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‘‘हममें से किसी के लिए जीवन आसान नहीं है। लेकिन इससे क्या ? हमें लगनशील होना चाहिए और सबसे अव्वल, खुद पर विश्वास होना चाहिए। हमें भरोसा होना चाहिए कि हममें कुछ खास है और उस खास चीज को हमें हर हाल में प्राप्त करना है।’’
‘‘हममें से किसी के लिए जीवन आसान नहीं है। लेकिन इससे क्या ? हमें लगनशील होना चाहिए और सबसे अव्वल, खुद पर विश्वास होना चाहिए। हमें भरोसा होना चाहिए कि हममें कुछ खास है और उस खास चीज को हमें हर हाल में प्राप्त करना है।’’
---मैरी क्यूरी
पूरी दुनिया में महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा के दरवाजे सदियों तक बंद थे। विज्ञान की अतिसम्मानित दुनिया में ज्यादातर मर्दों का दबदबा था और शक्तिशाली पुरुष महिलाओं के लिए अपना नाम लिखने-पढ़ने भर की शिक्षा को पर्याप्त मानते थे। यदि हम आविष्कारों और वैज्ञानिक खोजों का इतिहास देखें तो हमें पुरुषों का ही वर्चस्व दिखेगा। महारानी एलिजाबेथ के उत्तराधिकारी महाराज जेम्स प्रथम ने अपनी बेटी को शास्त्रीय शिक्षा देने के प्रस्ताव पर जवाब देते हुए कहा था, ‘‘औरतों को शिक्षित और लोमड़ी को डरपोक बनाने का एक ही नतीजा होता है, आप उन्हें और भी धूर्त बना देते हैं।’’ औरतों की बौद्धिक दासता के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाने वालों में कई प्रमुख स्त्री और पुरुष शामिल रहे हैं। 1692 में प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक और पत्रकार डेनियल डेफो ने लिखा ‘‘एक सभ्य और ईसाई देश होने के बावजूद औरतों को शिक्षा से दूर रखना दुनिया का सबसे बर्बर रिवाज है....उनकी जवानी कढ़ाई या सिलाई- बुनाई सीखने में खर्च हो जाती है। दरअसल उन्हें पढ़ना और शायद अपना नाम लिखना सिखाया जाता है और उनकी शिक्षा का कुल उद्देश्य इतना ही होता है।’’
उन्नीसवीं सदी में एक महिला ने पुरुषों के इस वर्चस्व को चुनौती देने की हिम्मत की और साबित किया कि महिलाओं में वैज्ञानिक उपलब्धियों को अर्जित करने की योग्यता और रुझान पुरुषों के बराबर ही होता है। और वह विशिष्ट महिला थी मैरी क्यूरी। जिनका जन्म का नाम मारिया स्क्लोडोवस्का था।

्लादिस्लाव स्क्लोडोवस्का और उनकी पत्नी ब्रानीस्लावा स्क्लोडोवस्का के लिए 7 नवंबर, 1867 एक खास दिन था। इस दिन उनकी पांचवीं और आखिरी संतान का जन्म हुआ था। जन्म लेने वाली लड़की का नाम उन्होंने मारया रखा। इस बालिका को उसके माता-पिता और भाई-बहन हमेशा प्यार से मारया ही कहते थे लेकिन बाकी दुनिया उसे मैरी क्यूरी के नाम से जानती थी। मारया के माता-पिता को इसका जरा भी अंदाजा नहीं था कि मारया का भविष्य कितना शानदार होने वाला है और वह अपने उपलब्धियों से इतिहास रचने वाली है। मारया का परिवार 19वीं सदी के पोलैण्ड में रहने वाले अध्यापकों का परिवार था। उसके दादा जोजेफ स्क्लोडोवस्का ल्युबिन में एक सम्मानित अध्यापक के रूप में जाने जाते थे। उनके पिता व्लादिस्लाव स्क्लोडोवस्का एक पोलिश अध्यापक थे जो गणित और भौतिकी पढ़ाते थे। वो कई स्कूलों और कई बाल-सुधार गृहों के व्यवस्थापक भी रहे थे। वह एक सुशिक्षित और ज्ञानी व्यक्ति थे। उनके बच्चे उन्हें चलता-फिरता ‘विश्वकोश’ कहते थे। मारया की मां ब्रानीस्लावा भी एक अध्यापिका थीं और पोलैण्ड की राजधानी और सबसे बड़े शहर वारसा स्थित एक बालिका विद्यालय की प्रधान अध्यापिका थीं। उनका अपने बच्चों के मस्तिष्क और जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था। मारिया के पिता नास्तिक थे लेकिन उनकी मां एक पक्की कैथोलिक थीं।
स्क्लोडोवस्का परिवार में पांच बच्चे थे। मारया के भाई-बहनों में सबसे बड़ी उसकी बहन जोसिया थी, जोसिया के बाद उसका भाई जोसेफ था फिर उसकी बहनें क्रमश: ब्रोनीस्लावा और हेलेना थीं। श्रीमती स्क्लोडोवस्का को घर पर पांच बच्चों को और फिर स्कूल में ढेर सारे बच्चों को संभालने में काफी मुश्किल होती थी। वो एक सुपर मां थीं तथा यह भी कहा जाता है कि वह अपने सभी बच्चों को जूते भी अपने हाथ ही से पहनाती थीं। वो एक सुंदर और बुद्धिमान महिला थीं जो अपने सभी काम बहुत सफाई से किया करती थीं।
स्क्लोडोवस्का परिवार अत्यधिक विद्याप्रेमी तथा सुसंस्कृत था और उनके बच्चों को ये मूल्य विरासत में प्राप्त हुए और बच्चों ने इस विरासत को बखूबी निभाया भी। मैरी और उसके भाई-बहनों का बचपन बहुत ही सुख के साथ बीता। वे ग्रामीण इलाकों में अपने रिश्तेदारों के साथ छुट्टियां मनाते थे। उनके माता-पिता उन्हें बहुत प्यार करते थे और उनका पूरा ख्याल रखते थे। लेकिन जीवन क्षणभंगुर होता है और इसीलिए खुशियां भी क्षणिक ही होती हैं। हम सबको जिंदगी के उतार-चढ़ाव का सामना करना ही पड़ता है।

‘‘वारसा उस वक्त रूसी कैंजे में था और इस कैंजे का सबसे बुरा पक्ष विद्यालयों और बच्चों पर होने वाला जुल्म था।’’
--- मैरी क्यूरी
जब मैरी 19वीं सदी में पोलैण्ड में जन्मी तो पोलैण्ड एक जटिल और मुश्किलों से भरा देश था। 1790 में पोलैण्ड पर उसके लालची पड़ोसियों रूस, आस्ट्रिया और प्रशा ने हमला कर दिया। पोलैण्ड इतना शक्तिशाली नहीं था कि उनका मुकाबला कर पाता। इन शक्तिशाली देशों ने पोलैण्ड पर कब्जा करके उसे आपस में बांट लिया। पोलैण्ड के उत्तरी इलाके पर रूस का कब्जा था। मैरी का परिवार इसी इलाके में रहता था। पोलैण्ड की राजधानी वारसा भी इसी इलाके में आती थी। पोलैण्ड के लोगों ने इन आतताइयों को कई बार उखाड़ फेंकने की कोशिश की लेकिन वे असफल रहे। रूसी आधिपत्य के खिलाफ विद्रोह करने वालों को या तो मार दिया जाता था या निर्वासन के लिए साइबेरिया भेज दिया जाता था। रूसी विद्रोह की छोटी-छोटी सुगबुगाहटों जैसे पोलिश भाषा में बात करने वालों या रूसियों के बारे में अपशब्द बोलने वालों पर भी रूसी अधिकारी नजर रखते थे। पोलिश विद्वानों के सार्वजनिक रूप से अपने विचार व्यक्त करने पर पाबंदी थी। प्रोफेसर केवल रूसी भाषा में पढ़ा सकते थे। शिक्षण के लिए पोलिश भाषा के प्रयोग पर पूर्णत: पाबंदी थी। उन दिनों पोलिश लोगों के लिए दैनिक जीवन गुजारना इस कदर कठिन था कि उन्हें अपने कैथोलिक धर्म का पालन करते वक्त भी रूसियों के हमले का डर बना रहता था। पोलिश बच्चों को स्कूलों में रूसी भाषा और रूसी लोकगीत सीखने के लिए मजबूर किया जाता था। इन कारणों से मैरी क्यूरी की मातृभूमि में बहुत ज्यादा प्रतिरोध और अशांति थी। मैरी अक्सर एक ऐसे आजाद और खुशहाल देश का स्वप्न देखती थीं जिसमें सभी लोग सुख एवं शांति से रह सकें और खूब विकास कर सकें।

“‘‘ विज्ञान के अंतर्गत हमें चीजों में रुचि लेनी चाहिए, न कि व्यक्तियों में।’’
---मैरी क्यूरी
मैरी क्यूरी के जन्म के समय विज्ञान नई बुलंदियां छू रहा था। नई-नई खोजें और आविष्कार हो रहे थे। सर्वकालिक महान जीव विज्ञानी चार्ल्स डार्विन अपने विकासवाद का सिद्धांत एवं विचार प्रकाशित करा चुके थे। इस सिद्धांत ने वैज्ञानिक जगत में भूचाल ला दिया था। जीवन-संघर्ष में प्राकृतिक चयन या पसंदीदा नस्ल के संरक्षण का सिद्धांत प्रतिपादित करने वाली उनकी किताब ‘‘दि ऑरिजिन ऑफ स्पेसीज‘‘ 24 नवम्बर, 1859 में प्रकाशित हो चुकी थी। आम जनता और विद्वानों ने भी विकासवाद के उनके सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था। जेम्स मैक्सवेल (स्कॉटिश गणितीय भौतिकविद्), माइकल फैराडे (अंग्रेज वैज्ञानिक) और लुडविग बोल्ट्जमान (आस्ट्रीयाई भौतिकविद्) इत्यादि ने मैरी क्यूरी के समय में ही विद्युत और चुम्बकत्व के सिद्धांत को आगे बढ़ाया था। रूसी रसायनविद और आविष्कारक दिमीत्री मेंडलीव ने अपनी आवर्त सारणी (रासायनिक पदार्थों का सूचीकरण) इसी दौर में प्रस्तुत की थी। रसायन विज्ञान में आजकल प्रयुक्त होने वाली आवर्त सारणी मेंडलीव की सारणी पर ही आधारित है। यह ऐसा दौर था जिसमें बहुत-सी खोजें हुईं और बहुत-सी खोजें होने से रह गई। और ऐसे उर्वर समय में मैरी क्यूरी परिदृश्य में आईं।

“ ‘‘मेरा यकीन कीजिए, सबकुछ के बावजूद पारिवारिक एकजुटता ही एकमात्र अच्छी चीज है।‘‘
--- मैरी क्यूरी
स्क्लोडोवस्का परिवार के सदस्यों के बीच पारस्परिक संबंध बहुत घनिष्ठ था और वे सभी जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे। मात्र चार साल की उम्र में मैरी धाराप्रवाह पढ़ना सीख गई थी। वो अत्यधिक जिज्ञासु और अपनी उम्र से ज्यादा परिपक्व थी। अपने पिता के दाबमापी, परखनलियां, स्केलें और स्वर्ण पवित्र इलेक्ट्रोस्कोप की स्वर्ण पत्रित वैज्ञानिक उपकरण नन्हीं-सी क्यूरी के लिए खिलौनों की तरह थे। ये खिलौने उसे अत्यधिक आकर्षित करते थे। उसकी स्मरणशक्ति भी अद्भुत थी। उन्होंने अपनी मातृभाषा पोलिश के साथ ही रूसी भाषा को भी बहुत ही सरलता से सीख लिया था। नन्हीं मैरी को अपनी मां से बहुत प्यार था और उनके साथ समय बिताना उसे बहुत पसंद था। लेकिन दुर्भाग्यवश मैरी के जन्म के बाद ही उनकी मां को क्षयरोग हो गया। 1871 में व्लादिस्लाव का भाई मैरी के परिवार के साथ रहने के लिए आए थे और स्क्लोडोवस्का परिवार को इस बात का जरा भी अंदेशा नहीं था कि उसे क्षयरोग था। यह रोग धीरे-धीरे मैरी की मां को अपनी गिरफ्त में लेने लगा और परिवार के असुरक्षित रहन-सहन के कारण यह बढ़ता गया। इसी दौरान 1873 की शरद ॠतु में मैरी के पिता को स्कूल के प्रधानाध्यापक के पद से हटा दिया गया। उनकी जगह एक रूसी को दे दी गई। मैरी के पिता स्वाभिमानी व्यक्ति थे। वे रूसियों के सामने नहीं झुकते थे इसलिए उनका सार्वजनिक अपमान किया गया। ऊपर से फजीहत यह कि उनके द्वारा किए गए कुछ खराब आर्थिक निवेशों के कारण उनकी सारी जमा-पूंजी भी चली गई। इसने उनकी मुश्किलों में और इजाफा कर दिया। मैरी के परिवार को बहुत ही खराब हालात का सामना करना पड़ रहा था। आखिर में उन्हें अपने बड़े घर को छोड़कर एक छोटे घर में रहने के लिए जाना पड़ा। मैरी के परिवार ने छात्रों को किराएदार के रूप में रखना शुरू कर दिया। इन्हीं में से एक किराएदार के कारण ब्रोन्या और जोसिया को 1874 में टाइफस का संक्रमण हो गया। मैरी की बड़ी बहन जोसिया इस बुखार से उबर नहीं सकी और उसका देहांत हो गया। बड़ी बहन की मृत्यु के समय मैरी की उम्र मात्र आठ साल थी।

हम जानते हैं कि मैरी के परिवार में बहुत भीड़भाड़ थी। एक छोटे से अपार्टमेंट में बहुत सारे लोग रहते थे। इस भीड-भड़क्का ने क्षयरोग को बढ़ावा देने में मदद की। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में क्षयरोग सबसे संक्रामक और जानलेवा बीमारी थी। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि श्रीमती स्क्लोडोवस्का रोग के संक्रमण के डर से अपने बच्चों को न छू सकती थीं न ही चूम सकती थीं। आमतौर पर बड़े बच्चे अपने छोटे भाई-बहनों का ख्याल रखते थे। मैरी जब छोटी थी तो उन्हें मां की कमी बहुत खलती थी क्योंकि उनकी मां उत्तरी फ्रांस जैसे गर्म प्रदेशों में रहने गई होती थीं। मैरी की मां को उम्मीद थी कि गर्म प्रदेशों में रहने से शायद उनकी बीमारी ठीक हो जाए। ब्रानीस्लावा जब घर में होती भी तो वह बच्चों के कमरे से दूर एक दूसरे कमरे में रहती थीं। मैरी की उम्र के बच्चे के लिए यह अत्यधिक हृदयविदारक था। वह मां के स्नेह और प्रेम से वंचित हो गई थी। तमाम महंगे इलाजों के बावजूद ब्रानीस्लावा इस रोग से लड़ नहीं सकीं और 1878 में उनका मात्र 42 साल की उम्र में देहांत हो गया। दो निकटसंबंधियों की मृत्यु स्क्लोडोवस्का परिवार के लिए एक बड़ा झटका थी इसलिए स्क्लोडोवस्का परिवार गहरे शोक में डूब गया। मैरी अवसादग्रस्त हो गई। उसने समझ लिया कि जिंदगी फूलों की सेज नहीं है। मां और बहन की मृत्यु ने मैरी को कैथोलिक धर्म से विरक्त कर दिया और वो अनीश्वरवादी बन गई।
मैरी का परिवार उत्तरी पोलैण्ड, जहां मैरी का घर था, पर रूसी कब्जे का कड़ा विरोध करता था। मैरी के पिता रूसी कब्जे के खिलाफ चलने वाले पोलिश प्रतिरोध आंदोलन में शामिल थे लेकिन सशस्त्र विद्रोह के विरोधी थे। वे परोक्ष विरोध के हिमायती थे। अपने समकालीन अन्य पोलिश विद्वानों की तरह मैरी के पिता भी शिक्षा की शक्ति में यकीन रखते थे। उनका मानना था कि एक शिक्षित समाज ही सामाजिक क्रांति ला सकता है। इस तरह के विचार को प्रत्यक्षवाद कहा जाता है। पोलिश प्रत्यक्षवादी मानते थे कि तर्क भावना से ज्यादा महत्वपूर्ण है। उनका मानना था कि यदि फिर से स्वतंत्रता प्राप्त करनी है तो इसे आधारभूत भौतिक सरंचनाओं के निर्माण और जनता के शिक्षण के माध्यम से धीरे-धीरे प्राप्त करना चाहिए। मैरी का परिवार कट्टर राष्ट्रवादी था और इस शैक्षणिक प्रतिरोध आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ था। रूसी हाकिमों की कड़ी निगरानी के बावजूद पोलिश शिक्षकों ने अपने बच्चों को पोलिश इतिहास और भाषा पढ़ाने का तरीका खोज लिया था। ऐसे कठिन हालात में भी मैरी को शिक्षा मिलती रही। कहना न होगा कि मैरी के लिए जिंदगी शुरू से ही एक जंग थी। जिसे उसने अंतत: जीत लिया।

”हमें यह जरूर मानना चाहिए कि हममें कुछ खास है और उस खास चीज को हमें हर हाल में प्राप्त करना चाहिए।’’
--- मैरी क्यूरी
अध्यापकों के परिवार से संबद्ध होने के कारण स्क्लोडोवस्का परिवार के लिए शिक्षा हमेशा एक महत्वपूर्ण चीज थी। मैरी की शिक्षा एक निजी व्याकरण स्कूल में शुरू हुई। दस साल की उम्र में उसका दाखिला एक पब्लिक स्कूल में कराया गया। इस स्कूल पर रूसियों का नियंत्रण था। स्कूल में बहुत-सी पाबंदियां थीं। छात्रों को केवल रूसी में बात करना होता था। पाठ्य-सामाग्री भी रूसी हितों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई थी। मैरी के पिता को उससे बहुत उम्मीद थी। मैरी ने भी अपने पिता की उम्मीदों पर खरा उतरने की पूरी कोशिश की। स्कूल में उसका प्रदर्शन उसके भाई-बहनों ब्रोयना, जोजेफ और हेलेना की तरह ही शानदार रहा। वह पढ़ाई का पूरा आनन्द लेती थी। रूसी में पढ़ाए जाने के बावजूद उसने सभी विषयों में अच्छी पकड़ बना ली थी।
उसकी कक्षा में पोलिश, रूसी और जर्मन लड़कियां थीं। स्कूल में काजिया प्रजिबोरोवस्का के रूप में मैरी को एक अच्छी दोस्त मिल गई थी। दोनों हमेशा एक साथ रहती थीं। तेरह साल की उम्र में मैरी द्वारा काजिया को लिखे एक पत्र में उसने अपने स्कूल प्रेम को स्वीकार किया था। मैरी ने पत्र में अपनी भावनाएं कुछ इस प्रकार व्यक्त कीं, ‘‘ जानती हो काजिया, सब कुछ होने के बावजूद मैं स्कूल को पसंद करती हूँ। हो सकता है कि तुम इसके लिए मेरा मजाक उड़ाओ लेकिन मैं तुम्हें बताना चाहूंगी कि मुझे स्कूल पसंद है, इतना ही नहीं मुझे उससे प्यार भी है।’’
उस समय पोलैण्ड में महिलाओं को शिक्षा देने पर पाबंदी थी। वारसा विश्वविद्यालय जैसे किसी भी पोलिश विश्वविद्यालय में महिलाओं के नामांकन की अनुमति नहीं थी। महिलाओं के लिए कोई रोजगार नहीं था। यदि कोई महिला रोजगार में जाने के लिए सोचे तो भी उसके पास उपलब्ध एकमात्र विकल्प स्कूल में अध्यापिका बनना था। लेकिन मैरी क्यूरी ने अपने लिए कुछ और सोच रखा था। और इस तरह आत्मविश्वास से भरी हुई मैरी जिंदगी में आगे बढ़ती गई।

‘‘मुझे पढ़ाया गया था कि आत्मिक विकास का रास्ता न तो आसान होता है न ही छोटा।‘‘
--- मैरी क्यूरी
क्यूरी अपने भाई-बहनों की तरह ही एक तेज और मेहनती लड़की के रूप में बड़ी हो रही थी। ब्रोनया को अपने स्कूल में स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ था। उसका भाई जोजेफ भी पीछे नहीं था। उसे भी स्कूल में स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ और वो चिकित्सा शास्त्र की पढ़ाई करने के लिए वारसा विश्वविद्यालय गया। क्योंकि महिलाएं वारसा विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ सकती थीं इसलिए ब्रोनया को घर पर रहकर अपने परिवार की देखभाल करनी पड़ रही थी। उसकी मां की मृत्यु के बाद घर में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जो घर को चला सके। ब्रोनया ने खुशी-खुशी अपने पिता, भाइयों और बहनों के देखभाल की जिम्मेदार अपने सिर पर ले ली। उधर मैरी भी स्कूल में अच्छा प्रदर्शन कर रही थी। वह अपने पिता की उम्मीदों पर खरा उतरती रही और उसे अपनी कक्षा के समापन भाषणकर्ता छात्रा के रूप में स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। स्कूल छोड़ते समय मैरी ने अपने सभी दोस्तों से हमेशा सम्पर्क में रहने का वादा किया। पोलैण्ड में महिला शिक्षा पर पाबंदी होने के कारण मैरी और उसकी बहन ब्रोनया उच्च शिक्षा के लिए पेरिस जाना चाहती थीं। पेरिस में बहुत से निर्वासित पोलिश रहते थे। लेकिन परिवार की आर्थिक हालत बद से बदतर होती जा रही थी। मैरी के पिता की अध्यापक की नौकरी चली गई थी। परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें अपने घर में और भी छात्रों को किराएदार रखना पड़ा था। मैरी के पिता आर्थिक दिक्कतों से उबरने के लिए अपने किराएदारों को घर में पढ़ाया करते थे। फिर भी जीवन की ये मुसीबतें इन लड़कियों का हौसला नहीं तोड़ सकीं। उन्होंने कभी भी भविष्य का स्वप्न देखना नहीं छोड़ा।
मैरी ने स्कूल में बहुत मेहनत की थी और इस कारण काफी थक गई थी। उसके पिता ने उसे और उसकी बहन हेलेना को छुट्टियों के लिए उनके एक संपन्न अंकल और आंटी के गांव भेजने का निर्णय लिया। मैरी के जीवन का यही एक मात्र समय ऐसा था जब वो कुछ कर नहीं रही थी और पूरी तरह जिंदगी का आनन्द ले रही थी। गांव में वो घूमने, नाव चलाने, मछली मारने, तैरने और घुड़सवारी करने जाती थी। अपनी पसंदीदा विज्ञान की किताबों की बजाय उपन्यास पढ़ती थी। सर्दियों के मौसम में वह बर्फ से ढके गांव में स्लेज चलाती थी। अपने चचेरे भाई-बहनों और दोस्तों के साथ नाचती-गाती और खुशियां मनाती थी। मैरी ताउम्र इस बात को याद करती रही थी कि किस तरह वो संत लुई के रात्रि नृत्य में अपने नए जूते पहन कर रात भर नाचती रही थी। ये सारे अनुभव नौजवान मैरी के लिए जादुई थे जिन्हें उसने आजीवन संभाल कर रखा। मैरी ने अपनी सबसे अच्छी मित्र काजिया को लिखा, ‘‘मुझे विश्वास ही नहीं होता कि ज्यामिति या बीजगणित जैसी कोई चीज कभी थी, मैं उन्हें पूरी तरह भूल चुकी हूँ।‘‘

‘‘पहला सिद्धांत : किसी भी व्यक्ति या घटना को यह इजाजत मत दो कि वो तुम्हें नीचा दिखा सके।‘‘
--- मैरी क्यूरी
मैरी का अच्छा समय जल्द बीत गया और वो अपनी तल्ख जिंदगी में फिर से वापस आ गई। उसके परिवार की आर्थिक हालत बहुत खराब थी। परिवार की सहायता के लिए वो अमीरों के बच्चों को घर जाकर ट्यूशन पढ़ाने लगी। ज्ञान की उसके अंदर तीव्र प्यास थी। ट्यूशन पढ़ाने के साथ ही मैरी और उसकी बहन ब्रोनया जैडविगा सजैसिंस्का डाविडोवा के चलते-फिरते विश्वविद्यालय में शामिल हो गईं। 1882 में शुरू हुआ यह विश्वविद्यालय एक रात्रिकालीन गैर-कानूनी विश्वविद्यालय था। इसमें ऐसे लोग खासकर महिलाएं पढ़ती थीं जो विश्वविद्यालयी शिक्षा प्राप्त करने की इच्छुक तो थीं लेकिन इसके लिए विदेश जाने में सक्षम नहीं थीं। इस विश्वविद्यालय को चलता-फिरता विश्वविद्यालय इसलिए कहा जाता था कि रूसी अधिकारियों के डर से इसकी कक्षाओं की जगह बदलती रहती थी। इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को शिक्षा देना मात्र नहीं था बल्कि इसके माध्यम से पोलैण्ड के स्वतंत्रता के लिए अनुकूल परिवेश बनाना भी था। इस विश्वविद्यालय की तुलना यूरोप के विकसित विश्वविद्यालयों से तो नहीं की जा सकती लेकिन इसने मैरी को इतना दिशानिर्देशित जरूर किया कि वो विज्ञान की दुनिया में अपनी जगह बना सके। विश्वविद्यालय की कक्षाएं लोगों के घरों में गुप्त रूप से चलती थीं। इसमें पढ़ाने वाले अध्यापक जाने-माने इतिहासकार, दार्शनिक और वैज्ञानिक थे। मैरी उद्योग एवं कृषि संग्रहालय में चलने वाली विज्ञान की कक्षाओं में चुपके से जाती थी। वो सप्ताहांत में रसायन और भौतिकी के प्रयोग करती थी। इस तरह मैरी की उसके पहले प्यार यानी विज्ञान-अध्ययन की यात्रा शुरू हुई।

मैरी का भाई जोजेफ चिकित्सक के रूप में अपना प्रशिक्षण अच्छी तरह पूरा कर रहा था। उसकी बहन हेलेना अभी भी यह निर्णय नहीं ले पाई थी कि वो अध्यापिका बनेगी या गायिका। वह इन दोनों कामों में प्रवीण थी। जहां तक ब्रोनया की बात है तो वो चार सालों तक घरेलू कामों में ही उलझी रही और अपना भविष्य बनाने के बारे में कुछ नहीं सोच सकी। वह चाहती थी कि वह पेरिस जाकर चिकित्सा विज्ञान पढ़े और फिर पोलैण्ड वापस आकर चिकित्सक के रूप में काम करे। लेकिन उनके परिवार के पास इतने संसाधन नहीं थे कि वो अपनी इच्छा पूरी कर पाती। मैरी अपनी बहन ब्रोनया के बहुत करीब थी और चाहती थी कि ब्रोनया का सपना पूरा हो। उसने एक योजना बनाई जिससे उन दोनों की इच्छा पूरी हो सकती थी। मैरी ने निर्णय लिया कि पहले वो घरेलू शिक्षिका के रूप में काम करे और ब्रोनया की पेरिस की पढ़ाई का खर्च वहन करे। उसके बाद जब ब्रोनया चिकित्सा संस्थान से स्नातक हो जाएगी तो वो मैरी के सोर्बन विश्वविद्यालय, पेरिस में विज्ञान अध्ययन का खर्च वहन कर लेगी।

‘‘एक वक्त था कि जिंदगी बहुत कठिन थी और एक ही चीज है जो उन दिनों की याद को कम पीड़ादायक बनाती है कि सब कुछ होने के बावजूद भी मैंने उन दिनों को पूरी ईमानदारी और सम्मान के साथ गुजारा।’’
--- मैरी क्यूरी
मैरी अमीर परिवार के बच्चों को पढ़ा रही थी लेकिन वो ब्रोनया की शिक्षा का खर्च नहीं जुटा पा रही थी। तब उसने वारसा से 150 किमी दूर रहने वाले एक कृषिविद् के घर पर घरेलू शिक्षिका की नौकरी करने का निर्णय लिया। अपनी इच्छाओं का त्याग कर अपनी बहन के लिए जब उसने शिक्षिका की नौकरी की तो उस वक्त मैरी की उम्र मात्र 18 साल थी। मैरी के नियोक्ता का एक शकरकंद से गुड़ बनाने का कारखाना था। उसने मैरी को खाली समय में अपने कारखाने के खेतिहर मजदूरों के अनपढ़ बच्चों को पढ़ाने की अनुमति दे दी। मैरी क्यूरी स्वभाव से मानवसेवी थी। वो केवल अपने विकास के बारे में ही नहीं बल्कि समूची मानवता के विकास के बारे में सोचती थी। इसी नेक मंशा के तहत वह अपने नियोक्ता की बड़ी बेटी ब्रोनका के साथ मिलकर खेतिहर मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने लगी। घर से इतनी दूर काम करने के कारण उसे घर की बहुत याद आती थी लेकिन अपना वादा निभाने के लिए वह लगातार काम करती रही।

‘‘मेरी मां हमेशा कहती थीं कि जिंदगी में किसी काम को चुनकर उसे गंभीरतापूर्वक करो, पूरी तरह आत्मनिर्भर बनो और अपना जीवन केवल मौज-मस्ती में मत गुजार दो लेकिन उसने कभी भी यह नहीं कहा बस विज्ञान ही एकमात्र ऐसा कॅरियर है जिसे अपनाया जा सकता है।’’
--- आइरीन जोलिएट-क्यूरी
मैरी का नियोक्ता परिवार उसके साथ अच्छा व्यवहार करता था और उसे भी बच्चों के संग काम करने में मजा आता था। इसी बीच कृषिविद् का बेटा काजीमिएर्ज छुटि्टयों में घर आया। वह वारसा विश्वविद्यालय में पढ़ता था। नौजवान और प्रतिभाशाली शिक्षिका को देखते ही वह उसे प्यार करने लगा। मैरी को भी उससे प्यार हो गया। उन्होंने सगाई कर ली और शादी करने की सोचने लगे लेकिन काजीमिएर्ज परिवार एक दरिद्र लड़की से अपने बेटे की शादी नहीं करना चाहता था। काजीमिएर्ज अपने पिता की आज्ञा के सामने झुक गया और उसने सगाई तोड़ दी। मैरी के लिए यह एक बड़ा झटका था। उसका दिल पूरी तरह टूट गया। लाख चाहने के बावजूद अपने परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण वह यह नौकरी छोड़ भी नहीं सकती थी। उसे हर हाल में ब्रोनया की सहायता करनी थी। अपने सभी गिले- शिकवे भुलाकर वह काम करती रही। अपने अकेलेपन से उबरने के लिए उसने अपना ध्यान स्वाध्याय पर लगाया और गणित के उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम में प्रवेश ले लिया। उसे जल्द ही एहसास हो गया कि उसकी रुचि गणित और भौतिक विज्ञान में है। उसने शकरकंद के कारखाने में रसायन विज्ञान की कक्षाओं में जाना शुरू कर दिया। वह वहां पर अगले दो साल तक काम करती रही। अपने दुखों को सहलाती रही लेकिन उसे यह अंदाजा नहीं था कि यही दर्द भविष्य में उसके लिए वरदान साबित होंगे।
जिंदगी के दुखों और मजबूरियों ने मैरी को कमजोर नहीं किया था लेकिन यह तय है कि वह पेरिस जाने की उम्मीद छोड़ चुकी थी। व्लादिस्लाव स्क्लोडोवस्का 1888 में सेवानिवृत्त हो गए। लेकिन वे घर पर खाली नहीं बैठे। उन्होंने सुधार विद्यालय में नौकरी कर ली और उसके निदेशक बन गए। इस नौकरी में अच्छी तनख्वाह मिलती थी और दूसरी तरफ उनकी पेंशन भी जारी थी। अब वो अपने परिवार का खर्च चलाने के साथ-साथ पेरिस में पढ़ रही ब्रोनया को भी पैसे भेज सकते थे। मैरी ब्रोनया को जो पैसे भेजती रही थी उनकी पूर्ति के लिए उन्होंने मैरी की खातिर कुछ पैसे अलग से रख लिए।
1890 में ब्रोनया ने अपनी चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई पूरी कर ली। अब वह पूर्णत: डाक्टर बन चुकी थी। और इसके साथ ही उसने एक अन्य डाक्टर काजीमिएर्ज डुल्सकी से शादी भी कर ली। ब्रोनया अब अपनी छोटी बहन के सपने को पूरा करने में उसकी मदद कर सकती थी। उसने मैरी को पेरिस बुलाया। यद्यपि मैरी अभी भी अपने पहले प्यार के दुख से उबर नहीं सकी थी। उसे लगता था कि यदि वो पोलैण्ड में रही तो उसका पहला प्यार शायद उसे वापस मिल जाए। वह अपने प्रिय काजीमिएर्ज के सम्पर्क में बनी रही। उसने उसके प्यार को जिंदा रखा। इसके अलावा वह अपने परिवार के लिए भी बहुत जिम्मेदारी महसूस करती थी। उसे लगता था कि उन्हें उसकी सहायता और सहारे की जरूरत है। इस प्रकार मैरी ने अपनी बहन के बुलावे पर पेरिस जाने और अपने सपनों की तरफ पहला कदम बढ़ाने का अवसर खो दिया।

“‘‘यह बताना संभव नहीं है कि मुझे इन सालों में क्या-क्या अच्छी चीजें मिली। किसी भी बाहरी व्यवधान से दूर रहकर मैं पूरी तरह सीखने और पढ़ने में तल्लीन थी।‘‘
--- मैरी क्यूरी
मैरी को जब दूसरा अवसर मिला तो वो वारसा ही में थी। उसे अपने चलते-फिरते विश्वविद्यालय के दोस्त और उनके साथ एक गुप्त प्रयोगशाला में अध्ययन करने का अवसर भी मिला। यह प्रयोगशाला रूसी अधिकारियों से छुपा कर चलती थी। दिन के समय यह प्रयोगशाला एक संग्रहालय के रूप में काम करती थी। रात के समय यह एक प्रयोगशाला बन जाती थी जिसमें पोलिश नौजवान प्रायोगिक विज्ञान पढ़ते थे। अभी तक मैरी ने वैज्ञानिक प्रयोगों के बारे में केवल पढ़ा था। अब वह प्रयोग कर सकती थी। प्रयोगों को लेकर वह बेहद रोमांचित थी। उसे पता चल चुका था कि उसे अपने जीवन में क्या करना है। वह जान चुकी थी कि उसका जन्म वैज्ञानिक बनने के लिए हुआ है।
उधर काजीमिएर्ज के परिवार के मना करने के बावजूद भी मैरी उससे सम्पर्क में रही। 1891 में वे पहाड़ों पर साथ-साथ छुट्टी मनाने गए। जब मैरी को एहसास हुआ कि काजीमिएर्ज के साथ उसका संबंध किसी भी मुकाम तक नहीं पहुंचने वाला है तब उसकी उम्र 24 वर्ष हो चुकी थी। वह जान चुकी थी कि वह कभी भी उससे शादी नहीं करेगा और वह उससे ऐसी उम्मीद करके अपना समय बर्बाद कर रही है। अंतत: पहाड़ से घर लौटते ही उसने काजीमिएर्ज से अपना संबंध खत्म कर दिया और ब्रोनया को खत लिखा कि वह पेरिस आ रही है।
‘‘ब्रोनया..... अच्छी तरह निर्णय करके बताओ कि क्या तुम सचमुच मुझे अपने घर में रख सकोगी क्योंकि अब मैं आने के लिए तैयार हूँ। मेरे पास अपने खर्च भर के पैसे हैं....तुम मुझे कहीं भी जगह दे सकती हो....मैं वादा करती हूँ कि तुम्हें बोर नहीं करूंगी, न ही कोई गड़बड़ी करूंगी। मुझे तुम्हारे जवाब का इंतजार है...’’
मैरी को पता था कि विज्ञान ही उसकी असल खुशी है और वह पेरिस के लिए चल पड़ी। उसे इसका जरा भी अंदाजा नहीं था कि नियति ने उसके लिए कैसी शानदार चीजें तय कर रखी हैं। उसे यह उम्मीद भी नहीं थी कि अब वह फिर कभी पोलैण्ड में आकर नहीं रहेगी।

दो दिन की थका देने वाली यात्रा के बाद मैरी 1891 में पेरिस पहुंची। उसने पेरिस के प्रसिद्ध सोर्बन विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय में अपने पोलिश नाम मारया की जगह अपने नाम के फ्रांसीसी प्रतिरूप मैरी के साथ नामांकन कराया। उस समय विश्वविद्यालय में विज्ञान के 1,825 छात्रों में मात्र 23 लड़कियां थीं जिनमें से मैरी एक थी। उसके एकांतप्रिय स्वभाव के कारण उसके साथ के छात्र उसका नाम भी नहीं जानते थे। मैरी अपनी शिक्षा के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया। वह लोकाचार से दूर ही रहती थी। पहले-पहल मैरी अपनी बहन ब्रोनया और जीजा काजीमिएर्ज के साथ उनके छोटे से अपार्टमेंट में रहती थी। बस द्वारा बहन के घर से विश्वविद्यालय की दूरी करीब एक घण्टे की थी। दोनों बहनें कामकाजी थीं और बहुत ही व्यस्त रहती थीं। ब्रोनया और उसका पति अपने अपार्टमेंट में ही अपनी क्लीनिक चलाते थे। काजीमिएर्ज एक पोलिश राजनीतिक कार्यकर्ता भी था। वह अपने साथियों को राजनीतिक चर्चाओं के लिए अपने घर बुलाता था। मैरी के पिता को महसूस हुआ कि इस घर का माहौल मैरी की शिक्षा के लिए उचित नहीं है। हालांकि मैरी को ब्रोनया के यहां रहना पंसद था फिर भी उसे विश्वविद्यालय के पास स्थित एक छोटे से कमरे में रहने जाना पड़ा।

“ ‘‘आह ! कितनी निर्दयता से नौजवान गुजरते थे
उसके आसपास से, ताजा भावों से भरे हुए
दूसरे नौजवान क्षणिक सुखों की तलाश में रहते थे !
और फिर अपने ही एकांत में
वह रही, अज्ञात और कृपापात्र
अपने कोठरी में मिलता था उसे स्नेह
जिससे भर जाता था उसका हृदय
लेकिन कृपा का समय भूल गया
उसे छोड़ना ही होगा विज्ञान की भूमि
बाहर निकल कर
अपनी रोटी के लिए
जिंदगी की धूसर सड़क परt
उसके बाद से कई-कई बार, उसकी क्लांत आत्मा
लौटी उसी छत के नीचे
अपने दिल के सबसे प्यारे कोने में
जहां उस शांत श्रम बसा था
और जहां स्मृतियों का संसार विश्राम कर रहा था‘‘
---मैरी क्यूरी
मैरी का छठवें तल्ले पर स्थित अपार्टमेंट पेरिस के लेफ्ट बैंक स्थित लैटिन क्वार्टर में था। यह जगह विश्वविद्यालय से पास थी इसलिए बहुत से छात्र और कलाकार यहां रहना पंसद करते थे। मैरी का जीवन बहुत कठिन था लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी थी। उसके पास शायद ही कभी पर्याप्त पैसे होते थे। जरूरत के सामान की भी कमी रहती थी। सर्दियों में अपने आप को गरम रखने के लिए उसके पास कोई साधन नहीं था। उसे साधारण भोजन पकाने भी नहीं आता था। एक बार तो वह भूख से बेहोश हो गई क्योंकि अपनी पढ़ाई के चक्कर में वह कई दिनों तक खाना खाना ही भूल गई थी। ब्रोनया और काजीमिएर्ज ने एक हफ्ते तक उसकी सेवा की। उसको खिलाया-पिलाया। उसे आराम करने दिया। उसके बाद वह फिर से अपने छोटे से अपार्टमेंट में वापस आ गई और अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई।
पेरिस में वह बहुत खुश थी क्योंकि यहां वह पूरी आजादी से रह सकती थी और बिना किसी भय के पढ़ सकती थी। उसके अध्यापक बहुत ही विद्वान थे। उसका विश्वविद्यालय विश्वविख्यात था। मैरी बहुत ही खुशकिस्मत थी कि वह बिल्कुल सही समय में एकदम सही जगह पर थी। विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला अत्याधुनिक थी। पब्लिक लेक्चर और प्रदर्शनों के लिए विश्वविद्यालय में नया एम्फीथियेटर बना था। मैरी ने 1893 की गर्मियों में भौतिकी में अपनी परास्नातक की शिक्षा पूरी कर ली। तीक्ष्णबुद्धि मैरी ने अब तक धाराप्रवाह फ्रेंच सीख ली थी। वह किसी स्थानीय निवासी जैसा फ्रेंच बोल लेती थी। प्रथम वर्ष की परीक्षा में उसने सर्वोच्च स्थान हासिल किया था। इस परीक्षा के बाद वह तीन महीने के लिए छुटि्टयां मनाने गई और ज्यादा खुश तथा स्वस्थ होकर लौटी। हालांकि विश्वविद्यालय के काम के दबाव में उसने फिर से अपने स्वास्थ्य की अनदेखी शुरू कर दी।
1893 में उसकी आर्थिक स्थिति फिर से बहुत खराब हो गई। उसका अकादमिक भविष्य खतरे में दिखाई देने लगा। वह अपनी भौतिकी की पढ़ाई से संतुष्ट नहीं थी। वह गणित में भी परास्नातक करना चाहती थी लेकिन उसके लिए उसके पास पैसे नहीं थे। एक बार उसने एक पत्र में लिखा :
‘‘मेरे पास सचमुच ही एक पैसा भी नहीं है - एक भी नहीं ! हो सकता है कि मैं अगली छुटि्टयों तक फिर तुम्हें कोई खत न लिख सकूं बशर्ते कि संयोगवश मुझे कहीं से स्टैम्प न मिल जाएं।‘‘
सौभाग्यवश मैरी की प्रतिभा को फ्रेंच वैज्ञानिकों ने पहचान लिया। उन्होंने उसके लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था कर दी जो अत्यधिक प्रतिभाशाली पोलिश छात्रों को मिलती थी। दि सोसाइटी फॉर दि इनकरेजमेंट ऑफ नेशनल इण्डस्ट्री ने उसे एक अध्ययन के लिए चयनित किया। इस अध्ययन में उसे विभिन्न स्टीलों के चुम्बकीय गुणों का अध्ययन करना था। इस अध्ययन के लिए उसे प्रयोगशाला की जरूरत थी। उसने एक अतिथि पोलिश प्रोफेसर से कुछ सहायता मांगी। इसी प्रोफेसर की सहायता से फ्रेंच भौतिकविद् पियरे क्यूरी से चाय पर उसकी मुलाकात हुई। प्रोफेसर को उम्मीद थी कि पियरे क्यूरी मैरी की कुछ सहायता कर सकेंगे।

‘‘वह मुझसे बहुत छोटे लग रहे थे, हालांकि उस वक्त उनकी उम्र 35 साल थी। मैं उनकी तीखी नजर और अपनी उच्च ख्याति के प्रति बेपरवाह रहने की शैली से हतप्रभ रह गई....उनकी मुस्कान, जो एक साथ ही गंभीर भी थी और उद्दीप्त भी, ने मेरे अंदर आत्मविश्वास भर दिया।
--- मैरी क्यूरी (पियरे से पहली बार मिलने के अनुभव के बारे में))
पियरे क्यूरी एक 35 वर्षीय भौतिकविद थे। उनका जन्म 15 मई, 1859 को हुआ था। वह मैरी ही की तरह एक आपस में घनिष्ठता से जुड़े और परस्पर मददगार परिवार से आते थे। उनका एक बड़ा भाई जैक था। जैक भी वैज्ञानिक था। उनके पिता और दादा दोनों ही डाक्टर थे। उनके पिता बुद्धिमान व्यक्ति थे। उन्होंने यह महसूस कर लिया कि पियरे साधारण स्कूलों में पढ़ने के लिए नहीं बना है। उन्होंने पियरे को घर पर ही शिक्षा देनी शुरू की। पियरे को अपने तरीके से पढ़ने की छूट थी। उसका बचपन बहुत ही खुशगवार बीता। उसकी मां एक कुशल गृहणी थी। वह पूरे घर का माहौल जीवंत बनाए रखती थी। पियरे पेरिस के म्यूनसिपल स्कूल ऑफ इण्डस्ट्रियल फिजिक्स एण्ड केमिस्ट्री के प्रयोगशाला प्रमुख थे। पियरे और उनके भाई जैक ने कई वर्षों तक एक साथ काम किया। उन्होंने पिएजोइलक्टी्रसिटी की खोज की थी।
पोलिश प्रोफेसर ने अपने अपार्टमेंट में मैरी की पियरे से मुलाकात कराई। इस मुलाकात ने सिर्फ उन दोनों की निजी जिंदगी ही नहीं बल्कि विज्ञान की भी दिशा बदल दी। इस मुलाकात के समय पियरे एक सफल वैज्ञानिक तो थे लेकिन निर्धन थे। वो अविवाहित थे और विज्ञान के लिए पूरी तरह से समर्पित थे। भौतिकी से भटकाने वाले किसी भी चीज को वो मुसीबत समझते थे। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था : ‘‘विरले ही कोई महिला जीनियस होती है...’’ अपने नियमित जीवन में एक ही भटकाव उन्हें पसंद था। वो था उत्तरी-पूर्वी फ्रांस के ग्रामीण इलाकों में घूमना। वो छुटि्टयों में इस इलाके में टहलना और साइकिल चलाना पसंद करते थे।
इधर मैरी की खुशनसीबी थी कि वो म्यूनिसिपल स्कूल में एक छोटी-सी जगह पाने में कामयाब रही। मैरी और पियरे भौतिकी के प्रति अपने प्रेम के कारण पहली ही मुलाकात में एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो गए। पियरे मैरी से आठ साल बड़े थे। कई मुलाकातों के बाद उन्होंने उससे अपने प्रेम का इजहार किया। पियरे करीब 15 साल पहले अपनी एक घनिष्ठ महिला मित्र को खो चुके थे। हालांकि उसके बाद वो कई महिलाओं से मिले लेकिन कोई भी महिला उनके भौतिकी प्रेम में साझीदार नहीं बन सकी। मैरी एक अपवाद थी और उन दोनों में बहुत-सी बातें समान थीं, हालांकि कुछ बातें अलग भी थीं। पियरे ने स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी थी जबकि मैरी स्कूल की टॉपर थी। पियरे अपनी पीएचडी पूरी नहीं कर सके थे जबकि मैरी अपने विश्वविद्यालय की शिक्षा को लेकर बहुत गंभीर थी। मैरी से हुई मुलाकात ने पियरे के जीवन में सकारात्मक बदलाव किए। उन्होंने अपना पीएचडी का शोध प्रबंध पूरा कर लिया। उन्हें डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त हो गई। फलस्वरूप उन्हें प्रोफेसर के सम्मानित पद पर प्रोन्नत कर दिया गया। उन्होंने अपने बनाए कई डिजाइनों की रॉयल्टी के अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए। और अपनी प्रेमिका मैरी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।
मैरी ने पियरे के साथ अपने संबंध के बारे में विचार करने और उसे जवाब देने में एक साल लगाया। उसे लगता था कि पियरे से शादी करने के बाद उसकी स्वतंत्रता छिन जाएगी यानी उसे खाने-पीने और साफ-सफाई में व्यस्त रहना होगा। इसके अलावा उसे यह डर भी था कि यदि वो पियरे से शादी करती है तो उसे अपनी मातृभूमि पोलैण्ड को हमेशा के लिए छोड़ना होगा जो कि उसे बहुत ही प्रिय थी। पियरे समझौते करने को तैयार था। वह मैरी के साथ पोलैण्ड में बसने के लिए भी तैयार था। अंतत: मैरी ने महसूस किया कि उन्हें नियति ने मिलाया है और वो एक-दूजे के लिए ही बने हैं क्योंकि दोनों ही प्रत्यक्षवादी राजनीतिक और वैज्ञानिक दृष्टि रखते थे। 26 जुलाई, 1895 को वे पेरिस में एक सादे समारोह में पति-पत्नी बन गए। इस विवाह में कोई धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं हुआ था क्योंकि अपनी मां की मृत्यु के बाद मैरी नास्तिक हो गई थी और पियरे के अभिभावक भी एक निष्क्रिय प्रोटेस्टेंट थे। दोनों ने एक दूसरे को अंगूठी भी नहीं पहनाई। मैरी ने शादी के लिए शादी का सफेद जोड़ा नहीं सिलवाया। उसने एक गहरी नीली पोशाक पहन रखी थी जिसे पहनकर वो अगले कई सालों तक प्रयोगशाला जाती रही। वह पैसे की कीमत जानती थी इसलिए कभी भी फिजूलखर्ची नहीं करती थी। शादी की पोशाक के बारे में उसने कहा : ‘‘मेरे पास एक ही कपड़ा है जिसे मैं रोज पहनती हूँ। यदि तुम उदारतावश मुझे कोई पोशाक देने वाले हो तो कृपया कोई गाढ़े रंग वाला उपयोगी वस्त्र देना ताकि शादी के बाद मैं उसे पहनकर प्रयोगशाला जा सकूं।‘‘ शादी के बाद यह जोड़ा एक विचित्र हनीमून पर गया। उन्होंने शादी पर तोहफों के रूप में मिले पैसों से फ्रांस के देहाती इलाकों की सैर करने के लिए साइकिल खरीद ली।

‘‘मुझसे अक्सर पूछा जाता रहा है, खासतौर पर महिलाओं द्वारा कि मैं वैज्ञानिक कॅरियर के साथ परिवार का तालमेल कैसे बिठा सकी। खैर, यह आसान नहीं था।‘‘
---मैरी क्यूरी
वैज्ञानिक झुकाव वाली मैरी के लिए शादीशुदा जीवन एक चुनौती था। मैरी और पियरे जिस घर में रहते थे वो मात्र तीन कमरों वाला छोटा-सा फ्लैट था फिर भी मैरी के लिए इस घर को संभालना आसान नहीं था। उसने स्टील के चुम्बकीय गुणों पर अपना शोध जारी रखा। उसे शोध का काम घर संभालने से ज्यादा आसान लगता था। यह सच है कि मैरी जो भी काम करती थी उसे पूरी क्षमता से करने की कोशिश करती थी। एक पत्नी के रूप में वह पियरे के लिए पोषक और सम्पूर्ण भोजन बनाने का प्रयास करती थी लेकिन खाना बनाना उसके लिए एक जटिल कार्य था। वह खाने बनाते वक्त रेसिपी बुक में नोट्स ले लेती थी ताकि गलती न हो लेकिन फिर भी शोध कार्य से ज्यादा कठिन उसे खाना बनाना लगता था।
1897 की गर्मियों में मैरी ने सोसाइटी फॉर इनकरेजमेंट ऑफ नेशनल इण्डस्ट्री के सामने अपना शोध परिणाम प्रस्तुत किया। इसके बदले में सोसाइटी ने उन्हें पैसे भी दिए। पैसे आने के बाद मैरी ने उसे चार साल पहले मिली छात्रवृत्ति का पैसा चुका दिया। हालांकि उसे यह धन चुकाने की जरूरत नहीं थी लेकिन उसने सोचा कि उस पैसे से किसी अन्य जरूरतमंद प्रतिभाशाली पोलिश छात्र को अपने सपने पूरा करने में सहायता मिलेगी। इस प्रकार मैरी की मानवता की सेवा और विज्ञान की पढ़ाई शादी के बाद भी जारी रही। सितम्बर, 1897 में मैरी ने अपने पहले शिशु आइरीन को जन्म दिया। मैरी की सास का स्तन कैंसर के कारण निधन हो गया था इसलिए उसके ससुर अपने दूसरे बेटे, बहू और पोती के साथ रहने के लिए आ गए। उनका घर में होना मैरी की खुशकिस्मती थी क्योंकि अब वो निश्चिंत होकर अपना काम कर सकती थी। उसकी बेटी की देखभाल के लिए एक विश्वसनीय आदमी हमेशा उपलब्ध था। अपनी बेटी को परिचारिका के साथ छोड़ना मैरी को बहुत खराब लगता था। पियरे के पिता के आने से पहले तक वह बच्ची की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए घर और प्रयोगशाला एक किए रहती थी। उसे इत्मीनान हो गया था कि आइरीन के दादा उसका ख्याल रख रहे हैं। उसे उचित शिक्षा दे रहें हैं। अब मैरी आराम से अपने काम पर ध्यान लगा सकती थी।

‘‘मैं कभी भी यह नहीं देखती कि मैंने क्या कर लिया है, मैं तो बस उसे देखती हूँ जिसे करना बाकी है।‘‘
---मैरी क्यूरी (अपने भाई को लिखे एक पत्र में)
जब मैरी क्यूरी अपने परिवार और शोध कार्य के बीच संतुलन बनाने में व्यस्त थीं तब पूरी दुनिया में ढेर सारी खोजें हो रही थीं। फ्रांसीसी भौतिकविद् अंटोइन-हेनरी बैकेरल ने विकिरण के बारे में अत्यंत महत्वपूर्ण खोज की थी। 24 फरवरी, 1896 को वह पहला व्यक्ति बन गया जिसने यूरेनियम की रेडियोधर्मिता का पता लगाया और सुझाव दिया कि यूरेनियम यौगिक से कुछ खास तरह का विकिरण होता है। वैज्ञानिक समुदाय की रुचि बैकेरल की किरणों की बनिस्बत रांटजन (जर्मन भौतिकविद्) के एक्स-किरणों में ज्यादा थी। लेकिन मैरी को बैकेरल की खोज में ज्यादा दिलचस्पी थी। क्योंकि यह खोज ताजा थी इसलिए इस क्षेत्र में शोध करने के अपार अवसर थे। मैरी ने इसे अपनी शोध उपाधि के शोध विषय के रूप में चुना। सौभाग्यवश पेरिस म्यूनिसिपल स्कूल ऑफ इण्डस्ट्रीअल फिजिक्स एण्ड केमिस्ट्री, जहां पर पियरे प्रोफेसर थे, के निदेशक ने मैरी को एक सीलन और सामान से भरा स्टोररूम़ प्रयोगशाला के रूप में प्रयोग करने के लिए दे दिया। मैरी इस कमरे के माहौल और आकार से बेपरवाह प्रयोग के लिए कमरा पाकर बहुत ही खुश थी। एक बार उसने कहा भी था, ‘‘ मैं उन लोगों में से हूँ जिन्हें विज्ञान में अभूतपूर्व सौंदर्य नजर आता है। प्रयोगशाला में काम करने वाला वैज्ञानिक एक टेकनीशियन मात्र नहीं होता बल्कि वह उस बच्चे की तरह होता है जिसे प्राकृतिक अवधारणाएं एक परी कथा की तरह प्रभावित करती हैं।’’
मैरी के जीवन के अगले कई वर्ष इसी छोटी-सी अंधेरी, अवसादभरी, सीलन वाली प्रयोगशाला में गुजरे। वह पियरे के साथ मिलकर रेडियोधर्मी पदार्थों पर अथक शोध कर रही थी। मैरी की इस कामचलाऊ प्रयोगशाला की स्थिति बहुत खराब थी। प्रयोगशाला को व्यवस्थित रखने के लिए वह बहुत श्रम करती थी। उसकी प्रयोगशाला में एक आयनाइजेशन चैम्बर, एक इलेक्ट्रोमीटर और पिएजोइलेक्ट्रिक क्वार्ट्ज जैसे साधारण उपकरण थे। यह ज्ञात था कि पिचब्लेंड अयस्क का गुणधर्म यूरेनियम के समान होता है। अत: क्यूरी दम्पति ने इस अयस्क को प्रयोग के लिए चुना। उस वक्त मैरी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उसे पता चला कि इस अयस्क में एक ऐसा पदार्थ है जिसमें शुद्ध यूरेनियम से भी ज्यादा विकिरण है। इस प्रयोग से यह स्पष्ट हुआ कि यह अभिक्रिया यूरेनियम मात्र के साथ नहीं होती और इस अभिक्रिया के स्वतंत्र नामकरण की जरूरत है। मैरी क्यूरी ने इस अभिक्रिया को रेडियोधर्मिता नाम दिया। मैरी ने अपनी बहन ब्रोनया को भेजे पत्र में इस खोज के बारे में लिखा, ‘‘ विकिरण, जिसकी मैं व्याख्या नहीं कर सकती, एक नए रासायनिक पदार्थ से निकलता है। यह पदार्थ यहीं है और मुझे इसे खोजना है। मुझे पूरा यकीन है ! मुझे पूरा भरोसा है कि मैं गलत नहीं हूँ।‘‘
इस नए पदार्थ को पृथक करने में अत्यधिक श्रम लगा और अंतत: 1898 में उन्हें इसमें कामयाबी मिल ही गई। उन्होंने इस नए पदार्थ का नाम मैरी की अतिप्रिय मातृभूमि पोलैण्ड के नाम पर पोलोनियम रखा। यद्यपि पोलोनियम की खोज बहुत ही महत्वपूर्ण थी फिर भी मैरी इतने से संतुष्ट नहीं थी। उन्हें अपने शोध के बाद इस बात पूरा विश्वास था कि पिचब्लेंड में कोई और भी पदार्थ है जो यूरेनियम से हजार गुना ज्यादा रेडियोधर्मी है। मुश्किल यह थी कि यह पदार्थ इतनी कम मात्रा में था कि इसे खोजना अत्यंत कठिन था। मैरी ने इस पदार्थ का नाम रेडियम रखा। यह पदार्थ दूसरे पदार्थों से ज्यादा स्थायी, ज्यादा रेडियोधर्मी और ज्यादा उपयोगी था। अत: 1898 का साल मैरी और पियरे क्यूरी के लिए बहुत ही खास था। इसी साल उन्होंने दो नए रेडियोधर्मी पदार्थों की खोज की जिनसे समूची मानवता को लाभ हुआ। क्यूरी दंपति द्वारा लिखे गए शोध-पत्र से पता चलता है कि यह उनका सम्मिलित प्रयास था। यद्यपि वे दोनों अलग-अलग नोटबुक का प्रयोग करते थे लेकिन दोनों अपनी-अपनी नोटबुक में प्रयोग के निष्कर्षों के बारे में ‘मैंने पाया’ या ‘मैंने देखा’ की जगह ‘हमने पाया’ या ‘हमने देखा’ लिखते थे। इसलिए यह कभी नहीं पता चला कि इन प्रयोगों में किसने क्या किया था। मैरी के शब्दों में, ‘‘बैकेरल किरणों के उत्सर्जन के लिहाज से कुछ खनिज अत्यधिक सक्रिय थे। इससे पहले के एक संवाद में हममें से एक ने यह दिखाया कि इन पदार्थों की सक्रियता यूरेनियम या थोरियम से भी ज्यादा थी।‘‘ यह जानना किसी के लिए संभव नहीं है कि मैरी और पियरे में से किसने यह निष्कर्ष निकाला था और स्पष्ट है कि मैरी की मंशा भी यही थी कि कोई कभी भी यह नहीं जान पाए।

‘‘कई वैज्ञानिक परपीड़क होते हैं। वे सत्य की खोज करने के बजाय गलती निकालने के लिए उतावले रहते हैं।’’
---मैरी क्यूरी
वैज्ञानिक समुदाय के सामने इन दो नए पदार्थों का अस्तित्व साबित करने के लिए मैरी और पियरे क्यूरी को बहुत संघर्ष करना पड़ा। विश्वविद्यालय के कई साथी वैज्ञानिकों ने उन पर यकीन नहीं किया। रेडियम और पोलियम की उपस्थिति को प्रमाणित करने के लिए मैरी ने इन विशुद्ध पदार्थों को पृथक करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्हें कई टन अयस्क की जरूरत थी। जिसे खरीदना उनके वश की बात नहीं थी। अंतत: उनके जीवन भर की बचत अवशिष्ट अयस्क खरीदने में खर्च हो गई। मैरी आस्ट्रिया सरकार द्वारा बोहेमिया से लाए जा रहे कई टन औद्योगिक अवशिष्ट को खरीदने में सफल हो गई। मैरी क्यूरी और उसके पति ने अगले चार साल 1898 से 1902 तक, रेडियोधर्मी पदार्थ की थोड़ी-सी मात्रा प्राप्त करने के लिए पिचब्लेंड को पिघलाने, शुद्ध करने और संशोधित करने में लगाए। वे पूरी तरह अपने काम में डूब गए थे। यह पूरी प्रक्रिया दोनों के लिए अत्यधिक थका देने वाली थी। आमतौर पर वे अपनी देखरेख में खदान मजदूरों की एक टोली की सहायता से इसे करवाते थे। हालांकि यह सब बहुत ही थकाऊ था लेकिन मैरी अपने घर और बेटी आइरीन की अनेदखी नहीं कर सकती थी।
मैरी की मेहनत 1902 में तब रंग लाई जब उसने 1/10 ग्राम शुद्ध रेडियम बनाने में सफलता प्राप्त कर ली। उसने इसका परमाणु भार 225 निर्धारित किया। जिन वैज्ञानिकों ने आरंभ में उनके निष्कर्षों पर शंका जाहिर की थी उनकी जबान बंद हो गई। रेडियम को आधिकारिक तौर पर नया पदार्थ घोषित कर दिया गया। मैरी के पास अब अपना शोध पूरा करने के लिए पर्याप्त रेडियम था।

‘‘हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब रेडियम की खोज हुई थी तो कोई नहीं जानता था कि यह अस्पतालों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। यह एक विशुद्ध वैज्ञानिक कार्य था। और इससे सिद्ध होता है कि वैज्ञानिक कार्यों को तात्कालिक उपयोग के नजरिए मात्र से नहीं देखना चाहिए। इसका उद्देश्य यह आप होना चाहिए, विज्ञान की सुंदरता को समझने की खातिर, और फिर इसकी संभावना तो हमेशा रहती है कि कोई वैज्ञानिक खोज, जैसे रेडियम की खोज, मानवता के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकेगी।’’
---मैरी क्यूरी
रेडियम मैरी और पियरे के जीवन का केन्द्र था। रेडियम उनके लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण था। इस प्रयोग के लिए चार साल तक लगातार काम करने के कारण उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अपनी जीविका चलाने के लिए उन्हें शोध के साथ-साथ विश्वविद्यालय में पढ़ाना भी पड़ता था। घर और प्रयोगशाला दोनों जगहों पर काम का बोझ होने के कारण पियरे दंपति खाने-पीने पर ध्यान नहीं देते थे। हानिकारक विकिरण ने भी उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला था। परिणामत: क्यूरी दंपति दिन-ब-दिन कमजोर होने लगे। क्यूरी परिवार पर अन्य कई विपत्तियां भी आईं। मैरी के पिता का देहांत हो गया। मैरी के दूसरे गर्भधारण के पांचवें महीने में समय पूर्व प्रसव हो जाने के कारण उसकी बच्ची का भी देहांत हो गया। उसका दुर्भाग्य यहीं खत्म नहीं हुआ। उसकी बहन ब्रोनया के बेटे का ट्यूबलर मेनिनजाइटिस के कारण निधन हो गया। दूसरी तरफ पियरे बीमार पड़ गए। उनके पैरों में हमेशा दर्द रहने लगा। इन सब झटकों के बावजूद मैरी पियरे के साथ मिलकर अपने प्रिय रेडियम पर शोध करने में लगी रही। मैरी ने ध्यान दिया कि रेडियम त्वचा को जला देता है और उत्तकों को नष्ट कर देता है। एक प्रयोग करने के दौरान पियरे की त्वचा जल गई थी। तब जाकर उन्हें यह एहसास हुआ कि रेडियम का प्रयोग कैंसर के विकसित होते ऊतकों को नष्ट करने में किया भी जा सकता है। इस तरह कैंसर के उपचार के लिए रेडियम चिकित्सा का जन्म हुआ और इसी के साथ एक नए उद्योग ‘रेडियम उद्योग’ का प्रारंभ हुआ।

‘‘आप लोगों को सुधारे बगैर बेहतर दुनिया की परिकल्पना नहीं कर सकते। इसके लिए हम सब को आत्मविकास का प्रयास करना चाहिए और साथ-ही-साथ मानवता के प्रति साझा जिम्मेदारी का भी निर्वाह करना चाहिए। हमारा विशेष दायित्व है कि हम सबसे ज्यादा उनके लिए काम करें जिनके लिए हम सबसे ज्यादा उपयोगी साबित हो सकते हैं।’’.
---मैरी क्यूरी
मैरी ने रेडियम पर किए गए शोध के परिणाम को अपने शोध-प्रबंध में शामिल करके 25 जून, 1903 को अपना शोध प्रस्तुत किया। परीक्षक समिति मैरी के शोध-प्रबंध को देखकर हतप्रभ थी। इसके पहले किसी ने भी अपने शोध-प्रबंध में ऐसा महत्वपूर्ण वैज्ञानिक योगदान नहीं दिया था। उसकी वर्षों की मेहनत रंग लाई और उसे प्रतिष्ठित शोध उपाधि प्राप्त हो गई। मैरी ने इस उपाधि के लिए बहुत त्याग किया था। आमतौर पर वो अपनी प्रयोगशाला के बाहर रखे एक बड़े से हौज पर बैठकर काम करती थी। लेकिन बरसात के दिनों में उसके पास अपनी सर्द, नम और गंदी प्रयोगशाला में काम करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता था। हानिकारक रैडन गैस ने प्रयोगशाला में मौजूद हर चीज को संक्रमित कर दिया था। रैडन को रेडियोधर्मिता के कारण हानिकारक माना जाता है। यह यूरेनियम या थोरियम से परोक्ष रूप से क्षरित होता है। मैरी हर हफ्ते एक इकाई विकिरण को सहती थी। उसके स्वास्थ्य के लिए यह बहुत हानिकारक था। फिर भी उसने अपने स्वास्थ्य पर कोई ध्यान नहीं दिया और अपने अध्ययन में लगी रही।
मैरी के शोध उपाधि प्राप्त करने के बाद क्यूरी दंपति ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने पिचब्लेंड से रेडियम पृथक करने की तकनीकी खोज ली थी। दूसरी तरफ चिकित्सा बाजार में इस नए बेशकीमती पदार्थ की भारी मांग होने लगी थी। पूरी दुनिया के लोग इस पदार्थ के पृथक्करण की विधि जानना चाहते थे ताकि वो इसका चिकित्सकीय उपयोग कर सकें। क्यूरी दंपति के लिए यह एक बहुमूल्य अवसर था। वे अपने शोध-निष्कर्षों को बिना कोई पैसा लिए प्रकाशित करवा सकते थे या फिर अपनी विधि का पेटेंट कराकर उसे मुनाफे के लिए बेच सकते थे। पेटेंट कराने से रेडियम का प्रयोग सीमित होता और मैरी तथा पियरे धनी हो जाते। लेकिन मैरी के मन में कोई दुविधा नहीं थी। मानवता की सेवा सदैव उसकी पहली प्राथमिकता रही थी। रेडियम पृथक्करण विधि को सार्वजनकि करने का मैरी का निर्णय दुनिया के हजारों बीमारों के लिए वरदान बन कर आया। लेकिन इसकी वजह से मैरी को और कई साल गरीबी और खस्ताहाल प्रयोगशाला के साथ गुजारना पड़ा।

“‘‘मैं उन लोगों में से हूँ जो नोबेल ही की तरह सोचते हैं कि मनुष्य नई खोजों में बुराई से ज्यादा अच्छाई तलाश करेगा।
---मैरी क्यूरी
मैरी और पियरे का संबंध विज्ञान के इतिहास का सबसे परिपूर्ण, फलदायक और सृजनात्मक साझीदारी वाला संबंध था। अब उनका नाम और काम चारों तरफ फैलने लगा था। उनके साथी वैज्ञानिक उनकी प्रशंसा करने लगे थे। फ्रांस में उन्हें कम सहायता मिली लेकिन दूसरे देशों में उनकी स्वीकार्यता बढ़ रही थी। 1903 में मैरी और पियरे को रायल सोयाइटी की तरफ से ब्रिटेन के भौतिकविद् एवं अभियंता लार्ड कैल्विन के हाथों डैवी मेडल प्राप्त हुआ। इस पदक को पाकर मैरी को अत्यधिक खुशी मिली थी। इसके बावजूद मैरी ने ये पदक आइरीन को खिलौन के रूप में खेलने के लिए दे दिया था। इसी साल यह घोषणा हुई कि मैरी और पियरे क्यूरी को रेडियोधर्मिता के सिद्धांत में योगदान के लिए हेनरी बैकेरल के साथ संयुक्त रूप से भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया जाएगा। नोबेल पुरस्कार से ख्याति के साथ-साथ काफी धन भी प्राप्त होता है। यह धन मैरी और पियरे के लिए एक बड़ी राहत थी। अब वो शिक्षण-कार्य को थोड़ा कम कर के अपनी प्रयोगशाला पर ध्यान दे सकते थे। काम की खराब परिस्थिति और अत्यधिक श्रम के कारण मैरी और पियरे का स्वास्थ्य अत्यधिक खराब हो गया था। उनके हाथों की उंगलियों की पोरें जलन के कारण स्थायी रूप से झुलस गई थीं और बगैर किसी सुरक्षा इंतजाम के रेडियोधर्मी पदार्थों को लगातार पकड़े रहने के कारण बेहद कठोर भी हो गई थी। मैरी हर वक्त थकी-थकी महसूस करती थी। उसका वजन 15 पॉउण्ड कम हो गया था। यही कारण है कि जब नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई तो खराब स्वास्थ्य के कारण वे दोनों व्यक्तिगत रूप से नोबेल पुरस्कार लेने स्टाकहोम नहीं जा सके थे।
नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद क्यूरी दंपति एकाएक मीडिया और जनता के आकर्षण के केन्द्र बन गए। वो अचानक ही दुनिया भर के पत्रकारों से घिर गए। यह स्थिति उनके लिए असहनीय थी लेकिन इसे टाला भी नहीं जा सकता था। क्यूरी दंपति के लिए यह समय काफी अच्छा था। इसी समय पियरे को सोर्बन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद ग्रहण करने का निमंत्रण आया। पियरे मैरी को प्रयोगशाला प्रमुख के रूप में अपने साथ रख सकते थे। पियरे और मैरी इन पदों को पाकर खुश थे लेकिन इस बात का उन्हें थोड़ा दुख भी था कि उन्हें नोबेल पुरस्कार पाने के बाद फ्रांस में स्वीकार्यता मिली।

‘‘पियरे, मेरे पियरे, तुम यहीं थे, एक बेचारे घायल आदमी की तरह जिसके सिर पर पिट्टयां बंधी हो। तुम्हारा चेहरा प्यारा और शांत लग रहा था, ये तुम ही थे, एक स्वप्न में खोए हुए जिससे तुम बाहर नहीं आ सकते।‘‘
---मैरी क्यूरी
1904 में मैरी और पियरे की दूसरी संतान ईव का जन्म हुआ। मैरी और पियरे को मिलकर काम करने और मिलकर परिवार के संग समय बिताने में आनन्द आता था। हालांकि ज्यादातर समय वो अपने शोध कार्य में व्यस्त रहते थे और बच्चों की देखभाल परिचारिका करती थी। लेकिन छुट्टी के दिन या शाम के समय जब भी उन्हें समय मिलता था, वे बच्चों के साथ समय व्यतीत करते थे। उनका विवाह दो महान मेधाओं का विवाह भी था जो आजीवन एक-दूसरे के हमसफर रहे। उन्हें सिर्फ मृत्यु ही अलग कर सकी।
19 अप्रैल, 1906 मैरी के लिए एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण दिन था। उस दिन बारिश हो रही थी। दोपहर के बाद पियरे पैदल ही पेरिस की भीड़भरी गलियों से होते हुए अपनी प्रयोगशाला के लिए निकले। हमेशा की तरह वो अपने ख्यालों में खोए हुए थे। उनकी आंखों पर उनका छाता आ गया था सो वो सामने की सड़क को ठीक से देख नहीं पा रहे थे। असचेत रूप से सड़क पार करते वक्त वे एक घोड़ागाड़ी के सामने आ गए। घोड़ागाड़ी से कुचलने के कारण उनका तत्काल देहांत हो गया। मैरी के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था। पियरे केवल उसके पति ही नहीं शोध साझीदार तथा जीवनसाथी भी थे। यह सदमा इतना बड़ा था कि मैरी इससे कभी भी उबर नहीं सकी। वह काले कपड़े पहनने लगी और एकाकी रहने लगी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि पियरे नहीं रहे। वो हमेशा बोल पड़ती थी, ‘‘पियरे नहीं रहा, नहीं रहा ? बिल्कुल नहीं रहा ?’’ पियरे के देहांत के बाद विश्वविद्यालय ने मैरी को विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर का पद दे दिया। फ्रांस में इस सम्मानजनक पद को प्राप्त करने वाली वह पहली महिला थी। मैरी अपने वैज्ञानिक कार्य और बच्चों की देखभाल के बीच संतुलन बनाने का पूरा प्रयास कर रही थी ताकि उसकी बच्चियों की अनदेखी न हो।

‘‘प्रिय पियरे, मैं अभी एक घण्टा पहले ही काफी शांत और अच्छी नींद से उठी हूँ और अब मैं फिर से किसी जंगली जानवर की तरह जोर-जोर से रोना चाहती हूँ।"
---मैरी क्यूरी (मई, 1906)
5 नवम्बर, 1906 का दिन मैरी क्यूरी और फ्रांस दोनों के लिए एक ऐतिहासिक दिन था। इस दिन दोपहर 1.30 बजे मैरी फ्रांस के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में व्याख्यान देने वाली पहली महिला बनी। उसने अपना व्याख्यान वहीं से शुरू किया जहां महीनों पहले पियरे ने समाप्त किया था। मैरी रेडियोधर्मिता पर पूरे अधिकार और आत्मविश्वास के साथ बोली। उसके लिए जीवन का सफर काफी कठिन रहा था लेकिन वह सभी चुनौतियों को सम्मान के साथ पार करती रही और उनसे उबर कर एक विजेता की तरह सामने आती रही। चूंकि अब वह अकेली थी इसलिए शोध कार्य और बच्चियों की देखभाल दोनों को एक साथ संभालना उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। पर सौभाग्यवश पियरे के पिता अभी भी जीवित थे और उनके साथ रहते थे। वो बच्चियों की देखभाल में मैरी की मदद करते थे।
मैरी अपने प्रिय पदार्थों रेडियम और पोलियम पर शोध करती रही। रेडियम के रासायनिक चरित्र को स्पष्टत: समझने के लिए वो इसे शुद्ध रूप में पाने का प्रयास करने लगी। क्यूरीथिरैपी का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा था इसलिए मैरी रेडियम की बिल्कुल दुरुस्त मात्रा नापने की विधियों पर शोध कर रही थी ताकि मरीजों को दी जाने वाली रेडियम की सही मात्रा का निर्धारण किया जा सके।
लेकिन अचानक मैरी को एक और बड़ा झटका उस वक्त लगा जब उसके लिए मजबूत संबल रहे पियरे के पिता का स्वर्गवास हो गया। मैरी की बेटियों को अपने दादाजी से बहुत लगाव था। इस घटना से उन्हें गहरा सदमा लगा। मैरी ने एक नौजवान पोलिश महिला को उनकी परिचारिका के रूप में नियुक्त किया। मैरी को फ्रांसीसी शिक्षा-व्यवस्था पर जरा भी भरोसा नहीं था इसलिए उसने एक निजी स्कूल शुरू किया जिसमें बच्चों के अभिभावक ही शिक्षक थे। यह दस बच्चों का समूह था जिन्हें अपने घरों में ही उनके अभिभावकों, जो कि नामी प्रोफेसर थे, द्वारा पढ़ाया जाता था।
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‘‘जीवन में डरने लायक कुछ नहीं है, सब कुछ समझने लायक है। यह समय ज्यादा-से-ज्यादा समझने का है ताकि हम कम-से-कम डरें।’’
---मैरी क्यूरी
1911 का साल मैरी के लिए अच्छा नहीं था। जब भौतिकविद् पॉल लैंगेविन के साथ उसके संबंध सार्वजनिक हुए तो उसकी काफी बदनामी हुई। पॉल मैरी से पांच साल छोटा था। वह पियरे का भूतपूर्व छात्र था। वह अपनी पत्नी से पहले ही अलग हो चुका था फिर भी मैरी पर उसकी शादीशुदा जिंदगी को तबाह करने का आरोप लगा। इन नकारात्मक अफवाहों और चरित्रहनन के कुत्सित प्रयासों के कारण अकैडमी ऑफ सांइस ने सदस्य के रूप में उसके प्रवेश पर रोक लगा दी। इस पूरे घटनाक्रम से मैरी को गहरी चोट लगी। यद्यपि दिसम्बर, 1911 में स्वीडेन की अकेडमी ऑफ साइंस ने मैरी के उत्कृष्ट कार्यों को रेखांकित करते हुए मैरी को रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दिया। पहला नोबेल पाना किसी अधूरे सपने के पूरा होने जैसा था लेकिन दो नोबेल पुरस्कार पाना तो बिल्कुल अविश्वसनीय था। लेकिन एक साधारण परिवार की साधारण पोलिश महिला ने यह कारनामा कर दिखाया।
दूसरा नोबेल पुरस्कार पाने के तीन साल बाद 1914 में पेरिस में इंस्टीट्यूट ऑफ रेडियम की स्थापना हुई। इसका नाम पैविलन क्यूरी था। इस तरह मैरी की एक प्रयोगशाला पाने की इच्छा अंतत: पूरी हो गई। अफसोस कि पियरे इस खुशी को साझा करने के लिए उसके साथ नहीं थे।
जल्द ही मैरी का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। उसके गुरदे का एक बड़ा ऑपरेशन हुआ जिसे भरने में लम्बा समय लगा। संयोगवश उसकी बेटियों सहित उसके कई अच्छे दोस्त थे जिन्होंने उसे फिर से स्वस्थ होने में काफी मदद की। विश्वविख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन और उनका बेटा मैरी के अच्छे दोस्त थे। मैरी उनके साथ कई घण्टों तक वैज्ञानिक विचारों पर चर्चा करती रहती थी। मैरी के बारे में आइंस्टीन ने अपनी राय यूं व्यक्त की है :
‘‘ यह मेरा सौभाग्य है कि मैडम क्यूरी के साथ 20 वर्षों तक मेरी उदात्त और निष्कलुष दोस्ती रही। मैं उनकी अभूतपूर्व मानवीय गरिमा का प्रशंसक था। उनकी हिम्मत, उनकी पवित्र इच्छाशक्ति, उनका आत्म-त्याग, उनकी वस्तुनिष्ठता, उनका अचूक निर्णय - ये कुछ ऐसी चीजें थीं जो किसी भी एक इंसान के भीतर विरले ही मिलती है। उनके जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक कार्य - रेडियोधर्मी पदार्थों की उपस्थिति और उनका पृथक्करण- केवल उनके अंत:प्रज्ञा का फल नहीं है बल्कि प्रायोगिक विज्ञान के इतिहास की सबसे कठिन परिस्थितियों में रह कर पूरी लगन से किए गए सतत परिश्रम का परिणाम है।’’

मैरी का स्वास्थ्य काफी हद तक सुधर गया था। उनकी बच्चियां भी बड़ी हो गई थी सो उनकी चिंताएं भी कम हो गई थी। आइरीन 17 साल की और ईव 10 साल की हो गई थी। उनका शोध कार्य अच्छी तरह चल रहा था। उन्होंने गर्मियों में ठहरने के लिए ब्रिटनी में एक बंगला किराए पर ले लिया था। मैरी का जीवन बेहतर हो चुका था लेकिन प्रथम विश्व यु़द्ध के बादल मंडराने लगे थे और अंतत: युद्ध छिड़ ही गया। इस दौरान बीच-बीच में मैरी ने एक्स-रे का भी विस्तृत अध्ययन किया था। उसे पता था कि घायल सैनिकों के उपचार में एक्स-रे काफी सहायक सिद्ध हो सकती है। इसकी सहायता से शरीर के अंदर छिपी हुई गोलियों एवं छर्रों का पता लगाया जा सकता था। अत: मैरी आइरीन के साथ युद्ध के मोर्चे पर जाकर घायलों का एक्स-रे करने के लिए स्वंयसेवी बन गई। वे फ्रांस और बेल्जीयम के कई अस्पतालों में गए। वहां के तकनीकी कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया और अपनी देखरेख में लाखों एक्स-रे करवाए। मैरी की मानवता की सेवा यहीं समाप्त नहीं हुई। उसने रेडियम इंस्टीट्यूट में महिलाओं को रेडियोधर्मी सहायक के रूप में प्रशिक्षित करना शुरू किया। अपने इस प्रयास में उसे आइरीन से सहायता मिलती थी। आइरीन उस समय सोर्बन विश्वविद्यालय में अध्ययन करती थी। मैरी नौजवान वैज्ञानिकों के प्रति ज्यादा उदार थी। उसने उन्हें अपनी प्रयोगशाला में परमाण्विक शोध करने के लिए जगह दी। यह परमाण्विक शोध खुद मैरी ने शुरू किया था। एलेन ग्लेडीत्स, मे लेजली इत्यादि जैसी नौजवान महिला वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करने के लिए मैरी उन्हें अपनी प्रयोगशाला में काम पर रख लेती थी। महिला वैज्ञानिकों के प्रति वो विशेष रूप से संवदेनशील थी क्योंकि महिला वैज्ञानिकों को अक्सर पुरुष वैज्ञानिकों के भेदभाव का शिकार होना पड़ता था।

“‘‘मेरी भीरुता उसकी भीरुता से ज्यादा थी। मैं पिछले बीस वर्षों से एक प्रशिक्षित जांचकर्ता के रूप में काम कर रही थी लेकिन इस भली औरत से मैं एक सवाल भी न पूछ सकी....मैंने उसे समझाना चाहा कि अमेरिकी औरतें उसके महान कार्यों के बारे में जानना चाहती हैं लेकिन मैंने खुद को उससे उसका कीमती समय खराब करने के लिए माफी मांगते हुए पाया....’’ श्रीमती मेलोनी
दो नोबेल पुरस्कार मिलने के कारण मैरी के पास जीविका के लिए पर्याप्त धन हो चुका था। अब वह बगैर किसी परेशानी के कार्य कर सकती थी। लेकिन मानवता के प्रति उसकी निष्ठा ने उसे युद्ध पर खर्च करने और फ्रांसीसियों की मदद करने के लिए मजबूर कर दिया। परिणामस्वरूप उसके हाथ फिर से खाली हो गए। उसके पास अपने शोध-कार्य के लिए धन नहीं बचा। और उसे इसका अंदाजा नहीं था कि उसके लिए मदद आने ही वाली है। श्रीमती विलियम ब्राउन मेलोनी न्यूयॉर्क की एक प्रसिद्ध पत्रिका की संपादक थी। वो लम्बे समय से मैरी से मिलने के लिए इच्छुक थीं। अंततोगत्वा जब वो मैरी से मिली तो यह देखकर दंग रह गई कि मैरी की प्रयोगशाला में कोई भी उपकरण नहीं है और कैंसर के रोगियों के उपचार के लिए प्रयुक्त होने वाला रेडियम एक ग्राम भी नहीं बचा है। श्रीमती मेलोनी समझ गईं कि प्रयोग शुरू करने के लिए मैरी को एक ग्राम रेडियम की आवश्यकता है लेकिन उसके पास रेडियम खरीदने के लिए जरूरी लाखों रुपए नहीं है। श्रीमती मेलोनी मैरी से अत्यधिक प्रभावित होकर अमेरिका लौटीं। उन्होंने तय कर लिया कि वो अमेरिकी औरतों की सहायता से मैरी की समस्या हल करेंगी। मैरी क्यूरी रेडियम सहायता कोष की राशि एक वर्ष में एकत्रित हुई। मैरी को इस राशि को ग्रहण करने के लिए अमेरिका बुलाया गया। मैरी 54 साल की उम्र में अपनी बेटियों के साथ अपने जीवन की सबसे लम्बी यात्रा के लिए निकल पड़ी। 1921 में अमेरिका के राष्ट्रपति वारेन जी हार्डिंग ने स्वयं मैरी क्यूरी को एक ग्राम रेडियम दिया।

मैरी की अमेरिका यात्रा बहुत सफल रही। यद्यपि इस यात्रा ने उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला। युवावस्था में मैरी ने आहार पर ठीक से ध्यान नहीं दिया था। सावधानी न बरतने के कारण वह विकिरण से भी प्रभावित हो गई थी। वह जानती कि रेडियम उसे झुलसा देगा फिर भी वह नंगे हाथों और आंखों से उसके साथ प्रयोग करती थी। दूसरे कर्मचारियों ने हाथों में दस्ताने और आंखों पर चश्मे पहनने शुरू कर दिए थे लेकिन मैरी को अपने और अपने प्रिय रेडियम के बीच आने वाली कोई भी बाधा नहीं पसंद थी।
मैरी और आइरीन ठीक उसी तरह एक साथ काम करती थीं जिस तरह शुरुआत में मैरी और पियरे किया करते थे। मां-बेटी को एक साथ काम करना अच्छा लगता था। यह जोड़ी विज्ञान के इतिहास में एकमात्र भौतिकविद् मां-बेटी की जोड़ी थी। आइरीन ने एक युवा भौतिकविद् फ्रेडरिक जोलियट से शादी की थी। जोलियट ने 1926 से मैरी और आइरीन के साथ काम करना शुरू किया। यह युगल भी मैरी और पियरे की तरह आजीवन भौतिकी में शोध करता रहा।
अब समय के साथ उम्र ने मैरी पर असर दिखाना शुरू कर दिया। उसे अपने स्वास्थ्य की अनदेखी की कीमत चुकानी पड़ी। 1923 में मोतियाबिंद के कारण उसकी आंखों की दृष्टि धुंधली होने लगी और वह लगभग अंधी हो गई। उसे अपनी आंखों की शल्य चिकित्सा करानी पड़ी। शल्य क्रिया के बाद उसके आंखों की रोशनी कुछ हद तक वापस आई। लेकिन उसके आंतरिक अंगों को पहुंची क्षति इतनी ज्यादा थी कि उसकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं हो पाई। वह टिनटिनस से भी पीड़ित थी। इस बीमारी में कानों में लगातार घंटियों की आवाज आती रहती है। विकिरण के जहर से भी उसे बहुत कष्ट होता था। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद वो अपने रेडियम शोध के लिए सहायता लेने दो बार अमेरिका गई। उसने 1932 में अपनी आखिरी अमेरिका यात्रा की। 1934 में वह आखिरी बार अपनी प्रयोगशाला गई। उसे अपना स्वास्थ्य बहुत खराब लग रहा था और वह प्रयोगशाला से कभी वापस न जाने के लिए लौट आई। वह कमजोर, थकी हुई और तेज बुखार से पस्त थी। डाक्टर उसका दर्द कम नहीं कर पा रहे थे। मैरी अपनी छोटी बेटी ईव के साथ पहाड़ पर स्थित स्वास्थ्य-केन्द्र में भर्ती हो गई। ईव अपनी मां के प्रति पूरी तरह समर्पित थी और उसकी खूब सेवा कर रही थी। मैरी की लाल और श्वेयत रक्त कणिकाएं बहुत कम हो गई थी। और 4 जुलाई, 1934 की भोर में मैरी ने अपनी आखिरी सांस ली। डाक्टरों ने ‘अप्लास्टिक पर्निसीयस एनिमिया’ तथा लम्बे समय तक विकिरण का सामना करते रहने के कारण अस्थि मज्जा के निष्क्रिय हो जाने को मौत का कारण बताया। मृत्यु के समय मैरी की उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी। वह अभी 67 वर्ष की ही थी। उसे ससेक्स में अपने पारिवारिक कब्रिस्तान में अपने पति की कब्र के साथ ही दफनाया गया। बड़े ही दु:ख की बात है कि मैरी की मौत का एक कारण उसका प्रिय रेडियम भी था।
आइरीन और फ्रेडरिक जोलियट-क्यूरी ने अपने परिवार की परंपरा को बनाए रखा। मैरी और पियरे की तरह वो भी एक सफल भौतिकविद् दंपति के रूप में कार्य करते रहे। इस जोड़ी ने मैरी की मृत्यु के एक साल बाद 1935 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। मैरी एक विशिष्ट महिला थी। वह साहस और दृढ़निश्चय की प्रतिमूर्ति थी। उसने जीवन को दिया बहुत बहुत ज्यादा, लिया बहुत बहुत कम। वह पहली महिला वैज्ञानिक थी जिसे मदर ऑफ मार्डन फिजिक्स‘ के रूप में याद किया जाता है। मैरी इस संसार में नहीं रही लेकिन उसके द्वारा शुरू किया हुआ कार्य मैरी की उम्मीदों के अनुरूप मानवता की भलाई के लिए अभी भी जारी है।
‘‘पच्चीस साल के गहन शोध के बाद अभी भी हम महसूस करते हैं कि अभी बहुत कुछ करना है। हमने कई खोजें की हैं। पियरे क्यूरी और उनकी नोटबुक में प्राप्त सुझाव तथा मेरे सामने व्यक्त उनके विचारों ने हमारा मार्गदर्शन किया है। लेकिन हममें से कोई भी ज्यादा नहीं कर सका। हालांकि शायद हममें से प्रत्येक ज्ञान की थोड़ी-सी चमक, चाहे वो कितनी भी मामूली या अपर्याप्त हो, मनुष्य के सत्य के स्वप्न में जोड़ सकता है। इन छोटे-छोटे चिरागों से हम हमारे सामने फैले अंधेरे में उस महान योजना का हल्का आभास पा सकते हैं जिसके कारण इस ब्रह्माण्ड का विस्तार हुआ है। और मैं उन लोगों में से एक हूँ जो मानते हैं कि इसी कारण विज्ञान में महान सौंदर्य है और विज्ञान अपनी महान आध्यात्मिक शक्तियों से संसार से बुराई, अज्ञानता, गरीबी, बीमारी, युद्ध और हृदयाघात समाप्त कर देगा। सत्य के स्पष्ट प्रकाश की तलाश करो। अज्ञात एवं नई राहों की खोज करो। मनुष्य की दृष्टि-क्षमता आज बहुत बढ़ गई है लेकिन दिव्य आश्चतर्य कभी भी मनुष्य को चकित करना बंद नहीं करेंगे। हर युग का एक स्वप्न होता है। इसलिए पुराने सपनों को छोड़ दो। नौजवानों, ज्ञान की मशाल को थामो और भविष्य के महल का निर्माण करो।’’
---- मैरी क्यूरी
मैरी क्यूरी की बायोग्राफीज | 0 टिप्पणी >>
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