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ब्रेस्ट कैंसर क्या है?

कैंसर का मतलब है सेल्स का असामान्य तरीके से विकसित होना; और सेल का यह विकास एक दर्दरहित ट्यूमर या कोशिकाओं के गांठ के रूप में हो सकता है। कैंसर के लगभग 100 प्रकार हैं और इसका वर्गीकरण शरीर के अंग और उसकी जगह जहां पर कैंसर सेल्स का असर हुआ है, उसके अनुसार होता है। कैंसर की बीमारी किसी भी उम्र में किसी को भी हो सकती है, फिर वह चाहे स्त्री हो या पुरुष। ब्रेस्ट कैंसर की बीमारी सिर्फ महिलाओं को होती है यह लोगों की आम धारणा है लेकिन दुर्लभ केसेस में यह बीमारी पुरुषों को भी हो जाती है। ब्रेस्ट कैंसर में हाथ के नीचे स्तन के पास एक दर्दरहित गांठ या ट्यूमर विकसित हो जाता है।

ब्रेस्ट कैंसर में क्या होता है?

यह एक प्रकार का कैंसर है जिसमें ब्रेस्ट सेल्स की अनलिमिटेड ग्रोथ होती है। यह दूध धमनी के अंदर की लाइनिंग को या फिर लोब्युल्स, जो दूध को धमनियों में भेजता है, उसे प्रभावित करता है। स्त्री के ब्रेस्ट (स्तन) में कई टिशूस, बहुत सारे ग्लैंड्स या ट्यूब्स और हजारों सेल्स शामिल होते हैं। जो मां ब्रेस्टफीडींग करती है उनके स्तन से इसी ग्लैंड के द्वारा दूध बहता है जो निप्पल के जरिए बाहर आता है। सामान्यत: दूसरे सेल्स की तरह ब्रेस्ट सेल्स भी नए सेल्स का निर्माण करने के साथ-साथ मृत सेल्स को रिप्लेस भी करते रहते हैं। लेकिन कैन्सर हो जाने पर ये सेल्स इतनी मात्रा में बढ़ते हैं कि उनपर नियंत्रण नहीं रहता और उस वजह से ट्यूमर या गांठ बन जाती है। यह या तो लोब्युल्स में या फिर दूध नलिकाओं की लाइनिंग में होता है।

लोब्युल्स के कैंसर को लोब्युलर कार्सिनोमा कहते हैं यह ज्यादा कॉमन नहीं है और मिल्क डक्ट्स (दूध धमनी) के कैंसर को डक्टल कार्सिनोमा कहते हैं जो ज्यादा कॉमन है।

ब्रेस्ट कैंसर कितने प्रकार के होते हैं?

ब्रेस्ट कैंसर के मुख्यत: दो प्रकार है :- इन्वेसिव और नॉन-इन्वेसिव।

इन्वेसिव :- जब कैंसर युक्त सेल्स लोब्युल्स या धमनियों से बाहर निकलकर आसपास के टिशूस पर आक्रमण करते हैं और लसिका ग्रंथियों पर असर करते हैं तथा लीवर और लंग्स जैसे शरीर के मुख्य अवयवों में चले जाते हैं, तब उसे इन्वेसिव कैंसर कहा जाता है। ये कैंसरयुक्त सेल या डॅमेज सेल्स तत्क्षण या फिर बाद में शरीर में फैलना शुरू करते हैं।

नॉन-इन्वेसिव :- लोब्युलर कार्सिनोमा में कैंसर की ग्रोथ लोब्युल्स के अंदर होती है या जब यह डक्टल कार्सिनोमा में धमनियों के अंदर होती है, तब इसे नॉन-इन्वेसिव कहा जाता है। लेकिन बाद में यह कभी भी इन्वेसिव हो सकता है।

ब्रेस्ट कैंसर में कौन-से लक्षण दिखाई देते हैं?

ब्रेस्ट कैंसर होने पर मरीजों को दर्द का अनुभव होने के साथ-साथ उनमें कुछ बाहरी लक्षण भी प्रकट हो जाते हैं। ये लक्षण इस प्रकार हैं:-

1.         ब्रेस्ट में गांठ होना या टिशू का जमा होना। इस गांठ में दर्द नहीं होता।

2.         स्तन में या उसके बगल में हर समय दर्द होना, जिसका कोई और कारण नहीं होता।

3.         निप्पल के आसपास की स्तन की त्वचा लाल और कोमल होना।

4.         कांख में सूजन आना और किसी एक निप्पल में फुन्सी (रैश) आना।

5.         निप्पल से खून या साफ द्रव निकलना।

6.         निप्पल के आकार में बदलाव जैसे कि धंसा हुआ या उल्टा होना।

7.         स्तन के शेप और साइज में बदलाव होना।

8.         ब्रेस्ट के पास की त्वचा पर परत जमना, या परत निकलना।

ब्रेस्ट कैंसर के कौन-से कारण हैं और उसके साथ जुड़े हुए कौन-से रिस्क फैक्टर्स है?

ब्रेस्ट कैंसर निम्न कारणों से होता है :-

वृद्धावस्था :- महिलाओं में मेनोपॉज के बाद या 50 साल की उम्र के बाद।

जेनेटिक्स :- ज्यादातर ब्रेस्ट कैंसर अनुवांशिक नहीं होते। ब्रेस्ट कैंसर की बीमारी कैंसर का ही आम प्रकार है। जिन महिलाओं में BRCA1 और BRCA2 जीन होते हैं, उनको इसका ज्यादा खतरा होता है और ये जीन उन्हें वंशगत प्राप्त होते हैं।

हिस्ट्री या रिलैप्स :- जिन महिलाओं को नॉन-इन्वेसिव टाइप की कैन्सर की बीमारी पहले ही हो चुकी है, उन्हें वापस कैंसर होने का खतरा ज्यादा होता है। जबकि जिन महिलाओं में इस बीमारी की हिस्ट्री नहीं होती, उन्हें इसका कम खतरा होता है।

गांठ :- अगर स्त्री के स्तन में पहले से कोई नॉन कैंसर गांठ है तो उन्हें कैंसर होने का खतरा बढ़ता है।

डेन्स ब्रेस्ट टिशू या हैवी ब्रेस्ट :- इसके कारण ब्रेस्ट कैंसर डेवलप होने के चान्सेस बढ़ते है।

इस्ट्रोजन लेवल :- इस्ट्रोजन एक ऐसा हार्मोन है जो युवावस्था में बढ़ता है और मेनोपॉज में कम होता है। अगर महिलाओं में जल्दी यौवनावस्था और देर से मेनोपॉज आता है तो फिर उन्हें ज्यादा रिस्क होता है।

हाइट और ओबेसिटी (ऊंचाई और मोटापा) :- नॉर्मल से ज्यादा हाइट और नॉर्मल से ज्यादा मोटापा अगर है तो उन महिलाओं को इसका ज्यादा खतरा होता है।

रेडिएशन एक्सपोजर :- लगातार एक्स-रे और स्कैन का एक्सपोजर ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को बढ़ाता है। खासकर अगर किसी ने बचपन में चेस्ट कंडीशन के लिए रेडिएशन थेरेपी ली हो तो।

हार्मोन रिप्लेसमेन्ट थेरेपी :- एस्ट्रोजन (कम्बाइन) थेरेपी ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क बढ़ाता है।

पर्यावरणीय कारक और सुस्त जीवनशैली :- जैसे कि प्लास्टिक कम्पोनन्ट्स के संपर्क में ज्यादा समय तक रहना और व्यायाम की कमी; इससे भी कैंसर का खतरा बढ़ता है।

कुछ कॉस्मेटिक इम्प्लांट्स की वजह से भी इन्सान के जीवित रहने की संख्या में कमी आ रही है।

ब्रेस्ट कैंसर को कैसे डायग्नॉज किया जाता है?

अगर आपको असहजता का पता चलता है तो आपको तुरंत अपने डॉक्टर से मिलना जरूरी है। नीचे दिए गए टेस्ट और टेक्निक्स से ब्रेस्ट कैंसर का पता चलता है:-

सर्वप्रथम शारीरिक निरीक्षण के द्वारा ही स्तनों के गांठों या उनके निपल और रंगों में आए परिवर्तन की जांच की जाती है।

मैमोग्राम/एक्स रे :- महिलाओं को 30 साल की उम्र के बाद किसी भी समय असहजता का पता करने के लिए मैमोग्राम कराना चाहिए। इस क्रम में एडवांस मैमोग्राम, जिसमें 2D और 3D इमेजिंग शामिल है, काफी मददगार साबित होता है।

बीमारी का सही-सही पता लगाने के लिए ब्रेस्ट अल्ट्रासाउन्ड, ब्रेस्ट एमआरआई और बायोप्सी कराई जा सकती है।

ब्रेस्ट कैंसर के लिए कौन-सा इलाज है?

कैंसर का ट्रीटमेन्ट निश्चित करने से पहले कैंसर का स्टेज (अवस्था) जान लेना महत्वपूर्ण होता है। अगर शुरुआती स्टेज में ही इस बीमारी का पता चल जाता है। तो मरीज के जिन्दा रहने के चान्सेस बढ़ जाते हैं। बीमारी का स्टेज पता करने के लिए कई टेस्ट जैसे ब्लड टेस्ट, सीटी स्कैन, मैमोग्राम किए जाते हैं और जैसे ही बीमारी की स्टेज का पता चलता है, उसके लिए ट्रीटमेन्ट का कोर्स निश्चित किया जाता है। ट्रीटमेंट अनेकों प्रकार के हो सकते है और इसकी कोई सीमा नहीं है। फिर भी कुछ अत्यधिक प्रचलित ट्रीटमेंट्स में रेडिएशन थेरपी, सर्जरी, बायोलोजिकल अथवा टार्गेटेड ड्रग थेरेपी, हार्मोन थेरेपी और केमोथेरेपी आदि प्रमुख हैं। इसके लिए दो तरह की सर्जरी भी प्रचलित है जैसे लम्पेक्टॉसी, इसमें गांठ को निकाला जाता है तथा ज्यादा सीरियस केस में मास्टेक्टॉमी विधि का सहारा लिया जाता है जिसमें स्तन को ही काटकर हटा दिया जाता है।

ब्रेस्ट कैंसर के कौन-से प्रिवेन्टिव स्टेप्स हैं?

अधिकांश कैंसर की बीमारियां अनुपयुक्त जीवनशैली अपनाने की वजह से होती हैं। गांव की तुलना में शहरों में कैंसर की बीमारी ज्यादा होती है। अस्वास्थ्यकर वातावरण और प्रदूषित माहौल में रहने तथा सुस्त जीवनशैली की वजह से कैंसर होने की संभावना बढ़ती है। इससे बचने हेतु नीचे दिए गए बातों को अपनाइए :-

*          शराब ना पिएं

*          समय पर उचित आहार लें

*          नियमित और पर्याप्त व्यायाम को दिनचर्या में शामिल करें

*          मेनोपॉज के बाद हार्मोनल थेरेपी यथासंभव कम लेना

*          हेल्दी बॉडी-वेट मेंटेन करना

*          उपयुक्त दवाइयां समय पर लें

इस बीमारी का खतरा महसूस होते ही स्त्री को ब्रेस्ट स्क्रीनिंग जल्द-से-जल्द करवानी चाहिए। और सभी उपायों में सबसे महत्वपूर्ण है ‘ब्रेस्ट फीडिंग’ (स्तनपान) जिसके कारण कैंसर का रिस्क बहुत कम हो जाता है।

कैंसर का सामना कैसे करना चाहिए?

जब इन्सान को यह पता चलता है कि उसे यह बीमारी हुई है, तब उसे इस बीमारी से प्रैक्टिकली और इमोशनली निपटना वास्तव में बहुत मुश्किल हो जाता है। मरीज काफी अपसेट महसूस करता है और उसे लगता है कि वह खुद पर अपना नियंत्रण खो देगा। लेकिन शुरुआत की फीलिंग खत्म होते ही उसे खुद को इस ट्रॉमा से बाहर निकालने का प्रयास करना चाहिए और इसके लिए मेडिकल एडवाइस लेना चाहिए तथा उसके बारे में ज्यादा-से-ज्यादा जानकारी जुटानी चाहिए जिससे उन्हें मदद मिल सके। ऐसे लोगों से बात करना या उनके बारे में पढ़ना, जिन्होंने इस बीमारी का सामना किया है और जो आज अच्छी और स्वस्थ जिन्दगी जी रहे हैं, इस आघात से उबारने में काफी सहायक होता है। आज 21 वीं सदी में अधिकांश कैंसर का इलाज संभव है बशर्ते बीमारी के बारे में शुरुआत में ही पता चल जाए।

रिस्क फैक्टर्स को टालें और बीमारी के आगे ना झुकें। दूसरी तरफ सकारात्मक दृष्टिकोण (पॉझिटिव्ह अप्रोच) अपनाइए और कैंसर को दूर भगाइए। अभी का उदाहरण ले लीजिए- ऐक्ट्रेस ऐंजलिना जोली में BRCA1 का जीन था जो उसे अपनी मां से आनुवंशिक रूप से (इनहेरिटेड) प्राप्त हुआ था और वह ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित थीं। ऐंजलिना ने मास्टेक्टॉमी सर्जरी करवाई क्योंकि उसे कैंसर होने का 87% खतरा था। वह एक मशहूर अभिनेत्री हैं जिसपर हमेशा लोगों का ध्यान रहता है फिर भी उन्होंने यह हिम्मत दिखाई और अपने रूप-रंग की चिन्ता नहीं की।

हेल्थ ज्यादा महत्वपूर्ण है। सकारात्मक रहिए और स्वस्थ जीवन-शैली को अपनाइए।

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