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सभी ने बचपन में यह कविता जरूर पढ़ी होगी:
“ट्विंकल, ट्विंकल, लिटल स्टार, हाउ आई वंडर व्हाट यू आर,
अप अबव द वर्ल्ड सो हाई, लाइक अ डाइमंड इन द स्काई.”
इस कविता के लिखे जाने से बहुत पहले एक व्यक्ति का जन्म हुआ था जिनके द्वारा किया गया सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार संभवतः इस कविता का प्रत्युत्तर था. वे शायद इस कविता को कुछ यूं पढ़ते:
“ट्विंकल, ट्विंकल, लिटल स्टार, आई नो मोर वंडर व्हाट यू आर,
अप अबव द वर्ल्ड सो हाई, स्टिल सो क्लोज टु माई आईज.”
कौन थे यह व्यक्ति? और क्या थी वह वजह जो इस लोकप्रिय कविता की मुझे पुनर्रचना करनी पड़ी? असाधारण प्रतिभासंपन्न यह व्यक्ति थे गैलिलियो गैलिली जिन्होंने दूरबीन (Telescope) का आविष्कार किया था.
सभ्यता की शुरुआत से ही वैज्ञानिक रात में आकाश का अध्ययन करते रहे हैं. उन्होंने वर्ष-चक्र के समयांतराल में तारों की गतियों-स्थितियों से ताल-मेल करती विशाल आकृतियां और स्मारकें बनायीं. ये उनके लिए कैलेण्डर का काम करते थे और चांद-तारों की गतियां उनकी घड़ी थी.
गैलिलियो गैलिली ही वो पहले व्यक्ति थे जो घर में बनाई अपनी छोटी-सी दूरबीन के द्वारा सितारों की दुनिया की एक झलक पाने में कामयाब हुए. इस आश्चर्यजनक यन्त्र के आविष्कार के बाद से अबतक वैज्ञानिक बड़े और बेहतर दूरबीनें निर्मित कर चुके हैं. दूरबीन जितना बड़ा होगा, दूरस्थ पिंडों की विलक्षणताओं को उतनी ही बारीकी से देख-दिखा सकने में सक्षम होगा. बाद में तो दूरबीनों को अंतरिक्ष में स्थापित भी किया गया जिससे तारामंडल में स्थित पिंडों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध हो सके. जैसे हबल स्पेस टेलिस्कोप, जिसका ऐपर्चर (छेद अथवा गोलाई) 2.4 मीटर यानी 7.9 फीट है. इसे 1990 में एक अंतरिक्ष यान के द्वारा कक्षा में प्रतिस्थापित किया गया.
गैलिलियो को आधुनिक यंत्र विज्ञान और प्रायोगिक भौतिकी का संस्थापक कहा जाता है. इटलीवासी गैलिलियो एक गणितज्ञ, खगोलशास्त्री और भौतिकविज्ञानी थे जिनका योगदान आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में अतुलनीय है. अपने गहन अध्ययनों के माध्यम से उन्होंने ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत किए जिनसे यह साबित हुआ कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केंद्र नहीं बल्कि यही सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है.
यहां हम गैलिलियो के जीवन के उन संघर्षों की, ब्रह्माण्ड के यथार्थ पर्यवेक्षण और टेलिस्कोप के अन्वेषण की बात करेंगे जिनकी बदौलत दुनिया को आकाश को समझ सकने की दृष्टि मिली और गैलिलियो अंतरिक्ष विज्ञान के प्रणेता कहलाए. गैलिलियो हर उस व्यक्ति के आदर्श हैं जो सिद्धांतों में नहीं, वरन् सच्चाइयों में विश्वास रखता है.

15 फरवरी 1564 को इटली के पीसा शहर में आज के सांता मारिया से होकर जाने वाली एक गली में गिलिया अम्मान्नती और विंसेंजो गैलिली के एक बेटा पैदा हुआ. परिवार के बाकी बच्चों की तरह ही इस बच्चे की भी परवरिश शुरू हुई. इस बच्चे का नाम रखा गया गैलिलियो- एक साधारण बच्चा जिसका भविष्य असाधारण था.
पिता गैलिली संगीत शास्त्र के ज्ञाता और एक संगीतकार थे. ये मूल रूप से फ्लोरेंस के निवासी थे जो पीसा में कार्य करते थे. वे संगीत रचना के सन्दर्भ में हार्मनी यानी सहस्वरता से संबंधित अपने प्रयोगों का प्रदर्शन भी किया करते थे. यह परिवार बहुत प्रतिष्ठित और शक्तिसंपन्न था और बड़े ठाट-बाट से जीवन-यापन करता था. हालांकि किन्हीं कारणों से 1570 में आर्थिक विपन्नता का शिकार होकर अपने छः वर्ष के बेटे को कुछ संबंधियों के हवाले छोड़कर इस परिवार को फ्लोरेंस लौट जाने को बाध्य होना पड़ा था. उस जमाने में आर्थिक समस्याओं से गुजर रहे परिवार के किसी बच्चे का अपने किसी सम्बन्धी के घर पलना-बढ़ना बहुत आम बात थी. गैलिलियो दो वर्षों तक अपने संबंधियों के साथ रहकर 1572 में फिर से अपने परिवार के साथ रहने आ गए.
10 साल के हो चुके गैलिलियो की उम्र के बाकी बच्चे जब बाहर खेलने-कूदने में व्यस्त रहा करते थे तब वे अपनी खिड़की से बाहर पीसा की मीनार पर ध्यान टिकाए इसकी संरचना के सिद्धांतों को समझने की अबूझ कोशिशों में लगे रहते थे.
इस संरचना के भौतिक सिद्धांतों को समझने के सिलसिले में अक्सर वे खुद से ही सवाल-जवाब किया करते और दूसरों से तर्क-वितर्क व झगड़े. उस जमाने में ब्रह्माण्ड के सिद्धांतों की व्याख्या का सारा दारोमदार चर्च के एकाधिकार के अंतर्गत आता था. पर गैलिलियो में अब इतनी समझ आ गई थी और वे चर्च द्वारा दिए गए विज्ञान और ब्रह्माण्ड से संबंधित कई सिद्धांतों और तथ्यों पर शक तथा सवाल उठाने लगे थे.
गैलिलियो बचपन में बड़े रचनात्मक और उत्साही थे. उनकी उम्र के दूसरे बच्चे जहां अपने लिए खिलौने खरीदकर लाते थे वहीं गैलिलियो अपने खिलौने खुद निर्मित करते थे. उनमें से कुछ काम करते तो कुछ नहीं लेकिन उनके प्रयोगों और आविष्कारों का सिलसिला थमा नहीं.
यह सब तो भविष्य में उनके द्वारा होने वाले बड़े आविष्कारों की छोटी-सी भूमिका भर थी. वे सतर्क प्रेक्षक और बड़े ही जिज्ञासु थे. खास तौर से तब जब उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं मिल पा रहे हों. अधिकांशतः वे स्वाध्याय और शोधों द्वारा खुद ही उत्तर ढूढ़ने की कोशिश किया करते थे. कभी-कभी वे चित्र भी बनाते थे. उनके चित्रों में सूर्य या चांद की स्थिति बहुत सटीक हुआ करती थी.
इस बच्चे में ऐसा क्या था? वह क्या था जिसने इस बच्चे को इतना खास बनाया?

गैलिली ने बेटे गैलिलियो का दाखिला फ्लोरेंस से 35 किलोमीटर दूर वल्लोम्ब्रोसा स्थित कैमलडोलेस मोंटेसरी में करवाया ताकि वे पढ़ने-लिखने में कुशल होने के साथ ही दर्शन और इतिहास जैसे अन्य विषय भी सीख सकें. और फिर 13 साल की उम्र में उच्च शिक्षा के लिए गैलिलियो को एक अन्य मोंटेसरी में भेजा गया जो बेनेडिक्ट धार्मिक संप्रदाय के द्वारा संचालित होता था. यहां उन्हें ग्रीक, लैटिन और तर्क शास्त्र जैसे विषय पढ़ने थे. ये विषय चिकित्सा शास्त्र की पढ़ाई के लिए अनिवार्य थे क्योंकि उस जमाने में किताबें ग्रीक और लैटिन जैसी भाषाओं में ही छपते थे. गैलिली ने चिकित्सा शास्त्र को ही बेटे के कैरियर के रूप में चुना था.
बचपन में गैलिलियो की बड़ी इच्छा थी कि वे एक पुरोहित बने. 17 साल की उम्र में शुरुआती शिक्षा पूरी कर गैलिलियो ने पिता की इच्छा का मान रखते हुए पीसा विश्विद्यालय में चिकित्सा शास्त्र की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया. लेकिन अंततः चिकित्सा शास्त्र की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर उन्होंने गणित की पढ़ाई शुरू कर दी. यदि किसी व्यक्ति को कोई चीज दिलोदिमाग से पूरी तरह स्वीकार नहीं हो तो वह इसे पूरा करने में सक्षम नहीं होगा. गैलिलियो के संदर्भ में वो क्या बात थी कि उन्होंने अपना विषय बदल लिया? पिता की इच्छा थी या कुछ और? वास्तव में कारण कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण था. दरअसल उन्होंने अपनी रुचिओं की गहराई से छानबीन की और पाया कि जिन प्रश्नों और जिज्ञासाओं में तब के विद्वज्जन और वे खुद भी उलझे रहा करते थे, उन वैज्ञानिक सच्चाइयों की तथ्यात्मक खोज करने में उनकी अभिरुचि थी. वे सिद्धांतों का जानकार बनने की अपेक्षा सत्यों और तथ्यों का अनुसंधानकर्ता बनने को व्यग्र थे.
1581 में एक दिन पीसा के एक गिरजाघर में बैठे हुए 17 साल के गैलिलियो ने अपने सिर के ऊपर डोलता हुआ एक लैम्प देखा. उस दिन उनका ध्यान एक ऐसे तथ्य पर गया जिसपर उनसे पहले कभी किसी का ध्यान नहीं गया था. उन्होंने देखा कि हर दोलन में लैम्प द्वारा लिया गया समय समान था. अपने प्रश्नों का उत्तर पाने की अनवरत कोशिशों और लैम्प के दोलन की समयावधि की जानकारी के फलस्वरूप उन्होंने पेंडुलम का आविष्कार किया.
भार की संकल्पना, गतिमान वस्तुओं की अवधारणा और वैज्ञानिक सच्चाइयों के प्रति गहन जिज्ञासा ने गैलिलियो को गणित का ज्ञान अर्जित करने की ओर प्रेरित किया. पेंडुलम के आविष्कार के बहुत अर्सा बाद गैलिलियो को यह सूझा कि इस सिद्धांत का उपयोग समय मापने में भी किया जा सकता था.

1583 में गैलिलियो ने संयोग से एक बार ग्रीक गणितज्ञ युक्लिड की ज्यामितिक अवधारणाओं पर एक संभाषण सुना. इससे वे इतने प्रभावित हुए कि चिकित्सा शास्त्र की पढ़ाई छोड़कर गणित की शिक्षा लेना शुरू कर दिए. यही वो समय था जब चिकित्सा शास्त्र से उन्हें ऊब होने लगी थी और गणित ही उनकी एकमात्र रुचि का विषय बन गया था. विश्वविद्यालय की तरफ से उनके माता-पिता को चेतावनी भी भेजी गई कि गैलिलियो कहीं विफल न हो जाए. यह सच्चाई जानकर पिता को दुःख तो हुआ लेकिन कम-से-कम स्नातक की परीक्षा उतीर्ण कर लेने के लिए उन्होंने बेटे को सिर्फ गणित में प्रशिक्षित करने का निश्चय किया और इसके लिए टस्कन कोर्ट (दरबार) के ओस्टिलियो रिक्की नामक गणितज्ञ की मदद ली. ओस्टिलियो रिक्की किसी समय इटालियन गणितज्ञ तर्ताग्लिया के विद्यार्थी रह चुके थे. तर्ताग्लिया ही वो शख्स थे जिनके द्वारा युक्लिड के “एलिमेंट” पर पीसा विश्वविद्यालय में पढ़ाए गए एक पाठ्यक्रम में गैलिलियो शामिल हुए थे. इस तरह गैलिलियो को युक्लिड और आर्कमिडीज के कार्यों को तर्ताग्लिया द्वारा किए गए इटालियन अनुवादों के माध्यम से जानने-समझाने का भरपूर मौका मिला.
1585 तक गैलिलियो विश्वविद्यालय छोड़ चुके थे और फ्लोरेंस में युवा विद्यार्थियों को व्यक्तिगत रूप से गणित की शिक्षा देने लगे थे. 1586 की गर्मियों में वे वल्लोम्ब्रोसा में पढ़ाने लगे थे और साथ ही उन्होंने अपनी पहली वैज्ञानिक किताब ‘द लिटल बैलेंस’ (ला बैलेंसिटा) लिखी जिसमें पदार्थों के विशिष्ट घनत्व (सापेक्षिक घनत्व) को नापने के लिए आर्कमिडीज के सिद्धांत का प्रयोग एक तुला के उपयोग से किये जाने की व्याख्या थी.
1588 -1589 से गैलिलियो अपने पिता के अंशकालिक सहायक के तौर पर काम करने लगे जो तब हार्मनी (सहस्वरता) की क्रिया-विधि से संबंधित प्रयोग कर रहे थे. गैलिली का एक कमरा उनके पसंदीदा वाद्य-यंत्रों से भरा हुआ था. वहां हर किस्म के वाद्य-यन्त्र थे: कई तरह के तार वाद्य, घन वाद्य, वजनें और न जाने क्या-क्या. ऐसा कहा जाता है कि इस अनुभव ने गैलिलियो को अपने विचारों को प्रयोगों के आधार पर परखने की सूझ दी. वे गेंदों, उत्तोलकों, पेंडुलमों और दूसरी कई वस्तुओं के साथ प्रयोग करने लगे. वे जानना चाहते थे कि वस्तुएं क्यों तैरतीं या डोलती हैं. वस्तुओं की गति के बारे में ज्ञान पाने को वे आतुर थे. उन्होंने वस्तुओं की नियतकालिक गति की गणितीय व्याख्या प्रस्तुत की.
1588 में गैलिलियो ने रोम के बोलोग्ना विश्वविद्यालय में एक प्राध्यापक के पद पर आवेदन देने और क्लेवियस से मिलने के लिए रोम जाने का निश्चय किया. क्लेवियस जेसुइट कॉलेजियो रोमानो में गणित के प्रोफेसर थे. उस समय ‘गुरुत्व केंद्र’ जेसुइट गणितज्ञों के बीच चर्चा का बेहद लोकप्रिय विषय था. चूंकि बोलोग्ना विश्वविद्यालय में पढ़ाने की गैलिलियो की तीव्र इच्छा थी इसलिए इसी विषय से संबंधित अपना शोध वे क्लेवियस के सामने प्रस्तुत करने के लिए ले गए. उनके शोध से क्लेवियस बेहद प्रभावित हुए लेकिन यह नौकरी उन्हें नहीं मिल सकी थी क्योंकि उनके पास कोई औपचारिक उपाधि नहीं थी. गैलिलियो ने सार्वजनिक व्याख्यानों में भाग लिया, ज्यामिति पर लेख लिखे और अन्य गणितज्ञों के साथ विचार-विमर्शों में भागीदारी की. साथ-ही-साथ वे क्लेवियस के संपर्क में भी लगातार बने रहे. विचार-विनिमय का यह सिलसिला कई वर्षों तक चलता रहा और ‘ठोस वस्तुओं के गुरुत्व-केंद्र’ पर किए गए शोध (की प्रति), जो वे रोम में ही छोड़कर लौट आए थे, पर अब काफी जोर-शोर से चर्चा होने लगी थी. इसका परिणाम यह हुआ कि गैलिलियो को कॉलेजियो रोमानो में पाठ्यक्रमों के लिए बनाए गए लेक्चर नोट्स मिलने लगे, जिनकी प्रतियां आज भी सुरक्षित हैं.
गैलिलियो के गुरुत्व के एक सिद्धांत से उच्च पदस्थ कुलीन गणितज्ञ गुइडोबाल्डो डेल मोंटे बहुत प्रभावित हुए. मोंटे ने कई किताबें भी लिखी थीं. मोंटे की मदद से गैलिलियो को 1589 में पीसा विश्वविद्यालय में नौकरी मिली. तब उनकी उम्र सिर्फ 25 साल थी.
उनके शोधों और अन्वेषणों का सिलसिला निर्बाध चल रहा था. गणित पढ़ाते हुए वे अपने छात्रों से भार, आयतन और संतुलन आदि के बारे में बातें किया करते थे. आयतन मापने के लिए उन्होंने तैरती हुई वस्तुओं के साथ प्रयोग किए, चूंकि यह माना जाता था कि केवल वजनी वस्तुएं ही तीव्र गति से पृथ्वी की ओर आती हैं. प्रचलित मान्यताओं को वे तथ्यों के आधार पर परखना चाहते थे.
ये शोध और प्रयोग उन बहसों का नतीजा थे जिन्हें गैलिलियो ने अरस्तू के ‘प्रकृति के नियम’ कड़ी का एक नियम कि “वजनी वस्तुएं हलकी वस्तुओं की अपेक्षा जल्दी गिरती हैं” को प्रायोगिक रूप से जांचने के क्रम में शुरू किया था.

पीसा विश्वविद्यालय में पढ़ाते हुए गैलिलियो उस समय के प्रचलित गणितीय सिद्धांतों के अध्यापन के प्रति प्रतिबद्ध थे. ये सिद्धांत अरस्तू के विचारों पर आधारित थे. गैलिलियो ने अरस्तू के सिद्धांतों की जांच-परख करने का निश्चय किया. गैलिलियो का विश्वास था कि गिरती हुई वस्तुएं अपने भार से निरपेक्ष होती हैं और किसी भी खाली जगह में एक समान गति से गिरतीं हैं. यह सिद्ध करने के लिए उन्होंने अलग-अलग वजन की कई वस्तुओं को एक तिरछी पहाड़ी से लुढ़काकर बहुतेरे परीक्षण किए. कुछ समयांतरालों पर वे इन वस्तुओं की स्थिति भी दर्ज करते जाते थे. अपनी किताब ‘डी मोटू’ (ऑन मोशन) में उन्होंने इसके बारे में संक्षेप में लिखा है. लेकिन उन्हें अरस्तू के सिद्धांत को गलत सिद्ध करने के लिए किसी ऊंची जगह की तलाश थी. आखिर वे पीसा की 54 मीटर ऊंची मीनार पर चढ़ गए जिसे वे बचपन से देखते आए थे. मीनार की चोटी से उन्होंने अलग-अलग आकार और वजन की गेंदें गिराईं. हर गेंद को भूमि पर पहुंचने में एक समान समय लगा था जिसे देखकर दर्शकों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. वे अरस्तू के सिद्धांत को ‘गलत’ प्रमाणित कर चुके थे.
1592 में क्लेवियस की प्रभावपूर्ण सिफारिश और स्वयं अर्जित प्रतिष्ठा के कारण गैलिलियो को पीसा विश्वविद्यालय में गणित का चेयरमैन चुना गया. हालांकि उनके रूखे व्यवहार, तीखे तेवर और अरस्तू के सिद्धांतों की आलोचना करने की वजह से गैलिलियो का पीसा विश्वविद्यालय के साथ किया गया दो वर्षों का अनुबंध बढ़ाया नहीं जा सका. पीसा विश्वविद्यालय से गैलिलियो खुश नहीं थे क्योंकि वहां प्राध्यापकों को टोगा पहनना पड़ता था. (टोगा प्राचीन रोम का एक विशिष्ट पहनावा था. यह लगभग 20 फीट यानी 6 मीटर लम्बा एक विशेष कपड़ा होता था जो कुर्ते के ऊपर पहना जाता था जिससे पूरा शरीर ढंका रहता था.) गैलिलियो को यह टोगा पहनना बेहद नागवार लगता था, खासतौर से अपने प्रयोगों के दौरान. उन्होंने इसे पहनने से इंकार कर दिया था. इसके लिए उन्हें जुर्माना भी भरते रहना पड़ता था. यह भी कहा जाता है कि साल भर पहले पिता के गुजर जाने के समय उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. सबसे बड़े पुत्र होने के नाते पूरे परिवार की जिम्मेदारी अब उन्हीं के कंधों पर आ गई थी. पीसा विश्वविद्यालय से होने वाली आय पर्याप्त नहीं थी. न तो इसमें कोई बढ़ोत्तरी होने की संभावना थी, न ही अनुबंध के नवीनीकरण की कोई गुंजाइश. अरस्तू को गलत साबित कर उन्होंने पीसा विश्वविद्यालय में अनेक शत्रु बना लिए थे. आखिर उन्होंने सार्वजनिक रूप से अरस्तू को चुनौती दी थी. इसने उनकी काबीलियत स्वीकार करने में विश्वविद्यालय के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी थी.
खैर, किसी तरह गुइडोबाल्डो डेल मोंटे की प्रभावशाली सिफारिशों की वजह से वे पाडुआ विश्वविद्यालय में एक अच्छी नौकरी पाने में कामयाब रहे. पाडुआ विश्वविद्यालय उस जमाने के सर्व प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक था. विश्वविद्यालय गैलिलियो की नियुक्ति कर बहुत प्रसन्न था. इस तरह गैलिलियो पाडुआ विश्वविद्यालय चले आए और 7 दिसंबर 1592 को उन्होंने यहां अपना पहला लेक्चर दिया. अगले 18 सालों तक वे ज्यामिति, यांत्रिकी और खगोलशास्त्र पढ़ाते रहे.
इसी कालखंड में उन्होंने अपने कई महत्वपूर्ण आविष्कार किए. 1593 में पाडुआ में पढ़ाते हुए वे अक्सर आर्सेनल नामक स्थान पर जाया करते थे, जहां वेनिस के जहाजों पर माल ढुलाई हुआ करती थी. गैलिलियो को यांत्रिकी की तकनीकों के प्रति गहरी रुचि थी. आर्सेनल आने-जाने से वे नॉटिकल तकनीक और जहाज निर्माण जैसी विधा के प्रति आकर्षित हुए. इसी समय वे वेनिस के सत्ताधारियों की ओर से पोतों में चप्पू के स्थान निर्धारण के लिए संपर्क किए गए. इस मुद्दे को हल करने के लिए गैलिलियो ने चप्पू को उत्तोलक दंड (लीवर) की तरह तथा पानी को तकनीकी रूप से कब्जे के रूप में व्यवहार में लाए. एक साल बाद चप्पू प्रकरण को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने पम्प का मॉडल विकसित किया. यह पम्प एक ऐसा यन्त्र था जिसकी मदद से केवल एक घोड़े की सहायता से पानी निकाला जा सकता था.

लेकिन गैलिलियो को प्रारंभिक अवस्था वाले थर्मामीटर ईजाद करने की आखिर क्या जरूरत पड़ी थी?
1591 में पिता की मृत्यु के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी के साथ ही एक बहन के लिए दहेज जुटाने का बोझ भी इन्हीं के मत्थे आ गया था. दहेज एक ऐसी समस्या है जिसका अस्तित्व मानव सभ्यता के इतिहास के साथ आज तक अनवरत बना हुआ है. थर्मामीटर के आविष्कार से उन्होंने अच्छा लाभ कमाया और उनकी सभी तात्कालिक जरूरतों की पूर्ति हो गई. उनके इस आविष्कार की बदौलत पहली बार तापमान के उतार-चढ़ाव को मापना संभव हो सका. उन्होंने कुछ लाभ तो इस समय भी कमाया लेकिन लाभ का सुनहरा मौका उन्हें 1596 में तब मिला जब उन्होंने मिलिटरी कम्पास (सैनिकों के लिए दिशा-सूचक यन्त्र) का आविष्कार किया. आमजन के उपयोग के लिए कम्पास का उन्नत स्वरूप 1597 में बाजार में आया. इसका उपयोग भूमि सर्वेक्षणों में हो सकता था. इससे गैलिलियो ने काफी धन कमाया. यह यन्त्र लागत के मुकाबले तीन गुनी कीमत पर बिक रहा था. इस बीच अपनी आय में और अधिक इजाफा के लिए इस यन्त्र के उपयोग की विधि पर वे लेक्चर देना भी शुरू कर चुके थे.
ज्यामितिक कम्पास और थर्मामीटर का आविष्कार कर गैलिलियो प्रसिद्ध हो गए थे. पाडुआ में उनका पढ़ाना जारी ही था जहां उनके काफी अनुयायी थे. अपने कौशल और प्रयोगों की वजह से उनकी खास पहचान बनती जा रही थी. उसी साल गैलिलियो ने गति और ऊंचाई से गिरने वाली वस्तुओं के सन्दर्भ में अपने सिद्धांतों का और परिष्कार करते हुए त्वरण के सार्वभौमिक नियम का प्रतिपादन किया. जीवन के दुःख और पैसों की आवश्यकता ने गैलिलियो को आविष्कारों के जुनून से भर दिया था और इसमें बचपन की रुचियों व प्रयोगों में दिलचस्पी का स्वभाव काफी मददगार साबित हुई. उन्होंने कई गणितीय यन्त्र बनाए और बेचे.

समय के साथ गैलिलियो की निजी जिंदगी में काफी उतार-चढ़ाव आए और 1599 में वेनिस की एक यात्रा के दरम्यान उनकी मुलाकात मरीना गाम्बा नामक एक महिला से हुई. दोनों एक-दूसरे को देखते ही प्रेम में पड़ गए. गैलिलियो पाडुआ के बोर्डा डी विग्नाली में रहा करते थे जबकि मरीना वेनिस में रहती थी. गैलिलियो मरीना से शादी नहीं कर सकते थे क्योंकि एक तो वे उम्र में उनसे काफी छोटी थीं, दूसरे वे निम्न सामाजिक हैसियत की थीं. उस जमाने में समाज में ऐसे रिश्ते स्वीकार नहीं किए जाते थे. मरीना जब गैलिलियो के पहले बच्चे की मां बनने वाली थीं तब गैलिलियो उन्हें अपने पास ही एक घर में ले आए जो उनके घर से केवल पांच मिनट की दूरी पर था. इस तरह उन्होंने मरीना को एक रखैल की तरह रखा और उनके तीन बच्चे हुए. बड़ी बेटी वर्जीनिया 1600 में पैदा हुई जबकि छोटी बेटी लिविया 1601 में और बेटा विन्सेंजियो 1606 में पैदा हुए. चूंकि उनकी बेटियां माता-पिता की बगैर शादी हुए जन्मी थीं, इस वजह से उनकी शादी अच्छे घरों में हो सकने का एकमात्र उपाय दहेज की बहुत बड़ी रकम ही हो सकती थी लेकिन उस समय गैलिलियो की आय इसके लिए पर्याप्त नहीं थी. इसलिए उन्होंने बेटियों को फ्लोरेंस से कुछ मील दूर स्थित अर्केत्री के सैन मट्टेओ कॉन्वेंट में भेजने का निश्चय किया. ऐसा कहा जाता है कि प्रतिष्ठित और सम्मानित परिवारों के माता-पिता अपनी बेटियों को कॉन्वेंट में तबतक रहने को भेज देते थे जबतक कि उनके लायक कोई उचित वर नहीं मिल जाए. लेकिन यह आसान काम नहीं था.

सूर्य जगत का केंद्र है, चन्द्रमा पृथ्वी के चक्कर लगता है आदि प्रश्नों और सिद्धांतों में गैलिलियो की बचपन से रुचि थी. यह सब जर्मन गणितज्ञ और खगोलशास्त्री निकोलस कोपरनिकस की मान्यताएं थीं लेकिन उन्होंने कभी भी इस सन्दर्भ में कोई आविष्कार या प्रयोग नहीं किया था. गैलिलियो अनुमानों पर विश्वास करने की बजाए अपने प्रश्नों का वास्तविक उत्तर प्राप्त करना चाहते थे.
1609 में एक दिन उन्होंने एक डच चश्मा निर्माता द्वारा स्पाई ग्लास (जासूसी का चश्मा) के आविष्कार की खबर सुनी. यह एक ऐसा यन्त्र था जिसके उपयोग से बहुत दूर स्थित वस्तु को बहुत करीब से देखने जैसा महसूस किया जा सकता था.
कोपरनिकस के इस सिद्धांत का कि पृथ्वी व अन्य ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं, का गैलिलियो खुलकर समर्थन करने लगे. ऐसा करते हुए वे अरस्तू और कैथोलिक चर्च द्वारा स्थापित नियमों का उल्लंघन कर रहे थे. इसलिए ब्रह्माण्ड और ग्रहों के बारे में स्वयं अध्ययन करने के लिए उन्होंने स्पाई ग्लास का बेहतर स्वरूप गढ़ने का निश्चय किया. गैलिलियो ने सोचा कि ऐसा यन्त्र सेना के कमांडरों के लिए काफी मददगार होगा. और इसलिए उनका पहला आविष्कार स्पाई ग्लास का विकसित मॉडल का निर्माण था. गैलिलियो का स्पाई ग्लास थोड़ा अलग और काफी बेहतर था. उन्होंने इसमें एक ट्यूब के भीतर दूसरा ट्यूब कुछ इस तरह फिट किया था कि वह आसानी से आगे-पीछे खिसकाया जा सकता था जिसकी वजह से देखने वाला व्यक्ति लेंस का फोकस परिवर्तित करने में सक्षम हो पाता था. गैलिलियो ने लेंस का आकार भी बदल डाला. इन परिवर्तनों से स्पाई ग्लास और अधिक शक्तिशाली हो गया था और 1609 के नवम्बर तक उन्होंने ऐसे लेंसों का निर्माण कर लिया जो किसी वस्तु को इसके वास्तविक आकार की तुलना में तीन गुना बड़ा कर के दिखा सकता था. कुछ और परिवर्तनों के बाद उन्होंने 10 गुनी क्षमता वाले स्पाई ग्लासों का निर्माण किया और इसका नाम रखा ‘टेलिस्कोप’. इस टेलिस्कोप को वेनिस में एक अति प्रभावशाली सीनेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया जिससे गैलिलियो को न सिर्फ ख्याति मिली बल्कि उनका वेतन भी बढ़ा. इस आविष्कार के कारण गैलिलियो अनेक सार्वजानिक सम्मानों से भी नवाजे गए.

अगस्त 1609 में गैलिलियो ने अपने टेलिस्कोप को वेनिस के कुछ खरीदारों को दिखाया. खरीदारों की नजर में यह यन्त्र जहाजों की स्थिति का अंदाजा लगाने में काफी उपयोगी था इसलिए उन्होंने और टेलिस्कोपों के निर्माण के लिए गैलिलियो को वेतन देना सुनिश्चित किया. लेकिन गैलिलियो यहीं रुक जाना नहीं चाहते थे. वे अपने इस नए आविष्कार का बृहत्तर उपयोग करने के इच्छुक थे. 1609 के दिसंबर की एक शाम उन्होंने अपना टेलिस्कोप आकाश की ओर घुमाया ताकि उन आकाशीय पिंडों की झलक पा सके जिनकी सिर्फ बातें हुआ करती थीं. पहाड़ों और गड्ढों से भरपूर इसकी सतह बेहद खुरदरी थी जिसे आजतक साफ, चिकना और खूबसूरत समझा जाता था. यह चन्द्रमा के सतह की जानकारी थी. उन्होंने पूरा माह टेलिस्कोप से देखे गए चांद की सतह के स्केच बनाने में लगा दिए.

अबतक यह माना जाता था कि तारे दो तरह के होते हैं: एक जो किसी स्थान पर स्थित हो गए हों और दूसरे जो घूमा करते हैं जिन्हें ग्रह भी कहा जाता है जैसे- बुध, शुक्र, मंगल, पृथ्वी, प्लूटो, वृहस्पति और शनि. घुमंतू तारे बड़े आकर्षक थे. इन्होंने गैलिलियो का ध्यानाकर्षण किया. जाड़ों का पूरा समय उन्होंने इन घुमंतू तारों को जानने-समझने में खर्च किया और 1610 में अपने सबसे महत्वपूर्ण खोज पर मुहर लगाई. उन्होंने यह खोज की थी कि वृहस्पति के गिर्द चक्कर लगाने वाले ‘चांदों’ की संख्या चार है.
जल्दी ही ये चांद गैलिलियन मून्स के नाम से प्रसिद्ध हो गए. गैलिलियो ने अपनी खोजों पर एक छोटी किताब प्रकाशित की जिसका शीर्षक था ‘द स्टारी मैसेंजर’. मार्च 1610 में इस किताब की 550 प्रतियाँ छपी थीं जिसके प्रति आम जनता का उत्साह और प्रतिसाद असाधारण था. इस किताब को उन्होंने पीसा विश्वविद्यालय के एक पूर्व विद्यार्थी कॉसिमो डे मेडिसी को समर्पित किया था जो 1609 में अपने पिता की मृत्यु के बाद कॉसिमो द्वितीय के नाम से टस्कन का प्रभावशाली ड्यूक बन गया था. गैलिलियो ने ग्रहों को ‘मेडिसियन स्टार्स’ का नाम दिया. उन्होंने कॉसिमो को एक टेलिस्कोप और किताब की एक प्रति भी भिजवाई. इसके परिणामस्वरूप 1610 के वसंत में गैलिलियो को पीसा विश्वविद्यालय में प्रमुख गणितज्ञ और दार्शनिक का पद मिला. 18 सालों के बाद उन्होंने पीसा विश्वविद्यालय का दौरा किया था और यह पदवी मिलने के बाद उन्होंने फ्लोरेंस लौटना तय कर लिया.

सितम्बर 1610 में गैलिलियो नया पद ग्रहण करने फ्लोरेंस आ गए. आगामी शोधों के लिए यहीं उन्होंने अपना टेलिस्कोप व्यवस्थित किया. फ्लोरेंस में सर्दियों में वे बीमार पड़ गए. यह बीमारी पाडुआ में हुई एक घटना का परिणाम थी. हुआ यह था कि पाडुआ के निकट एक बार गैलिलियो अपने दो दोस्तों के साथ एक दोपहर में गर्मी से बचने के लिए एक भूमिगत कमरे में झपकी ले रहे थे. यह कमरा पास की एक गुफा से एक सुरंग द्वारा आ रही हवा के कारण ठंढा था. फिर पता नहीं क्या हुआ जब ये तीनों जन अचानक अस्वस्थता महसूस करने लगे. एक दोस्त ने तो वहीं दम तोड़ दिया जबकि दूसरे दोस्त की दो सप्ताह बाद मृत्यु हो गयी. केवल गैलिलियो ही सलामत बचे थे लेकिन अब इनपर भी उस अनजानी घटना का प्रभाव दिखना शुरू हो गया था. वे लगातार अपने अध्ययनों और शोधों में रत थे. उन्होंने यूरोप के खगोलशास्त्रियों, जो उनकी खोजों को चुनौती दे रहे थे, को बेचने के लिए बड़ी संख्या में टेलिस्कोपों का निर्माण किया. इन टेलीस्कोपों ने गैलिलियो के सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप से और बेहतर तरीके से समझाने में यूरोपीय विद्वानों की काफी मदद की.

जबकि गैलिलियो की किताब और सौर-मंडल से संबंधित उनके खोज सत्यापित हो चुके थे, पर अब भी कुछ ऐसे लोग थे जिनकी दृष्टि में यह सब किसी अपराध से कम नहीं था. गैलिलियो चर्च के उन विश्वासों का खंडन कर चुके थे जो पृथ्वी को सौर-मंडल का केंद्र मानता आ रहा था. कैथोलिक चर्च अरस्तू के सिद्धांतों का अनुयायी था जबकि गैलिलियो ने अरस्तू के नियमों को गलत साबित करते हुए यह मान्यता दी थी कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी, चन्द्रमा और दूसरे सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं.
चर्च के कई गणितज्ञ गैलिलियो की खोजों को सही मानते थे लेकिन कई ऐसे भी थे जो इसे खारिज करने पर अमादा थे. पोप पॉल पंचम के आदेश से प्रीस्ट कार्डिनल बेल्लार्मिन ने गैलिलियो को चेतावनी दी कि वे कोपरनिकस के सिद्धांतों का समर्थन और व्याख्या करना बंद कर दें.
गैलिलियो एक धार्मिक व्यक्ति थे और बाइबिल में आस्था रखते थे लेकिन वे यह भी मानते थे कि बाइबिल लिखने वाले व्यक्ति से जरूर कोई गलती हो गई होगी इसलिए इसे पूरी तरह सच नहीं मान लेना चाहिए. यह वो समय था जब आम आदमी से बाइबिल पर आंख मूंद कर सिर्फ आस्था रखने की अपेक्षा की जाती थी, इसके प्रति विरोध का स्वर निकालने की नहीं. केवल पोप, जो चर्च का मुख्य पदाधिकारी होता था, को बाइबिल पर बात करने का अधिकार था क्योंकि केवल वही ऐसा करने के योग्य समझा जाता था. चर्च के कुछ पादरी गैलिलियो पर टीका-टिपण्णी करना शुरू कर चुके थे. उनके अनुसार गैलिलियो नास्तिक थे क्योंकि बाइबिल के विरुद्ध कुछ भी कहना ईश्वर के प्रति अपराध माना जाता था.

अपने सिद्धान्तों की पुष्टि के लिए गैलिलियो 1611 में रोम गए. वे ग्रैंड ड्यूक कॉसिमो की पालकी में सवार होकर भ्रमण करते रहे. पोप पंचम समेत वे कई धार्मिक नेताओं से मिले. पोप पंचम गैलिलियो से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने आजीवन गैलिलियो का मित्र बने रहने का वादा किया. गैलिलियो को एक रोमन उच्चाधिकारी प्रिंस फेडरिको केसी, जिनकी गणित में बहुत रुचि थी, द्वारा स्थापित लिंसीन अकादमी का सदस्य भी बनाया गया. यह उस वक्त के महान विचारकों का एक समूह था जिसने गैलिलियो की किताबें भी प्रकाशित करवाई.
यहीं पर गैलिलियो की मुलाकात एक उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त कार्डिनल पुरोहित (पादरी) मफ्फेओ बार्बेरिनी से हुई जिनसे वे दुबारा 1612 की शरद ऋतु में मिले जब ग्रैंड ड्यूक कॉसिमो ने मफ्फेओ को आमंत्रित किया था. तब रात के खाने के बाद तैरती हुई वस्तुओं के विषय पर वाद-विवाद में गैलिलियो भी शामिल हुए थे. मफ्फाओ गैलिलियो और उनके व्याख्यान से बहुत प्रभावित हुए.

पृथ्वी सूर्य के गिर्द चक्कर लगाती हैं ऐसा दावा करने की वजह से करीब 12 साल पहले रोम में गियोर्डानो ब्रूनो नाम के एक डमनिकी (संत डमनिक से संबंधित) रोमन कैथोलिक भिक्षु को जिन्दा जलाकर मार डाला गया था और अब गैलिलियो भी सत्य के इसी खतरनाक रास्ते पर बढ़ रहे थे. वे खगोलशास्त्री निकोलस कोपरनिकस से सहमत थे. कोपरनिकस ने 1543 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘डि रिवोल्युशनिबस’ में यह मत दिया था कि पृथ्वी अपने अक्ष पर हर दिन एक बार और सूर्य के गिर्द एक साल में एक बार पूरा घूम जाती है. टेलिस्कोप से प्रयोगों के दौरान गैलिलियो भी इस तथ्य से परिचित हो चुके थे. वे जानते थे कि कोपरनिकस की खोज सही है.
चर्च की अवधारणाओं से गैलिलियो परिचित थे लेकिन वे अपनी खोजों को झुठलाना नहीं चाहते थे. 1613 में उन्होंने अपने अवलोकनों पर आधारित सूर्य के धब्बों (संस्पोट्स) के बारे में विचार प्रकाशित किया जो पुनः अरस्तू के विचार कि सूर्य बिल्कुल सुडौल है के विपरीत था. यह बात उन्होंने अपने एक विद्यार्थी को लिखी थी जिसमें यह वर्णित था कि कोपरनिकस के सिद्धांत बाइबिल के अनुच्छेदों का विरोधाभासी नहीं है लेकिन बाइबिल वस्तुओं के बारे में आम इंसान के विचारों और अनुभूतियों को आधार बना कर लिखी गई जबकि विज्ञान इनके बारे में बेहद सटीक और अलग सन्दर्भ प्रस्तुत करता है. लोगों ने इस पत्र की अनेक प्रतियां बनवाई और अलग-अलग तरीकों से इसकी व्याख्या की. एक ऐसी ही अशुद्ध प्रति रोम के धर्म न्यायाधिकरण यानी विधर्मियों का दमन करने वाले संघ के हाथ लगी. संभवतः गैलिलियो के शत्रुओं ने इस पत्र को भेजा था.
इस पत्र को सार्वजनिक किया गया और चर्च के धर्म न्यायाधिकरण संघ ने इसे ‘अप्रमाणिक कोपर्निकन सिद्धांत’ कहते हुए इस पर आपत्ति की. गैलिलियो ने अपनी सफाई पेश करने के लिए रोम की यात्रा की और आखिर पत्र की मूल प्रति पेश करने के बाद उन्हें तमाम आरोपों से बरी घोषित कर दिया गया. पर साथ ही उन्हें फिर से कोपरनिकस के नियमों की व्याख्या न करने की चेतावनी भी दी गई.
अरस्तू तथा चर्च के गलत नियमों के बरक्स कोपरनिकस के सही सिद्धांतों और अपने वक्तव्यों को सुदृढ़ करने के लिए गैलिलियो आंकड़े और प्रमाण जुटाने लगे. 1612 में उन्होंने ‘डिस्कोर्स ऑन बॉडीज इन वाटर’ का प्रकाशन किया जिसमें अरस्तू के उस नियम को खारिज किया गया था जिसके अनुसार वस्तुएं सपाट आकार की होने की वजह से तैर पाती हैं जबकि गैलिलियो का मत था कि वस्तुओं का तैरना उनके वजन के द्वारा पानी की विस्थापित मात्रा पर निर्भर करती है.
जब गैलिलियो अपने सिद्धांतों की पुष्टि के लिए प्रमाण जुटाने में व्यस्त थे उसी दौरान अक्टूबर 1613 में उनकी पद-प्रतिष्ठा के चलते उनकी दोनों बेटियों को सेंट मत्तीओ कॉनवेंट में दाखिले की स्वीकारोक्ति मिल गई. उस समय वर्जीनिया 13 साल की और लीविया 12 साल की थी. उनकी पत्नी और बेटा पाडुआ में ही रह रहे थे. गैलिलियो अब एक पिता की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रहे थे.

1616 में गैलिलियो ने अपने भूतपूर्व विद्यार्थी कॉसीमो डी’मेडिसी की मां कैस्टेली को एक पत्र लिखा था जिसमें चर्च के प्रभावशाली व्यक्तियों को प्रभावित करने के आरोपों के विरोध में उन्होंने खुद का बचाव किया था. यह पत्र बाद में ‘ग्रैंड डचेज क्रिस्टीना के नाम पत्र’ (लेटर टु द ग्रैंड डचेज क्रिस्टीना) के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इस पत्र में यह बताया गया था कि बाइबिल के अनुच्छेद किस तरह वैज्ञानिक तथ्यों के विरोधाभासी हैं. गैलिलियो ने लिखा था, “खगोलशास्त्र के संदर्भ में इसमें (बाइबिल में) तनिक भी ध्यान नहीं दिया गया है तभी तो किसी ग्रह का नाम तक भी नहीं लिया गया है. यह निश्चित है कि इसकी (बाइबिल की) मंशा यदि लोगों को खगोलशास्त्र का ज्ञान देना होता तो ऐसा कभी नहीं हुआ होता कि इसमें ऐसे महत्वपूर्ण और गहन विषय को यूं ही छोड़ दिया गया होता.”
इस समय तक काफी लोग कोपरनिकस की अवधारणाओं को सच मानने लगे थे. इन्हीं लोगों में से एक थे प्रिंटर फ्रिअर फोस्कारिनी. फ्रिअर द्वारा छापी गयी पुस्तिकाओं में वर्णित होता था कि बाइबिल के अनुच्छेदों के आलोक में भी कोपरनिकस के सिद्धांतों को निश्चित रूप से माना जा सकता है. फ्रिअर द्वारा बांटी जाने वाली इन पुस्तिकाओं के कारण विश्वविद्यालयों और चर्चों में कोपरनिकस के सिद्धांतों के माननेवालों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी. धीरे-धीरे बाइबिल के बारे में चर्च के कुछ धर्मानुयायियों के पुरातन मंतव्य और सार्वभौमिक वैज्ञानिक सत्यों के बीच के मतान्तर से युद्ध की-सी स्थिति पैदा होती चली गयी.
1616 में कैथोलिक विशेषज्ञों की एक समिति ने एक फरमान जारी की जिसके अनुसार सूर्य को ब्रह्माण्ड का केंद्र मानना प्रचलित धार्मिक मान्यताओं के विपरीत था और न्यायिक जांच के अंतर्गत आता था. अतः कोपरनिकस के सिद्धांतों को मानने वाले व्यक्ति पर न्यायिक कार्यवाही, यातना और दोषी पाए जाने पर मृत्युदंड तक दिए जाने का प्रावधान घोषित किया गया. इस आदेश के पारित होने के एक महीने बाद कोपरनिकस की किताब ‘डी रिवोल्यूशनिबस’ के साथ- साथ फ्रिअर की पुस्तिकाओं को भी प्रतिबंधित कर दिया गया.
जल्दी ही गैलिलियो को सम्मन भेजकर कार्डिनल बेलार्मिनो के घर बुलवाया गया जो चर्च के एक प्रभावशाली व्यक्ति थे. उन्होंने गैलिलियो को पृथ्वी की गति के संदर्भ में कोपरनिकस की अवधारणाओं को ‘मानने, पढ़ाने या किसी भी रूप में इसका पक्ष लेने’ से सख्त मना किया. गैलिलियो के पास इस आदेश को स्वीकार करने के सिवा कोई चारा नहीं था क्योंकि विकल्प सिर्फ दो थे: या तो इस आदेश को मानें या मृत्युदंड के भागी बनें. 4 अक्टूबर 1616 को अपनी बड़ी बेटी वर्जीनिया का ‘अंतिम घोषणा’ (फाइनल प्रोफेशन) नामक शपथ समारोह में हिस्सा लेने गैलिलियो फ्लोरेंस लौट आए. इस शपथ समारोह में वर्जीनिया ने नन बनने की प्रतिज्ञा ली और उस दिन के बाद से वे ‘सिस्टर मारिया सेलिस्टी ‘ कही जाने लगीं.

सितम्बर 1618 में गैलिलियो फिर बीमार पड़ गए और कुछ समय के लिए उन्हें काम बंद करना पड़ा. उस साल सितम्बर से नवम्बर के बीच फ्लोरेंस के आसमान में तीन धूमकेतु दिखाई दिए थे. चूंकि गैलिलियो बिस्तर पर पड़े थे और स्वयं अध्ययन करने में असमर्थ थे इसलिए उन्होंने जेजुइट (ईसा मसीह के रॉयल कैथोलिक समाज का सदस्य) गणितज्ञ पुरोहित फादर ग्रासी के साथ इन धूमकेतुओं की प्रकृति के बारे में लिखित वाद-विवाद करना शुरू किया. यह विवाद कई सालों तक चला और इसी बीच गैलिलियो की छोटी बेटी भी चर्च में शपथ लेकर नन बन गयी. इसके ठीक एक साल बाद जून 1619 में ग्रैंड ड्यूक कॉसीमो द्वितीय ने गैलिलियो के बेटे को उनका वैधानिक पुत्र घोषित कर दिया.
जनवरी 1621 में दिल के दौरे से पोप पॉल पंचम के गुजर जाने के बाद ग्रेगोरी XV नए पोप नियुक्त किए गए. फरवरी 1621 में ग्रैंड ड्यूक कॉसीमो द्वितीय का भी निधन हो गया. उनके दसवर्षीय पुत्र फर्डीनांडो द्वितीय को ग्रैंड ड्यूक कॉसीमो द्वितीय का उत्तराधिकारी बनाया गया. फर्डीनांडो द्वितीय को पिता के पदनाम के साथ ही दरबारी गणितज्ञ और दार्शनिक गैलिलियो भी उत्तराधिकार में मिले.
गैलिलियो ने सात साल की लम्बी अवधि तक चर्च के आदेशों का पालन तो किया लेकिन अपना शोध कार्य बंद नहीं किया. वे धूमकेतुओं के वाद-विवाद पर आधारित अपनी किताब ‘एसैअर’ की रचना में जुटे रहे. 1622 तक इसकी पाण्डुलिपि तैयार कर उन्होंने इसे प्रकाशित करने के लिए रोम स्थित लिंसिन अकादमी को भेजा. लेकिन कुछ अवांछित परिस्थितिओं की वजह से इसका प्रकाशन रुक गया. इसी बीच 1623 की गर्मियों में ग्रेगोरी XV के निधन के बाद नए पोप का चयन हुआ. ये व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि कार्डिनल मफ्फेओ बार्बरीनी ही थे जिन्हें पोप अर्बन VIII की उपाधि से नवाजा गया था. तात्कालिक रोम में उनके विचारों पर सकारात्मक रवैया अपनाने की आशा के साथ गैलिलियो ने तुरंत ही अपनी किताब पोप अर्बन को समर्पित कर दी.

गैलिलियो के विचारों में अभी भी दिलचस्पी होने के कारण पोप अर्बन ने एसैयर के प्रकाशन की अनुमति दे दी. उन्होंने गैलिलियो को खगोलशास्त्रीय कार्यों और अध्ययनों को आगे बढ़ाने के साथ ही इनके प्रकाशन की भी अनुमति दी बशर्ते ये तथ्यपरक हों और कोपरनिकस के सिद्धांतों के पोषक न हों. 1624 में पोप अर्बन VIII की तरफ से गैलिलियो को कोपरनिकस के उन सिद्धांतों के बारे में भी लिखने की छूट का आश्वासन मिला जो गणितीय उद्धरणों और सुझावों के संदर्भ में लिखे गए हों. अगले पांच हफ्तों के बीच पोप अर्बन और गैलिलियो करीब पांच बार मिले और टहलते हुए घंटों बातें करते रहे थे. उन दोनों के बीच 1616 के फरमान के संदर्भ में काफी विचार-विमर्श हुआ और अर्बन इससे सहमत हो गए कि कोपरनिकस के सिद्धांत कैथोलिक आस्था को बिल्कुल क्षति नहीं पहुंचाते. अर्बन इस बात से भी सहमत हो गए थे कि इस मुद्दे पर कैथोलिक विद्वानों के साथ गैलिलियो का तार्किक विचार-विमर्श होना चाहिए और तब यदि कोपरनिकस के सिद्धांतों को परम सत्य मान लिया जाए तो चर्च पर इसे मानने और लागू करने का दबाव डाला जा सकता है.
8 जून 1624 को अर्बन VIII द्वारा ग्रैंड ड्यूक फर्डीनांडो द्वितीय को लिखी हुई चिट्ठी के साथ गैलिलियो घर लौटे. इस चिट्ठी में गैलिलियो की महिमा का इन शब्दों में बखान किया गया था: ‘एक महान व्यक्ति जिसका यश स्वर्ग और धरती पर दूर-दूर तक फैलता जा रहा है.’ गैलिलियो फिर से अपने आविष्कारों और अध्ययनों में रत हो गए और अगली किताब लिखी- ‘दो मुख्य वैश्विक तंत्रों के बीच संवाद’ (डायलाग-कन्सर्निंग द टू चीफ वर्ल्ड सिस्टम्स). उन्होंने शोध का अगला दिलचस्प विषय चुना ‘समुद्र की ज्वार-भाटाएं’ और इसीपर लिखना शुरू किया. उधर सालों के परिमार्जन के बाद उनका टेलिस्कोप भी बहुत उन्नत हो चुका था और उनके प्रयोग भी. टेलिस्कोप के द्वारा उन्होंने मापन के अलग-अलग कई तरीके ईजाद किए जो समुद्र यात्रियों के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हुए.

निरंतर नए आविष्कारों और प्रयोगों में जुटे रहने के बावजूद गैलिलियो को हमेशा जो मुद्दा परेशान किए रहता था वह था सूर्य के ब्रह्माण्ड का केंद्र होने की उनकी खोज पर लगातार तर्क-वितर्क. लेकिन इस संदर्भ में कुछ भी बड़ा या विवादास्पद करने से पहले उन्होंने फरमान की गंभीरता को अच्छी तरह परखने का निश्चय किया. उन्होंने रेवेना के न्यायशास्त्री फ्रांसेस्को इंगोली, जो अधिप्रचार से संबंधित धार्मिक सभा के सचिव थे, को एक पत्र लिखा जिसमें 1616 में छपे उनके विचारों को चुनौती दिए गए विवाद का जिक्र था. इस पत्र में उन्होंने कोपरनिकस के सिद्धातों से सहमति तो जताई लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया, “मैं किसी ऐसे सत्य का पक्षपात करने की जिम्मेदारी नहीं लेता हूँ जिसे पहले से ही संशयात्मक और घृणित माना जा चुका हो.” इसी पंक्ति से पत्र की शुरुआत हुई थी. यह पत्र 1624 के दिसम्बर में रोम पहुंचा. दिसंबर के अंत तक पोप की तरफ से प्रत्युत्तर या असहमति जताने जैसा कोई भी समाचार फ्लोरेंस में नहीं पहुंचा.

किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं मिलने से गैलिलियो बड़े खुश थे कि अब वे ब्रह्माण्ड की कार्यप्रणाली के बारे में विचार और तर्क प्रस्तुत कर सकते थे. लेकिन अंततः उन्हें यह समझ आ गया कि इस तरह के वाद-विवादों में बतौर वैज्ञानिक उनका बहुमूल्य समय बर्बाद हो रहा था. इसलिए उन्होंने एक किताब लिखने की रूपरेखा बनाई जिसमें अलग-अलग पहलुओं को प्रस्तुत करने के लिए तीन काल्पनिक पात्रों की रचना की गयी थी.
पहला पात्र गैलिलियो के दृष्टिकोण का पक्षधर था और बेहद जहीन था. दूसरा पात्र संतुलित समझ रखने वाला एक व्यक्ति था जो विवाद के दोनों पक्षों को समझ सकता था. तीसरे पात्र का नाम सिम्प्लिसियो था जो जिद्दी और मूर्ख था. यह तीसरा पात्र गैलिलियो के उन सभी शत्रुओं का प्रतिनिधि था जिन्होंने गैलिलियो को सही साबित करने वाले सभी प्रमाणों को सिरे से नकार दिया था. जल्दी ही उन्होंने ऐसा ही एक और संवाद लिखा: “विश्व के दो महान तंत्रों के बारे में संवाद”.
गैलिलियो इस किताब पर छः सालों तक काम करते रहे थे और यह 1629 के दिसंबर में पूरी हो सकी. इस समय गैलिलियो की उम्र 63 साल थी. इस किताब को प्रकाशित करवाना आसान नहीं था. इसके लिए चर्च के आदेश की जरूरत थी क्योंकि इसमें कोपरनिकस के तंत्र की चर्चा थी. आदेश पारित करवाने की औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए किताब के साथ गैलिलियो ने खुद ही रोम जाने का निश्चय किया और ‘दो मुख्य वैश्विक तंत्रों के बीच संवाद’ को प्रकाशित करने हेतु लाइसेंस के लिए आवेदन दिया. 1631 के वसंत में उन्हें किताब में कुछ बदलाव करने को कहा गया. लेकिन समय गैलिलियो के अनुकूल नहीं था. उस साल गर्मियां शुरू होते ही पूरे यूरोप में काली मौत (ब्लैक डेथ) नामक एक भयंकर बीमारी फैल गई. यात्रा करना खतरनाक हो गया और इस वजह से गैलिलियो की पाण्डुलिपि किसी भी व्यक्ति द्वारा अनुमोदित नहीं हो सकी. कुछ बदलावों के बाद यह आंशिक रूप से रोम में और आंशिक रूप से फ्लोरेंस में स्वीकृत हो पाई. आखिरकार यह किताब स्वीकृत हुई और फ्लोरेंस में 1632 में प्रकाशित हुई. यह किताब बेहद सफल रही, लेकिन इसकी बाबत रोम में चर्चाओं का बाजार गर्म होना शुरू हो गया. गैलिलियो अब 68 साल के हो चुके थे और लगातार बीमारियों की वजह से काफी कमजोर हो गए थे.

अर्बन बतौर पोप परेशानियों में घिर चुके थे. आध्यात्मिक व्यक्ति होने के साथ ही वे एक राजनेता भी थे जिन्होंने अमीर बनने के लिए अपनी राजनैतिक शक्ति का इस्तेमाल किया था. उनपर कैथोलिक आस्थाओं की सुरक्षा में असफल होने का भी आरोप था. कोई नहीं जान सका कि अर्बन ने ‘डायलॉग्स’ खुद पढ़ा था या किसी ने उन्हें पढ़कर सुनाया था. किताब के विरुद्ध चर्च की त्वरित प्रतिक्रिया आई: तय पाया गया कि यह किताब कोपरनिकस के सिद्धांत का पक्षपाती है यानी यह 1616 के फरमान का निश्चित रूप से उल्लंघन करती है.
जनवरी 1633 में एक बार फिर जांच-पड़ताल के लिए गैलिलियो को रोम बुलवाया गया. वहां वे तस्कन दूतावास में दो महीने रहे. आखिर अप्रैल से उन्होंने अपने बचाव की शुरुआत की. अप्रैल 1633 के एक मंगलवार को वे रोम की धार्मिक न्याय संघ के पवित्र कार्यालय में लाए गए. उन्होंने यह दावा किया कि ‘डायलॉग्स’ पक्षपातहीन है. गैलिलियो की जांच के लिए बतौर जज दस कार्डिनल्स के एक समूह को नियुक्त किया गया जिसमें कार्डिनल फ्रांसिस्को बार्बरीनी भी शामिल थे. गैलिलियो से पहले से ही तैयार किए गए प्रश्न पूछने और उनके उत्तर धार्मिक न्याय संघ के जजों तक पहुंचाने के लिए दो अधिकारी और एक सचिव भी नियुक्त किए गए थे.

सितम्बर 1632 से शुरू हुई जांच-पड़ताल की कार्यवाही जुलाई 1633 तक चली. इस पूरी अवधि के दौरान गैलिलियो के साथ आदर भरा बर्ताव किया जाता रहा था और उन्हें कभी भी जेल में नहीं डाला गया. सुनवाई के शुरुआती दिनों में गैलिलियो ने यह स्वीकार नहीं किया कि वे कोपरनिकस के सिद्धांत को सच मानते हैं. अब जबकि आखिर सभी चर्च ने ‘डायलाग’ के प्रकाशन की मंजूरी दे दी थी तब कार्डिनलों को यह नहीं सूझ रहा था कि क्या करना उचित है. इसलिए उन्होंने यह फैसला किया किया कि इस मामले को बगैर किसी औपचारिक सुनवाई के हल किया जाए जिसके लिए पोप भी राजी थे. 10 मई को गैलिलियो फिर धार्मिक न्याय संघ के समक्ष प्रस्तुत हुए. हालांकि इस बार उनपर अपनी किताब में कोपरनिकस के सिद्धांतों को समर्थन देने की बात स्वीकार करने के लिए यातना भरी धमकी दी गयी थी. इन यातनाओं के सामने घुटने टेकते हुए गैलिलियो ने इस आरोप को स्वीकार तो कर लिया लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ वे अपने वक्तव्यों की सत्यता पर कायम रहे.
22 जून 1633 को गैलिलियो को उनके ‘डायलाग’ के लिए दोषी करार दिया गया और धार्मिक न्याय संघ के कारागार की एक कोठरी में डाल दिया गया. लेकिन जल्दी ही उनकी सजा को तीन भागों में संशोधित किया गया:
1) सिएना के प्रधान पादरी के घर पांच महीनों तक श्रमदान देना.
2) हमेशा के लिए धार्मिक न्याय संघ की कैद में रहना और बाद में मृत्युपर्यंत अपने घर में नजरबन्द रहना.
3 ) ‘डायलाग’ पर हमेशा के लिए प्रतिबन्ध लगना और कोपरनिकस के सिद्धांत के समर्थन में किसी भी और किताब के प्रकाशन की मनाही.
सजा में यह संशोधन कार्डिनल फ्रांसिस्को बार्बरीनी के प्रयत्नों का परिणाम था जिन्होंने अपने चाचा एम्बेसडर निकोलिनी को गैलिलियो के लिए संघर्ष करने को मनाया था. प्रधान पादरी खुद एक गणितज्ञ थे और गैलिलियो से बखूबी परिचित थे. वे अब बहुत कमजोर हो चुके थे. उन्होंने तो प्रधान गिरजाघर के प्राचीन घंटे को फिर से ढालने से संबंधित अपनी समस्या के बारे में गैलिलियो से सलाह-मशविरा भी किया था.
सिएना में ही गैलिलियो ने अपनी अंतिम किताब ‘टू न्यू साइंसेज’ (दो नए विज्ञान) लिखनी शुरू की. इस किताब में उन्होंने यंत्रविज्ञान और गतिविज्ञान से संबंधित अपने विचारों और अनुभवों को लिखा. इस किताब में भी ‘डायलाग’ के ही तीनों चरित्रों को विमर्श का माध्यम बनाया गया था. गतिशील वस्तुओं के व्यवहार की जांच-परख के सिलसिले में वेनेटियन आर्सेनल में चार दिनों तक चले वाद-विवाद का जिक्र करते हुए इस किताब की शुरुआत की गयी थी.

इस समय तक गैलिलियो के समर्थक उन्हें घर वापस भेज देने की मुहिम छेड़ चुके थे. इसतरह दिसंबर 1633 में उन्हें फ्लोरेंस के पास अर्सेट्री में आजीवन नजरबंदी के आदेश के साथ उनके घर भेज दिया गया. उनके किसी से भी मिलने या पढ़ाने पर पूरी तरह पाबन्दी लगाई गयी थी. गैलिलियो बिलकुल अकेले थे. उनके पास करने को और कोई काम था नहीं इसलिए वे अपनी किताब ‘टू न्यू साइंसेज’ पर काम करते रहे. किताब पूरी होने के बाद प्रकाशक ढूढ़ना एक टेढ़ी खीर से कम नहीं था क्योंकि यह चर्च की अवमानना का प्रश्न था. इसलिए इस किताब को आल्प्स के पर्वतों के पार तस्करी कर एक प्रोटेस्टेंट देश नीदरलैंड में पहुंचाया गया जहां कैथोलिक चर्च का कोई प्रभाव नहीं था. जून 1638 में यह किताब प्रकाशित हुई.
बुढ़ापे और गिरते स्वास्थ्य के चलते 1638 में गलिलियो को फ्लोरेंस के अपने घर में जाने की इजाजत मिल गयी ताकि वे अपने डॉक्टर्स के सानिध्य में रह सकें. गैलिलियो अपनी किताबें भी नहीं पढ़ सकते थे क्योंकि टेलिस्कोप में वर्षों तक झांकते रहने के कारण वे अंधे होने के कगार पर पहुंच चुके थे. तब भी वे लगातार अपने प्रयोग किए जा रहे थे. 1641 में ग्रैंड ड्यूक फर्डीनांडो ने विन्सेन्जियो विविअनी नाम के एक प्रतिभाशाली युवा गणितज्ञ को गैलिलियो के पास उनका साथ देने के लिए भेजा. उसी साल गैलिलियो ने समय को सही-सही दिखा सकने वाले पेंडुलम का आविष्कार कर अपने बचपन का सपना साकार किया.
नवम्बर तक गैलिलियो सर्दियों में होने वाले बुखार से इतने बीमार हो गए कि बिस्तर पकड़ लिए. इस बार की यह बीमारी ज्यादा गंभीर थी. 77 साल की उम्र में, 78वें जन्मदिन से से कुछ ही दिन पहले, 8 जनवरी 1642 को गैलिलियो ने अपने घर में अंतिम सांसें लीं. मृत्यु की घड़ी तक वे घर के भीतर नजरबन्द ही थे.
जैसे-जैसे समय गुजरता गया पृथ्वी और सूर्य के बारे में वैज्ञानिक सच्चाइयों से मुंह मोड़े रखना चर्च के लिए असंभव हो गया और 1758 में इसने कोपरनिकस के सिद्धांतों के समर्थन में किए/लिखे गए अधिकांश कार्यों पर से प्रतिबंध हटा लिया. 1822 तक यह साफ हो गया कि ब्रह्माण्ड का केंद्र पृथ्वी नहीं है और चर्च ने 1835 तक इसे पूरा समर्थन दे दिया. 1960 के दशक की शुरुआत में और 1979 में वेटिकन सभा की ओर से वक्तव्य जारी किए गए कि चर्च के हाथों गैलिलियो और उनके आविष्कारों के साथ दुर्व्यवहार हुआ और वे वैज्ञानिक सत्यों के आधार पर नहीं बल्कि शत्रुता के कारण गलत समझे गए. 20वीं शताब्दी में कई पोपों ने गैलिलियो के कार्यों का लोहा माना और लगभग 350 सालों के बाद 1992 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने गैलिलियो के साथ दुर्व्यवहार के मामले पर अफसोस प्रकट किया.
गैलिलियो के आविष्कार ब्रह्माण्ड के बारे में हमारी समझ का विकास करने के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि आविष्कार करने की उनकी विशिष्ट प्रक्रिया और इन्हें प्रमाणित करने में गणित का प्रयोग करने का उनका तरीका भी कम महत्त्व नहीं रखता है. वैज्ञानिक क्रांति में उनकी भूमिका बड़े मार्के की है. वे एक गणितज्ञ, एक वैज्ञानिक और एक भौतिकवेत्ता तो थे ही ‘आधुनिक विज्ञान का जनक’ कहलाने के सुयोग्य भी थे.
आखिरकार ‘गैलिलियो नेमसेक’ नाम के अन्तरिक्ष यान को वृहस्पति पर भेजे जाने के तीन साल बाद 1992 में वेटिकन सभा ने सार्वजनिक रूप से औपचारिक तौर पर गैलिलियो पर आरोपित किसी भी गलत कार्य के बारे में स्पष्टीकरण दिया और पोप जॉन पॉल द्वितीय ने एक दस्तावेज जारी किया जिसके अनुसार, “चर्च ने गैलिलियो को दोषी ठहराकर गलती की.”

बाद के अन्वेषकों ने गैलिलियो से जिज्ञासु और चौकस पर्यवेक्षक होना, प्रश्न पूछना और गहन अर्थों तक पहुंचने की लगातार कोशिश करते रहने का महत्वपूर्ण सबक सीखा. साथ ही पूर्वाग्रहों से उपजी दुनिया भर की प्रतिक्रियाओं से निरपेक्ष होकर अपने विश्वासों पर दृढ़ रहने का आत्मबल भी. दूसरों की आस्थाओं को चोट पहुंचाए बिना किसी भी मुद्दे पर आदर के साथ कई सन्दर्भों से सोचे जाने और स्वीकारे जाने की स्थिति बनाई जा सकती है लेकिन यह भी जरूरी है कि दूसरे महत्वपूर्ण दृष्टिकोणों के समानांतर अपने विचार प्रस्तुत करने का साहस भी हो.
इस निबंध के लिखने तक गैलिलियो के बारे में मुझे इतनी जानकारी नहीं थी जबकि बचपन से ही आकाश को देखते हुए ग्रहों-नक्षत्रों के बारे में मेरा सोचना आजतक जारी है. मेरे पास आकाश की झिलमिल चादर में झांकने के लिए एक छोटा-सा टेलिस्कोप है, तापमान मापने के लिए थर्मामीटर और छुट्टियों के बारे में निर्णय लेने के लिए मौसम की रोज-ब-रोज की जानकारी लेने की सुविधा भी है लेकिन यह कभी नहीं सूझा कि इनका अविष्कार किसने और क्यों किया या इनके पीछे उद्देश्य क्या था और इन्हें कैसे निर्मित किया गया.
जिंदगी शायद ऐसे ही आगे बढ़ती है कि अविष्कार इस्तेमाल किए जाते रहते हैं और आविष्कारक भुला दिए जाते हैं.
गैलिलियो गैलिलीकी बायोग्राफीज | 0 टिप्पणी >>
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