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आसान शब्दों में अस्थमा का मतलब है सांस लेते समय कठिनाई महसूस होना। जब हम सांस लेते हैं तो श्वासनली के जरिए हवा हमारे लंग्स (फेफड़ों) के अन्दर जाती है जो कि कन्टिन्यूअस प्रोसेस होती है। इन्सान को श्वास लेना यानी ऑक्सीजन को अंदर लेना और कार्बन डायऑक्साइड को बाहर फेंकना होता है। इस प्रक्रिया में जो मुख्य अंग शामिल हैं वे हैं ‘लंग्स’, जो फिल्टर का काम करते हैं और दूसरा है श्वासनली या फिर एअर वे (वायुमार्ग) जिसकी वजह से हवा अंदर-बाहर जाती है। जब इस श्वासनली में कोई रुकावट आती है तब इन्सान को सांस लेने में तकलीफ होती है और सांस लेने की इस ‘कठिनाई या बाधा’ को अस्थमा कहते हैं।
अस्थमा एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति के सांस लेने की क्रिया पर इसका असर होता है। यह स्थिति तब पैदा होती है जब श्वासनली में सूजन आ जाती है और उसकी वजह से सांस लेने में कठिनाई होती है। यह एक दीर्घकालिक स्थिति है। यह श्वासनली किसी भी अस्वाभाविक उद्दीपन के कारण संवेदनशील बन जाती है और जैसे ही सूजन बढ़ती है, यह हवा जाने वाला मार्ग संकुचित हो जाता है जिसके कारण इन्सान को सांस लेने में और कठिनाई होती है।
अस्थमा में दिखाई देनेवाले लक्षण सांस की तकलीफ और भारी सांस के मुकाबले अलग होती है। अस्थमा में नीचे दिए गए लक्षण मुख्य हैं:-
* सांस लेने में तकलीफ
* सांस लेते समय घरघराहट जैसी आवाज निकलना
* सीने में जकड़न और खांसी
* बात करते वक्त कठिनाई महसूस होना
ये लक्षण ज्यादातर रात में और सुबह दिखाई देते हैं।
अस्थमा एक ऐसी कंडीशन है जो दुनियाभर में करोड़ों लोगों को प्रभावित करती है। वैसे तो इसका किसी भी उम्र के लोगों पर असर होता है, लेकिन इससे बच्चे ज्यादा प्रभावित होते हैं और इसका कारण होता है जन्म के समय उनका वजन कम होना, कुपोषण, वातावरण, माता-पिता की हिस्ट्री और एलर्जी।
एलर्जी :- अस्थमा के ज्यादातर केसेस में मुख्य ट्रिगर एलर्जी ही है। खून में मौजूद एंटीबॉडी की वजह से एलर्जिक प्रतिक्रिया होती है उसके कारण कभी-कभी श्वासनली (एअर वे) में सूजन आ जाती और यह अस्थमा का कारण बन जाता है। सामान्यत: घरेलू स्तर पर कुत्ते, बिल्ली, क्रॉक्रोचेज, धूल के कण और फंगस की वजह से भी एलर्जी पैदा हो जाती है और यह अस्थमा को जन्म देती है।
तंबाखू का सेवन और धूम्रपान :- यह अस्थमा के मुख्य कारणों में से एक है। बल्कि तंबाखू-सिगरेट की वजह से मौत का खतरा ज्यादा होता है और यह होता है खांसने से, जोर-जोर से सांस लेने से या फिर सांस की अन्य बीमारियों की वजह से।
पर्यावरणीय कारक :- इसमें प्रदूषण शामिल हैं जैसे: रंग, फफूंद, गैस स्टोव के धुंए का घर में फैलाव होना और घर के क्लीनर्स से उत्सर्जित धुआं इत्यादि। वातावरण में होनेवाले बदलाव जैसे कि सर्दियों में कोहरा होता है और गर्मियों में नमी, उसके कारण भी अस्थमा ट्रिगर होता है। बाहरी प्रदूषण भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मोटापा :- ज्यादा वजन वाले व्यक्ति जिनके शरीर का आकार बहुत बड़ा होता है, वे अस्थमा से ज्यादा पीड़ित होते हैं और उन्हें एलर्जिक अस्थमा से ज्यादा नॉन एलर्जिक अस्थमा का खतरा होता है।
प्रेग्नन्सी :- सी सेक्शन, तनाव, जीन और हेरिडीटी, एअर वे की हायपर एक्टिविटी (श्वासनली की अतिसक्रियता) और ऍटॉपी (डर्मटाइटिस) अस्थमा के दूसरे अन्य कारण हैं।
मेडिसीन के जनरल प्रैक्टिशनर अस्थमा को नीचे दिए गए तरीकों से डायग्नॉस करते है :-
मेडिकल हिस्ट्री और फैमिली हिस्ट्री के साथ-साथ एलर्जी की हिस्ट्री चेक की जाती है। स्पष्ट लक्षणों जैसे घरघराहट, खांसी, सांस लेने में परेशानी, छाती का कड़ा होना, सुबह और रात में इन लक्षणों का बढ़ना, सर्दियों में इन लक्षणों का और एलर्जी रिऍक्शन्स का ज्यादा होना; इत्यादि के द्वारा अस्थमा सुनिश्चित की जाती है।
शारीरिक जांच :- डॉक्टर स्टेथोस्कोप की सहायता से यह चेक करते हैं कि आप कैसे सांस लेते हैं, सांस लेते समय आप जोर-जोर से आवाज करते हैं या नहीं। नाक भरा हुआ होना, नाक में जंतु (Nasal Polyps) का होना, नाक बहना, श्वासनली के पैसेज के सूजने के लक्षण और एक्झिमा की बीमारी; इन सबकी भी जांच की जाती है।
अस्थमा टेस्ट :- लंग या फेंफड़े के कार्यों को देखकर अस्थमा के कंडीशन का क्लीनिकली निदान किया जाता है। इस मेथड में एक टेस्ट होता है जिसे ‘स्पायरोमेट्री टेस्ट’ कहा जाता है। यह टेस्ट सांस लेने के पैटर्न को चेक करने के लिए की जाती है।
इस हेतु विज्ञान ने कई और टेस्ट विकसित किए हैं जैसे CBC और थूक का टेस्ट।
अस्थमा को स्थाई तौर पर ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन सही मैनेजमेंट और उपचार के जरिए इसे ‘कंट्रोल’ किया जा सकता है। वातावरण में मौजूद अस्थमा के ट्रिगर को कंट्रोल में रखने के लिए कई सारी थेरेपी का शोध किया गया है जैसे:
पीक फ्लो मीटर का इस्तेमाल :- इस डिवाइस की मदद से बाहर चल रही हवा के मूवमेंट को चेक किया जाता है और फिर वह दर्शाता है कि दवाइयां लेने का समय हो गया है या फिर दवाई को बदल देना चाहिए।
सही नियंत्रण :- गुड कंट्रोल का मतलब है ऐसी चीजों से दूर रहना जिससे अस्थमा ट्रिगर हो सकता है। जैसे प्रदूषित वातावरण, स्मोक, प्रदूषित भोज्य पदार्थ और नरम रोएं वाले जानवरों से संपर्क आदि।
मेडिसीन :- दमा से ग्रस्त इन्सान को मेडिकेशन्स के रूप में दवाइयां और मिस्ट (परदा) और स्प्रे (जिसे इन्हेलर कहते हैं) का सुझाव दिया जाता है। इन्हेलर कुशलतापूर्वक श्वासनली के अंदर प्रवेश करता है और जलन को कम करता है।
इसलिए यह उचित होगा कि डॉक्टर के पास प्रिवेन्टिव चेकअप के लिए हमेशा जाना चाहिए ताकि बीमारी की स्थिति के बारे में पता चल सके।
अस्थमा से ग्रस्त होने का मतलब यह नहीं कि आप खुद को काम करने से रोकें। यह आपको ऐक्टिव और हेल्दी जिन्दगी जीने से रोक नहीं सकता। अस्थमा की स्थिति को मैनेज करना थोड़ा तनावपूर्ण होता है और तनाव को दूर रखना काफी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि तनाव से अस्थमा बढ़ता है। अस्थमा के साथ जीवन जीना आसान हो सकता है अगर आप दूसरे अस्थमा के मरीज को देखें जिन्होंने अस्थमा को कंट्रोल में रखा है और सफलतापूर्वक अस्थमा को मैनेज किया है। आप स्वस्थ भोजन खाइए और स्मोकिंग छोड़ दीजिए तथा भरपूर आराम कीजिए।
बिल क्लिंटन का उदाहरण ले लीजिए जो अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति हैं; उन्होंने अपने जीवन और करिअर को सफलतापूर्वक मैनेज किया हुआ है। बिल क्लिंटन के मार्ग में यह बीमारी कभी रुकावट नहीं बनी और उन्होंने वह हासिल किया जो वह करना चाहते थे।