्होंने तीली जलाकर इस धुंधले प्रकाश का स्रोत जानना चाहा। यह स्रोत था बेरियम प्लेटिनोसाइनाइड से आवृत छोटा कार्डबोर्ड पट जो बेंच पर रखा हुआ था। प्रतिदीप्ति प्रकाश को गतिशील रखते हुए उन्होंने ट्यूब में विद्युत-प्रवाह देना जारी रखा। वे अच्छी तरह जानते थे कि कैथोड-किरणों ने इतनी दूरी कभी तय नहीं की हैं और इस वजह से वे अपने प्रयोग के परिणाम की व्याख्या करने में पूरी तरह डूब गए। वे प्राप्त परिणामों की कठिन जांच-परख में लग गए क्योंकि ये कैथोड-किरणों के अबतक जाने गए गुणों से अगल व्यवहार प्रदर्शित कर रही थीं। सही जवाब पाने के क्रम में उन्होंने प्रकाश-पुंज के बीच में विभिन्न तरह के कागज, पुस्तक आदि रखा और प्रतिदीप्ति को थोड़ा-सा मद्धिम होता पाया। पट पर धातु की वस्तुओं के बाहरी आरेख दिखे और इसी क्रम एक वस्तु को पकड़े हुए उन्होंने अपनी अंगुलियों की हड्डियों की परछाई को देखा। असंभव!!! वे आश्चर्य में चीख पड़े। उन्हें अपनी आंखों पर बमुश्किल ही भरोसा हो रहा था। शायद यही वो क्षण था जब वे अपने अद्भुत और विस्मयकारी खोज के निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि प्राप्त प्रभाव कैथोड-किरणों की वजह से नहीं बल्कि संभवतः अबतक अज्ञात किसी नई किस्म की अत्यधिक वेधक किरणों की वजह से हो। इस नई किरण का नाम उन्होंने 'एक्स-रे' रखा।
पूरा सप्ताह उन्होंने अपना सारा समय इस नव-आविष्कृत किरणों की विशिष्टताओं व गुणों की जांच-परख करने में लगा दिया। उन्होंने इस किरण का हर तरह की नई वस्तुओं, हर किस्म के वजन, अपनी बन्दूक की नली, एक कम्पास (परकार), तार का क्वायल, तरह-तरह की लकड़ियां और कागज, शीशा, दरवाजे का पल्ला और भी कई तरह की चीजों पर परीक्षण किया। उनके परीक्षणों और पर्यवेक्षणों का दौर अगले कई सप्ताह तक चलता रहा। उन्होंने पाया कि ये किरणें कार्डबोर्ड, लकड़ी, कपड़े और यहां तक कि मोटी किताबों को भी वेध सकने में कामयाब हैं लेकिन तांबा, लोहा व अन्य धातुओं को ठीक तरह से नहीं वेध पा रही हैं। उन्होंने यह भी पाया कि ये मांस को तो वेध पा रही हैं लेकिन हड्डी को नहीं। इन आश्चर्यजनक किरणों की खोज से विल्हेम रोंटजन इस हद तक उत्साहित हो चुके थे कि वे यह तक भूल गए कि नींद किस चिड़िया का नाम है। कभी वे सोए भी तो प्रयोगशाला की बिछावन पर ही। इन अद्भुत किरणों के रहस्य की जिज्ञासा में उन्हें खाने तक का वक्त भी शायद ही मिलता था। हफ्तों वे इन किरणों के अध्ययन में ऐसे तन्मय रहे कि एक रात वे बर्था द्वारा बनाए गए रात के स्वादिष्ट भोजन की तारीफ करना तक भूल गए। धीरे-धीरे बर्था उन्हें किसी तरह घर आकर खाना खा लेने को फुसलाने की जुगत करने लगी जबकि वे जल्दी-जल्दी किसी तरह निवाला निगल लेते।
बर्था उनके इस व्यवहार से काफी निराश हुईं और काम में इस डूबे रहने के कारणों की पड़ताल करने लगीं। उनकी अधीरता को शांत करने के लिए रोंटजन ने उन्हें अपने डार्क-रूम (प्रयोगशाला का अंधेरा कमरा) में ले जाकर अपनी अद्भुत खोज 'एक्स-रे' का दर्शन करवाया। यह 27 दिसंबर, 1895 की रात थी जब पहली बार रोंटजन ने यह राज किसी दूसरे व्यक्ति के समक्ष उजागर किया। उन्होंने एक्स-किरणों के आलोक में बर्था के हाथों की तस्वीर भी खींची।एक्स-रे ने हाथ की हड्डियां और अंगूठी तो दिखाई लेकिन मांस और त्वचा नहीं। बर्था के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। यह आश्चर्यजनक किरण उनके लिए विस्मयकारी थी जिसकी वजह से वे अपनी आतंरिक संरचना देख सकीं। वे स्वादिष्ट खाने की तारीफ नहीं कर सकने का राज अच्छी तरह समझ गईं। आखिर यह अद्भुत खोज इतनी महत्पूर्ण तो थी ही जिसपर कितने ही अच्छे भोज कुर्बान किए जा सकते थे।
यह नई घटना इतनी अविश्वसनीय थी कि विल्हेम रोंटजन अपनी मेधा पर ही शक करने लगे। एक आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण खोज कर लेने के बावजूद वे इसे जाहिर करने को लेकर बड़ी दुविधा में थे। यहां तक कि उनके प्रयोगशाला सहायकों को भी अबतक इस किरण के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने बार-बार इस खोज को जांचा-परखा, रात-दिन अपनी प्रयोगशाला में मुस्तैदी से पर्यवेक्षण करते रहे कि शायद कोई नया तथ्य उजागर हो जाए। लेकिन हर बार उनके प्रयोगों ने उनकी खोज और प्रयुक्त उपकरणों की प्रमाणिकता को और पुख्ता ही किया। आखिर वे संतुष्ट हुए और 28 दिसंबर, 1895 को उन्होंने 'ऑन अ न्यू काइंड ऑफ रेज' शीर्षक से लिखा बेहद महत्वपूर्ण आलेख वुर्जबर्ग फीजिकल मेडिकल सोसाइटी को भेजा। इस आलेख में सत्रह बिन्दुओं का जिक्र किया गया था जो इस नई किरण के मुख्य गुण के तौर पर सूचीबद्ध थे। यह तुरंत प्रकाशित हो गया लेकिन इसका वाचन सोसाइटी की अगली सभा यानी आगामी जनवरी के आखिर में ही हो सका था।

इस सूचना को सार्वजनिक करने का खतरा मोल लेने की अपेक्षा अपने मित्रों और वैज्ञानिक सहकर्मियों की राय लेना उचित समझते हुए विल्हेम ने सभी मित्रों को आलेख की एक-एक प्रति भेजी। प्रिय पत्नी बर्था से शायद उन्होंने कहा था, "अब आगे न जाने कैसा उत्पात मचने वाला है।" और उनके कहे शब्द अक्षरशः सही सिद्ध हुए। वैज्ञानिक बिरादरी की ओर से इस महत्वपूर्ण खोज को तुरंत ही मान्यता और प्रतिष्ठा मिल गई और इस खोज की सूचना आमजनों के लिए सार्वजनिक कर दी गई।
23 जनवरी, 1896 को विल्हेम ने वुर्जबर्ग की सोसाइटी के समक्ष सार्वजनिक रूप से व्याख्या की कि किस तरह वे 'चमत्कारी किरणों' की खोज कर सके। इस खोज की सूचना ने दुनिया भर में हलचल मचा दी। यह यकीन करना नामुमकिन था कि विल्हेम त्वचा के पार अपने हाथ की हड्डियां देखने में सफल हुए हैं। ऐसी तो कल्पना करना भी बड़ा अजीबोगरीब था। वहां उपस्थित सभी जन बेसब्री से नए किस्म के विकिरण के बारे में विल्हेम के व्याख्यान का इंतजार कर रहे थे। प्रोफेसर, उच्च पदाधिकारीगण, सैनिक, विद्यार्थीगण, डॉक्टर आदि सभी लोगों ने बड़े उत्साह से करतल ध्वनि के साथ विल्हेम का अभिवादन किया। और जब वे नई किरण के बारे में बोलने लगे तो ऐसा लग रहा था जैसे किसी जादू का वर्णन कर रहे हों। उन्होंने जिसका प्रत्यक्ष अनुभव पाया था, जिसका अनुसंधान किया था, उसपर किसी को विश्वास नहीं हो रहा था। सभी के लिए यह बस एक चमत्कार-सा था। लेकिन विल्हेम ने दर्शकों के सामने प्रख्यात शरीर-विज्ञानी, डॉ। वोन कोलिकर (की हड्डियों) का फोटोग्राफ खींचकर अपना कहा प्रमाणित कर दिया। अधिकांश लोगों को अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था और आश्चर्यचकित कोलिकर ने तो इस किरण का नाम ही विल्हेम रोंटजन के नाम पर रख दिया। यह विल्हेम के लिए जीवन का सर्वाधिक यादगार क्षण था। रोमांचित बुजुर्ग वोन कोलिकर ने कहा था कि (इस सोसाइटी में) पिछले 48 सालों की सदस्यता के दौरान उन्होंने ऐसी घटना कभी नहीं देखी।
जनवरी 1896 में बर्लिन से रोंटजन का बुलावा आया कि वे राजमहल में आकर कैसर विल्हेम के समक्ष अपनी खोज का प्रदर्शन करें। यहां उन्हें द्वितीय श्रेणी के राजकीय सम्मान से विभूषित किया गया और उन्हें उत्कृष्टता (एक्सलेंस) का खिताब दिया गया। बाद में 9 मार्च, 1896 और 10 मार्च 1897 को 'ऑन अ न्यू काइंड ऑफ रेज' पर वुर्जबर्ग फीजिकल मेडिकल सोसाइटी में उन्होंने क्रमिक आलेख प्रकाशित करवाए। मैडल और पुरस्कारों का तो ढेर लग गया जिनमें सबसे बड़ा सम्मान था भौतिकी के लिए उन्हें मिला दुनिया का सबसे पहला नोबेल पुरस्कार। 10 दिसंबर, 1897 को स्टॉकहोम में खुद जाकर उन्होंने यह पुरस्कार ग्रहण किया था। उसमें भी आश्चर्यजनक हिस्सा यह था कि वे मंच पर से बिना कोई भाषण दिए वापस आ गए। इस व्यवहार के पीछे सच्चाई शायद यही थी कि आकर्षण के केंद्र में रहने के प्रति उनमें कोई ललक नहीं थी।
प्रचार-प्रसार का रोंटजन द्वारा निषेध करने के बावजूद हर समाचार-पत्र उनके द्वारा खोजी गई 'वेधक किरणों' के बारे में लिखने को बेताब था। वैसे तो 19वीं शताब्दी की सबसे बड़ी खबर 'बोर वार' से संबंधित थी, लेकिन इस युद्ध की घटना की वजह से भी विज्ञान के क्षेत्र में हुई 'रोंटजन रेज' जैसी उत्कृष्ट उपलब्धि की चकाचौंध कम न हो सकी थी।
बाद में एक पत्रकार को दिए गए एक इंटरव्यू से अपनी ही खोज के बारे में उनका विस्मय प्रकट होता है।
"क्या यह प्रकाश है?" पत्रकार ने पूछा।
"नहीं", उन्होंने उत्तर दिया, "इसे न तो परावर्तित किया जा सकता है, न ही खंडित किया जा सकता है।"
"क्या यह विद्युत (ऊर्जा) है?"
"अबतक ज्ञात प्रकारों में से तो कोई नहीं।"
"फिर आखिर यह है क्या?"
"मैं नहीं जानता", अन्वेषक ने विनीत भाव से उत्तर दिया।

यह सच है कि मानव सभ्यता के इतिहास में किसी भी क्रांति की शुरू में काफी आलोचना हुआ करती है; तो रोंटजन रेज के साथ भी ऐसा ही हुआ। 1896 के वर्ष में विज्ञान-पत्रिकाओं में सैकड़ों आलेख प्रकाशित हुए। चिकित्सा जगत जहां एक्स-रे को संभावनाओं के पिटारे के रूप में देखता था, वहीं आम जनता में 'अपने आतंरिक स्वरूप को जान लेने' में कोई खास रुचि नहीं थी। रोंटजन रेज से संबंधित विडम्बनाओं की कल्पना में कितने ही सृजनशील इस लाईन को व्यवस्थित करें । और मनोरंजनात्मक कार्टून प्रकाशित हुए। एक आलेख में कहा गया, "लोगों की हड्डियां देखने जैसी धृष्टता पर हमें विचार नहीं करना चाहिए"। किसी दूसरे आलेख ने तो फतवा ही जारी कर दिया, "इस चीज को समुद्र में फेंक देना चाहिए ताकि मछलियां एक-दूसरे की हड्डियां देखकर विचार-विमर्श करें, लेकिन हमें बख्स दिया जाए।"
25 जनवरी, 1896 को एक अखबार में रोंटजन के आविष्कार से संबंधित एक कविता छपी थी जिससे इसके बारे में उन दिनों प्रचलित आम धारणा का पता चलता है। यह कविता थी:
(ओ रोंटजन, यानी यह खबर पक्की है। कोई चालबाजी या बकवास या अफवाह नहीं है और साफ है कि हम सभी को आपसे और आपके कब्रिस्तान सरीखे भयानक व क्रूर मजाक से बचकर रहना होगा। डॉ। स्विफ्ट की तरह अपने मांस उतरवा कर हड्डियों के कंकाल में हम अपना फोटो नहीं खिंचवाना चाहते। न ही हर छोटी-बड़ी दरार या जोड़ प्रदर्शित करना चाहते हैं जिसमें आप अपनी नाक घुसेड़ सकें।)
आलोचना हो या प्रशंसा, रोंटजन दोनों से ही निरपेक्ष रहे। ऐसा जान पड़ता है कि किसी भी तरह के ध्यानाकर्षण से वे संकोच में पड़ जाते थे। जिन नेमतों की बदौलत वे परम संतुष्टि के भाव से भरे रहते थे, उन्हें उन्होंने उपहारस्वरूप मानवता के लिए समर्पित कर दिया। हर तरह की खुशामद से परे वे हमेशा विनम्र बने रहे और अपने असाधारण अन्वेषण को न तो कमाई का जरिया बनाया, न ही इसे पेटेंट करवाया। इसके बाद वे विज्ञान विषयक दूसरे मुद्दों पर कार्य करने में व्यस्त हो गए। एक्स-रे की खोज के बाद इसपर उन्होंने और कार्य नहीं किया।
इस बीच बेवेरियन सरकार ने रोंटजन को म्यूनिख के लुडविग मैक्सिमिलिअन्स युनिवर्सिटी में भौतिकी का चेयर पद और इसके फीजिकल साइंस इंस्टीट्यूट का अध्यक्ष (डायरेक्टर) पद प्रदान किया। यह बेहद सम्मानजनक पदोन्नति थी जिसे स्वीकार करते हुए वे 23 मार्च 1900 को म्यूनिख चले गए। यहां भौतिकी विभाग की देख-रेख करने और कुछ कक्षाओं में व्याख्यान देने में वे पूर्णरूपेण संलग्न हो गए। इसके आलावा प्रिय पत्नी बर्था की सेवा-सुश्रूषा में उन्होंने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया। उस वक्त बर्था किडनी के किसी गंभीर रोग से जूझ रही थीं। उनका स्वास्थ्य दिनों-दिन गिरता जा रहा था और 31 अक्टूबर, 1919 को अस्सी वर्ष की अवस्था में वे चल बसीं।
अपनी प्रिय पत्नी के देहांत के बाद रोंटजन ने 1920 के वसंत में म्यूनिख के विश्वविद्यालय से अवकाश लेने का फैसला कर लिया। प्रथम विश्व युद्ध के बाद म्यूनिख बहुत खराब दौर से गुजर रहा था, लेकिन रोंटजन अध्ययन करने और पुराने मित्रों से संपर्क कर खुद को व्यस्त रख रहे थे। उन्हें शिकार करना पसंद था। उनके पास म्यूनिख के दक्षिण स्थित वेल्हेम में एक घर था जिसका उपयोग शिकार के दौरान निवास करने में किया जाता था। इस हंटिंग लॉज में उन्होंने दोस्तों के साथ अच्छा-खासा वक्त गुजारा। यह सब दरअसल खुशनुमा पुराने दिनों की याद ताजा करने का बहाना था। पहाड़ों के बीच शान्ति और सुकून पाने की उन्होंने बहुतेरी कोशिशें की लेकिन सच तो यही था कि पत्नी के देहांत ने उनमें जीवन के प्रति स्थाई विरक्ति पैदा कर दी थी। दुर्भाग्य से उन्हें आंत की परेशानियों ने घेर लिया जो बढ़ती ही चली गई। 1923 की शुरुआत में उन्हें 'टर्मिनल कोलोन कैंसर' होने की पुष्टि हो गई। उनकी बदहाली का दूसरा सबब था प्रथम विश्व युद्ध के बाद पैदा हुई मुद्रा-स्फीति, मंदी और महंगाई का दौर जिसने मृत्यु की कगार तक पहुंचते-पहुंचते उन्हें लगभग दिवालिया बना दिया था। इस महान वैज्ञानिक की जीवन-लीला अंततः समाप्त होने को आ गई और 10 फरवरी, 1923 को 78 साल की आयु में वे स्वर्ग सिधार गए। उन्हें गिसेन की उनकी पैतृक जमीन में दफनाया गया जहां उनकी पत्नी और माता-पिता भी दफनाए गए थे। उनकी मृत्यु के साथ ही उनकी वसीयत के अनुसार उनके सभी व्यक्तिगत और वैज्ञानिक पत्रों को नष्ट कर दिया गया।

"वैज्ञानिकों को इस संभावना को ध्यान में रखना चाहिए, जो कि निश्चित ही है, कि कुछ ही समय के अंतराल के बाद उनके द्वारा किए गए कार्यों पर किसी और का कार्य स्थापित हो जाने वाला है, उनके द्वारा अपनाए गए तरीके विकसित किए जाते रहेंगे, नए परिणाम ज्यादा सटीक होंगे और उनके जीवन व कार्यों की यादें धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएंगी।"
इन पंक्तियों से इस असाधारण वैज्ञानिक व पर्यवेक्षक रोंटजन की उद्दात विनम्रता प्रतिध्वनित होती है। यह वक्तव्य उन्होंने रेक्टरशिप ग्रहण करने के समय दिए गए भाषण में दिया था। रोंटजन की आश्चर्यचकित कर देने वाली खोज तो दुनिया भर में मशहूर हो गई लेकिन इनका व्यक्तित्व बहुत कम ही लोग जानते थे। महानतम उपलब्धियां हासिल करने और मानवजाति के उत्थान के लिए अतुलनीय योगदान देने के बावजूद अपने आचरण में वे हमेशा ही सहज, सरल और विनीत बने रहे।
एक्स-रे के अन्वेषक तो दुनिया से कूच कर गए थे, लेकिन उनकी आविष्कृत किरणों ने रेडिएशन से संबंधित कई सिद्धांतों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टूटी हड्डियों और अंदरूनी अवयवों की जांच-पड़ताल करने में डॉक्टर एक्स-रे का उपयोग करने लगे थे। केवल हड्डी के डॉक्टर (ऑर्थोपेडिस्ट) ही नहीं, बल्कि दांतों के डॉक्टर भी इसका उपयोग करने लगे थे। एक्स-रे की खोज से पहले गलत चिकित्सा की वजह से लाखों व्यक्तियों की जान जा चुकी थी क्योंकि गड़बड़ी की सटीक जानकारी हासिल करने का तब कोई तरीका उपलब्ध नहीं था। यहां तक कि सुरक्षा के मद्देनजर यात्रियों के सामानों में खतरनाक हथियारों या नशीली दवाओं की पड़ताल करने के लिए एअरपोर्ट पर भी एक्स-रे का उपयोग किया जाने लगा। चिकित्सा के क्षेत्र में इससे आमूल-चूल परिवर्तन तो आया ही, सामान्य जीवन में लोगों की मदद करने के लिए पूरी दुनिया में एक्स-रे का अधिकाधिक उपयोग होने लगा। रोंटजन को खुद शायद यह नहीं पता था कि उनकी इस आश्चर्यजनक खोज की वजह से मानव-जाति का किस कदर उत्थान हो सकता है। संभव है कि रोंटजन जैसे अपूर्व व असाधारण वैज्ञानिकों के नाम इतिहास के पन्नों में गुम हो जाएं लेकिन इनके द्वारा किए गए कार्य सृष्टि के बने रहने तक मानव-जाति को लाभान्वित करते ही रहेंगे।
"किसी नई चीज के जन्म के पीछे कोई-न-कोई घटना जरूर होती है। न्यूटन ने गिरता हुआ सेब देखा, तो जेम्स वाट की दृष्टि उबलते हुए द्रव की केतली पर पड़ी और इसी तरह रोंटजन ने फोटोग्राफिक प्लेटों को धुंधला किया। ये सभी व्यक्ति सामान्य घटनाओं में से ही कुछ असामान्य गढ़ लेने का अंतर्ज्ञान रखते थे।’’
विल्हेल्म कॉनरेड रोंटजनकी बायोग्राफीज | 0 टिप्पणी >>
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