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एडीएचडी जैसा कि नाम दर्शाता है, यह एक बिहेवियरल डिसऑर्डर है। यह कंडीशन ज्यादातर स्कूल जानेवाले बच्चों में दिखाई देता है और लगभग 8 से 10% बच्चों पर इसका असर पड़ता है। यह कंडीशन लडकों से ज्यादा लड़कियों में दिखाई देता है। लेकिन इसका कोई भी सटीक कारण अभी तक पता नहीं है। बच्चे नॉर्मली जिस तरह से बर्ताव करते हैं वह एक साधारण बात है लेकिन जब उनका इम्पल्सिव बिहेवियर बड़े होने के बाद भी वैसा ही बच्चों जैसा रहता है, तब यही बात चिंताजनक हो जाती है। हालांकि यह बिहेवियर युवावस्था में प्रवेश करने पर थोड़ा सामान्य हो जाता है; फिर भी इसे कुछ सुधारात्मक उपायों (करेक्शनल मेजर्स) द्वारा मैनेज किया जा सकता है।
अगर एक बच्चा बिना कुछ सोचे-समझे रास्ते पर ऐसे ही दौड़ने लगता है और वह खतरे से अन्जान होता है, तो हम उसकी इस नादानगी को उसका भोलापन मानते हैं। लेकिन जब यही उतावलापन वह बड़े होने पर भी करता है, तो यह चिंता की बात है। उन बच्चों के लिए, जो एडीएचडी से ग्रस्त होते हैं, किसी भी एक काम पर फोकस करना मुश्किल होता है फिर वह काम कितना ही छोटा क्यों ना हो, जैसे पढ़ाई करना या अपना होमवर्क कम्प्लीट करना। वे जल्दी ही बोर हो जाते हैं और कोशिश किये बिना ही किसी भी काम को छोड़ देते हैं। किसी भी बात को ध्यानपूर्वक ना सुनना, यह भी एडीएचडी का लक्षण है।
इस डिसऑर्डर (विकार) और नॉर्मल बिहेवियर के बीच फर्क करना बहुत मुश्किल है। खासकर बच्चों में। इसका निर्णय लेने के लिए बच्चे को कंट्रोल सिचुएशन्स में 6 महीने तक ऑब्जर्व करना पड़ता है। खासकर उनके ही उम्र के बच्चों के साथ उनके व्यवहार की तुलना की जाती है। अगर यह बिहेवियरल डिसऑर्डर लंबे समय तक ऑर्ब्जव किया जा रहा है और फिर भी इस व्यवहार में कमी नहीं आ रही, तो फिर डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
एडीएचडी के 3 प्रकार नीचे दिये गए लक्षणों के आधार पर निश्चित किए जाते हैं-
प्रिडॉमिनंटली इनटेन्टिव टाइप :- ऐसे इंसान को दिया गया काम पूरा करने में मुश्किल आती है क्योंकि वे दिए गए डिटेल्स की तरफ ध्यान नहीं दे पाते और उन्हें दिए गए इन्स्ट्रक्शन्स और कन्वर्सेशन (आदेश और संवाद) को फॉलो करने में कठिनाई महसूस होती है।
प्रिडॉमिनंटली हायपर ऐक्टिव-इम्पल्सिव टाइप :- इसमें छोटा-सा बच्चा हमेशा दौड़ता है, कूदता है, ऊपर चढ़ता है और हमेशा उसे चोट पहुंचती है। वे हमेशा रेस्टलेस, इम्प्लसिव और इम्पेशन्ट यानी अधीर होते हैं। उनके सामने जो चीज आती है उसे वो पकड़ते हैं, बीच-बीच में बोलते हैं और इन्स्ट्रक्शन्स लेने में असमर्थ होते हैं।
कम्बाइन टाइप :- ऊपर दिए दोनों प्रकार के डॉमिनन्ट साइन को दर्शाना।
यह सारे चिह्न सभी बच्चों में दिखाई देते है लेकिन जब यही लक्षण आक्रमक और प्रबल हो जाते है तब यह एडीएचडी की बीमारी होती है।
एडीएचडी के सही कारणों का पता नहीं है। लेकिन इसके रिस्क फैक्टर्स हैं –
जेनेटिक हेरिडीटी फैक्टर्स :- एडीएचडी के मुख्य कारणों में से एक कारण आनुवंशिकता या जीन हो सकता है। अगर परिवार में किसी को एडीएचडी है या किसी को यह पहले हुआ है, तब यह परिवार के दूसरे लोगों में आगे बढ़ सकता है।
ब्रेन में केमिकल या हार्मोनल इम्बैलेन्स :- शायद यह वजह भी हो सकती है और इसके कारण ब्रेन के काम करने के ढंग पर इसका असर होता है।
प्रेग्नन्सी :- जब गर्भवती स्त्री शराब पीती है या स्मोक करती है तब होनेवाला बच्चा एडीएचडी से पीड़ित हो सकता है।
कुछ फुड जैसे शुगर और फुड कलर और मर्क्यूरी भी कभी-कभी एडीएचडी का कारण बन जाता है।
एडीएचडी के सफल इलाज के लिए सही डायग्नॉज होना जरूरी है। उसके लिए बच्चे की ताकत (स्ट्रेन्थ) और कमजोरी (विकनेस) को समझना चाहिए। यहां पर माता-पिता और उनके भाई-बहन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। डॉक्टर में शामिल है सायकेट्रिस्ट, सायकोलॉजिस्ट और पीडीआट्रीशियन। डॉक्टर हायपरऐक्टिविटी और इम्पलसिव्ह बिहेवियर कम करने के लिए और ध्यान केंद्रित करने का समय बढ़ाने के लिए कुछ दवाइयां देते हैं।
इन दवाइयों का इस्तेमाल करते वक्त किसी बुर्जुग को इसे सुपरवाइज करना चाहिए। कुछ खास थेरेपी और काउन्सलिंग मरीज के बिहेवियर और रिस्पॉन्सेस में सुधार लाते हैं। स्कूल के टीचर सबसे पहले इन लक्षणों को पहचान लेते हैं।
क्योंकि क्लासरूम में सभी विद्यार्थियों को समान रूप से नियम-कायदों का पालन करना पड़ता है और यहां पर कोई भी विशिष्ट लक्षण तुरंत पता चल जाता है। फिर डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी जाती है। एडीएचडी के लिए कोई सर्जरी नहीं है।
आप एडीएचडी को रोक सकते हैं उसके लिए आपको रिस्क फैक्टर्स से दूर रहना चाहिए। अगर यह आनुवांशिक (हेरिडेटी) है तब यह कंडीशन वक्त के साथ कम हो जाता है या फिर यह प्रौढ़ावस्था (ऍडल्टहुड) तक पीछा कर सकता है। कोई भी व्यक्ति एडीएचडी को पूर्णत: रोक नहीं सकता, लेकिन इस कंडीशन को ट्रीटमेन्ट, बिहेवियरल थेरेपी और काउन्सलिंग द्वारा कुशलता से मैनेज किया जा सकता है।
एडीएचडी को मैनेज करना एक चैलेन्ज है, लेकिन बच्चों के माता-पिता को इसकी पूरी जानकारी देना और बच्चों की उस तरह से देखभाल करना सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि ऐसे बच्चों को प्यार और केअर की जरूरत होती है और यह समझना जरूरी होता है कि बच्चों की कुछ खास जरूरतें होती हैं।
टीवी देखने के बजाय अच्छी आदतें रखना, डिसिप्लीन, न्यूट्रीशनल टेक्निक्स अपनाना और प्रीस्कूल ऐक्टिविटी को अधिक महत्व देना, बोर्ड गेम्स और चेस खेलना; इन सबसे एडीएचडी को मैनेज और कंट्रोल करने में मदद मिलती है। अगर एडीएचडी से ग्रस्त इंसान की अच्छी तरह से देखभाल की जाए तो वह एक जीनियस बन सकता है।
लोगों में यह गलत धारणा (मिसकन्सेप्शन) है कि एडीएचडी से ग्रस्त इन्सान या तो मूर्ख या मंदबुद्धि होता है। लेकिन यह गलत विचार है। बल्कि सच्चाई यह है कि ऐसे व्यक्ति को अच्छा वातावरण मिल जाए तो वह जीनियस बन सकता है।
फेमस फिजिसिस्ट (भौतिकविज्ञानी) अल्बर्ट आइन्स्टाइन एडीएचडी के कंडीशन से ग्रस्त थे। उन्हें स्कूल से बाहर निकाला गया था और कई प्रवेश परीक्षाओं में वे फेल हुए थे। वे स्पेशल स्कूल में भी पढ़ने के लिए गए, लेकिन उन्होंने वह भी छोड़ दिया और खुद ही अपनी प़ढ़ाई की।
उन्होंने फिजिक्स के क्षेत्र में काम किया और ‘थिअरी ऑफ रिलेटिविटी’ को डेवलप किया। जिसके लिए उन्हें नोबल प्राइज भी मिला। आइन्स्टाइन की मौत 1955 ई. में हुई लेकिन उनका ब्रेन अभी भी सहेजकर रखा हुआ है।