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आइस्क्रीम देखकर आपके मुंह में पानी क्यों आ जाता है? आप खरीददारी करते समय भी कैसे शांत रहते हैं? लंबी दूरी की ड्राइविंग से क्यों आपको तकलीफ नहीं होती? मल्टीप्लेक्स में मूवी देखना क्यों ज्यादा आरामदायक होता है? गर्मियों में आप खुद को कैसे बचाए रखते हैं? इन सभी प्रश्नों के उत्तर में एक चीज समान है। जी हां, आपका अनुमान बिल्कुल सही है। वो है एअर कंडीशनर और वातानुकूलन-प्रणाली। लेकिन क्या यह आविष्कार मनुष्य की आरामदायक और विलासिता भरी जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया था ?



कुछ पल ठहरकर जरा सोचें कि नष्ट होनेवाली वस्तुओं को जल्द खराब होने से कैसे बचाया जा सकता है? घर से 6000 मील दूर खाद्य वस्तुओं को कैसे पहुंचाया जा सकता है और उसे कैसे संचित किया जा सकता है? जीवन रक्षक दवाओं के उत्पादन को कौन-सी चीज आसान बना देती है? मुर्दाघर में रखे मुर्दे को कौन-सी चीज सड़ने से बचाती है? अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को कौन कीटाणु-मुक्त करके स्वास्थयकर बनाता है? ऐसे ही कई और भी प्रश्न हैं लेकिन इनका जवाब एक ही है-एअर कंडीशनर और वातानुकूलन-प्रणाली। ये मशीनें न सिर्फ भौतिक सुख देती हैं बल्कि मनुष्य के रहने-सहने के स्तर को भी उत्कृष्ट बनाती हैं।

इसका श्रेय आधुनिक वातानुकूलन-प्रणाली के जनक विलिस हैविलैंड कैरियर को जाता है। लेकिन विलिस कैरियर के दिमाग में ये ख्याल  कहां से आया? इस अनूठे आविष्कार के लिए उन्हें कहां से प्रेरणा मिली? क्या यह आविष्कार महज इत्तिफाक था या फिर यांत्रिक सवालों के समाधान से निकली प्रक्रिया का एक हिस्सा था। आइए, जरा उस व्यक्ति की जीवन-लीला का क्रमानुसार अवलोकन करते हैं  जिसके आविष्कारों की तुलना थॉमस आल्वा एडीसन और राइट-बंधुओं जैसे आविष्कारकों के आविष्कार से की जाती है। विलिस के जीवन और कैरियर के प्रत्येक अध्याय से हमारे जहन में उसकी आदर्श, तेजस्वी और एक प्रेरक व्यक्तित्व की छवि उभरकर सामने आती है। 

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न्यूयार्क के अंगोला में 26 नवंबर 1876 को डुएन कैरियर और एलिजाबेथ कैरियर को चंचल विलिस कैरियर का माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। डुएन कैरियर ने अपना कैरियर एक संगीत-अध्यापक के तौर पर शुरू किया था। वे अंगोला के स्थानीय ग्रामीणों को संगीत सिखाया करते थे। डुएन ने किराने की दुकान भी चलाई और कुछ समय के लिए पोस्टमास्टर की नौकरी भी की। आखिर में ये अपना जीवन एक सामान्य किसान के रूप में बिताने लगे और अपनी पत्नी एलिजाबेथ के साथ पश्चिमी न्यूयार्क राज्य में स्थित अपने खेतों के पास जीवन व्यतीत करने लगे। इकलौते बच्चे के जन्म से उनकी जिंदगी खुशियों से भर गई।

डुएन कैरियर ज्यादातर समय अपने खेतों पर ही बिताते थे। इसलिए घरेलू कामों की पूरी जिम्मेदारी एलिजाबेथ ही संभालती थीं। गुजरते समय के साथ नन्हें विलिस को यंत्र से संचालित होनेवाले खेलों से गहरा लगाव हो गया। उनमें धीरे-धीरे यंत्रों को बनाने का भी शौक प्रस्फुटित हो रहा था। यहां गौर करनेवाली बात यह है कि विलिस का यंत्रों के साथ लगाव उनकी मां की वजह से हुआ। विलिस की मां एलिजाबेथ घर की खराब पड़ी घड़ी, सिलाई मशीन आदि घरेलू यंत्रों की मरम्मत खुद किया करती थी और यहीं से विलिस को भी प्रेरणा मिली। यंत्रों के प्रति विलिस की जिज्ञासा देखकर मां एलिजाबेथ को यह आभास हो गया कि उनका बेटा बड़ा होकर अभियंता ही बनेगा और यांत्रिक के क्षेत्र में इतिहास भी रचेगा।

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थोड़ा बड़ा होते ही विलिस का दाखिला अंगोला अकादमी में करा दिया गया और इसी एक कमरे के स्कूल में विलिस ने अपनी प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। वैसे तो वे बचपन से ही समझदार और पढ़ाकू थे, लेकिन नौ वर्ष की आयु में उन्हें गणित विषय के भिन्न को समझने में दिक्कत होने लगी। लेकिन विलिस की मां ने बहुत ही नायाब तरीके से विलिस के डर को दूर करते हुए सवालों को हल करना सिखाया। उन्होंने विलिस से कहा कि वो गोदाम से एक तसले में सेब लेकर आए। इसके बाद उन्होंने विलिस को सेब को आधे हिस्से में बांटने को कहा, फिर चौथाई और उसके बाद आठवें हिस्से में बांटने को कहा। फिर इसे और भी कई हिस्सों में बांटने को कहा। कैरियर इस घटना को बड़े ही चाव से याद करते हुए कहते हैं, ‘‘उन्होंने मेरे लिए जैसे एक नई दुनिया का दरवाजा खोल दिया और मुझे सवालों को हल करने का ऐसा तरीका सिखाया जिसे मैं आज भी इस्तेमाल करता हूँ।’’
"सिर्फ डेढ़ घंटे में उन्होंने मुझे शिक्षित किया। भिन्न (फ्रैक्शंस) के सवाल मेरे लिए अर्थपूर्ण हो गए और इसका मुझे बहुत गर्व था। उसके बाद से कोई समस्या मेरे लिए कठिन नहीं साबित हुई। मैं समस्याओं को कुछ सरल हिस्सों में बांट देता हूँ जिसके बाद समस्या आसानी से हल हो जाती है।"

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एलिजाबेथ ने शैक्षणिक कामों में बड़ी ही उत्सुकता से दिलचस्पी लेकर विलिस को भिन्न के अलावे अन्य गणितीय सवालों को भी हल करना सिखाया जिससे उनकी अभिरुचि बढ़ी और आखिरकार इन बातों ने उन्हें अभियंता बनने के लिए प्रेरित किया।

विलिस का अपने काम के प्रति समर्पण तो अनुकरणीय था ही, वे काफी गंभीर और मेहनती छात्र भी थे जो दिन में पिता के खेतों में कड़ी मेहनत करते और उसके बाद आधी रात तक गणित के सवालों को हल किया करते। उनके समर्पण का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता था कि एक दिन बर्फीले तूफान के दौरान अपने घर के बाहर वो रेखागणित के सवालों में इतने लीन थे कि उन्हें तूफान का ध्यान ही नहीं रहा।

परंतु दुर्भाग्यवश मात्र 19 वर्ष की आयु में विलिस ने अपनी मां को खो दिया, जिन्हें वो अपना सलाहकार और आदर्श मानते थे। उन्होंने अपनी मां के दिखाए हुए रास्तों पर चलने की शपथ ली और विलिस ने अपनी मां से विरासत में मिले गणित और यांत्रिक से जुड़े ज्ञान को आगे बढ़ाया।

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उनकी प्रतिभा को जानकर, न्यूयार्क के बाफलो स्थित केंद्रीय हाई स्कूल जहां उन्होंने माध्यमिक शिक्षा पूरी की, में जाने से पहले विलिस से उनके स्कूल प्राधिकारियों ने अन्य छात्रों को पढ़ाने के लिए कहा था। इसके बाद उन्हें राज्य स्तर पर छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई और साथ ही कॉर्नल विश्वविद्यालय में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दाखिला मिल गया।

विलिस छह फूट छह इंच लंबे, बलिष्ठ और जबरदस्त व्यक्तिव के धनी थे। वे हरफनमौला थे तथा कॉलेज की ओर से आयोजित किए जानेवाले तैराकी, स्केटिंक, मुक्केबाजी तथा अन्य खेल-आयोजनों में  बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया करते थे। इस नाजुक छात्र जीवन में ही उन्होंने कड़ी मेहनत और कॉलेज से मिलनेवाली छात्रवृत्ति के अलावे ट्यूशन, लॉन की घास काटने की पार्ट-टाइम नौकरी करने, छात्रालयों के एजेंट आदि कामों से पैसे कमाकर अपने खर्च की व्यवस्था करते थे। इसी दौरान उन्होंने अपने कुछ दोस्तों के साथ कपड़े धुलाई की एक एजेंसी खोली, जो अमेरिका में अपने तरीके का पहला काम था। इसके पीछे का उनका मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनना था। उन्हें अक्सर समस्याओं को खुद हल करने की अपनी मां की दी हुई सलाह याद आती थी।

विलिस के सुंदर व्यक्तिव ने कॉर्नवेल की छात्रा एडिथ क्लेयर सिमोर को आकर्षित किया और दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो गया। 1901 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद दोनों ने हमेशा के लिए एक होने का फैसला किया और अगले ही साल 1902 में दोनों ने खुशी-खुशी शादी कर ली।

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स्नातक के तुरंत बाद, विलिस को न्यूयार्क में बाफलो स्थित बाफलो फोर्ज कंपनी में बतौर अभियंता नौकरी का प्रस्ताव मिला। कंपनी में लोहे को पिघलाने, उसे ठंडा करने और सांचे में तब्दील करने का काम किया जाता था। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की धुन में विलिस ने नौकरी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। वे मैकेनिकल इंजीनियरिंग का उपयोग श्रमसाध्य अभ्यासों के बजाए तार्किक रूप से करने में ज्यादा विश्वास  करते थे। उन दिनों, अधिकांश अभियंता वास्तव में मशीनों के संचालन के बारे में ज्यादा जानकर नहीं होते थे जिसके कारण मशीनों के डिजाइन में सुरक्षा संबंधी ढेरों खामियां होती थी और परिणामस्वरूप लोगों की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित होती थी। विलिस ने इसे एक चुनौती की तरह स्वीकार करते हुए कंपनी के सभी उत्पादों की कार्यप्रणाली की जांच का फैसला किया। और छह महीनों के बाद उन्होंने मैकेनिकल ड्राफ्ट नाम से एक रिपोर्ट कंपनी की वार्षिक आम बैठक में प्रस्तुत की। उनकी थीसिस का सिद्धांत बहुत ही व्यावहारिक विषय पर था। एक नए कर्मचारी होने के बावजूद प्रस्तुत किए गए उनके सिद्धांत ने सभी को प्रभावित किया और कंपनी को अहसास हुआ कि विलिस में असीम यांत्रिक योग्यता है। बस इसे एक मंच की जरूरत है ताकि उसे और भी निखारा जा सके। इसलिए बैठक में यह फैसला लिया गया कि विलिस को सभी तरह की तकनीकी और सैद्धांतिक सहायता प्रदान की जाए साथ ही विलिस को कार्य समय के दौरान और उसके बाद भी अपनी सुविधानुसार काम करने की इजाजत दी जाए। विलिस एचवीएसी (हीटिंग,वेंटीलेशन,एयर कंडीशनर) इंडस्ट्री में दुनिया की पहली रिसर्च एंड डेवेलपमेंट लेबोरेटरी इसी बाफलो फोर्ज कंपनी में स्थापित की और यह बहुतों के लिए हैरत की बात हो सकती है क्योंकि उस समय वे महज 25 वर्ष के थे।

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अपने रिसर्च के दौरान, विलिस ने पाया कि वाष्प और वायु की भौतिकी और थर्मल गुणों के अतिरिक्त और किसी तरह के आंकड़े उपल्बध नहीं हैं। अतः वह प्रयोगशाला में लगातार परीक्षण और प्रोयोग से ही समीकरण निकालते और अपनी गणना को पूरा करते।

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बतौर युवा इंजीनियर विलिस का पहला प्रमुख कार्य न्यूयार्क में ही ब्रुकलिन स्थित सैकेट विलहेल्म लिथोग्राफिंग कंपनी में वातनुकूलित प्रणाली लगाने का था।  कंपनी के इंजीनियरों के सामने मुख्य रूप से ऊष्मा के बजाए आद्रता की चुनौती थी। उस समय के सलाहकार इंजीनियर, वॉल्टर टिमिस ने जे.इर्विन लायल, जो कि बाफलो फोर्ज कंपनी के सेल्स टीम के प्रमुख भी थे, के मैनहट्टन स्थित कार्यालय का दौरा कर स्थिति की अद्यतन जानकारी का ब्योरा लिया। इस लिथोग्राफिंग कंपनी की केस-स्टडी कुछ इस तरह थीः

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उनके छपाईखाने के कागज का आकार वायु में जल की मात्रा अवशोषित होने की मात्रा के आधार पर बढ़ता और घटता था। गर्म-आद्र दिन में कागज का आकार अलग होता था और गर्म-शुष्क दिन में अलग हो जाता था। रंगीन छपाई को भी इसी समस्या का सामना करना पड़ रहा था, क्योंकि रंग एक-दूसरे पर चढ़ रहे थे या फिर पिछले दिन के मुकाबले में दूसरे दिन की छपाई के रंग में अंतर आ जाता था।

छफाईकर्मियों के सामने यह एक कठिन चुनौती थी और उन्हें गुणवत्ता बनाए रखने के लिए या तो दोबारा से छपाई करनी पड़ती थी या फिर प्रेस की गति को कम करनी पड़ती थी। वैसे टिमिस के पास समस्या से निजात पाने का मोटा-मोटी तरीका तो था लेकिन उन्हें कुछ विशिष्ट सहायता और निर्देश की जरूरत थी। सो उन्होंने लाइले से संपर्क किया जो कि कॉर्नवेल स्नातक, विलिस कैरियर से काफी प्रभावित थे। अत:  उन्होंने टिमिस को विलिस कैरियर से मिलने के लिए कहा और इसके साथ ही लंबे और समृद्ध सह्योग की ओर पहला कदम पड़ा।

यह एक रोचक प्रकरण है कि इस वास्तविक समस्या से विलिस ने कैसे निजात दिलवाई ? क्योंकि इसी समस्या के समाधान ने वातानुकूलन-प्रणाली की अवधारणा को जन्म दिया।

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विलिस ने स्थिति का अध्ययन कर चुनौतियों को स्वीकारा और उनपर तुरंत कार्य करना शुरू किया। विलिस के साथ टिमिस ने भी हाथ मिलाया और मिलकर कुछ प्रयोग किए। प्रयोग के दौरान दोनों हाथ से बुने लिपटे हुए तौलिए को कैल्शियम क्लोरीन ब्राइन के घोल में भिगोया। हालांकि इससे ऊष्मा को कम करने में मदद तो मिली, लेकिन इस प्रयोग के दौरान वायु में लवण और दुर्गंध मिल गया जो कि छपाई की प्रक्रिया में स्वीकार्य नहीं थी।

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विलिस ने तब स्वयं का प्रयोग शुरू किया जिसके तहत भाप की जगह ठंडे पानी को गर्म कुंडलियों से गुजारा गया और इसके तहत कुंडलियों की सतह के तापमान को हवा के बहाव के जरिए कम करने का प्रयास किया गया। विलिस ने समस्या हल करने हेतु कठोर परिश्रम किया और अपने प्रयोग के परिणामों को डेटा, टेबल और ग्राफ के रूप में तैयार किया। फिर उसने सफलतापूर्वक बहाव की दर और ठंडे पानी के तापमान के साथ ही कुंडलियों को ठंडा होने की दर का सूक्ष्म अध्ययन किया एवं प्रति घन फूट हवा में तापमान एवं आद्रता आदि की मात्रा का भी आकलन किया।

इन कुंडलियों के पहले समूह को नमीकरण के लिए पंखों, नलियों (डक्ट्स), हीटर और छिद्रित भाप पाइपों के साथ लगाया गया था। इस प्रक्रिया में ठंडा पानी एक आर्टीजियन वेल से लिया गया था। यह बुंब कूप (आर्टीजियन वेल) एक ऐसा कूप होता है जिसमें दबाव-युक्त पानी स्वत: ही सतह पर आ जाता है। उन्होंने इसमें अमोनिया कंप्रेशर की भी मदद ली ताकि इस मौसम की पूरी गर्मी में इसके संचालन में कोई समस्या नहीं आए। इन ठंडी कुंडलियों का इस्तेमाल पूरे साल निर्धारित 55 % आद्रता पैदा करने के अनुरूप की गई थी, तथा प्रतिदिन 1,08,000 पाउंड बर्फ पिघलाकर आवश्यक ठंडापन बनाए रखा गया था।

लाइले, विलिस के प्रयोगों से काफी प्रभावित थे। उन्होंने तुरंत बाफलो फोर्ज कंपनी को एक पत्र लिखा जिसमें इस बात का जिक्र किया कि “ उन्होंने जो ठंडी कुंडलियां इस कंपनी को बेची थी, उनकी पिछले गर्मियों में अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं।’’ विलिस कैरियर ने अपनी बौद्धिक क्षमता व सृजनशीलता का परिचय देते हुए सभी कड़ियों को जोड़कर इसे एक नया रूप देने की कोशिश की, इनके जिस चार्ट में ठंडे पानी की बहाव की दर एवं कुंडलियों की पूरी जानकारी थी, वह 17 जुलाई 1902 को आधिकारिक रूप से छपकर सामने आई और इस तरह आधुनिक एयर कंडीशनिंग प्रणाली का जन्म हुआ।

इस सफल प्रयोग के बाद विलिस कैरयिर ने एयर कंडीशनिंग प्रणाली को नई परिभाषा दी उसने अनुसार

““ एयर कंडीशनर एक ऐसा उपकरण है जो वायु में मौजूद नमी को बढ़ाकर या घटाकर आद्रता को नियंत्रित करता है। आद्रता में नियंत्रण दरअसल तापमान में नियंत्रण होता है चाहे वह गर्मी बढ़ाकर किया जाए या ठंढ़ बढ़ाकर। वायु की शुद्धता उसे शोधित कर या छान कर किया जाता है साथ ही इसके माध्यम से वायु की गति और उसके वेन्टलेशन को नियंत्रित किया जाता है”।

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प्लांट की सफलता के बाद बिना विश्राम किए विलिस ने अपने अनुसंधान के तौर-तरीकों में सुधार लाने हेतु नए प्रयोगों का दौर शुरू कर दिया। बाफलो फोर्ज कंपनी का एक इंजीनियर आई.एच. हार्डेमन एक टेक्सटाइल इंजीनियर था। उसने विलिस को बताया कि उसने स्प्रे कंडीशनर का इस्तेमाल कपड़ा उद्योग में भी खासा हो सकता है क्योंकि वहां आद्रता की जरूरत कताई फैक्ट्रियों से ज्यादा होती है। हार्डेमन ने विलिस के स्प्रे को साउथ कैरोलिना स्थित बेलमॉन्ट के क्रोनिकल कॉटन मिल्स को बेची, लेकिन ऊष्मा का प्रभाव उपकरणों में अधिक होने के चलते मशीन में खराबी आ गई, विलिस ने तुरंत आद्रता की समस्या और नमी की मात्रा की गणना की और इसे शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा :

‘‘यदि मैं हवा में नमी पैदा करूं और उसी अवस्था में इसके तापमान को नियंत्रित करूं तो मैं किसी भी हद तक नमी के साथ हवा प्राप्त कर सकता हूँ। ऐसा मैं पानी के बेहतर छिड़काव के जरिए धुंध बनाकर भी कर सकता हूँ। जल के तापमान को नियंत्रित कर मैं तापमान व नमी को नियंत्रित कर सकता हूँ। जब अधिक नमी वाली हवा की जरूरत हो तो मैं ऐसा जल के तापमान को बढ़ाकर कर सकता हूँ, मैं ठंडे पानी का इस्तेमाल तापमान और नमी को कम करने के लिए कर सकता हूँ। ठंडे पानी का छिड़काव सतह में संघनन की प्रक्रिया को अंजाम देता है।’’

विलिस इस निष्कर्ष पर तब पहुंचा जब वे धुंध की अवस्था में किसी ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। तब उन्होंने नोट किया कि दरअसल धुंध हवा में मौजूद संघनित वाष्प की वजह से होती है। अपनी गणना के अनुसार विलिस ने महसूस किया कि हवा में जलवाष्प की मात्रा हवा के तापमान पर निर्भर होती है। जब वायु के तापमान में गिरावट होती है, तब वायु में मौजूद जलवाष्प के स्तर में भी गिरावट होती है। सो, अगर आद्र वायु को ठंडे पानी के छिड़काव से ठंडी की जाए, तो वायु में मौजूद जलवाष्प की मात्रा में भी गिरवाट होगी। धीरे-धीरे बिना किसी अतिरिक्त जल का छिड़काव किए वायु में मौजूद जलवाष्प की मात्रा वायु में मौजूद अधिकतम स्तर के जलवाष्प की क्षमता से भी ज्यादा पहुंच जाती है। जब ऐसी स्थिति होती है, तो जलवाष्प धुंध अथवा सुबह की ओस में बदल जाता है और जिस तापमान पर ये अवस्था पैदा होती है वो "एयर ड्यू पॉइंट" कहलाती है।

इस सिद्धांत को प्रयोग में लाने के लिए विलिस को थोड़ा समय लगा। सन 1904 में इस प्रक्रिया का औपचारिक रूप से वाटर-स्प्रे में संतोषजनक रूप से किया जा सका। उन्होंने इस प्रयोग के पेटेंट के लिए आवेदन किया और जनवरी 1906 में उन्हें इसका पेटेंट प्राप्त हुआ। उन्होंने इस खोज को एक नवीन नाम “ऐपरैटस फॉर ट्रीटिंग” एयर दिया।

ऐपरैटस फॉर ट्रीटिंग एयर पहला स्प्रे-टाइप एयर कंडीशनिंग उपकरण था और हालांकि इसे क्रांतिकारी खोज की संज्ञा दी गई थी, फिर भी इसकी विश्वसनीयता पर कई सवाल खड़े किए गए थे। विलिस को महसूस हुआ कि बाजार को इस ऐपरैटस के बारे में जानकारी देने की जरूरत है, सो, इसके बारे में “"बाफलो एयर वॉशर एंड ह्यूमिडीफायर" ”. नाम की कैटलॉग में सूचना प्रकाशित की गई। परिणामस्वरूप, उपकरण की ब्रिकी बढ़ने लगी और साथ ही विलिस की ख्याति भी काफी बढ़ी। इससे कंपनी का शुद्ध मुनाफा भी तेजी से बढ़ने लगा।

इसी दौरान विलिस ने एक सिद्धांत की भी खोज की, "दि लॉ ऑफ कॉन्सटेंट ड्यू-पॉइंट डिप्रेशन",इस सिद्धांत के अनुसार, वायु की सापेक्ष आद्रता तब तक अचर बनी रहती है जब तक शुष्क-बल्ब का तापमान और ड्यू-पॉइंट के तापमान के बीच का अंतर अचर रहता है। वर्ष 1907 में, विलिस ने स्वचालित नियंत्रण प्रणाली की एक डिजाइन की खोज की और इसका भी उन्होंने पेटेंट कराया। इसके पश्चात, उन्हें "दि इन्वेंटर ऑफ ड्यू-पॉइंट कंट्रोल" के नाम से भी मान्यता मिली।

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जैसे-जैसे समय बीता, विलिस ने वाष्पीकरण और शीतलन की साइक्रोमेट्रिक के विभिन्न पहलुओं के अनुसंधान पर और भी समय देना शुरू कर दिया, साथ ही एयर कंडीशनिंग सिस्टम की समस्त प्रक्रिया पर भी उतनी ही गहराई से विचार करने लगे। और इस अध्ययन के पश्चात उन्होंने एक निर्णायक दस्तावेज तैयार किया, जो कि एक एयर कंडीशनिंग के क्षेत्र में अपनी तरह का पहला दस्तावेज था और जिसका नाम ““रैशनल साइक्रोमेट्रिक सिद्धांत” ”था। आखिरकार उनका यह दस्तावेज तीन दिसंबर 1911 को हुई अमेरिकन सोसाइटी ऑफ मैकेनिकल इंजीनियर्स की वार्षिक बैठक में रखा गया। इस आलेख में विलिस ने निम्न सिद्धांतों को प्रस्तुत किया जिस पर उनका वाष्पीकरण का सिद्धांत आधारित था:

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पहला : - जब वायु नम हो तो तापमान कम हो जाता है क्योंकि सकल आद्रता के बढ़ने व उष्मा में गिरावट होने की मात्रा वाष्पीकरण में छुपी हुई वर्तमान उष्मा में वृद्धि के समानुपाती होता है।

दूसरा : - जैसे-जैसे हवा में नमी की बढ़ोत्तरी होती है वैसे-वैसे तापमान में तब तक कमी होती रहती है जब तक कि संपूर्ण रूप से स्थिति बदल नहीं जाती। और तापमान के इस अंतिम स्तर को स्थिरोष्म-आद्र कहा जाता है।

तीसरा: - जब जल के अछूते हिस्से को वायु में बिना किसी अवरोध के वाष्पित होने दिया जाता है, तो वह स्थिरोष्म नमी के तापमान को ग्रहण कर लेता है और संवहन से प्रभावित नहीं होता, अर्थात वायु का शुद्ध वेट-बल्ब का तापमान खुद के स्थिरोष्म नमी के तापमान के समान होता है।

और उक्त तीनों सिद्धांतों से चौथा सिद्धांत निकाला गया था: वायु का शुद्ध वेट-बल्ब तापमान वायु के सकल गुप्त उष्मा पर निर्भर करता है और अपने सापेक्ष अनुपात से मुक्त होता है, अगर वायु की सकल उष्मा अचर होती है तो वेट-बल्ब तापमान भी अचर रहता है।

विलिस के ये सिद्धांत एयर कंडीशनिंग क्षेत्र में मील के पत्थर थे और इन्हें “दि मैग्ना कार्टा ऑफ साइक्रोमेट्रिक” के नाम से जाना गया। इसके प्रकाशन के बाद इंजीनियरिंग उद्योग-जगत के लोग वायु के नियंत्रण के इस सिद्धांत से सहमत हुए और इसे व्यवसाय में एक मानक के रूप में शामिल किया।"विलिस चार्ट" " इंजीनियरिंग कॉलेजों के साथ-साथ स्कूली किताबों में पाठ्यक्रम के तौर पर भी शामिल किया गया। इतना ही नहीं, उनका सिद्धांत दुनिया की कई भाषाओं में रूपांतरित किया गया जिससे विलिस कैरियर के वैज्ञानिक खोज को व्यापक मान्यता मिली।

खैर, विलिस अपने कैरियर में काफी लीन थे और निरंतर कुछ नया खोजते रहते थे। लेकिन उनकी निजी जिंदगी में को एक बड़ा झटका तब लगा जब 1912 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया। हालांकि विलिस ने निजी जिंदगी की इस दु:खद घटना का प्रभाव अपने कैरियर पर नहीं पड़ने दिया और उसी साल उन्होंने जेनी मार्टिन के साथ विवाह कर लिया।

1914 में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत होते ही बाफलो फोर्ज कंपनी ने केवल उत्पादन की प्रक्रिया तक सिमटे रहने का फैसला लिया। लेकिन युवा विलिस अपनी सीमाओं का विस्तार करना चाहते थे, इसलिए वे और उनके सात सहकर्मियों ने अपनी-अपनी बचत से 32,600 डॉलर की राशि जमा की और 25 जून 1915 को न्यूयॉर्क में "कैरियर इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन" के नाम से एक अलग कंपनी की स्थापना की। जिन सात युवा इंजीनियरों ने इस कॉर्पोरेशन को स्थापित किया उनमें विलिस कैरियर, जे इर्विन लाइले, एडवर्ड टी.मर्फी, एल.लोगन लेविस, अर्नेस्ट टी.लाइले, फ्रैंक साना, अलफ्रेड इ. स्टेसी जूनियर और एडमंड पी. हेकेल शामिल थे।

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कैरियर इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन की स्थापना के साथ ही विलिस अपने काम के प्रति और भी जुनूनी हो गए और उन्होंने उन दिनों इस्तेमाल की जानेवाली रेफ्रीजेरेशन मशीनरियों में कई कमियों की खोज की। और अंतत: उन्होंने अपना एक नया वैज्ञानिक आलेख “डेवेलपमेंट पॉसीबिलिटीज ऑफ इंप्रूवमेंट इन रेफ्रीजेरेशन”” प्रस्तुत किया। जिसने एक नई तरह की मशीन की नींव रखी। विलिस ने कहा:

‘‘संपूर्ण विद्युत-प्रसारण की प्रणाली का विकास शून्य से एक विशाल उद्योग में हुआ है, वह भी सिर्फ सामान्य मोटरों से जो कि एक उच्च-गति का रोटेटिव उपकरण है।"

यह उद्योग निम्न-गति रेसीप्रोकेटिंग टाइप के भाप इंजिन से उच्च-गति के रोटेटिव टरबाइन में बदलता चला गया है। पंप मशीनरी(द्रव्य और गैस) रेसीप्रोकेटिंग टाइप से उच्च-गति रोटेटिव पंप में काफी तेजी से बदल रही है। आधुनिक बिजली घरों में उच्च-गति वाले डायरेक्ट-कनेक्टेड, सेंट्रीफ्यूगल, ब्वॉयलर-फीड पंप को पुराने भाप पर आधारित रेसीप्रोकेटिंग मशीनों की जगह स्थापित किया गया है। "

"परंतु पुरानी मैकेनिकल कला में ही गिनी जानेवाली रेफ्रीजेरेशन प्रणाली में इस तरह का कोई ठोस विकास नहीं हुआ है। जो सुधार विद्युत परिचालन और भाप मशीनों में अपनाए गए हैं बिल्कुल वैसी ही सुधार रेफ्रीजेरेटिंग मशीनों में भी अपनाए जाने की जरूरत है।’’

इस पेपर से सेट्रीफ्यूगल रेफ्रीजेरेशन मशीन के सिद्धांत का जन्म हुआ। इसकी प्रमुख विशेषता इसकी डायरेक्ट ड्राइव थी, जो कि उच्च-गति से परिचालन के लिए उपयुक्त था, और इसके अंदर उष्मा की अदला-बदली प्रदर्शन के लिहाज से भी और मूल्य के हिलाज से भी अत्यंत सरल और प्रभावी तरीके से सक्षम थी।

नई सेंट्रीफ्यूगल मशीन ने न्यू रेफ्रीजेरेंट डाइलीनी,को जन्म दिया, जो कि विषाक्त नहीं था और आधुनिक मैकेनिकल उपकरण के लिए उपयोगी विशेषताओं से लैस था, साथ में कई अन्य नई सुविधाएं भी थीं। इस मशीन का कई बार टेस्ट किया और तब इसे न्यूयार्क स्थित कैरियर इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन में मई 1922 में स्थापित किया गया। सेंट्रीफ्यूगल मशीन यानी चिलरको वास्तव में 1923 में बोस्टन स्थित डब्लू.एफ.स्राफ्ट एंड संस कैंडी नामक कंपनी को बेचा गया और मशीन को पहली बार इंस्टाल करने का श्रेय फिलाडेल्फिया के एक कैंडी उत्पादक स्टीफन एफ. विटमैन एंड सन को जाता है।

मशीन की बिक्री में लगातार इजाफा होता रहा परंतु इसकी गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं किया गया। विलिस ने सभी कर्मचारियों को सख्त निर्देश दिए थे कि मशीन की अच्छी तरह से जांच की जाए। इस प्रक्रिया में कमियों को बारीकी से खोजकर, उनमें बदलाव करके उन्हें दुरुस्त किया जाता था। सेंट्रीफ्यूगल मशीन विलिस और उनकी टीम के कठिन परिश्रम और गहन अनुसंधान का नतीजा था इनका उद्देश्य एक उत्कृष्ट व्यावसायिक मशीन बनाना था। चिलर का इस्तेमाल टेक्सटाइल मिल्स, कैंडी फैक्ट्री और फार्मास्यूटिकल लैब्स में बड़े पैमान पर किया गया।

इस तरह, विलिस कैरियर ने डैविड बोयल, जिन्होंने 1872 में मूल अमोनिया कंप्रेसर को डिजाइन किया था, के बाद पहली प्रमुख मैकेनिकल रेफ्रीजेरेशन की शुरूआत की।

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जैसा कि पिछले पृष्टों के अवलोकन से भी ज्ञात होता है, विलिस कैरियर को रातोंरात सफलता नहीं हासिल हुई। बल्कि ये मुमकिन हुआ कई चरणों में और प्रत्येक चरण में खास तरह का विकास हुआ। वर्ष 1923 में विलिस ने तीन प्रमुख फैन निर्माताओं के साथ साझेदारी की और 'एरोफिन कॉर्पोरेशन' .नामक एक नई कंपनी बनाई। एरोफिन कम वजन वाले पीतल और तांबे के हीट-एक्सचेंजर के उत्पादन में संलग्न था, जिसने भारी-भरकम ढालुआ लोहे वाले हीट-एक्सचेंजर के बदले एक सुगम विकल्प प्रदान किया। आगामी कुछ वर्षों के दरम्यान विलिस ने 195 टन वजनी तीन सेंट्रीफ्यूगल चिलर्स को डेट्रॉयट शहर के सबसे बड़े डिपार्टमेंट स्टूडियो जे.एल. ह्यूयडसन में स्थापित किया। इस इंस्टॉलेशन के पीछे का मुख्य उद्देश्य खरीदारों को ठंडे दिमाग से खरीददारी के लिए प्रोत्साहित करना था। इसके बाद विलिस ने मूवी थिएटर्स की ओर नजर की। इस क्षेत्र में उन्होंने अपना पहला एयर कंडीशनर लॉस एंजिलिस स्थित सिड ग्राउमैन्स मेट्रोपॉलिटन थिएटर में सफलतापूर्वक स्थापित किया, इसके बाद डलास के दि पैलेस थिएटर और हाउसटन के टेक्सन में स्थापित किया। इन तीनों थिएटरों में विलिस का एयर कंडीशनिंग सिस्टम सेंट्रीफ्यूगल चिलर्स के साथ लगा था। जैसी कि उम्मीद थी, ये थिएटर ही वे स्थान बने जहां लोग आरामदायक कूलिंग के साथ पहली बार आराम से मूवी देख रहे थे।

वर्ष 1925 में, विलिस ने यूएस नेवी के डिस्ट्रॉयर के इंजन रूम में एयर कंडीशनर लगाया, जो कि कैरियर इंजीनियरिंग कॉपॉरेशन के लिए गर्व की बात थी। अगली बारी स्काईस्क्रैपर्स की थी जिसने विलिस का ध्यान 1926 में आकर्षित किया। कैलिफोर्निया स्थित टी.डब्लू. पैटर्सन पहली बहुमंजिला इमारत बनी जिसमें विलिस ने एयर कंडीशनर लगाया। कुछ ही महीनों के अंदर विलिस ने न्यूयॉर्क सिटी स्थित 16 मंजिला राष्ट्रीय प्रसारण केंद्र में भी एयर कंडीशनर लगाया। इस तरह एक के बाद एक सफलता मिलती गई और इसी क्रम में 1927 में सैन एंटोनियो स्थित दि फॉस्ट नेशनल बैंक विलिस का एयर कंडीशनर लगाने वाला पहला बैंक बना। उसी वर्ष, विलिस ने “दि वेदरमेकर” के ब्रांड नेम से पहला उच्च क्षमता वाला आवासीय एयर कंडीशनर विकसित किया।


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अमेरिकी बाजार पर कब्जा करने के साथ ही विलिस के एयर कंडीशनरों की बिक्री ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कई नई ऊंचाइयों को छुआ। वर्ष 1928 में कैरियर इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन को ब्राजील स्थित मोरो वेल्हो सोने की खान में खदानकर्मियों के लिए कार्य-स्थल को बेहतर बनाने हेतु 76 टन के दो सेंट्रीफ्यूगल मशीन स्थापित करने का ठेका प्राप्त हुआ। एयर कंडीशनरों की अत्यधिक मांग की पूर्ति के लिए विलिस ने सिडनी, पेरिस, मुंबई, जोहान्सबर्ग और स्टटगार्ट में नए कार्यालय खोले।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विलिस ने मशीनों को स्थापित करने के लिए केवल बड़े बाजारों और सार्वजनिक स्थलों को ही नहीं चुना। उन्होंने छोटे खुदरा व्यापारियों और दुकानों के लिए भी यूनिट एयर कंडीशनर बनाया। और उन्होंने अपना पहला यूनिट एयर कंडीशनर 1928 में न्यूयार्क स्थित मर्चेंट्स रेफ्रीजेरटिंग कंपनी के उस कमरे में लगाया जहां अंडों को स्टोर किया जाता था। उसी साल उन्होंने जे इर्विन लाइले के साथ साझेदारी की और एक नई सहायक कंपनी “दि कैरियर-लाइले कॉर्पोरेसन” बनाई। कुछ महीनों के बाद, विलिस और लाइले ने महसूस किया कि उनके प्लांट में काम करनेवाले कर्मचारियों की सुरक्षा के स्तर को समुन्नत करने की जरूरत है। जिसके बाद कैरियर विश्वविद्यालय की स्थापना की गई, जिसमें छह प्रोफेसर और 20 विद्यार्थी थे और विलिस उसके अध्यक्ष थे। एक साल के अंदर कंपनी ने सात सुरक्षा इंस्पेक्टरों के साथ एक सुरक्षा-संगठन की शुरुआत की।


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व्यापार बढ़ने के साथ, विलिस ने न्यूयॉर्क में “लाइले प्लांट” ” के नाम से एक प्रॉपर्टी खरीदी जहां पर यूनिट एअर कंडीशनर उत्पादों का निर्माण किया जाने लगा। उनका पुराना “कैरियर प्लांट” अब कंपनी के अनुसंधान कार्यों के लिए रख छोड़ा गया था। इसके एक साल बाद कंपनी ने पेंसिल्वेनिया में तीसरा प्लांट स्थापित किया। इससे कंपनी की उत्पादन-क्षमता काफी बढ़ी और एक मीटिंग में कंपनी के प्रमुख ने यह कहते कि““सन 1921 में कुछ नहीं से सन 1928 में पांच एकड़ से ऊपर’’ अपने विकास का दस्तावेज प्रस्तुत किया।

इस तरह बहुत कम समय के अंदर विलिस के सेंट्रीफ्यूगल रेफ्रीजेरेशन ने कंपनी के बाजार का विस्तार मूवी थिएटर, बैंकों, शॉपिंग मॉल्स, कार्यालय, खदानों, प्रसारण केंद्रों और समुद्री जहाजों तक किया।

फरवरी 1928 में विलिस कैरियर ने अपने कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कहा, ““25 साल पहले एयर कंडीशनिंग सैंद्धांतिक और प्रायोगिक तौर पर एक अबूझ पहेली थी। और आने वाले समय में एयर कंडीशनिंग और गर्मियों में ठंडापन विलासिता से ज्यादा एक जरूरत की वस्तु बन जाएगी। पर हमें अपना ध्यान वर्तमान पर केन्द्रित करना होगा क्योंकि हम उस पिछले “अंधकारमय युग” का अंत करने जा रहे हैं जिसमें मानवीय सुविधा के मुताल्लिक शीतलता का लेशमात्र भी मौजूद नहीं था।’’

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बिक्री और मुनाफे के लिहाज से सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन 24 अक्टूबर 1929 में गुरुवार के दिन जिसे काला गुरुवार भी कहा गया, स्टॉक मार्केट पूरी तरह से ढह गया और इसके साथ ही दुनिया के इतिहास की सबसे लंबी और गहरी मंदी छा गई। विलिस, कुशाग्र बुद्धि के धनी थे, विलिस ने मार्केट में बने रहने की बात कही और कंपनी के अपने लक्ष्यों पर काम करती रही। साथ ही ऐसी परिस्थिति में नवीकरण(इनोवेशन) ही इनके लिए संजीवनी का काम कर सकता था। सो, समस्या पर चिंता करने के बजाय उन्होंने विषम परिस्थितियों के अध्ययन का फैसला किया। उधर अर्थव्यवस्था में काफी तेजी से बदलाव हो रहा था और विलिस ने महसूस किया कि एयर कंडीशनिंग उद्योग से आशान्वित होकर आए सभी उत्पादकों को नुकसान हो रहा था। उन्होंने परिस्थिति का आकलन कर अपना उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि "चिंता करने की सबसे खराब बात यह है कि वो हमारी एकाग्रता की क्षमता को नष्ट कर रहा है। जब हम चिंता करते हैं तो हमारा दिमाग यहां-वहां और सब जगह भटकने लगता है। हालांकि, जब हम खुद को चुनौती के लिए मानसिक तौर पर तैयार कर लेते हैं, तब हम सभी अनिश्चित विचारों को दूर कर खुद को उस स्थिति में ले आते हैं जब हम अपनी समस्या पर एकाग्र होने लगते हैं।"

ऐसे समय में विलिस ने बाजार की अपनी रणनीति को सुनियोजित किया और अपनी कंपनी का छोटे कमर्शियल रेफ्रीजेरेटर बनाने वाली “ब्रुन्सविक क्रोएशेल कंपनी” और यूनिट हीटर्स बनाने वाली“दि यार्क हीटिंग एंड वेंटीलेटिंग कॉर्पोरेशन” के साथ विलय पर अपनी मुहर लगा दी। इन इंजीनियरिंग और उत्पादन विशेषज्ञों के साथ कैरियर कॉर्पोरेशन ने कंपनी को एक नया स्लोगन ““वेदरमेकर टू दी वर्ल्ड” दिया ।

विलय के तुरंत बाद विलिस ने रेल यातायात पर काम करना शुरू किया। उन्होंने भांप लिया कि इस क्षेत्र में राजस्व और उपभोक्ता संतुष्टि की काफी संभावनाएं हैं और जैसा कि उन्होंने बाद में कहा भी: “"थिएटर, डिपार्टमेंटल स्टोर्स, रेस्टोरेंट ने बेशक महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन हमें ज्यादा बल तब मिला जब सार्वजनिक तौर पर रेल यातायात द्धारा इसे व्यापक उपयोग हेतु स्वीकार किया गया। "

खैर, उन्होंने अपने स्टीम इजेक्टर पर शोध अविलंब शुरू कर दिया जो जल को बतौर रेफ्रिजरेंट इस्तेमाल करता है। 1930 में पहली बार बाल्टीमोर में रेलवे यात्री यान को कूल करने का प्रदर्शन किया गया। एक रेडियो कमेंटेटर लोवेल थॉमस ने लाइव रिपोर्ट देते हे कहा न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी की यात्रा के लिए रेल अधिकारियों की एक सबसे प्रभावशाली सूची और वहां...वे एक पुराने अप्रचलित कार में कदम उठा। बाहर आग बरसाती गर्मी थी। कार के अंदर का तापमान 74, शांत और सुखद था। और यहां किस चीज की वजह से ठंडक थी? क्यों ! जी हां, गर्म वाष्प ! अत्यधिक गर्म वाष्प! एक नया भाप रेलगाड़ियों को ठंडा करने के लिए तैयार किया गया है”।

यह जीनियस विलिस कैरियर थे। सन् 1903 में उन्होंने पता लगाया कि हवा में नमी कम करने यानी उसे शुष्क करने के लिए पानी का उपयोग किया जा सकता है और वही विलिस कैरियर एक पीढ़ी बाद इस अनुभव से दो-चार हुआ कि वाष्प का प्रयोग पानी को ठंडा करने हेतु किया जा सकता है।

एक बहुत ही दिलचस्प घटना, जो विलिस के वित्तीय और मार्केंटिंग रणनीति को प्रदर्शित करती है, तब घटी जब उन्होंने शिकागो के एक बैंकर क्लाउड वैंपलर के पास गए जो उस बिल्डिंग के रखरखाव का काम देखता था जिसमें विलिस का ऑफिस भी था। विलिस किराए में कटौती चाहते थे सो, उन्होंने बैंकर से बात का सिलसिला प्रारंभ किया और दो-चार मुलाकात में ही वैंपलर को विलिस ने अपना वित्तीय सलाहकार बना लिया। अपने लागत खर्च में कटौती के एक निर्देश के तहत विलिस ने कहा, “"हम शोध और विकास कार्य कम नहीं करेंगे। हम प्रशिक्षित लोगों को भी नहीं निकालेंगे, लेकिन इसके अलावे और हम कुछ भी नहीं करेंगे। "

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अबतक के वर्णन से आप यह तो समझ ही गए होंगे कि विलिस रातोंरात एयर कंडीशनिंग के विशेषज्ञ नहीं बने। सालों तक उन्हें तरह-तरह की तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ा पर उन्होंने कभी हार नहीं मानी। जब भी वे किसी तकनीकी समस्या का हल निकाल पाने में असफल होते, उसे कुछ समय के लिए टाल देते लेकिन कभी हार नहीं मानते थे। अगर किसी वजह से उन्हें लगता कि उनकी खोज व्यावसायिक सफलता के अनुरूप नहीं है, तो वे उसे रद्द कर देते। एकबार उन्होंने कहा“ मैं केवल खा सकने वाली मछलियों को ही पड़ता हूँ, और केवल खाने योग्य गेम का ही शिकार करता हूँ यहां तक कि लेबोरेटरी में भी।’’

उनके जीवन की एक और दिलचस्प घटना है जो विलिस के उच्च स्तर की प्रज्ञा को दर्शाता है। एकबार एक केमिस्ट ने उन्हें फ्रीओन-12 के उत्पादन के बारे में बताया, एक रंगहीन गैस जिसे मूल रूप से डाइक्लोरोडाइफ्लोरोमिथेन के नाम से जाना जाता है। केमिस्ट के मुताबिक उस गैस को प्राप्त करने का औद्योगिक प्रक्रिया के अलावा और कोई तरीका नही था। विलिस को पूरा भरोसा था कि अचानक सामने आया यह गैस सेंट्रीफ्यूयगल कंप्रेशन के लिए एक शानदार रेफ्रीजेरेंट साबित होगी। उन्होंने फार्म्यूला मालूम करने हेतु केमिस्ट से काफी दिक किया और आखिरकार वे सफल भी हुए। केमिस्ट ने फॉर्म्यूला एक कागज पर पेंसिल से लिखा और उसे फ्लूड सैंपल के साथ विलिस को दिया। फिर विलिस इस पर अनुसंधान करने में जुट गए लेकिन कई अनुसंधान और टेस्ट के बाद 1931 में विलिस ने कैरेन-2 नाम का एक नया ही रेफ्रीजेरेंट तैयार कर लिया। यह रेफ्रीजेरेंट पहले की प्रक्रिया के मुकाबले काफी बेहतर और सक्षम था। पहला केरेन-2 रेफ्रीजरेंट न्यूयार्क सिटी स्थित यूएस कोर्ट हाउस में स्थापित किया गया जो कि सफलतापूर्वक 16 सालों तक बिना किसी शिकायत के चला रहा। वाकई क्या उपलब्धि थी!

वर्ष 1931 में विलिस कॉर्पोरेशन ने 'ऐटमॉसफेरिक कैबिनेट' को प्रस्तुत कर अपने नई खोज की जानकारी दी। इस कैबिनेट में पंखे के साथ एक रूम कूलर, कैबिनेट से ही लगी हुई ठंडी कुंडलियां तथा फिल्टर व्यवस्थित थीं जो कमरे से बाहर इंस्टॉल्ड एक रेफ्रीजेरेटिंग मशीन से जुड़ी थी।

विलिस की सतर्कता और सतत नवीकरण के कारण मंदी के बावजूद पूरे दशक के दौरान कैरियर कॉर्पोरेशन का व्यवसाय काफी तेजी से बढ़ा। इस दौरान उन्होंने दूसरे क्षेत्रों में भी अपना हाथ फैलाया और क्वीन मैरी और क्वीन एलिजाबेथ जैसे लग्झरी क्रूज लाइनर्स में भी एयर कंडीशनर लगाया। वे चिकित्सा-क्षेत्र में भी उतरे; मेक्सिको सिटी के कई अस्पतालों के साथ लिनॉक्स हिल अस्पताल न्यूयॉर्क तथा इजिप्ट में काहिरा के अस्पतालों में भी एयर कंडीशनर लगाए गए। इस तरह मंदी के बावजूद भी व्यवसाय में बढ़ोत्तरी होती रही, साथ ही कंपनी ने अपने व्यावसायिक नीतियों पर भी बराबर ध्यान दिया। जून 1933 के आखिर तक, कुछ 30 डीलरों ने लगभग 5,00,000 डॉलर के एयर कंडीशनर कैरियर कॉर्पोरेशन से खरीदे।

18 नवंबर 1937 को 700 से भी ज्यादा लोगों का एक बड़ा समूह साइराकूस होटल के बॉलरूम में शहर के एक नए और सबसे सफल उद्योग के स्वागत में जमा हुआ। इतने दिनों में कैरियर कॉर्पोरेशन एक भरोसेमंद कंपनी के तौर पर उभरी थी जो कि प्रबंधन और कैरियर कॉर्पोरेशन के 600 कर्मचारियों के सामूहिक प्रयास से संभव हो सका था।

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विलिस ने "नालीनुमा वेदर मास्टर" की खोज करके एक और कामायबी अपने नाम की जिसे ज्यादातर"एयर हैंडलिंग यूनिट(एएचयू)" भी कहा जाता है। यह खोज गगनचुंबी इमारतों में व्याप्त समस्याओं से प्रेरित थी, मतलब ऊंचाई और प्रति मंजिल कमरों की संख्या की वजह से बाहरी वेंटीलेशन की समस्या इनमें आम थी।

एक आदर्श एएचयू (कंडीशनिंग ऐपरैटस) वायु चक्र का एक प्रमुख हिस्सा है। एएचयू में जो मूल तत्व होते हैं उनमें फैन मोटर, शीतल क्वायल्स, मॉड्यूलेटिंग फेस और बाइपास डंपर्स तथा वायु के बहाव वाले मिक्सिंग बाक्सेज। इससे एएचयू के साथ ओ.ए. डक्ट की साइज भी काफी बढ़ गई। लेकिन विलिस ने कॉम्पैक्ट डक्टस के जरिए जगह बचाने का लक्ष्य निर्धारित किया और नालीनुमा वेदर मास्टर इसी सफलता का जवाब था।

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ओ.ए. कक्ष काफी बड़े होते हैं जिसमें संवेदनीय और असंवेदनीय उष्मा की निकासी की जरूरत पड़ती है। ये दोनों उष्मा के वे प्रकार हैं जो वातावरण में प्रेषित और अवशोषित होती रहती हैं। असंवेदनीय उष्मा ठोस, तरल और गैस के चरण में होनेवाले बदलाव से संबंधित है जबकि संवेदनीय उष्मा गैस अथवा वस्तु के तापमान से सीधा संबंधित है। विलिस ने संपूर्ण ओ.ए. प्रवाह को ठंडा करने का निर्णय लिया और इसे ड्यू पॉइंट स्तर तक ले आए। परिणाम काफी प्रोत्साहित करनेवाला था क्योंकि ओ.ए. डक्ट के लिए जरूरी जगह कम हो गई थी। डक्टिंग के लिए उच्च वेग(20 मीटर प्रति सेकेंड ) का इस्तेमाल किया गया ताकि ओ.ए. को नालीनुमा वेदर मास्टर में बदला जा सके।

कंपनी ने अपना पहला वेदर मास्टर कॉन्डुइट पेंटागन में स्थापित किया साथ ही इसे वाशिंगटन डीसी स्थित स्टैटलर होटल में भी स्थापित किया गया। 1939 में अमेरिका का द्वितीय विश्वयुद्ध में हिस्सा लेने से पहले कंपनी का ये आखिरी इंस्टालेशन था। उसी वर्ष, लाइले कैरियर कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष चुने गए। अध्यक्ष चुने जाने पर लाइले ने काफी प्रोत्साहित करने वाला संबोधन अपने कर्मचारियों को दिया और उन्होंने कहा: “ हम प्रचंड आपदाओं से गुजरे हैं। हम उबरे भी और तीन अलग-अलग संगठन एक में समाहित भी हो गए। मैं ईमानदारी से कह सकता हूँ कि इस कॉर्पोरेशन के लिए भविष्य काफी सुनहरा है”।

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1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत के साथ विलिस ने अपना पूरा ध्यान युद्ध और अमेरिकी सेना पर लगा दिया। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि वो सेना के लिए कुछ कर सकें। सेना ने भी विलिस की इंजीनियरिंग कुशलता का पूरा फायदा उठाया। वर्गीकृत उपकरणों जैसे कि एयरप्लेन इंजन माउंट्स, बंदूकों की साइट हुड्स, टैंक एडैप्टर और हेजीहॉग जैसी एक एंटी सबमरीन बॉम्ब डिस्चार्ज के निर्माण में विलिस का सहयोग उल्लेखनीय था। विलिस का योगदान रेफ्रीजेरेशन के तौर पर भी हुआ जिसे जल्द खराब होने वाले खाद्य पदार्थ को अमेरिका से 6000 मील दूर सैनिकों तक सुरक्षित पंहुचाना मुमकिन हो सका।

अमेरिका की कई प्रतिष्ठित कंपनियों ने अपने एयर कंडीशनिंग प्रणाली को युद्ध में स्टील के निर्माण में ब्लास्ट फर्नेस को नियंत्रित करने के लिए लगाने का निश्चय किया। सो, विलिस ने यूएस नेवी की मदद 11 नए पोत और उनकी सहयोगी 258 जहाजों में एयर कंडीशनर लगाकर किया। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर काफी कुछ होने के बावजूद, विलिस की निजी जिंदगी त्रासदी से उलझी रही और वे अपनी दूसरी पत्नी जेनी मार्टिन को भी युद्ध के दौरान खो बैठे। फिर गुजरते वक्त के साथ युद्ध की तीव्रता भी बढ़ती गई।

11 सितंबर 1941 को कैरियर कॉर्पोरेशन को यूएस नेवी में उनके योगदान के लिए अमेरिकी नौसेना आयुध ब्यूरो की ओर से ब्यूरो फ्लैग और नेवी “ई” पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उसी साल 1941 में ही विलिस ने फिर से शादी की, इस बार उनकी पत्नी थीं एलिजाबेथ मार्श वाइस।




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1942 में एरोनॉटिक्स की राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने ऑहियो के क्लीवलैंड स्थित विंड टनल मे एयर कंडीशनिंग प्रणाली लगाने का ठेका दिया। विलिस के लिए यह काफी चुनौतीपूर्ण कार्य था लेकिन उन्होंने चुनौती को सफलता में बदल दिया। उनके शब्दों में “यह काफी मुश्किल प्रोजेक्ट था। पहली बार जब मैंने काम शुरू किया तो यह बिल्कुल असंभव लग रहा था लेकिन इस दुरूह प्रोजेक्ट के सफल होने पर वायु सेना के उच्च अधिकारियों ने कहा कि द्वितीय विश्वयुद्ध कई महीने कम हो गया”। विलिस कैरियर ने असंभव को संभव कर दिखाया और परिणाम इतना शानदार था कि वैश्विक युद्धस्थिति को जल्द खत्म कर दिया।

एक अन्य बड़ी सफलता विलिस के उपकरण का दक्षिण अफ्रीका स्थित रॉबिन्सन डीप में लगना था, जो कि दुनिया की सबसे गहरी खदान है। विलिस के उपकरण की मदद से खदान की गहराई 1500 फीट से 8500 फीट तक संभव हो सकी जिससे सोने की उपलब्धता में इजाफा संभव हो सका।

इधर एक तरफ अमेरिकी सेना पर युद्ध का तनाव बढ़ रहा था तो दूसरी तरफ विलिस को झटके-पर-झटके लगते जा रहे थे। इस बार बड़ा झटका तब लगा जब वर्ष 1942 में कैरियर कॉर्पोरेशन के निवर्तमान अध्यक्ष जे.इरविन लाइले का निधन हो गया। लाइले को याद करते हुए विलिस ने उन्हें अपना साझीदार और प्रिय मित्र कहा। लाइले की मौत के बाद क्लाउड वैंपलर को कैरियर कॉर्पोरेशन का अध्यक्ष नामित किया गया। अबतक विलिस कैरियर भी 66 वर्ष के हो चुके थे और ये वो उम्र थी जब ज्यादातर लोग रिटायर होने की सोचते हैं, लेकिन ऊर्जा से ओतप्रोत विलिस युद्ध में लगी सेना की जरूरतों को पूरा करना चाहते थे। वर्ष 1942 में विलिस कैरियर की खोज सेंट्रीफ्यूगल चिलर की 20वीं वर्षगाठ भी मनाई जो कि युद्ध-सामग्री बनाने में एक महत्वपूर्ण सहयोगी साबित हुआ था।

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1943 के अंत तक युद्ध समाप्ति के बाद भीषण त्रासदी और महामारी खड़ी हो गई थी। ऐसे समय में उन्होंने “पेनिसिलीन” जैसी चमत्कारी दवा को बनाने में मदद की जिससे मलेरिया का इलाज हो सका। विलिस का उपकरण ओहियो में सिनसिनाटी स्थित क्राइस्ट अस्पताल में लगाया गया था जहां इस चमत्कारी दवा को बनाया जा सका।

शांति स्थापना के बाद विलिस ने अपने वेदरमेकर ब्रांड के विभिन्न उत्पादों को दुकानों और कार्यालयों में प्रचार किया। और 1950 तक उनके लिए वैश्विक बाजार तब अपने चरम पर पहुंचा था जब विलिस ने अपनी शाखाएं जोहानसबर्ग, जिम्बाब्वे और मोजाम्बिक में खोली। उन्होंने सिंगापुर में भी एक शाखा खोली जहां दक्षिण एशियाई देश इंडिया और पाकिस्तान के साथ-साथ अन्य देशों का मुख्यालय स्थापित किया गया। फिर उन्होंने ग्रीस, फ्रांस, इंडिया, जापान, पुर्तगाल, मोरक्को, इस्रायल और वेनेजुएला में बर्फ बनाने के लिए संयंत्र स्थापित किया।

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उसी साल विलिस ने “द कैरियर डिजाइन मैनुएल” के नाम से एक विस्तृत उत्पाद-सूची प्रकाशित की जिसे एयर कंडीशनिंग क्षेत्र का मैग्ना कार्टा भी कहा गया जिसमें साइक्रोमेट्रिक चार्ट से लेकर एयर ट्रीटमेंट ऐपरैटस, ड्यू-प्वाइंट डिप्रेशन का अचर सिद्धांत और सेंट्रीफ्यूगल मशीन का सिद्धांत वर्णित था। यह मैनुअल इंजीनियरों के लिए बाइबल सरीखा था। हालांकि संकलन का यह कार्य विलिस के लिए काफी कठिन परिश्रम और तनाव वाला साबित हुआ और उन्हें इसी क्रम में जबरदस्त दिल का दौरा पड़ा और फिर उन्हें कंपनी से सेवानिवृत्त होना पड़ा।

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अपनी खराब सेहत की वजह से विलिस भले ही चेयरमैन पद से सेवानिवृत्त हो गए लेकिन बाकी की जिंदगी कुछ नया खोजने के अपने जुनून के साथ ही बिताई। शारीरिक रूप से वे पहले की भांति सक्रिय नहीं थे लेकिन दिमागी तौर पर वे अभी भी काफी तेज थे। दिल काफी कमजोर होने की वजह से डॉक्टर की सलाह पर वे 20 घंटे रोजाना लेटे रहते क्योंकि काम का ज्यादा बोझ वे नहीं उठा सकते थे। फिर भी उनके पास नोटपैड जरूर रहता और वे जटिल सवालों को सुलझाने में लगे रहते। उन्होंने अपनी रिटायरमेंट दुनिया के लिए एयर कंडीशनिंग को सुलभ बनाने में समर्पित कर दी। हालांकि वे दुबारा ठीक नहीं हो सके और इसी शय्या पर 9 अक्टूबर 1950 को अपने 74 वें जन्मदिन से बस कुछ दिन पहले उनका देहांत हो गया। तीन-तीन बार शादी करने के बाद भी उनकी एक भी संतान नहीं थी और अपनी पत्नी जेनी मार्टिन के कहने पर उन्होंने दो बच्चों को गोद लिया था। उन्हें और उनकी पत्नियों को न्यूयार्क के बाफलो स्थित फॉरेस्ट लेन में दफनाया गया।

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इंजीनियरिंग के क्षेत्र में विलिस ने अपने पूरे जीवन-काल में उल्लेखनीय योगदान दिया था। जैसे ही उनकी ख्याति बढ़ी फिलाडेल्फिया की सिटी ट्रस्ट कंपनी ने एयकंडीशनिंग और रेफ्रिजेरेशन की प्रक्रियाओं और उपकरण के आविष्कार हेतु जॉन स्कॉटा मेडल से उन्हें सम्मानित किया। सन् 1934 में अमेरिकन सोसाइटी ऑफ मैकेनिकल इंजीनियर्स(ए.एस.एम.ई) ने विलिस कैरियर को अपना सबसे बड़ा पुरस्कार ए.एस.एम.ई मेडल दिया। दो साल बाद, साइक्रमेट्रिक फॉर्म्यूला की खोज के 25 वीं वर्षगांठ के अवसर पर जापान की रेफ्रीजेरेशन असोसिएशन ने विलिस कैरियर को अपना मानद सदस्य चुना। विलिस को लेघ विश्वविद्यालय ने इंजीनियरिंग तथा अल्फ्रेड विश्वविद्यालय ने साइंस में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। सन् 1949 में ग्रेट ब्रिटेन की न्यूकॉमेन सोसायटी ने विलिस को वातानुकूलन-प्रणाली के जनक का सम्मान दिया। न्यूकॉमेन सोसायटी, जो इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी के इतिहास का अध्ययन करनेवाली ए.एस.एच.आर.ई के हॉल ऑफ फेम में शामिल होनेवाले विलिस कैरियर पहले व्यक्ति थे। ए.एस.एच.आर.ई अमेरिकन सोसायटी ऑफ हिटिंग, रेफ्रीजेरेशन और एयर कंडीशनिंग इंजीनियर्स के अधिकार के लिए काम करता है।

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आखिर वो कौन-सी बात उस एक युवा इंजीनियर के दिमाग में आई जिसकी वजह से कई करोड़ डॉलर की इंडस्ट्री खड़ी हो गई। विलिस कैरियर ने वाणिज्यिक एयर कंडीशनिंग को एक आवासीय सुविधा में बदल दिया। एयर कंडीशनिंग का मैग्नाकार्टा, साइक्रोमेट्रिक चार्ट, एयर ट्रीटमेंट ऐपरैटस, ड्यू-प्वाइंट डिप्रेशन का अचर सिद्धांत, ड्यू-प्वाइंट कंट्रोल, सेंट्रीफ्यूगल मशीन का प्रयोग धड़ल्ले से आज किया जाता है।

शुरुआत में सिर्फ औद्योगिक अनुप्रयोगों में वातानुकूलन का इस्तेमाल किया जाता था जिसे विलिस ने सिनेमाघरों, डिपार्टमेंटल स्टोर्स, थिएटर और रेस्तरां तक पहुंचाया। रेलवे और यात्री-पोत को वातानुकूलित करने और हमारे घरों में युनिट एयर कंडीशनिंग पहुंचाने तक में विलिस ने महती भूमिका निभाई। विलिस कैरियर ने साबित किया कि वातानुकूलन विलासिता की चीज नहीं बल्कि आवश्यकता है। कैरियर ने अपना पूरा जीवन इंसान की जरूरतों को पूरा करने वाली नई खोज और तकनीक के सुधार में लगा दिया। विलिस कैरियर को अमेरिका के महान आविष्कारकों में से एक माना जाता है। मगर एडीसन, बेल, राइट-बंधुओं जैसे आविष्कारकों की तरह कैरियर को वह मान्यता हासिल नहीं हुई। कैरियर की वजह से ही इंडोर स्पोर्ट्स संभव हो पाया। उनके आविष्कार की वजह से ही फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री का विकास हो पाया। आज हम विलिस कैरियर के आविष्कार के कारण ही मॉल्स, दुकानों, कार्यालयों और सार्वजनिक परिवहन-यानों में ठंडी हवा का आनंद लेते हैं। और जिस तरह एयर कंडीशनिंग में उद्योग लगातार सुधार कर रही है ठीक उसी तरह अपने पहले एयर कंडीशनिंग के खोज के दौरान विलिस कैरियर ने सन 1902 में किया था।

आधिकारिक तौर पर दुनिया विलिस कैरियर को “मौसम निर्माता” के नाम से जानती है मगर क्या डॉ.कूल उपनाम उपयुक्त नहीं है ???

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कंपनी ने मध्य एशिया के सउदी अरब में वातानुकूलन-प्रणाली की स्थापना की। साल 1946 में तेहरान की ए.आर.एम.सी.ओ नाम की एक कंपनी की तरफ से एक बड़ा काम मिला। इसके साथ ही रियाद के सभा-कक्ष और दमाम के राजमहल में एयर कंडीशनिंग करने का अनुबंध भी हासिल हुआ।

सन् 1951 के अंत तक, एयर कंडीशनिंग इंडस्ट्री एक अरब डॉलर तक का हो चुका था और कैरियर की कंपनी ने फैक्ट्री, सुपर बाजार, कार्यालय, सिनेमाघर, अस्पताल, होटल, गगनचुंबी इमारतों और खदानों में हजारों की संख्या में अपने एयर कंडीशनर लगाए। कैरियर कॉर्पोरेशन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता तब मिली जब जापान की टोयो इंजीनियरिंग कंपनी ने अपने कार्यालय, टैक्सटाइल प्लांट और मर्चेंट शिप्स में एयर कंडीशनर लगाने का ऑर्डर किया। पेनिसिलिन के उत्पादन को बढ़ावा देने हेतु रोम के पलमा प्रयोगशाला में कैरियर कॉर्पोशन ने ही सेंट्रीफ्यूगल-कूलिंग प्रणाली को लगाया था। सन् 1955 में कैरियर कॉर्पोरेशन ने फिलिपिंस में सफलतापूर्वक कपड़ा मिलों में अपने एयर कंडीशनरों को लगाया।

वास्तविकता यह थी कि अमेरिका के घरेलू बाजार से ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में एयर कंडीशनिंग की मांग थी। सन् 1953 में दस लाख से ज्यादा एयर कंडीशनर बेचे गए। मार्च 1955 में कैरियर कॉर्पोरेशन को व्यापार के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी हाथ लगी जब अफिलिएटेड गैस इक्विपमेंट को अपने साथ विलय कर लिया। इससे विलिस की कंपनी को बहुत फायदा पहुंचा और रातोंरात हीटिंग और कूलिंग उत्पादनों को मिलाकर $200 मिलियन का व्यापार किया। अगले साल, लेविटॉउन पेनसिल्वेनिया में घरेलू एयर कंडीशनिंग लगाने का सबसे बड़ा अनुबंध कैरियर कॉर्पोरेशन को मिला।

कैरियर की मशीनें अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के बाहर पहुंच रहे थे और अपनी इस उपलब्धि को कंपनी ने अपनी नियम-पुस्तिका में “बांबे से ब्यूनस आयर्स- स्टॉकहोम से सिंगापुर” ” जैसे स्लोगन से प्रचारित किया था। सन 1956 के अंत में कैरियर कॉर्पोरेशन को दुनिया के तमाम मीडिया में जगह मिली साथ ही उस समय की शीर्ष पत्रिकाओं जैसे दी सैटिडै इवनिंग पोस्ट, टाइम्स न्यूजवीक, बेटर होम्स और गार्डेन्स में विस्तृत रूप से लेख छपा। विज्ञापन एजेंसियों ने कुछ इस तरह का नारा दिया ““यह बेहतर इच्छा, चैन की नींद, खुशहाल आशियाना और बेहतर स्वास्थ्य का समय है।"

1969 में कैरियर कॉर्पोरेशन के एयर कंडीशनिंग उपकरणों को न्यूयॉर्क के 110 मंजिल ऊंची ट्विन्स वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में लगाया गया। 1970 में कंपनी की वार्षिक आय बढ़कर $594 मिलियन हो गई। शिकागो में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी इमारत, सीअर्स टाउन में एयर कंडीशनिंग लगाने का अनुबंध 1974 में कैरियर कंपनी को ही मिला। 1978 में वातानुकूलन-प्रणालियों का वाणिज्यिक विक्रय बढ़कर 25 फीसदी तक पहुंच गया।

80 के दशक के दौरान और 90 के दशक की शुरुआत में कंपनी वैश्विक स्तर पर फैल गई। अपने मूल व्यापार से हटकर ऊर्जा नियंत्रण और सेवा क्षेत्र की तरफ रुख किया। कैरियर कंपनी यूएसए के कॉनेक्टिकट, हैर्टफोर्ट में स्थित यू.टी.सी क्लाइमेट का एक हिस्सा बन गई जो कि यूनाइटेड टेक्नॉलोजी की एक ईकाई है। 1993 में, कैरियर कॉर्पोरेशन ने यू.एस.ग्रीन बिल्डिंग काउन्सिल की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूर्व और लैटिन अमेरिका में अपने व्यापार को फैलाने के लिए कंपनी ने एक मजबूत वितरण-तंत्र की भी स्थापना की। 1994 में चीन जैसी बड़ी और उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश के साथ सात संयुक्त उद्यम पर कैरियर कॉर्पोरेशन ने समझौते पर हस्ताक्षर किया। 2003 में कैरियर एच.वी.ए.सी उत्पादन करने वाली पहली कंपनी बनी और इसके साथ ही पर्यावरण संस्था द्वारा चलाई जानेवाली “क्लाइमेट लीडर प्रोग्राम” में प्रवेश किया। और एक दशक के अंदर ही कैरियर की वातानुकूलन-प्रणाली बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ दी पीप्युल में स्थापित किया गया। और 2005 में बीजिंग के ही हॉल ऑफ क्लॉक्स और हॉल आफ ट्रेजर्स में भी वातानुकूल-प्रणाली लगाया गया। कैरियर कॉर्पोरेशन को साल 2008 में हुए बीजिंग गेम्स के लिए भी चुना गया। जहां तक दक्षिण एशिया की बात है तो सन् 1996 में कैरियर कॉर्पोरेशन को भारत में सबसे बड़ा अनुबंध मिला। ये अनुबंध था मुंबई के सहारा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा का। इसी साल अपने पर्यावरण मानक कार्यक्रम के तहत एवरग्रीन चिलर्स को बाजार में उतारा। सन् 1998 में कंपनी ने ‘प्यूरोन’ नाम का एक नया रेफ्रीजरेंट ब्रांड दुनिया के सामने लाया। साल 2006 में मुंबई के बाद दिल्ली हवाई अड्डा के हाईपर सिटी सुपर बाजार में एयर कंडीशन का अनुबंध मिला। इसके तुंरत बाद राष्ट्रमंडल खेल में भाग लेने आए खिलाड़ियों के ठहरने की जगह पर एयर कूलिंग का भी अनुबंध इसी कंपनी को मिला। इसी साल कैरियर कंपनी की वातानुकूलन-प्रणाली इस्तेमाल करने की वजह से बेंगलूरू में आइ.टी.सी के एक होटल रॉयल गार्डेन को एशिया का सबसे बड़ा सम्मान ऊर्जा और पर्यावरण का अगुआ बनने हेतु ‘‘प्लेटिनम ग्रीन होटल’’ का अवार्ड मिला।

वर्ष 2009 में कैरियर कॉर्पोरेशन को सिंगापुर ग्रीन बिल्डिंग कांउसिल की ओर से संस्थापक सदस्य की हैसियत से काउंसिल का सदस्य बनने हेतु न्योता दिया और अगले वर्ष विलिस हैविलैंड कैरियर टोटल इंडोर एन्वॉयरमेंटल क्वालिटी लेबोरेटरी की स्थापना के लिए 15 लाख डॉलर दिया। यह लेबोरेटरी 10,000 वर्ग फूट के क्षेत्र में बनाई गई जिसमें वातावरण निर्माण और मानवीय कारकों पर अनुसंधान हेतु पर्यावरण तथा ऊर्जा प्रणाली पर शोध को प्रोत्साहित जाना है।


विलिस हैविलैंड कैरियरकी बायोग्राफीज | 0 टिप्पणी >>

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