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ऐक्ने यह एक प्रकार का त्वचा-विकार है जो ज्यादातर 11-30 की उम्र में लोगों को होता है। आसान शब्दों में कहा जाए तो इंसान की त्वचा रोमछिद्रों से बनी होती है जो कि स्किन सेल्स्, सेबम (ऑइल्स्) और हेअर फॉसिल की वजह से बंद हो जाती है क्योंकि ये गुच्छ के रूप में एकसाथ आकर उसे मुंहासे का रूप दे देते हैं। फिर ये मुंहासे बॅक्टीरिया की वजह से दूषित हो जाते हैं और उनमें पस (पीप) भर जाता है। इस स्थिति को ‘ऐक्ने’ कहा जाता है।
ऐक्ने पिंपल्स का ही एक प्रकार है। ऐक्ने में एक या एक से ज्यादा पिंपल्स भी होते हैं। ऐक्ने में एक या उससे ज्यादा पिंपल्स, ब्लैकहेड्स और व्हाइटहेड्स और दूसरे बॉईल्स अथवा सिस्ट्स होते हैं जो दिखने में लाल और ज्यादातर पस से भरे होते हैं जो कभी-कभी पीड़ादायक भी होते हैं। कभी-कभी चेहरे पर एक पिंपल उभरकर आता है तो कभी-कभी बहुत सारे एकसाथ उभर आते हैं।
ऐक्ने कई प्रकार के होते हैं - ब्लैकहेड, व्हाइटहेड, दानेदार (पैपल्स), फुंसी (पस्टयुल्स), नोबल्स, सिस्ट और पिंपल्स।
इन्सानों में ऐक्ने अक्सर चेहरे, गर्दन, छाती, पीठ और कंधों पर आते हैं। लेकिन ऐक्ने का असर शरीर के किसी भी भाग पर हो सकता है। पिंपल्स और सिस्ट्स आंखों से तुरंत दिखनेवाले शरीर के भागोंपर आते हैं या फिर शरीर का जो भाग दिखाई नहीं देता, वहां पर भी आते हैं जैसे कि पैरों के पीछे। ऐक्ने विभिन्न प्रकार के होते हैं और यह शरीर के किसी भी भाग पर आ सकते हैं लेकिन वह ज्यादातर चेहरे पर आते हैं।
टीनएजर्स में ऐक्ने आने का मुख्य कारण उनकी यौवनावस्था की शुरुआत होना होता है जिसकी वजह से उनके शरीर में हार्मोन्स का लेवल अचानक बढ़ जाता है। शरीर में तेल के ज्यादा निर्माण होने से अथवा सीबम जब रोमछिद्रों को गंदगी से भर देते हैं तब उनकी वजह से वहां सीबम और हेअर फॉसिल जमा हो जाते हैं। और यह बॅक्टीरिया से दूषित होते ही पस से भर जाता है। खानपान की आदतें, तनाव और स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही यानी कम स्तर का हाइजीन; इत्यादि इसके ज्यादातर कारण होते हैं। आनुवांशिकता (हेरिडेटी) भी इसका एक कारण होता है।
11 से 30 की उम्र के लोगों में से किसी भी इसांन को ऐक्ने आ सकता है। लेकिन कभी-कभी इस ग्रुप के अलावा 40 अथवा 50 साल की उम्र में भी यह लोगों में देखा जाता है। वैसे ज्यादातर यह टीनएजर्स में ही दिखाई देते हैं क्योंकि इसी उम्र में ज्यादातर ऑईल्स प्रौड्युसिंग ग्लैंड्स ऍक्टिव होते हैं।
ऐक्ने कोई खतरनाक अथवा सीरियस बीमारी नहीं है। लेकिन कभी-कभी इसका इंसान के मन पर बुरा असर पडता है। टीनएजर्स और ऍडोलेसन्ट पर इसका असर होता है। खासकर तब जब लोग अपने रूपरंग पर ज्यादा ध्यान देते हैं और लोगों को इम्प्रेस करने के लिए वे अच्छा दिखना चाहते हैं। अगर टीनएजर्स में यह त्वचा की समस्या होती है तो उनका सेल्फ एस्टीम लो हो जाता है या फिर वे डिप्रेशन में चले जाते हैं और कभी-कभी उनमें आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है। किशोर (ऐडोलेसन्ट) और टीनएजर्स लोगों को टालते हैं और अपने मित्रों से दूर रहते हैं। जिसके कारण उनके हाथ से कई मौके छिन जाते हैं। लेकिन आज इन दोनों बीमारियों के लिए मेडिसीन उपलब्ध है। फेमस ऐक्टर ब्रैड पिट को भी ऐक्ने की बीमारी थी। लेकिन उन्होंने अपनी बीमारी पर काबू पाया और वे आज एक यशस्वी फिल्म स्टार हैं।
ऐक्ने की बीमारी क्रीम लगाने से भी आसानी से ठीक हो सकती है। लेकिन अगर प्रॉब्लम बना ही रहता है या अगर बहुत ज्यादा है तो किसी डर्मटॉलॉजिस्ट (त्वचा रोग विशेषज्ञ) या स्किन स्पेश्यलिस्ट को इसे दिखाना चाहिए। ऐक्ने का उपचार इंसान की त्वचा के प्रकार के ऊपर निर्भर करता है और डर्मटोलॉजिस्ट स्किन-टाइप को पहचानकर उसके अनुसार दवाइयां देते हैं। दूसरा इलाज है खानपान की आदतों को बदलना। जैसे कि ऑयली फुड, जंक फुड और स्वीट्स से यथासंभव बचना। उसके लिए सही स्किन केअर रुटीन का भी ध्यान रखना पड़ता है। तनाव को दूर रखना होता है और नींद पूरी तरह से लेना भी जरूरी होता है। ये सारे उपाय करने से ऐक्ने दूर रखने में काफी मदद मिलती है।
हां। प्राकृतिक उपचार (नॅचरल रेमिडीज्) से भी ऐक्ने को रोका जा सकता है। मार्केट में जो नेचरल प्रॉडक्ट्स मिलते हैं और नेचरल होममेड रेमिडीज में काफी फर्क होता है। होममेड प्रॉडक्ट्स इस्तेमाल के लिए काफी सुरक्षित होता है जिसका कोई साइड इफेक्ट्स नहीं होता। लेकिन मार्केट में मिलनेवाले प्रॉडक्ट्स को इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए नहीं तो इससे बीमारी और बढ़ने की संभावना रहती है। नेचरल प्रॉडक्ट्स जो मार्केट में मिलते हैं उसमें ऍलो वेरा, टी फ्री ऑइल, विटामिन A और विटामिन E के साथ कुछ केमिकल्स होते हैं जो ऐक्ने को बढ़ने से रोकते हैं। इसलिए सावधानी बरतना जरूरी होता है। लेकिन होममेड रेमिडीज जैसे शहद, लेमन और उसके साथ मुल्तानी मिट्टी का लेप त्वचा के लिए सुरक्षित होता है।
हां। ऐक्ने को नियंत्रण में रखने के लिए बैलेन्स-डाइट का होना जरूरी है। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर का पूरा सिस्टम डीटॉक्सीफाय होता है। इसलिए हेल्दी स्किन के लिए कम-से-कम 8 ग्लास पानी रोज पीना जरूरी है। विटामिन A और विटामिन E डाइट में शामिल करना चाहिए। इसके लिए ताजे फल और सब्जियां खानी चाहिए। विटामिन A और E टॅबलेट और जेल के स्वरूप में भी मिलते हैं जिसमें दूसरे आवश्यक न्यूट्रीअन्टस् भी होते हैं। इसके सेवन से शरीर और त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद मिलती है।