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हमारे अंदर माता-पिता के बहुत सारे गुण कैसे आते हैं? आंखों का रंग, नाक का आकार, हमारे मोटे होने की प्रवृत्ति, हृदय रोग या दिल का दौरा पड़ना, या फिर वक़्त से पहले बालों का गिरना और गंजापन..... आश्चर्यजंक रूप से ऐसे बहुत सारे गुण हमारे माता-पिता से हमें तभी मिल चुका होता है जब हमें इस धरती पर आए बमुश्किल कुछ पल ही हुआ होता है है। लेकिन आपने यह कभी सोचा है कि यह वास्तव में कैसे होता है? यह सारे गुण माता-पिता से बच्चों में कैसे आतें है? सभ्यता के शुरूआत से ही मानव मन इस पहेली को सुलझाने के लिए प्रयासरत रहा है, और इसीलिए याब बात बड़ी अजीब लगती है कि अंततः जब यह विशाल रहस्य सुलझा तो दुनिया इस खुलासे से लगभग एक सदी तक अंजान बनी रही।

अब हम सब जानते हैं कि यह उल्लेखनीय उपलब्धि डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल(Deoxyribonucleic Acid) या डीएनए(DNA) नाम के एक छोटे से अणु के खोज के द्वारा पायी गई। ‘जीवन अणु’ या ‘जीवन की इकाई’ के नाम से जाने जाने वाले डीएनए की खोज ने अभूतपूर्व रूप से हमारी दुनिया ही बदल के रख दी। हालांकि बहुत ही कम लोगों को इस सच्चाई का पता है कि डीएनए के खोजकर्ता कौन हैं और कैसे इसका सिद्धान्त सजीव हुआ। अधिकांश लोग डीएनए की खोज का श्रेय ‘वाट्सन और क्रीक’(‘Watson and Crick’) को देंगे। कुछ लोग तो इसके अन्वेषण का वर्ष 1953 ही बता देंगे। कुछ प्रबुद्ध लोग तो यह उल्लेख भी कर सकते हैं कि यह काम 1940 के दशक में एवरी(Avery), मैकलॉयड(Macleod) और मैकार्टि(McCarty) द्वारा हुआ। लेकिन वह सब लोग गलत होंगे क्योकि डीएनए की खोज सन 1869 में एक युवा स्विस वैज्ञानिक ‘फ़्रेडरिक मिशर’ द्वारा टुबिंजेन (Tübingen) महल की चारदीवारी में संयोग वश हुई।

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बेसल प्रांत और शहर उत्तर पश्चिमी स्विट्जरलैंड में राइन नदी के तट पर स्थित है। हरे भरे चारागाहों, खेत-खलिहानों और जंगलों से सुसज्जित, प्रकृतिक सौंदर्य से भरा बेसल, एक बहुत ही मनोरम जगह है। जर्मन भाषी बेसल को, स्थानीय नागरिकों के विद्रोह के बाद सन 1833 में, बेसल शहर और बेसल गण-राज्य के रूप में दो भागों में विभाजित कर दिया गया। बेसल शहर, रासायनिक और औषधीय उद्योग के औद्योगिक केंद्र के रूप में कार्यरत है। साथ ही यह शहर एक प्रमुख वित्तीय केंद्र भी है और यहीं सन 1460 में पोप पिवस (pivs) द्वारा स्थापित, स्विस परिसंघ का प्राचीनतम और पहला विश्वविद्यालय भी स्थित है। और यह वहीं शहर है जहां 13 अगस्त, 1844 को जोहन फ़्रेडरिक मिशर(Johanne Friedrich Miescher) का जन्म हुआ।

फ़्रेडरिक कण जन्म वैज्ञानिकों के एक परिवार में हुआ था। उनका नामकरण उनके पिता फ़्रेडरिक मिशर के नाम पर हुआ, जो बेसल विश्वविद्यालय में रोग विज्ञान एवं शारीरकी (pathologic anatomy) के प्राध्यापक थे और एक सफल स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) भी थे। उनकी माँ कार्लोटे एन्टोनी हीस (Charlotte Antonie His) का संबंध प्रख्यात ‘हीस परिवार’ (his family) से था, हीस परिवार प्रख्यात राजनयिक और इतिहासकार पिटर ओक्स (peter ochs) के वंश परंपरा का हिस्सा था। सुप्रसिद्ध भ्रूण वैज्ञानिक विल्हेल्म हीस (Wilhelm हीस) फ़्रेडरिक के मामा थे, जो बेसल विश्वविद्यालय में शारीरकी (anatomy) और दैहिकी (physiology) पढ़ते थे। विल्हेल्म हीस का अपने भांजे फ़्रेडरिक पर बहुत गहरा और आजीवन प्रभाव रहा। फ़्रेडरिक का परिवार शहर के बौद्धिक आभिजात वर्ग के परिवारों में से एक था, और उनके मित्रों का दायरा बहुत बड़ा था।

मिशर का घर संगीत, किताबों और अन्य बौद्धिक गतिविधियों से भरा हुआ था। बहुत सारे वैज्ञानिक उनके घर आते-जाते रहते थे और उनके जीवंत चर्चाओं ने बहुत ही कम उम्र में फ़्रेडरिक को वैज्ञानिक अवधारणाओं से अवगत करा दिया। इस तरह के बौद्धिक वातावरण में रहने के कारण फ़्रेडरिक की विज्ञान के प्रति प्रारम्भिक अभिरुचि पैदा हुई। शर्मीले और अंतर्मुखी स्वभाव के युवा जोहन फ़्रेडरिक अपने परिवार और दोस्तों के बीच फ्रिट्ज़ नाम से जाने जाते थे। फ्रिट्ज़ को अपने आप में मग्न रहना बहुत पसंद था और वह अपना वक़्त सोचते हुये गुजरते थे।

 

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संभवतः इस बात का संबंध बचपन में हुये टाइफस (typhus) का वह आघात था जिससे उनके सुनने की शक्ति क्षीण हो गयी थी। इसके बावजूद वह अपने पिता की तरह संगीत से प्यार करते थे। उनके पिता एक प्रतिभावान गायक थे जो सार्वजनिक समारोहों में अक्सर गाते थे।

युवा फ्रिट्ज़ एक अत्यधिक बुद्धिमान बालक थे। आगे चल, उनके अधिकांश मित्र असाधारण रूप से सफल हुये पर उन सब मे बचपन से ही सिर्फ फिट्ज़ ही ऐसे थे जो शैक्षिक और दार्शनिक मानसिकता रखते थे। जाहीर है उन्होने विद्यालय में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया और अपने वर्ग में सर्वोच्च वरीयता के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की। चूकि फ्रिट्ज़ का जन्म चिकित्सकों के परिवार में हुआ था अतः यह मान लिया गया कि वह भी चिकित्सकों कि विरदरी में शामिल हो जाएंगे। परंतु ऐसा नहीं था, फ्रिट्ज़ एक पुरोहित बनना चाहते थे, उनके पिता इस फैसले से बिलकुल खुश नहीं थे। अतः फ्रिट्ज़ ने पुरोहित बनाने का ख्याल छोड़ चिकित्सा को ही अपना पेशा बनाने का फैसला किया।

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सन 1863 में, सत्रह वर्ष की उम्र में फ्रिट्ज़ ने बेसल चिकित्सा विद्यालय (Basel Medical School) में अपनी चिकित्सा की शिक्षा की शुरुआत की। सन 1865 की गर्मियों के दौरान, जब वह अभी भी आयुर्विज्ञान के छात्र थे, तब वह गाइटिगेन (Gattingen) एक कार्बनिक रसायनज्ञ एडोल्फ़ स्ट्रेकर (Adolf Strecker) की प्रयोगशाला में काम करने गए। वहाँ उनका समय भले ही घटना रहित रहा हो, मगर बेसल आते है वह टाइफाइड के शिकार हो गए। उन दिनों टाइफाइड एक बहुत ही खतरनाक बीमारी थी, जिसका कारक अज्ञात था, और नहीं कोई एंटी-बायोटिक दवाएं बाज़ार में उपलब्ध थीं। अतः स्वस्थ होने के लिए फ्रिट्ज़ को एक साल के लिए पढ़ाई छोड़नी पड़ी। अंततः सन 1868 में, तेईस साल की उम्र में उन्होने आयुर्विज्ञान में स्नाकोत्तर (M.D.) की पढ़ाई पूरी की।

यह अवसर किसी भी युवा चिकित्सक के लिए बहुत ही आनंदमय होता, पर फ्रिट्ज़ के विचार आनंद की अनुभूति से कोसों दूर थे। अब उन्हे इस बात का चयन करना था कि विशेष योग्यता हेतु उन्हे चिकित्सा विज्ञान की किस शाखा में जाना है। सुनने की शक्ति से विकालांग फ्रिट्ज़ यह फैसला नहीं कर प रहे थे कि क्या उन्हे ऐसी किसी शाखा का चयन करना चाहिए जहां उन्हे स्टेथोस्कोप (Stethoscope) की आवश्यकता पड़े। अंत में उन्होने अपने पिता को एक विस्तृत पत्र लिखा, जिसमे उन्होने अपने लिए उपलब्ध सभी विकल्पों के पक्ष और विपक्ष में तर्कों को सूचीबद्ध किया। उन्होने ओपथलमोलोजी यानि नेत्र विज्ञान (ophthalmology-आँख की संरचना और उसके रोगों का अध्ययन) अथवा ओटोलोजी यानि कर्ण विज्ञान (otology-कान की संरचना और उससे संबन्धित रोगों का अध्ययन) को अपना कार्य-क्षेत्र बनाने की इच्छा प्रकट की, क्योंकि इन दोनों विषयों में स्टेथोस्कोप की अवश्क्ता नहीं पड़ती।

उसी वक़्त उन्होने कहा कि अनुसंधान के प्रति उनका एक आकर्षण है, “दैहिकी (physiology) पर एक व्याख्यान में ही जैविक पदार्थों पर शोध की महिमा मेरे लिए स्पष्ट हो गयी”। अतः फ्रिट्ज़ ने अपनी अभिरुचि से समझौता करते हुये यह फैसला किया कि वह नेत्र विज्ञान को अपना कार्य क्षेत्र बनाएँगे और खाली वक़्त में अनुसंधान करेंगे।

फ्रिट्ज़ के पिता ने उनका पत्र उनके मामा विल्हेल्म हिस को दिखाया, विल्हेल्म को यह समझते देर न लगी कि अपनी अभिरुचि से किया गया समझौता कोई समाधान नहीं है और यह कारगर नहीं साबित होने वाला है। उन्होने फ्रिट्ज़ को एक पत्र लिखा, जिसमे उन्होने फ्रिट्ज़ को प्रोत्साहित करते हुये कहा कि उनके लिए यही सबसे अच्छा होगा कि वह वही करे जो वह करना चाहते हैं। उन्होने लिखा-

प्रिय फ्रिट्ज़,

मैंने तुम्हारे काम करने की योग्यता पर कभी शक नहीं किया है, और मैं यह जनता हूँ कि अगर तुम अपनी आशावादी मनोदशा बनाए रखते हो तो एक दिन तुम्हारी उपलब्धियां आसमान की बुलंदीयों को छुएंगी। तुम्हें बस अति-आत्मविश्वास से भरे निरे मूर्खों की भांति यह सोचने की जरूरत नहीं है कि उनसे कोई गलती हो ही नहीं सकती, तुम्हें सिर्फ आत्म विश्वास और समर्पण की आवश्यकता है, तुम बस आत्मनिर्भर हो कठिन परिश्रम करते रहो, अपना सबकुछ काम पर न्योछावर कर के देखो तुम खुद ब खुद सर्वोतम बन जाओगे। संदेह तो दूसरे क्षेत्रों में भी बना रहेगा, पर अपनी विशिष्टता और व्यक्तित्व के डैम पर तुम सब से पार पा लोगे; अतः अपने कार्य क्षेत्र का चुनाव करते वक़्त, अपने दिल की सुनो, और साफ मन से इसका चयन करो, दुविधाओं को अपने मन से परे कर अपने काम में संलग्न हो जाओ।

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यह आश्चर्यजंक ही है ना, कि एक सच्ची और नेक सलाह चमत्कारिक रूप से एक इंसान के लिए क्या नहीं कर सकती है! फ्रिट्ज़ का मामला इससे कुछ अलग नहीं था, अपने मामा के पत्र से बेहद प्रेरित फ्रिट्ज़ ने रासायनिक शोध के लिए जाने का फैसला किया। उत्कृष्टता पर अपने मामा के शब्दों से प्रदीप्त और उत्प्रेरित फ्रिट्ज़ ने उस क्षेत्र के शीर्ष पुरुषों के साथ काम करने का फैसला किया। तदनुसार, कार्बनिक रसायन शास्त्र (Organic chemistry) की तकनीकों से परिचित होने के लिए उन्होने एक सत्र टुबिंगेन(Tübingen) के एडोल्फ़ स्त्रीकर (Adolf Strecker) की प्रयोगशाला में बिताया। उन दिनों अनुसंधान के क्षेत्र में ‘प्रशिक्षित’ होने की अवधारणा काफी नई थी। उस दौर से पहले शोध अमीर लोग अपने शौक के लिए करते थे या किसी अकादमी या समुदाय से जुड़े कुछ अपरिपक्व लोगों का समूह अनुसाधन से जुड़ा होता था।

परिशिक्षण खत्म होते ही, फ़्रेडरिक उस समय के एक महान व्यक्तित्व फेलिक्स होप सेयलर (felix hoppe seyler) की प्रयोगशाला से जा जुड़े। फेलिक्स होप सेयलर बायोकेमिस्ट्री या जैव-रसायन (biochemistry) और आणविक जीव विज्ञान या मोलिकुलर बायोलॉजी (molecular biology) के एक अग्रणी थे और इस क्षेत्र की कई महत्वपूर्ण खोजों का श्रेय उनके नाम दर्ज था। उनका एक सबसे प्रसिद्ध कार्य हीमोग्लोबिन (haemoglobin) की पहचान करना है। प्रोटाईड(Proteid) शब्द गढ़ने का श्रेय श्रेय भी इन्ही को जाता है, प्रोटाईड जिसे अब हम प्रोटीन के नाम से जानते है।

सन 1860 से 1871 के बीच, होप सेयलर ने दुनिया के सर्व प्रथम जैव रासायनिक प्रयोगशालाओं में से एक का नेतृत्व किया। उनकी प्रयोगशाला निकर (Neckar) नदी घाटी के ऊपर टुबिंजेन महल की कपड़े धोने के कमरे को परिवर्तित कर बनया गया था, जबकि फ़्रेडरिक को होप सेयलर के रसोई घर में रखा गया। फ्रिट्ज़ उस वक़्त के एक प्रख्यात वैज्ञानिक के साथ काम करने के लिए बहुत ही रोमांचित थे और उत्सुकता से भरे फ्रिट्ज़ ने प्रयोगों की एक नई परिकल्पना रच ली थी। वह इस तथ्य से बिलकुल ही अंजान थे कि जल्दी ही वह समय के महानतम वैज्ञानिक खोजों में से एक करने वाले हैं।

“उत्तकों के विकास के बारे में अन-सुलझे अंतिम प्रश्नों का हल सिर्फ रसायन शास्त्र के माध्यम से ही हल किया जा सकता है।“ अपने मामा के इस दृढ़ विश्वास से प्रभावित फ्रिट्ज़ कोशिका के रसायन विज्ञान की जांच का फैसला किया। सेयलर की दिलचस्पी शरीर के तरल पदार्थों की रासायनिक जाँचने में थी, वह एक श्वेत रक्त कोशिका (white blood cell)लिंफोसाइट (Lymphocyte) की जांच करना चाहते थे, उनका विश्वास था कि इस जांच से संक्रमण के दौरान मवाद बनने की प्रक्रिया को समझने में मदद मिलेगी। वास्तव में यह एक आदर्श साझेदारी थी, फ्रिट्ज़ एक कोशिका की रासायनिक अभिरचना की जांच करना चाहते थे और सेयलर ने उनके लिए एक उपयुक्त कोशिका का चयन किया था।

सन 1868 की शरद ऋतु में जोश से परिपूर्ण फ्रिट्ज़ ने लिंफोसाइट पर अपना शोध शुरू किया, मगर जल्दी ही उनके इस काम पर जटिलताओं ने बाधा डाली। अवतरण (extraction) के बावजूद किसी व्यक्ति के लासिका ग्रंथियों (Lymph Glands) से लिंफोसाइट निकालना एक बहुत ही मुश्किल काम था, अवतरण के बाद प्राप्त लिम्फोसाइट की मात्रा काम करने के लिए बहुत ही कम साबित हुई। एक लंबे समय से रक्त में रुचि रखने वाले होप सेयलर ने फ्रिट्ज़ को लिम्फोसाइट से मिलते – जुलते श्वेत रक्त कोशिका ल्यूकोसाइट (leukocyte) पर काम करने की सलाह दी। ल्यूकोसाइट एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका है, जो संक्रामण के दौरान बनने वाले मवाद में भरी संख्या में मौजूद होती है। इस शोध के लिए उपयोगी सामाग्री फ्रिट्ज़ के पास आसानी से उपलब्ध थी, बस उन्हे पास के अस्पताल जाना था, जहां रूस के साथ इंग्लैंड और फ्रांस के चल रहे कृमियन (Crimean) युद्ध में घायल सैनिकों का इलाज़ चल रहा था, वहाँ ख़ून और मवाद से सने पट्टियों की कोई कमी नहीं थी और फ्रिट्ज़ प्रचुर मात्रा में यह पट्टियाँ अपनी प्रयोगशाला में ले आए। इस डीएनए की खोज की एक खूनी शुरुआत हुई।



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अब जबकि फ्रिट्ज़ के पास शोध सामाग्री थी, तब उन्हे कोशिकाओं को बिना नुकसान पहुंचाए धोने की अगली चुनौती का सामना करना पड़ा। उन्होने इस काम के लिए नमक के विभिन्न का उपयोग किया, पर इससे यह कोशिकाएँ सूज के गाढ़े और चिप-चीपे दलिया जैसे पदार्थ का स्वरूप ले लेतीं थीं, जिनको प्रयोग में लाना असंभव था। कई असफ़ल प्रयासों के बाद अंततः फ्रिट्ज़ ने पट्टियों को धोने के लिए पानी और सोडियम सल्फेट के घोल का प्रयोग किया। उसके बाद वह एक पन्ने को उपयोग में लाते हुये कोशिकाओं को पट्टियों के कपास के रेसों से अलग कर छान लेते थे। फिर उन्हे इस छने हुये घोल को बीकर में रख स्टैंड पर लगा, कई दिनों तक बिना हिलाये छोडना पड़ता था, जिससे कोशिकाएँ बीकर के ताल पर जाम जाती थीं।

एक बार जब यह प्रक्रिया खत्म हो गई तब फ्रिट्ज़ ने कोशिका के अंदर मिले विभिन्न प्रकार के प्रोटीनों चिन्हित और वर्गीकृत करने का बीड़ा उठाया। इस तरह के एक जटिल विश्लेषण के लिए, उस समय जो भी उपकरण और तरीके उपलब्ध थे, वह बहुत ही पुरातन थे, जिनकी वजह से फ्रिट्ज़ को अपने प्रयोगों और शूध के दौरान बहुत सारी अड़चनों का सामना करना पड़ा। अंत में वह पाँच ‘प्रोटीन’ अलग करने में सफल हुये, पांचवा प्रोटीन उस वक़्त ज्ञात किसी भी प्रोटीन से भिन्न था, यह रहस्यमय पदार्थ अम्लीय घोल में अघुलनशील था, पर जब घोल को क्षारीय किया जाता तब वह दुबारा से उस में घुल जाता था।

26 फरवरी 1869, को फ्रिट्ज़ ने अपने मामा विल्हेल्म हिस को इस रहस्यमयी पदार्थ की खोज के बारे में बताते हुये एक पत्र लिखा “मैंने जिस पदार्थ को खोज निकाला है वह, पानी में एसीटिक अम्ल में हाइड्रोलोरिक अम्ल या नमक(सोडियम क्लोराइड) के घोल में अघुलनशील है, और मैं इसका प्रेसीपीटेट (एक अघुलनशील पदार्थ जो किसी घोल में ऊपर आ जाता है) प्रपट कर सकता हूँ, अतः यह इस पदार्थ का संबंध अब तक ज्ञात किसिस भी प्रोटीन से नहीं हो सकता।“ फ्रिट्ज़ को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उन्होने सफलतापूर्वक अपरिष्कृत डीएनए का प्रेसीपीटेट प्रपट कर लिया था। हालांकि फ्रिट्ज़ अपनी इस खोज से बेहद उत्साहित थे, पर अपनी इस खोज के परिमाण से बेखबर थे।

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इस रहस्यमयी पदार्थ पर आगे और प्रयोगों के संचालन हेतु अब फ्रिट्ज़ को वह दुष्कर कार्य करना था जो इससे पहले कभी नहीं किया गया था, और वह कार्य था – कोशिका के नाभिक(nucleus) को कोशिका से अलग करना! जिसका मतलब था कि उन्हे साइटोप्लाज्म यानि कोशिका द्रव्य (cytoplasm- जैली कि तरह का एक पदार्थ जिससे कोशिका भरी होती है) से नाभि को अलग करने का कोई रास्ता निकालना था। बहुत सारे असफल प्रयासों के बाद, अंततः फ्रिट्ज़ ने इस लक्ष्य को हासिल करने की एक विधि ढूंढ निकाली। फ्रिट्ज़ ने कई हफ्तों तक डायल्यूट हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के साथ संसाधित किया। इस काम को ठंढे वातावरण में करना जरूरी था, अन्यथा प्रोग सामाग्री नष्ट हो जाती। इस बात की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है कि कैसे फ्रिट्ज़ ने टुबिंगेन महल के अपनी उस प्रयोगशाला कि खिड़कियाँ खुली रख कर, उस भयावह सर्दियों में काम करते होंगे जब बाहर का तापमान हिनक बिन्दु से नाम मात्र ऊपर था।

उस पदार्थ के संसाधित होने के बाद, उन्होने पानी और ईथर के एक मिश्रण में, अवशिष्ट (residue) को हिला कर एक लंबे वक़्त के लिए रख छोड़ा। नाभिक पाउडर के रूप में बर्तन के तल पर जमा हो गए। इस पदार्थ ने भी ल्यूकोसाइट से प्राप्त उस पाँचवे प्रकार के ‘प्रोटीन’ की तरह, अम्ल में अघुलनशील और क्षार में घुलनशील गुण का प्रदर्शन किया, लेकिन अब भी फ्रिट्ज़, सुखद रूप से इस बात से अंजान थे कि उन्होने एक ऐसा पदार्थ ढूंढ निकाला है जो प्रोटीन नहीं है।

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फ्रिट्ज़ को अगर आगे इस रहस्यमयी पदार्थ पर काम और इसका आगे और विश्लेषण करना था तो उन्हे इस रहस्यमयी पढ़ार्थ कि अधिक से अधिक मात्रा कि जरूरत थी। इसके अलावा निकले गए इन नाभिकों को और शुद्ध होना चाहिए था। इसके लिए उन्हे एक ऐसा रास्ता ईजाद करना था जिससे दूषित कोशिका द्रव्य को जितना हो सके उतना हटाया जा सके, मगर इसे हासिल कैसे किया जाता? सौभाग्य वश इस दुविधा का जबाब शरीर विज्ञानी (physiologist) विल्हेल्म कुन (Wilhelm Kuhne) द्वारा, सिर्फ एक साल पहले विकसित एक विधि में निहित था। विल्हेल्म कुन ने अपने परीक्षण में यह पाया था कि साइटोप्लाज्म को एंजाइम पेप्सिन में घोला जा सकता है। इसके अतिरिक्त कोशिका का नाभिक एस एंजाइम के बिलकुल ही अप्रभावित रहते हुये, बच जाता था, और यह फ्रिट्ज़ के काम के लिए एक दम उपयुक्त था। पर दुर्भाग्य वश, उन दिनों तैयार पेप्सिन, किसी रासायनिक अपपूर्तिकर्ता से खरीदा नहीं जा सकता था, अतः इस के लिए फ्रिट्ज़ को अभी और हांथ पाँव मारना था।

अंत में, फ्रिट्ज़ के पास डीएनए को अलग करने एतौ एक अनुकूल प्रोटोकाल था। उन्होने काम की शुरुआत ल्यूकोसाइट को कई बार गर्म एल्कोहल से धोने के द्वारा की, और फिर प्राप्त अवशिष्ट (residue) को पेप्सिन के घोल में घोला। उन्होने इस प्रक्रिया द्वारा भूरे रंग के बारीक पाउडर के रूप में शुद्ध नाभिक प्राप्त किया; जिसे पुनः ईथर में हिला कर, एल्कोहल से धोया गया। इन प्रक्रियाओं के बाद प्राप्त पदार्थ ने, पूर्व प्राप्त उस पाँचवे प्रोटीन और प्रोटीन से दूषित नाभिक के गुण प्रदर्शित किया। अंततः फ्रिट्ज़ को उनके डीएनए का पहला साफ मिश्रण मिल चुका था।

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फ्रिट्ज़ अब इस नए पदार्थ के तत्वों की संरचना के निर्धारण के लिए आगे बढ़े, और यहाँ वह अचरज में पद के रह गए, इस पदार्थ में आम तौर पर कार्बनिक अणुओं में पाए जाने वाले कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और आक्सीजन की माजूदगी का पता तो चला पर साथ ही यूने इस पदार्थ में असमान्य रूप से फास्फोरस की उच्य मात्रा मिली। इसके अलावा इस पदार्थ में प्रोटीन के विपरीत सल्फर का अभाव था। इन परिणामों ने फ्रिट्ज़ को यह यक़ीन दिलाया कि वह बिलकुल ही एक नए पदार्थ पर काम कर रहे थे। उन्होने कहा “ हमें एक नए पदार्थ के अस्तित्व का पता चला है, जो अपने आप में सबसे अलग है और जिसकी तुलना अब तक ज्ञात किसी भ पदार्थ या समूह से नहीं की जा सकती है।“ चुकी उन्होने इस नए पदार्थ को कोशिका के नाभिक में पाया था अतः इसका नाम न्यूक्लीन (Nuclean- व्हा पदार्थ या प्रोटीन जिससे फरफोरस प्राप्त होता है और वह कोशिका के नाभिक में पाया जाता है) रखा, जिसे आज हम डीएनए के नाम से जानते हैं।

बाद में उन्होने न्यूक्लीन को गुर्दे, अंडकोश, नाभिक वाले एरिथ्रोसाइट एवम खमीर की कोशिकाओं में भी पाया। फ्रिट्ज़ को इस बात का पूरा यक़ीन था किन्यूक्लीन का महत्व प्रोटीन के महत्व के बराबर ही होना चाहिए। फ्रिट्ज़ का यह विश्वास अकारण ही नहीं था। जिस वक़्त उन्होने न्यूक्लीन को खोज निकाला था उस वक़्त तक, मानव शरीर में पाये जानेवाले सिर्फ तीन श्रेणियों के पदार्थों – ‘लिपिड या वसा(lipids & fats) पोलिसेकेराइड्स (polysaccharides-शर्करा और स्टार्च) तथा प्रोटीन कि ही पहचान हुई थी। ऐसे में उस वक़्त पदार्थ की एक नई श्रेणी की खोज, अग्रणी और अभूतपूर्व सफलता से कुछ काम नहीं थी।

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सन 1869 की शरद ऋतु में, फ्रिट्ज़ का न्यूक्लीन पर प्रारम्भिक विश्लेषण समाप्त हो गया, तो वह लघु अवकाश ले बेसल लौट आए। यहाँ उन्होने अपने न्यूक्लीन सहित, ल्यूकोसाइट पर किए गए विश्लेषण पर अपने पहले वैज्ञानिक प्रकाशन का लेखन शुरू किया। अवकाश खत्म होते ही, फ्रिट्ज़ ने लाईपजिग विश्वविद्यालय के फिजिओलोजी संस्थान के लिए प्रस्थान किया। अपने वैज्ञानिक शिक्षा को और व्यापक बनाने के क्रम में उन्होने अपना ध्यान अन्य विषयों पर भी लगाने का संकल्प किया।

लेपजिग में, वह प्रख्यात शरीर विज्ञानी (physiologist) ‘कार्ल लुडविंग’(Carl Ludwig) की प्रयोगशाला से जा जुड़े। फ्रिट्ज़ की दिलचस्पी दैहिकी (physiology) में प्रयुक्त होने वाली तकनीक सीखने में थी। लुडविंग ने उन्हे रीढ़ की हड्डी में विस्तारित उस तंत्रिका क्षेत्र की जांच करने का काम दिया जो दर्द का संदेश संचारित करती है। हालांकि वह अपने सामान्य रूप से कुशलता पूर्वक काम करते रहे पर फ्रिट्ज़ के लिए यह विषय उतना आकर्षक नहीं था, जितना की ल्यूकोसाइट पर काम करना लगता था। लुडविंग प्रयोगशाला में छह विभिन्न देशों के वैज्ञानिक रहते थे, और फ्रिट्ज़ ने यहाँ कुछ अच्छे दोस्त बनाए।

 

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लुडविंग के साथ काम करने के दौरान, फ्रिट्ज़ ने ल्यूकोसाइट पर अपना लेख पूरा किया। वह इस लेख को पत्रिका “मेडिसिनिक केमिक अंतेर्सुगेन- (“Medicinisch-Chemische Untersuchungen यानि मेडिकल और रासायनिक जांच) में प्रकाशित करवाना चाहते थे, जो उनके पहले पथ प्रदर्शक, हॉप सेलर द्वारा प्रकाशित किया जाता था। 23 दिसंबर 1969 को उन्होने अपने माता-पिता को एक पत्र लिखा – “ मेरे मेज़ पर एक बंद और पता लिखा एक पुलिंदा पड़ा हुआ है, यह मेरी पाण्डुलिपि है। अब मैं इसे हॉप सेयलर को टुबिंगेन भेज रहा हूँ। प्रकाशन के दिशा में उठाया गया यह मेरा पहला कदम है, बशर्ते कि हॉप सेयलर इसके प्रकाशन के लिए मना नहीं कर दें।

लेकिन, आरंभ में होप सेयलर ने प्रकाशन से मना कर दिया। फ्रिट्ज़ के खोज की प्रवृति इतनी अभूतपूर्व थी कि होप सेयलर काफी संशय में थे। फ्रिट्ज़ के निष्कर्ष के बारे में अपना संशय दूर करने के लिए उन्होने खुद इन प्रयोगों को दुहराने का फैसला किया। हॉप सेयलर का यह रवैया कोई आश्चर्यचकित करने वाली बात नहीं थी। इस बात के कुछ समय पूर्व ही उनकी प्रयोगशाला, मस्तिष्क के उत्तकों में एक निश्चित अणु के अस्तित्व को ले कर विवाद में उलझी रही थी। साथ ही, वह अपनी पत्रिका की प्रतिष्ठा बनाए रखने की खातिर, प्रकाशन के लिए आए प्रपत्रों को प्रकाशित करने के मामले में बहुत ही कठोर आदमी थे।

भले ही होप सेयलर, फ्रिट्ज़ के काम के प्रति आशावादी थे पर उन्होने अपना प्रारम्भिक विश्लेषण, फ्रिट्ज़ के विश्लेषण से अलग पाया। भले ही विश्लेषण में आए अंतर अभिप्रायपूर्ण ना थे, फिर भी होप सेयलर ने सतर्कता बरतते हुये, प्रकाशन को कुछ दिनों के लिए टालने का फैसला किया। उन्होने फ्रिट्ज़ को यह सलाह दी कि अगर वह अपने काम का शीघ्र प्रकाशन चाहते हैं तो अपनी पाण्डुलिपि किसी और पत्रिका को भेज दें, क्योकि उनकी पत्रिका की अगली प्रतिलिपि, कम से कम दो – तीन महीने बाद ही तैयार होने वाली थी। फ्रिट्ज़ ने जबाब दिया, कि प्रकाशन में बस कुछ ही समय कि देरी हो रहिया है तो, वह इंतज़ार करने के लिए तैयार हैं, पर उन्होने होप सेयलर से यह आग्रह किया कि वह जब भी उयनके शोध को प्रकाशित करें तब वह पाण्डुलिपि लेखन का दिनांक (अक्तूबर 1869) अथवा प्रकाशन के लिए पाण्डुलिपि की प्राप्ति की तारीख का उल्लेख करें। उनको इस बात का दर सता रहा था, कि इस बीच कहीं कोई और वैज्ञानिक न्यूक्लीन पर शोध कर, उसे प्रकाशित कर सकता है, और साथ ही साथ इस खोज का श्रेय भी ले सकता है।

जुलाई 1870 के अंत में फ्रिट्ज़ चिंतित होने लगे, क्योंकि तब तक होप सेयलर ने कोई जबाब नहीं दिया था। उन्होने होप सेयलर को एक पत्र लिखा कि वह ‘बेसल प्रकृतिक विज्ञान रिपोर्ट’(besal natural science Reports) के लिए अपने कम का संक्षिप्त सारांश भेजना चाहते है, क्योकि कुछ दिनों पहले ही वह इसके सदस्य बने हैं। होप सेयलर ने इस पत्र का भी कोई जाबा नहीं दिया। अतः अगस्त में फ्रिट्ज़ ने इसके तात्कालिक महत्व पर ज़ोर देते हुये उन्हे दुबारा एक पत्र लिखा। नव वर्ष से पूर्व एक व्याख्याता के रूप में बेसल मेडिकल स्कूल में काम शुरू करने वाले थे। जिसके लिए उन्हे या तो उन्हे अपनी पाण्डुलिपि अथवा प्रकाशन साक्ष्यों की जरूरत थी, क्योंकि उन्होने अपने सम्पूर्ण शोध का कोई प्रपत्र या कोई खांका अपने पास नहीं रखा था। पर अफसोस ! होप सेयलर का फिर से कोई जबाब नहीं आया।

जुलाई 1870, में शुरू हुये फ्रांसीसी – जर्मन युद्ध ( frnco – Prussian war) के प्रादुर्भाव वश, हालात बाद से बदतर होते चले गए। उस युद्ध ने दैनिक समाचार पत्रों को छोड़ कर, बाक़ी हर चीज के प्रकाशन दखल डाला था। समय के साथ अपने लेख के प्रकाशन में हो रही देरी की वजह से फ्रिट्ज़, अत्यधिक आशंकित हो गए। उन्होने पुनः होप सेयलर को एक और पत्र लिखा, जिसमे उन्होने होप सेयलर से सम्मान पूर्वक, प्रकाशन में गति लाने का अनुरोध किया। उन्होने अपने शोध पत्र को किसी और पत्रिका में भेजने का विचार किया, और होप सेयलर से अपनी पाण्डुलिपि लौटने का निवेदन किया। एक लंबे, संविदान विध्वंशक साल के इंतज़ार के बाद, अक्तूबर 1870 में होप सेयलर ने फ्रिट्ज़ के पत्रक का जबाब दिया। उन्होने कहा कि “मुझे अभी अभी तुम्हारा दूसरा पत्र प्राप्त हुआ है, जैसे ही मैं यह निश्चिंत हुआ हूँ कि तुम बेसल में हो मैं तुरंत उत्तर दे रहा हूँ। युद्ध छिड़ने के बाद बड़ी मुश्किल से तुम्हारा पहला पत्र मिला, जिसमे तुमने अपने प्रस्थान की सूचना दी थी, युद्ध के भयावह स्थिति से मुझे यह दर लग रहा था कि शायद मेरे पत्र तुम तक पँहुचे ही नहीं।

उन्होने बताया कि वह, न्यूक्लीन पर दिये गए फ्रिट्ज़ के विवरणों की पुष्टि करने में सक्षम रहे थे, और उनका इरादा फ्रिट्ज़ की पाण्डुलिपि को अपनी पत्रिका के अगले अंक मे प्रकाशित करने का था। इस पत्र के साथ फ्रिट्ज़ की टिप्पणी के लिए होप सेयलर का निष्कर्ष संलग्न था। होप सेयलर का पत्र पा फ्रिट्ज़ बहुत उत्साहित थे , उन्होने तुरंत होप सेयलर को उत्तर लिख भेजा। कुछ हफ्तों के बाद, फ्रिट्ज़ को उनके प्रकाशन का साक्ष्य के साथ होप सेयलर का एक पत्र मिला, जिसमे होप सेयलर ने लिखा था कि तुम्हारा साक्ष्य मुद्रण संबंधी त्रुटियों (topographical errors ) से भरा हुआ था, और प्रकाशक को फ्रिट्ज़ की लिखावट समझ में नहीं आ रही थी।

अंततः सन 1871 की शुरुआत में, “मेडिसिनिक केमिक अंतेर्सुगेन- (“Medicinisch-Chemische Untersuchungen यानि मेडिकल और रासायनिक जांच) में फ्रिट्ज़ का शोध पत्र प्रकाशित हुआ, फ्रिट्ज़ के न्यूक्लीन पर शोध के अलावा पत्रिका के इस संस्करण में दो और लेख सम्मिलित थे, पहला - होप सेयलर के एक अन्य छात्र द्वारा पक्षियों और साँपों के नाभिक वाले एरिथ्रोसाइट में न्यूक्लीन की मौजूदगी की पुष्टि करता एक लेख और दूसरा फ्रिट्ज़ के न्यूक्लीन पर निष्कर्ष को प्रमाणित करता हुआ लेख, जो खुद होप सेयलर द्वारा लिखित था।


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फ़्रेडरिक, लुडविंग के साथ अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद, सन 1871 में अपने गृह नगर बेसल लौट आए और विश्वविद्यालय में एक प्राध्यापक के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन शुरू किया। उन्होने श्वसन की फिसीओलोजी पर अपना ‘हाइबिलिटेसन (Habilitation- कई यूरोपियन और एशियाई देशों में, उच्चतम योग्यता, जिसे स्वतंत्र रूप से प्राप्त किया जा सकता है, जिसके पूरा होते ही उम्मीदवार ‘प्रवेडोजेट’ की उपाधि प्राप्त करता है) प्रस्तुत किया और एक प्रावेडॉजेट(Privatdozent - एक जर्मन शब्द जिसका निकटतम अर्थ ‘गैर सरकारी व्याख्याता या private Lecturer होता है) के रूप में अपना काम शुरू किया। उन्होने न्यूक्लीन पर अपना शोध दुबारा शुरू किया, जो लुडविंग के साथ काम कराते वक़्त गौण हो गया था। होप सेयलर भी न्यूक्लीन पर अध्ययन करने की रुचि रखते थे, पर फ़्रेडरिक न्यूक्लीन पर आगे काम करना चाहते हैं, यह सोच उन्होने खुद को न्यूक्लीन पर अध्ययन से दूर रखा।

टुबिंगेन में किए गए अपने शोध की तुलना में, फ़्रेडरिक अब अधिक विस्तार से न्यूक्लीन का चित्रण और विश्लेषण करना चाहते थे। पर शोध के लिए प्रतिकूल और खराब परिस्थितियों के कारण उनके काम की प्रगति बहुत धीमी थी। इस परिस्थिति की शिकायत करते हुये, उन्होने अपने एक मित्र को पत्र लिखा – “ पिछले डॉ वर्षों से मैं, उतावला हो, टुंबिंगेन महल के अपने रसोई घर वाले प्रयोगशाला में जाने के लिए तड़प रहा हूँ। यह कहने की जरूरत नहीं है कि मेरा पास कोई प्रयोगशाला नहीं है, रसायन विज्ञान प्रयोगशाला के एक कोने में मैं काम करता हूँ, जहां मुश्किल से ही कोई हरकत की जा सकती है, प्रयोगशाला पहले ही, अत्यधिक छात्रों के बोझ से दबा हुआ है, ऊपर से रसायन विज्ञान के प्राध्यापक भी अपने अनुसंधान यही करते हैं। तुम इस बात की सिर्फ कल्पना मात्र कर सकते हो कि बाह्य कारक मेरे काम में इतनी अड़चन ड़ाल रहे हैं की इन परिस्थितियों में शोध को आगे बढ़ाने में बहुत मुश्किलें आ रही हैं। मुश्किलें इतनी हैं कि मैं शोध को आसानी से याद भी नहीं रख सकता।

इन सब के बावजूद, फ़्रेडरिक दृढ़ निश्चय के साथ अपने काम पर लगे रहे, अपने मामा के सलाह पर उन्होने साल्मन मछली के अंडों में न्यूक्लीन अध्ययन शुरू किया और उन्हे जल्दी ही इस बात का एहसास हुआ कि साल्मन का शुक्राणु साल्मन के अंडे से बेहतर विकल्प था, क्योंकि साल्मन के शुक्राणु का सिर लगभग पूरी तरह से नाभिक से ही बने होने के लिए जाना जाता था। पिछली बार की तरह, जब वह श्वेत रक्त कोशिकाओं पर प्रयोग कर रहे थे तब उन्होने लिंफोसाइट पर शोध करना छोड़ ल्यूकोसाइट पर काम करना शुरू कर दिया था, जिंका अध्ययन स्वतंत्र कोशिकाओं के रूप में किया जा सकता था, इस बार उन्होने मछली के अंडों कण अध्ययन छोड़ , फ्रिट्ज़ ने अपनी अभिरुचि मछली के शुक्राणु में दिखाई।

डीएनए की खोज और उसके चित्रण में सफलता के लिए फ्रिट्ज़, परीक्षण के लिए चुनी गई कोशिकाओं के आभारी थे। जटिल प्रयोगों के सफलता पूर्वक संचालन में वह बहुत ही निपुण थे, मगर उनमे प्रयोगों को और प्रभावी बनाने की दक्षता का अभाव था। फ़्रेडरिक पर सर्वोत्कृष्टता का जुनून सा सवार था। वह अपने प्रयोगों को बार- बार दोहराते और बार बार उनका विश्लेषण करते, तथा अपने निष्कर्षों के प्रकाशन से पूर्व वह लंबे समय तक इंतज़ार करते, भले ही उनके वैज्ञानिक जीवन का फैलाव तीन दशकों तक रहा हो, मगर इस दौरान उन्होने सिर्फ नौ वैज्ञानिक पत्रों और कुछ गिनी चुनी व्याख्यानों की पाण्डुलिपि का प्रकाशन कराया। उनके विचारों और परिणामों के एक बहुत बड़े हिस्से का लेखा जोखा केवल उनके पत्रों के माध्यम से मिलता है, जो उन्होने अपने मित्रों तथा अपने सहयोगियों को लिखा था।

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सन 1872 में , फ्रिट्ज़ के मामा विल्हेल्म हिस लेपजिंग में एनाटोमी (शरीरकी ) के प्राध्यापक बन गए। विल्हेल्म ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में फिजिओलोजी (दैहिकी) के विभागाध्यक्ष के पद के लिए, फ़्रेडरिक के नाम की सिफ़ारिश की। होप सेयलर और लुडविंग को, फ़्रेडरिक की योग्यता और इस पद के लिए उपयुक्तता जाँचने हेतु, पत्र भेजा गया। दोनों ने फ़्रेडरिक की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुये, उनको इस पद के लिए उपायुक्त और योग्य बताया, और नवंबर, 1872 में मात्र 28 वर्ष की उम्र में फ़्रेडरिक को बेसल विश्वविद्यालय में फिजिओलोजी के विभायाध्यक्ष बनने की पेश कश कर दी गई। यह वहीं पद था, जिसे कभी उनके पिता और मामा संभाला करते थे। भले ही फ़्रेडरिक ने यह पद अपनी योग्यता के डैम पर प्राप्त किया हो, मगर विश्वविद्यालय में अफवाहों का यह बाज़ार गरम था कि यह मात्र फ़्रेडरिक परिवार की राजनीतिक विजय है।

इस पद ने, उन्हे अपने शोध के लिए अधिक धन और उपकरणों के बेहतर उपयोग के लिए और सक्षम बनाया। दुर्भाग्यवश, इस उफर का दूसरा पहलू भी था। उनके इस नए पद जुड़े बहुत सारे दायित्व भी थे, जिनके निर्वहन ने उन्हे एक लंबे समय तक उनको अपने काम से दूर रखा। इन दायित्वों में शिक्षण भी शामिल था। उन्होने अपना बहुत सारा वक़्त और ऊर्जा शिक्षण में झोक दिया, लेकिंग दुखद बात यह रही कि वह बहुत अच्छे शिक्षक साबित नहीं हुए, उन्होने छत्रों से उच्य स्टार के ज्ञान, लगन, और रुचि की अपेक्षा की थी, पर अधिकांश छात्र उनकी इस अपेक्षा पर खरे नहीं उतरे। इसके अलावा वह बहुत शर्मीले और कुछ अधीर भी थे, और अक्सर अपने कार्यों में चिंतामग्न दिखाई पड़ते। केवल फिजिओलोजी के उच्य छत्रों ने ही उनके व्याख्यान को सुखद पाया।

फ्रिट्ज़ शिक्षण के अलावा, उपकरण निर्माण, परीक्षण के नमूने तैयार करना, प्रयोग को छत्रों के अनुकूल तरीके से आयाओजित करने के लिए भी जिम्मेदार थे। सन 1875 आते आते उन्होने एक ऐसी प्रणाली की स्थापना की जिसमे प्रत्येक छात्र के पास, अपने लिए खुद के एक नियत कार्य होता था, जिनके परिणामों को उन्हे खुद ही प्रस्तुत करना होता और उन पर चर्चाओं और गोष्ठियों का आयोजन भी करना पड़ता था। अपने पद और स्थिति के साथ न्याय करने के लिए फ़्रेडरिक ने जी तोड़ मेहनत की, और उन्होने यह भी साबित किया कि इस पद के लिए उनका चयन उनकी योग्यता की वजह से हुआ था, नाकी उनके पारिवारिक सम्बन्धों की वजह से। इस चक्कर में उन्होने अपने ऊपर बहुत सारे बोझ डाल लिए और जिसकी वजह से उनका स्वास्थ्य गिरने लगा।

 

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इन सारे कार्यों को करने के बावजूद, फ़्रेडरिक ने अपने प्रयोगों को और ज्यादा सफलता के साथ जारी रखा, राइन नदी तट पर स्थित बेसल, साल्मन मछली के शुक्राणुओं पर फ़्रेडरिक के प्रयोगों के लिए एक आदर्श जगह साबित हुई। साल्मन का, अंडे देने के लिए बहाव के विपरीत वार्षिक पलायन की वजह से शहर में एक समृद्ध साल्मन उद्योग था। इससे फ़्रेडरिक के लिए सस्ती और आसानी से मिलने वाली अध्ययन सामाग्री उपलब्ध थी।

साल्मन शुक्राणु से, फ्रिट्ज़ काफी मात्रा में शुद्ध न्यूक्लीन प्राप्त करने में सक्षम हुये, इतनी मात्रा उन्हे पहले कभी प्राप्त नहीं हुई थी। साथ ही उन्होने कोशिका द्रव्य से न्यूक्लीन अलगाव हेतु कई अत्याधुनिक तरीकों को विकसित किए थे। हालांकि काम में अभी भी कठिनाइयाँ बरकरार थीं। फ़्रेडरिक को कड़ाके की ठंढ में अंधा- धुन काम करना पड़ता था, क्योंकि उन दिनों ठंढे कमरे उपलब्ध नहीं थे, अतः प्रयोग सामाग्री को अपकर्षण (degradations) से बचाने के लिए वह, सर्दियों के सुबह सारी खिड़कियों को खोल, ठंढ में अपने प्रयोगों का संचालन करते थे। वह अक्सर गई रात उठ जाते और दिन के शुरुआती पल विश्वविद्यालय के पास एक जगह मछली पकड़ते और उनको अपने साथ प्रयोगशाला ले जाते। साल्मन मछली के न्यूक्लीन द्वारा उन्होने डीएनए के कुछ गुणों का सबसे सटीक विश्लेषण किया। बाद में उन्होने कार्प मछली , मेढक, मुर्गियों, और बैल के शुक्राणुओं में भी न्यूक्लीन की मौजूदगी दर्ज की।

उसी दौरान, वैज्ञानिक भ्रूण विकास और वंशानुगत लक्षणों के संचरण के रहस्यों से पर्दा उठाने की कोशिश में लगे हुए थे। फ़्रेडरिक इस रहस्य के पर्दाफाश करने के काफी करीब आए। अपने एक लेख में उन्होने लिखा कि “ यदि कोई इस बात की कल्पना करना चाहता है कि किसी भी तरह से कोई एक खास पदार्थ ही निषेचन (fertilization) के लिए जिम्मेदार है, तो वह पदार्थ बिना किसी शक के उसे यह मान लेना चाहिए कि वह पदार्थ न्यूक्लीन है” लेकिन बाद में उन्होने अपने इस विचार को खुद अस्वीकार कर दिया, क्योंकि उन्हे इस बात पर विश्वास नहीं था कि जिन पशुओं के शुक्राणुओं का अध्ययन उन्होने किया है, उनकी विविधता के लिए कोई एक अणु जिम्मेदार हो सकता है। इसके बजाय उनका यह मानना था कि न्यूकिल का काम फास्फोरस भंडाराण है।

उन्होने एक परिकल्पना विकसित की, जो उल्लेखनीय रूप से इस बात के बहुत करीब था कि कैसे गुण और लक्षणों की जानकारी डीएनए में संग्रहीत होती है। उन्होने यह अनुमान लगाया कि संभवतः यह सारी जानकारीयां अणुओं के अंदर कार्बन परमाणुओं की व्यवस्था के द्वारा संग्रहीत होती है। “ जैसे की सभी भाषाओं के शब्दों और अवधारनाओं को वर्णमाला के चौबीस से तीस अक्षरों द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकता है, ठीक वैसे ही अणु, संघटक परमाणुओं के अलग –अलग तरीके के संयोजन से बने हो सकते हैं।“ संक्षेप में उनका इशारा आनुवांशिक कोड की तरफ था।

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समय के साथ फ़्रेडरिक का रुझान अनुसंधान के अन्य क्षेत्रों की तरफ बढ़ा और उन्होने न्यूक्लीन पर कोई और लेख नहीं प्रकाशित कराया। 1870 के दशा के मध्य से वह, साल्मन मछलियाँ जब समुद्र से पलायन कर रैन नदी में उनके अंडे देने के स्थान पर आती, उस दौरान उनके शरीरकी (Anatomy) में आने वाले बदलाओं पर सम्मोहित हो गए। मछुआरे इस बात बहुत लंबे वक़्त से जानते थे कि भले ही यह समुद्री मछलियाँ पलायन के दौरान मीठे पानी में जीवित रह जाती हों, मगर वह मीठे पानी में कुछ भी खा पाने में विफल रहती हैं। यह विलक्षण ही था कि इसके बावजूद नर शुक्राणु उत्पादन करते रहते हैं और मादा मछलियों के अंडाशय का वजन बढ़ के, उनके शरीर के कुल वजन का एक चौथाई हिस्से तक पहुच जाता है। फ़्रेडरिक को ठीक मछुआरों की तरह, साल्मन पकड़ना पड़ता और फिर उन्हे अपनी प्रयोगशाला में लाना पड़ता। जहां वह मछलियों की लंबाई और वजन मापते फिर उनके मांसपेशियों, आंतरिक भागों, और रक्त का परीक्षण करते थे।

साल्मन के एनाटोमी के आधार पर, सन 1876 की शरद ऋतु में, स्विस सरकार ने फ्रिट्ज़ से बेसल जेल के क़ैदियों के भोजन पर एक रिपोर्ट तैयार करने को खा। फ़्रेडरिक ने इस काम को घृणास्पद पाया और शिकायत करते हुये कहा कि यह अकृतज्ञ और थकाऊ काम था। हालांकि सरकार उनके रिपोर्ट से बहुत ही प्रभावित हुई, अतः अन्य कारागारों से उनके पास इसी तरह के अनुरोध आने लगे। इसके बारे में उनके मामा ने लिखा “ हर कारागार को अपने लिए अपनी एक व्यंजन सूची चाहिए थी।“ लेकिन इसका अंत यहीं नहीं हुआ, बहुत सारे शैक्षिक संस्थानों और संघो ने पोषण पर मिशर की राय लेनी शुरू कर दिया। अंततः फ्रिट्ज़ का धैर्य जबाब दे गया, और वह इस बात से बहुत नाराज़ हो गए। उन्होने कहा कि “ मैंने अपने आप को इतना हरा बना दिया है कि अब बकरियाँ मुझे खाने लगी हैं। स्विस लोगों के आहार की जांच, श्रमिकों के लिए खाना बनाने की किताब, राष्ट्रीय प्रदर्शनी के लिए पोषक तत्वों की आहार तालिका, काइमर दुग्ध कंपनी के साथ विवाद, संक्षेप में मैं तीन लाख स्विस लोगों के पेट का अभिभावक बनने की ओर अग्रसर हूँ!”

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दिसंबर 1877 में, फ़्रेडरिक की सगाई बेसल निवासी मैरी एन रुस्क (Marie Ann Rusch) के साथ हो गई, और 21 मार्च, 1878 को उनकी शादी हुई। उनके तीन बच्चे हुए। बाद में वह अपने परिवार के साथ मंस्टरप्लैटस ( Munsterplatz) के पास 12, अगस्टिनग्रास (Augustinergrass) स्थित एक चार मंज़िले इमारत रहने चले गए। उनके घर के पीछे से राइन नदी बहती थी, जिससे आगामी कई वर्षों तक फ़्रेडरिक साल्मन पकड़ते रहे। उनका यह घर आज भी उपयोग में है।

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सन 1885 में फ़्रेडरिक ने बेसल बेसल की पहली फिसीओलोजी एवं एनैटॉमी संस्थान की स्थापना की, जिसे “वेसालियम” (Vesalianum) नाम से जाना जाता था। यह स्विट्जरलैंड में अपनी तरह का पहला संस्थान था। फ़्रेडरिक इसके प्राथमिक निदेशक बने और हमेशा की तरह अपने काम से ईमानदारी बरते हुए उन्होने अपने कर्तव्यों को बहुत गंभीरता से लिया। उन्होने जीवंत वैज्ञानिक जीवन को प्रोत्साहन दिया और कई प्रसिद्ध, उच्य कोटी के तकनीशियनों को अपने साथ जोड़ा, जिनके साथ मिल के उन्होने शारीरिक माप (physiological measurements) के लिए उन्नत और मौलिक मशीनों का रूपांकन और विकास किया। फ़्रेडरिक ने श्वसन पर दुबारा काम शुरू किया, जिसकी शुरुआत उन्होने अपने हाइबिलिटसन (Habilitation) के दौरान की थी और रक्त की संरचना पर ऊंचाई के प्रभाव का अध्ययन किया।

संस्थान आज भी कार्यरत है और संस्थान के शीर्ष पर बायीं तरफ लगी फ्रिट्ज़ की अर्ध प्रतिमा, आगंतुकों को संस्थान के साथ फ़्रेडरिक मिशर के रिश्ते की याद दिलाती है।

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गुजरते हुए वक़्त के साथ, फ़्रेडरिक की अत्यधिक प्रतिबध्यता ने उनके स्वास्थ्य को क्षति पहुंचनी शुरू कर दी। काम के प्रति उनके जुनून और सर्वोत्कृष्टता चाह की वजह से उन्हे आराम करने के लिए बहुत कम वक़्त मिला, उन्होने सोने में बहुत ही कंजूसी बरती और अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को भी नज़र अंदाज़ किया, और तो और अपनी छुट्टियों की भी उन्होने प्रयोगशाला में काम करते हुए गुजारा। सन 1885 में, संभवतः अत्यधिक सर्द वातावरण में लंबे समय तक कार्य करने की अपनी आदतों की वजह से, उन्हे प्लेयूरिसी (pleurisy- श्वसन और फेफड़ों से संबन्धित एक रोग) हो गया। उन्होने थकावट महसूस करना शुरू कर दिया, वह उदास रहने लगे और शारीरिक रूप से बहुत ही कमजोर हो गए। अंततः सन 1890 में उन्हे तपेदिक (tuberculosis) से पीड़ित पाया गया और उन्हे अपने प्रिय काम का त्याग कर, स्विस एल्प्स (swis alps- एल्प्स पर्वतमाला का स्विट्जरलैंड का हिस्सा) की पहाड़ियों में स्थित दावोस (Davos) के अस्पताल में स्थानातरित होना पड़ा।

मई 1895 में उन्होने बर्लिन विश्वविद्यालय को एक पत्र लिख बताया कि उनके चिकित्सकों ने यह बताता है कि वह शायद धीरे-धीरे ठीक हो सकते हैं, लेकिन उन्हे इस बात का पता नहीं है कि वह विश्वविद्यालय में अपना काम दुबारा शुरू करने के लिए कब सक्षम हो पाएंगे, अतः उन्होने खुद को, प्राध्यापक पद से मुक्त करने का अनुरोध किया। जून 1895 में उन्हे आधिकारिक तौर पर उनके पद से सेवा मुक्त कर दिया गया और उनके सम्मान में बेसल शहर ने एक प्रशंसा पत्र भेजा। उस जबाब में उन्होने लिखा “मुझे अपनी निपुणता के बारे में नहीं पता, अपने पेशे के कर्तव्यों का सामान्य निर्वहन के अलावा कुछ अलग नहीं किया है, और मैंने अपने सामुदायिक परंपरा के अनुसार वही किया है जो बेसल के शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक नागरिकों द्वारा किया जाता रहा है, मैंने कुछ भी विशेष या अलग नहीं किया है। मेरा यह मानना है कि यह सम्मान सरकार ने गंभीर रूप से बीमार एक नागरिक को खुशी प्रदान करने की इच्छा से प्रदान किया है, मैं इस बात की सराहना करूंगा, अगर आप अधिकारियों तक मेरा हार्दिक अभिनंदन पाहुचा दें।“

अपनी बीमारी के दौरान फ़्रेडरिक ने कई बार, अपने काम के दस्तावेजी करण के बारे में सोचा, और तो और उन्होने सारांश लिखने का भी प्रयास किया, पर वह विफल रहे क्योंकि कुछ पन्नों का लेखन भी उन्हे थका देता था। उनके पूर्व संरक्षक कार्ल लुडविंग ने उन्हे लिखा, “ बेसक धैर्य का प्रचार इसके अभ्यास से बहुत आसान काम है और अपने अनुभवों से मुझे यह पता है कि अपने सबसे प्रिय एवं उम्मीद से भरे कार्य को छोडना कैसा लगता है, और यह कितना दुखद होता है, पर तुम्हारे लिए, संतुष्टि की एक बात यह है कि तुम्हारे अध्ययन और शूध अमर हैं, विशेष रूप से नाभिक का ज्ञान तुमने विश्व को दिया है, और इसीलिए जब आगामी शताब्दियों में लोग कोशिका का अध्ययन और शोध करेंगे तब तुम्हारा नाम कृतज्ञता के साथ, इस क्षेत्र के अग्रणी के रूप में याद किया जाएगा।“

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अपने खोज के प्रभाव को देखने के लिए फ़्रेडरिक लंबे समय तक जीवित नहीं रहे, 26 अगस्त 1895 को मात्र 51 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके मामा ने फ़्रेडरिक के सभी कार्यों को एकत्रित कर प्रकाशित कराया, जिसकी भूमिका में उन्होने लिखा कि “मिशर के नाम उनके काम की सराहना कभी धूमिल नहीं होगी, इसके बजाय इसका और फैलाव होगा, उनकी खोजें और उनके विचार एक सुनहले भविष्य के लिए नीव साबित होंगी। “ विल्हेल्म हिस को इस बात शायद ही अंदेशा था कि उस वक़्त की गई उनकी भविष्यवाणी आगे चल अक्षर- अक्षर सत्या साबित होगी।

उनकी मृत्यु के लगभग 50 साल बाद तक वैज्ञानिकों ने डीएनए के बारे में सोचा तक नहीं, क्योंकि उनका मानना था कि सिर्फ चार इमारती ब्लॉक वाली अपनी संरचना कि वजह से डीएनए आनुवंशिकता जैसे जटिल काम के लिए एक अति साधारण अणु है। इसके बजाय उन्होने अधिक जटिल संरचना और विन्यास वाले प्रोटीन की हिमायत की और इसे इस काम के लिए उत्तरदायी ठहराया। यह तो 1940 का दशक था, जिसमे की डीएनए में उनकी रुचि को पुनर्जीवित किया। फिर अधिक से अधिक वैज्ञानिक डीएनए के रहस्यों से पर्दा हटाने की होड में शामिल होते गए और इस पहेली के गायब टुकड़े अपनी सही जगह पर आ जुडने लगे। अंततः 1960 के दशक के मध्य में, फ़्रेडरिक की खोज के लगभग 100 साल बाद , आनुवांशिक कोड के रहस्य का पर्दाफाश औया, और फिर कहीं जा के डीएनए का आगमन हुआ। इस अभूतपूर्व सफलता ने जीव विज्ञान की एक नई शाखा को जन्म दिया- “आणविक अनुवंशिकी” (Molecular Genetics)

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महान खोज और अनवेषण , उत्कृष्ट मस्तिष्कों का उत्पादन होते हैं, फ़्रेडरिक को उनके सहयोगियों और छत्रों द्वारा एक उत्कृष्ट शोध कर्ता माना जाता था। अपने जीवन के अंत तक उन्होने जिस लगन और कठिन परिश्रम के साथ काम किया, जैसे की कोई युवा अपने कैरियर की शुरुआत में कर्ता है। काम के प्रति उनमे एक ऐसा जुनून सवार था कि वह अपनी शादी में पाहुचने में विफल रहे, बाद में जब उन्हे ढूँढने के लिए एक खोजी दल भेजा गया तब यह पाया गया कि वह अपनी प्रयोगशाला में चुपचाप एक प्रयोग में संलग्न थे। जब उनसे पूछा गया कि वह इतनी मेहनत क्यों करते हैं ? तब उन्होने कहा कि “ यह प्रश्न किसी भी उस व्यक्ति से पुछना चाहिए जो किसी प्रमुख विज्ञान परियोजना का एक उपक्रम है, आखिर युद्ध की गर्मी क्या होती है? वह कौन सी चीज है जो बार बार आगे बढ़ाने को उत्साही और प्रेरित करती है? वह कभी भी , किसी भी और लक्ष्य के बारे में नहीं सोचता है, शिकारियों और सैनिकों का वह जुनून है जो युद्ध में मिले असफलताओं से प्रेरणा लेता है और आगे बढ़ता है।“

फ़्रेडरिक एक विलक्षण और अद्भभूत दृढ़ संकल्प से भरे एक प्रतिभावन व्यक्तित्व के स्वामी थे। जहां अधिकांश लोग हिम्मत हर उन प्रयोगों का परित्याग कर देते, वही फ़्रेडरिक डटे रहे और जब उन्होने मानव शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अणुओं में से एक की खोज कर, उन्होने अपने परिश्रम के लिए मिले सभी सम्मानों के साथ पूरा न्याय किया। उनके इसी दृढ़ निश्चय भरे रवैये ने थामस एडिसन एक प्रसिद्ध उद्धरण को सही साबित किया “ जीवन की विफलताओं का अनुभव उनही लोगो द्वारा किया जाता है, जिनहे इस बात का पता नहीं होता कि जिस वक़्त उन्होने हार मानी थी उस वक़्त वह लोग सफलता के कितने करीब थे।“ फ़्रेडरिक एक बहुत ही प्रवीण प्रयोग कर्ता थे, जो यह जानते थे कि कैसे , उबप्लब्ध संसाधनों को प्रयोग में लाते हुये उनका सर्वश्रेष्ट उपयोग करना है। अति प्रतिभाशाली होने के बावजूद वह बहुत ही सरल और विनम्र व्यक्ति थे, दूसरे प्रतिभाशाली व्योक्तियों की तरह उनका व्याहर रूखा और सर्द कभी नहीं रहा। सर्वोत्कृष्टता ही उनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य था। उन्हे इस बात का यकीन था कि उन्होने जो कुछ भी अपने जीवन में किया, वह श्रेष्ठ था।

फ़्रेडरिक मिशर एक उल्लेखनीय वैज्ञानिक थे, अपनी चतुराई और दृढ़ता की बदौलत उन्होने एक ऐसी खोज कर डाली जो वक़्त से बहुत पहले था। उनकी खोज और जब दुनिया ने डीएनए के महत्व को समझा इन बातों के बीच लगभग 75 साल के अंतर से यह बात साबित भी हो जाती है। आज फ़्रेडरिक को लगभग भुला दिया गया है, और शायद ही उन्हे, उनकी खोज का श्रेय दिया जाता है, पर अगर उन्होने यह काम नहीं किया होता तो कौन जाने इस रहस्यमयी डीएनए से पर्दा हटाने के लिए पहला कदम कब उठाया जाता?

जरा सोचिए , एक छोटा सा अणु, हमें वह बनाता है, जो हम आज है... जैस की एनी न्यूमैन (Anne Newman) ने सत्य ही कहा था “ एक व्यक्ति का निर्माण डीएनए से होता है, जो न इससे पहले कभी था और न इसके बाद प्रकृतिक तौर पर कभी होगा”

फ्रेडरिक मीशर की बायोग्राफीज | 0 टिप्पणी >>

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