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चिंता (ऐंग्जाइटी) क्या है?

चिंता का सरल शब्दों में मतलब है अनिश्चित बातों के लिए बेचैन होना अथवा चिंता करना। चिंता में मूल कारण का पता नहीं होता। उदाहरण के लिए एक विद्यार्थी का केस ले लीजिए जो परीक्षा में बैठने वाला हो। वह इस बात से नर्वस होता है कि उसका क्वेशन पेपर कैसा होगा? आसान या कठिन? चिंता अवास्तविक भय की भावना या बेचैनी या चिंता की भावना है जिसका कि आमतौर पर कोई विशिष्ट रूप नहीं होता। जब व्यक्ति व्यर्थ में ही हमेशा चिन्ता करता है और अनजान कारणों की वजह से बेचैनी महसूस करता है और उसकी यह दिमाग की अवस्था हमेशा ही ऐसी रहती है, तब उसे चिंता कहा जाता है।

भय (Fear) और चिन्ता (Anxiety) कैसे अलग है?

भय और चिन्ता ये दो अलग-अलग भावनाएं हैं और उनका मूल इस प्रकार है:-

डर एक ऐसी भावना है जिसमें किसी निश्चित कारण की वजह से इन्सान को उसका डर लगता है। जबकि चिंता में यह अस्पष्ट होता है और उसका कोई निश्चित रूप नहीं होता और न ही उसके मूल कारण का पता होता है।

‘भय या डर’ की भावना क्षणिक होती है। यानी जिस चीज से इन्सान को डर लगता है वह चीज जबतक सामने मौजूद है तभी तक इन्सान को उससे डर लगता है। लेकिन चिंता साधारण भावना होती है जो हमेशा के लिए बनी रहती है और जिसका कोई निश्चित कारण नहीं होता।

डर ज्ञात वस्तुओं से होता है और डर पैदा करनेवाले कारणों का निदान करके उसे दूर किया जा सकता है जबकि चिंता हमेशा अज्ञात वस्तुओं के लिए होता है तथा इसके अनेकों कारण होते हैं और किसी एक कारण को हटाने से चिंता दूर नहीं हो सकती बल्कि किन्हीं दूसरे कारणों की वजह से भी चिन्ता पुन: उत्पन्न होती है।

चिन्ता के क्या कारण होते हैं?

चिन्ता के कई कारण होते हैं। उनमें से कुछ कारण इस प्रकार हैं - लंबे समय से तनाव, हेरिडेटरी फैक्टर्स (आनुवांशिकता), बे्रन में केमिकल इम्बैलेन्स (मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन), अपरिचित वातावरण, जगह, ट्रॉमा (सदमा) और दुर्घटना।

चिंता में कौन-से लक्षण दिखाई देते हैं और उसे विकार क्यों कहा जाता है?

सामान्यत: हर व्यक्ति अपने जीवन में कुछ-ना-कुछ भावनात्मक अशांति (इमोशनल डिस्टर्बन्स) का अनुभव करता है। यह नॉर्मल है। लेकिन यही बर्ताव जब आक्रमक हो जाता है और इसका असर इन्सान की दिनचर्या पर होने लगता है तथा उसके जीवन में बाधा डालता है तब उसे ‘ऐंग्जाइटी डिसऑर्डर’ कहा जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति अपने व्यवहार में नीचे दिये गए परिवर्तन महसूस करता है।

*          घबराहट, भय और बेचैनी

*          लगातार सोचना

*          अतीत के दर्दनाक अनुभवों का बारबार याद आना

*          बुरे सपने देखना और नींद न आना

*          हाथ धोने के कार्य को बारबार दोहराना

*          माथे पर और हथेलियों पर पसीना आना

*          पेट में दर्द, मांसपेशियों में दर्द और जी मचलना

*          सांस की तकलीफ और दिल धकधक होना

*          शांत रहने की असमर्थता

*          सूखा मुंह तथा हाथ और पैरों में सुन्नता और सिहरन (टिंगलिंग) महसूस होना

*          चक्कर आना

ऐंग्जाइटी डिसऑर्डर के कितने प्रकार हैं?

ऐंग्जाइटी डिसऑर्डर के विभिन्न प्रकार इस तरह हैं :-

1.         पैनिक अटैक :- इसमें पसीना आना, सीने में दर्द, अनियमित दिल की धड़कन, घुटन और ‘दिल का दौरा’ पड़ रहा हो ऐसा महूसस होता है।

2.         ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसआर्डर (OCD) :- ‘ओसीडी’ से ग्रस्त व्यक्ति को किसी-न-किसी बात का डर हमेशा लगा रहता है और उस वजह से वे किसी भी काम को बार-बार करते रहते हैं। जैसे कि जर्म्स और बैक्टीरिया के डर की वजह से वे अपने हाथों को बार-बार धोते रहते हैं। यह ऑब्सेशन एक विचार है और उनकी विवशता उन्हें वही काम बारबार करने पर मजबूर करती है।

3.         पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसआर्डर (PTSD) :- शारीरिक हमला, यौन शोषण और उत्पीड़न, भयानक या दर्दनाक घटना, किसी अपने की मृत्यु अथवा कोई प्राकृतिक संकट; इन सब कारणों की वजह से यह डिसआर्डर हो सकता है। जिन लोगों को यह विकार होता है उन्हें इन घटनाओं के भयानक विचार दिमाग में आते रहते हैं और वे फिर भावनात्मक रूप से असंवेदनशील बन जाते हैं।

4.         सोशल ऐंग्जाइटी डिसआर्डर :- सोशल ऐंग्जाइटी डिसआर्डर अथवा सोशल फोबिया में व्यक्ति यह सोचता है कि लोग उनकी आलोचना करते हैं या उनके बारे में कुछ अनुमान लगाते हैं। इसमें व्यक्ति सोशल गैदरिंग में थोड़ा सेल्फ कॉन्शियस हो जाता है और अपनी परेशानी से बचने का रास्ता ढूंढ़ता है।

5.         स्पेसिफिक फोबिया :- इसमें किसी खास चीज के बारे में तीव्र डर लगता है जैसे ऊंचाई, पानी, फ्लाइंग अथवा अंधेरे का डर।

6.         जनरलाइज्ड ऐंग्जाइटी डिसऑर्डर :- इसमें किसी भी बात के लिए चिन्ता हो सकती है और इसमें किसी खास घटना से बातों का संबंध नहीं होता। चिंता और बेचैनी अवास्तविक होती है। प्रकट में ऐसा कोई कारण उपस्थित नहीं होता जिससे व्यक्ति को चिन्ता हो सके।

ऐंग्जाइटी डिसआर्डर का उपचार किस तरह से किया जाता है?

इस चिंता का निदान जनरल प्रैक्टिशनर द्वारा किया जाता है। वे आपको आपके बर्ताव के बारे में सवाल पूछते हैं और आपकी फैमिली हिस्ट्री पता करते हैं। फिर जिन तनावपूर्ण स्थितियों की वजह से ऐंग्जाइटी ट्रिगर होता है अथवा बेचैनी या चिन्ता होती है, उन पर वे सवाल पूछते हैं। ऐंग्जाइटी और उसके कारण निश्चित करने के लिए कोई एक खास टेस्ट उपलब्ध नहीं है, इसलिए अगर व्यक्ति को कोई खास शारीरिक बीमारी नहीं है तो फिर वे आपको सायकेट्रिस्ट या मेन्टल हेल्थ प्रोफेशनल के पास जाने की सलाह देते हैं जो कि मानसिक बीमारियों को दूर करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं। इन एक्सपर्ट के पास सुनिश्‍चित मेथड होता है जिससे वे व्यक्ति के मेन्टल बिहेवियर को उनके लक्षण, उसकी तीव्रता (इन्टेन्सिटी) और इस बर्ताव की कालावधि का मूल्यांकन करते हैं और अंदाज लगाते हैं।

एक्सपर्ट यह देखते हैं कि इन्सान की रोज की दिनचर्या पर इसका किस हद तक असर पडता है और फिर वह लक्षण और डिग्री ऑफ डिसफंक्शन (शरीर के किसी अंग का सामान्य रूप से कार्य न करना) से ‘ऐंग्जाइटी डिसआर्डर’ है या नहीं, यह निश्चित करते हैं।

चिंता के लिए क्या उपचार है?

मानसिक बीमारियों के इलाज के लिए मेडिसीन के फील्ड में बहुत प्रगति हुई है। जिसमें चिंता भी शामिल है। हालांकि इस विकार का सही स्वरूप जानने के बाद ही इसका इलाज निश्चित किया जाता है। मेडिसीन का कॉम्बिनेशन और थेरेपी का इसके लिए सुझाव दिया जाता है। इसके उपचार में शामिल हैं -

*          मेडिकेशन एण्ड ड्रग्स
*          साइकोथेरेपी :- यह काउन्सलिंग का एक प्रकार है जिसमें मरीज के इमोशनल और परेशान मुद्दों को प्रशिक्षित प्रोफेशनल्स चर्चा करते हैं। इसके लिए वे मरीज से बात करते हैं और इस प्रकार के डिसआर्डर को समझने और उससे उबारने के लिए उपाय करते हैं।
*          कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी :- इस प्रकार की थेरेपी में मरीज अपने सोचने के तरीके को पहचानता है और अपना व्यवहार बदलने की कोशिश करता है जिसकी वजह से वे हमेशा चिन्तित रहते हैं।
*          हेल्दी लाइफस्टाइल और बैलेन्स डाएट को अपनाकर वे अपनी मानसिक स्थिति हमेशा अच्छी रख सकते हैं।
*          रिलैक्स करने की आदत :- आराम और ध्यान (रिलैक्सेशन और मेडिटेशन) करने से चिंता का विकार नियंत्रण में रखने में मदद मिलती है।

क्या ऐंग्जाइटी डिसऑर्डर आम है? इसे कैसे रोका जा सकता है?

आज की तारीख में दुनिया के करोड़ों लोग चिंतित हैं, फिर चाहे वह पुरुष हो या स्त्री या फिर बच्चे; लेकिन इसका असर स्त्रियों पर ज्यादा होता है। परीक्षा और अभ्यास में तीव्र स्पर्धा के कारण बच्चों पर भी इसका काफी असर हुआ है। कम उम्र में शारीरिक उत्पीड़न और यौन शोषण की वजह से भी इस प्रकार का विकार हो सकता है। माता-पिता का अलग होना, अपने आस-पास की जगह का बदलना या नया स्कूल; इन सभी का थोड़े समय के लिए बच्चे पर असर पड़ता है। लेकिन वक्त के साथ धीरे-धीरे यह सब डर दूर हो जाता है। ऐंग्जाइटी डिसआर्डर को रोका नहीं जा सकता। लेकिन इसे नीचे दिए गए तरीकों से कम किया जा सकता है:-

*          इसके लिए कॉफी, चाय, कोला और एनर्जी ड्रिंक्स् का सेवन कम करना चाहिए क्योंकि इसमें कैफीन होता है जो ऐंग्जाइटी को ट्रिगर करता है।

*          जिन दवाइयों में चिंता के लक्षण पैदा करनेवाले केमिकल्स होते हैं ऐसी दवाइयां लेने से बचें।

*          डिस्टर्बिंग इवेन्ट और ट्रॉमा (सदमा) के बाद व्यक्ति को काउन्सलिंग और सपोर्ट देना चाहिए।

एक आदर्श उदाहरण जिसने ऐंग्जाइटी डिसआर्डर पर विजय प्राप्त की?

किंग ऑफ पॉप माइकल जैक्शन भी सोशल ऐंग्जाइटी डिसआर्डर से ग्रस्त थे। यकीन नहीं आता? लेकिन यही सच है।

माइकल का जन्म एक अफ्रीकन-अमेरिकन वर्किंग क्लास परिवार में हुआ था। उनके परिवार में उनके माता-पिता और 10 बच्चे शामिल थे। एम जे उनका आठवां बच्चा था लेकिन अपने पिता के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं थे। बचपन में उनके पिता उन्हें हमेशा मारते थे। उनके पिता का म्यूजिकल बैन्ड था जिसमें बचपन में रिहसर्ल के वक्त माइकल ने हमेशा शारीरिक और मानसिक दुर्व्यवहार (अब्यूस) का सामना किया। एम जे हमेशा अकेले में रोया करते थे और अपने पिता को देखते ही उनको उनसे नफरत होने लगती थी। लेकिन इसके साथ ही वे अपने पिता को अपने यशस्वी होने का श्रेय भी देते हैं क्योंकि उन्होंने सख्त परवरिश देकर उन्हें बड़ा किया।

एम जे अपने अपियरन्स के प्रति काफी जागरुक थे और एनोरेक्सिया नर्वसो की बीमारी से ग्रस्त थे। साथ ही उनमें सोशल ऐंग्जाइटी डिसआर्डर भी था। लेकिन फिर भी वे किंग ऑफ पॉप बनते चले गए और उन्होंने अपने बेमिसाल संगीत के जरिए दर्शकों का मनोरंजन किया। उनकी लोकप्रियता अद्वितीय है और आज भी अपनी मौत के बाद माइकल लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं।

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