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‘‘जब आप मजेदार चीजें करना बंद कर देते हैं तब समझिए कि आप खत्म हो जाते हैं।’’
- यह बात एक उत्साही खिलाड़ी, प्रकृति प्रेमी, लोकोपकारी सज्जन व्यक्ति, और सबसे बढ़कर एक महान अमरीकी लेखक ने कही है। एक ऐसे व्यक्ति ने, जो यह मानते थे कि वे तभी आगे बढ़ सकते हैं जब वे उस काम से प्यार करते हों जो वो करते हैं।’’
वे असाधारण क्षमताओं वाले एक साधारण व्यक्ति थे जो उन्होंने अपने अंदर काम के प्रति जुनून और प्रतिबद्धता के सहारे विकसित की थी। उन्हें शब्दों में चाशनी लपेटने नहीं आता था, न ही वे तर्क-वितर्क करते थे। इसीलिए उनके लेखन की तीखी आलोचना भी हुई थी। हालांकि जिंदगी के प्रति उनकी ललक सिर्फ उनके लेखन में ही नहीं दिखी, बल्कि उनके आसपास के लोगों ने भी महसूस की। आलोचनाओं से विचलित हुए बिना उन्होंने अपने ही शर्तों पर जिंदगी जी और वे थे अर्नेस्ट मिलर हेमिंग्वे।
हेमिंग्वे अपने समय के साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिवेश से काफी दूर निकल आए लेखक थे। वे एक ऐसे लेखक थे जिन्होंने अपने विवरणात्मक गद्य और छोटे-छोटे मौलिक विषयों से आधुनिक साहित्य को प्रभावित किया था। वे इस बात के प्रबल पैरोकार थे कि ‘‘लेखक को वही लिखना चाहिए जो उसे लिखना है और वह जो लिख रहा है उसके बारे में बोलना नहीं चाहिए।’’ साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि लेखक को नितांत अपने निजी अनुभव के आधार पर ही लिखना चाहिए।
शिकागो के नॉर्थ ओक पार्क में 21 जुलाई, 1899 को डॉक्टर क्लेरेंस एडमण्ड्स (एड) और ग्रेस हॉल हेमिंग्वे के यहां जन्मे अर्नेस्ट मिलर हेमिंग्वे छह बच्चों में दूसरे थे। उनकी चार बहनें और एक भाई था । सभी भाई-बहनों में उनका नाम उनके दादा अर्नेस्ट हॉल और उनके बड़े चाचा मिलर हॉल के नाम का मिश्रण था।
हेमिंग्वे उच्च मध्य-वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे और इसीलिए वे उच्च मध्य-वर्गीय माहौल में बड़े हुए। ओक पार्क शिकागो का एक उपनगर था जहां मुख्यत: प्रोटेस्टैंट इसाई रहते थे और इनका परंपरावादी होना स्पष्ट रूप से इनके व्यवहारों से भी झलकता था। इनमें कड़ी मेहनत, स्वास्थ्य और धार्मिक विचार-बोध जैसे मूल्य प्रचलित थे। इसमें ताज्जुब की कोई बात नहीं कि अर्नेस्ट ने बाद में इसका जिक्र ‘‘ चौड़ी गलियों और संकीर्ण दिमागों’’ वाले शहर के रूप में किया।
ओक पार्क प्रोटेस्टैंट ईसाइयों का सिर्फ एक मोहल्ला ही नहीं था बल्कि धार्मिक मतों से ओतप्रोत एक केंद्र भी था जो शहर के आत्मसंतुष्ट लोगों का प्रतिनिधित्व करता था। ओक पार्क वासी शहरी राजनैतिक भ्रष्टाचार से दूर थे और मध्य-पश्चिमी शिकागो से कटे हुए थे। तत्कालीन धार्मिक सामुदायिक मंत्री ब्रूस बार्टन ने इसके बारे में कहा है कि यह एक ऐसा स्थान था जहां ‘‘शराबखाने बंद हो जाते हैं और तब चर्च के लाट शुरू होते हैं।’’
अर्नेस्ट ने इस शहर को इसके बेहद परंपरागत और दकियानूसी सोच की वजह से कभी पसंद नहीं किया। उन्होंने एक बार अपनी मां से कहा भी था ‘‘मेरे ईसाई नहीं होने को लेकर डरने या चिंता करने की जरूरत नहीं है। मैं जैसा था वैसा ही हूँ। मैं रोज रात को प्रार्थना करता हूँ तथा खुश रहने की पूरी कोशिश करता हूँ। क्योंकि मैं एक खुशमिजाज ईसाई हूँ, इसलिए मुझे आपको परेशान नहीं करना चाहिए।’’
अर्नेस्ट एक बेहद होड़ करने वाले बच्चे थे और यह प्रवृत्ति उनमें बाद में भी बनी रही। वे हमेशा अपनी बंदूकें लेकर खड़े हो जाते थे और वही करते थे जो उन्हें सही लगता था। उन्होंने अपनी स्कूल की शिक्षा ओक पार्क पब्लिक स्कूल सिस्टम से 1905 में पूरी की। वे पाठ्येत्तर गतिविधियों जैसे- तैराकी, वाटर पोलो, फुटबॉल, वाद-विवाद और ऐसी ही दूसरी चीजों में बहुत अच्छे थे।
अर्नेस्ट सीखने के लिए हमेशा तैयार रहते थे और हमेशा बेहतरीन लोगों से ही सीखते थे। उन्होंने गृहयुद्ध अपने दादा से, राजनीति लयोल्ड जॉर्ज (ब्रिटिश उदारवादी नेता और राजनीतिज्ञ) से और लिखना एंडरसन, स्टीन, फिटजेरल्ड और फोर्ड जैसे अमेरिकन लेखकों से सीखी। उन्होंने अपने पिता, जिन्हें वे एक कठोर व्यक्ति मानते थे, से शिकार और मछली पकड़ने की कला भी सीखी। इस परिवार का ग्रीष्मकालीन निवास मिशिगन में वलून झील के किनारे था जो उनके लिए शिकार और मछली पकड़ने के लिए बिल्कुल माकूल जगह साबित हुई थी। लेखन के अलावे वे अपना ज्यादातर समय अपनी पसंदीदा खेलों में बिताते थे। वे पूरे दिन शिकार करते थे और सर्दियों में जमे हुए तालाबों पर स्केटिंग करते थे। उन्हें पढ़ना पसंद था और यह उनकी उम्र के लिहाज से बड़ी बात थी। शुरू से ही अर्नेस्ट अपने लेखन को साहस, वीरता, हिंसा और मौत के अच्छे मिश्रण तथा रहस्यवाद के साथ पेश किया। वे एक जबरदस्त मुक्केबाज भी थे और पहली बार 1916 में लड़े थे।

अर्नेस्ट की मां ग्रेस, एक तरफ जीवन शक्ति से भरी हुई एक सुंदर महिला थीं तो दूसरी तरफ अभिमानिनी और स्वार्थी महिला भी थीं। अर्नेस्ट ने अपनी कमजोर दृष्टिशक्ति की शिकायत अपनी मां को बताया जो खुद भी इसकी शिकार थीं। लेकिन ग्रेस को कला के प्रति कुछ ज्यादा ही रुझान थी और वे इस पर भाषण देने के साथ-साथ गोष्ठियां भी आयोजित करती थीं। इसीलिए वे कभी घर के कार्य नहीं करती थीं। वास्तव में अर्नेस्ट के पिता एड ही सभी घरेलू चीजों की खरीददारी करते थे और बच्चों के लिए नाश्ता भी बनाते थे।
अपनी मां के बारे में अर्नेस्ट के विचारों का थोड़ा-सा हिस्सा उनकी मां के बेहद कठोर और पुरानी सोच की वजह से पनपा था। विक्टोरिया काल में प्रचलित एक परंपरा के अनुसार लड़कों को लड़कियों के कपड़े पहनाना अनिवार्य था। बाद में बड़े होने पर अर्नेस्ट का मर्दानगी की चरमसीमा को छूने की प्रबल इच्छा, दरअसल बचपन में उनकी मां द्वारा उनपर स्त्रियोचित चीजें लादने की प्रतिक्रिया थी।
अर्नेस्ट को अपने नाम से नफरत थी और इसकी तुलना वे ऑस्कर वाइल्ड की किताब ’इम्पॉर्टेन्स ऑफ बिइंग अर्नेस्ट’ के मूर्ख और उथले प्रतिनिधि-पात्र से करते थे। उन्हें लगता था कि ये बहुत आम मध्य वर्गीय नाम है।
अर्नेस्ट अक्सर अपनी मां और पिता की इच्छाओं के पाटों के बीच पिसते रहते थे। उनके पिता ने उन्हें वो सब कुछ सिखाई जो उन्हें मर्दाना बनाती थी। इसके उलट, कला और संगीत की शिक्षिका होने के नाते उनकी मां ने अर्नेस्ट को संगीत की बारीक बातें सिखाई। परंतु उन्होंने संगीत सीखने में कभी कोई रुचि नहीं ली। इतना ही नहीं, वे अपने माता-पिता के बीच लगातार होने वाले झगड़ों से भी परेशान रहते थे और उन्हें लगता था कि उनके माता-पिता उन्हें स्कूल में कभी मदद नहीं की। उन्होंने कहा है ‘‘मैं चाहे कितना भी सही रहूं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मेरे लिए मेरे माता-पिता में से कोई भी स्कूल नहीं आते थे। मुझे इसे इसी तरह स्वीकार करना था।’’ उन्हें हमेशा ये लगता रहा कि उनके पिता की खामोशी और मधुमेह रोग की वजह उनकी मां थी जो उन्हें अपमानित करती रहती थीं।
उनके कुछ प्रारम्भिक कार्य उनके स्कूल के दिनों से संबंधित हैं जो खासकर खेलों के बारे में है क्योंकि वे उस दौरान अपने हाई स्कूल के अखबार ’टे्रपेज’ के लिए कार्य करते थे। 17 साल की कमसिन उम्र में ही उन्होंने ’कनसास सीटी स्टार’ अखबार में जूनियर रिपोर्टर के तौर पर नौकरी कर ली। सक्रिय क्रियाओं, प्रमाणिकता, सकारात्मकता और स्पष्टता से संयोजित छोटे-छोटे वाक्यों को वहां सराहा जाता था और बढ़ावा दिया जाता था। अर्नेस्ट ने अपने छोटे-से कार्यकाल में इन सब चीजों को आत्मसात किया और बाद में अपने साहित्यिक सिद्धंात में उन्हें हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
उन्होंने एकबार कहा था, ‘‘स्टार में मुझे सामान्य घोषणात्मक वाक्य लिखना सीखने के लिए मजबूर किया गया। यह सबके लिए उपयोगी है। अखबार का काम एक युवा लेखक को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा बल्कि मददगार ही साबित होगा अगर वह सही समय पर वहां से निकल जाता है।’’
हालांकि उनकी परवरिश की वजह से उनमें एक संवाददाता के लिए आवश्यक स्पष्टवादिता की कमी थी, लेकिन अपना काम पूरा करने में उन्होंने खासा उत्साह और साहस दिखाया।
जब अर्नेस्ट ने हाई स्कूल से स्नातक की पढ़ाई पूरी की, तब यूरोप में प्रथम विश्व युद्ध का माहौल तैयार हो रहा था। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वूड्रो विल्सन ने युद्ध में भाग नहीं लेने की कोशिश की। लेकिन कोशिश असफल रही और अमेरिका ऑस्ट्रिया और जर्मनी के विरोधी, मित्र राष्ट्रों के गुट में शामिल हो गया। 18 साल का होने पर अर्नेस्ट ने सेना में भर्ती होने की कोशिश की लेकिन कमजोर नजर उनके लिए कमी साबित हुई। इस कमी की वजह से फौज द्वारा लिए गए फैसले से अविचलित, उन्होंने एक सैनिक के रूप में न सही लेकिन ऐम्बुलेंस ड्राइवर के रूप में सेना में भर्ती होने की फौरन कोशिश की।
रेड क्रॉस इटैलियन सेना में ऐम्बुलेंस ड्राइवर के पद के लिए लोगों से आवेदन आमंत्रित कर रही थी। वे चुन लिए गए और वहां तैनात किए जाने के आदेश मिलने के बाद जिस दिन वे मिलान पहुंचे उसी दिन उन्हें युद्ध का पहला अनुभव हुआ। एक हथियार बनाने वाले कारखाने में विस्फोट हुआ जिससे बहुत सारे लोग घायल हो गए। उन्होंने क्षत-विक्षत शरीरों को तुरंत एक मुर्दाघर में पहुंचाया। उसके तुरंत बाद 8 जुलाई, 1918 को एक ऑस्ट्रियन मॉर्टर से अर्नेस्ट को पहली बार बहुत जबरदस्त चोट लगी । जैसा कि एक साथी ऐम्बुलेंस ड्राइवर टेड ब्रमबैक ने अर्नेस्ट के पिता को पत्र लिखकर बताया कि लगभग 200 बम्ब के टुकड़ों या हथियारों के छोटे-छोटे टुकड़ों से चोटिल होने के बावजूद अर्नेस्ट ने अपनी परवाह किए बिना तुरंत दूसरे जख्मी सैनिकों को उठाने का प्रयास किया। इसे चाहे जो नाम दिया जाए, एक सद्भावनापूर्ण कार्य या वीरता की अद्भुत निशानी, लेकिन अर्नेस्ट ने अपने साथी सैनिकों तक पहुंचने के पहले एक आंख भी नहीं झपकाई।
उसके फौरन बाद जब वे इटली एक अस्पताल में स्वास्थ्य-लाभ ले रहे थे, तभी ऐजनेस वॉन कुरोवस्की नाम की एक नर्स के प्यार में पड़ गए जो उनसे 7 साल छोटी थी। अर्नेस्ट को महसूस हुआ कि प्यार में पड़ना उनके लिए सबसे असरदार उपचार साबित हुआ। ऐजनेस के साथ उनके प्यार ने उनसे दो कहानियां लिखवाई-‘ए वेरी शॉर्ट स्टोरी’ (पहली बार 1924 में लघुचित्र के रूप में प्रकाशित हुई) और ’ए फेयरवेल टू आर्म्स’ (1929) जो उनकी बेहतरीन कहानियां बन गईं।
ऐजनेस और अर्नेस्ट एक आकर्षक जोड़ा थे। वह हंसमुख, दयालु और अच्छे हास्य-बोध वाली महिला थीं। उनकी कद-काठी भी अच्छी थी और उनका जलवा ऐसा था कि महिलाएं बहुत ही आसानी से उनकी तरफ आकर्षित हो जाती थीं। ऐजनेस ने अपनी स्वेच्छा से अस्पताल में रात की पाली चुनी ताकि उसे अर्नेस्ट के साथ बिताने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
किंतु उनका यह प्रेम-संबंध बहुत कम समय तक टिका। ऐजनेस को लगता था कि अर्नेस्ट को पता नहीं है कि वह क्या चाहती हैं। ऐजनेस की नजर में वे शराबी थे और उनकी दिलचस्पी दौलत में थी। हालांकि अर्नेस्ट ने उन्हें पूरे दिल से प्यार किया लेकिन फिर भी ऐजनेस को लगता था कि वे अपरिपक्व हैं और दुनिया में अभी भी अपने पैर नहीं जमा पाए हैं। हालांकि फ्लोरेंस में फैली इंफ्लुएंजा महामारी के दौरान वहां काम करते हुए ऐजनेस ने अपने प्रेमपत्रों में उनके प्रति गहरा प्यार जताया था। पर बाद में उसने किसी दूसरे पुरुष के लिए उन्हें छोड़ दिया। यहां तक कि उसने ये भी दावा किया कि ‘‘उसने कभी उन्हें प्यार किया ही नहीं।’’
लेकिन विडम्बना ये हुई कि वह उस लेफ्टिनेंट से शादी नहीं कर पाई जिसके लिए उसने अर्नेस्ट को ठुकाराया था। उसने बाद में अर्नेस्ट को पत्र लिखकर अपने रिश्ते के टूटने के बारे में बताया था।
इस थोड़े समय की दोस्ती का अर्नेस्ट पर काफी प्रभाव पड़ा। वे भावनात्मक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर हो गए और ऐजनेस से इस बात का बदला लेने का मौका ढ़ूंढ़ने लगे कि उसने उन्हें किसी और आदमी के लिए छोड़ दिया। हालांकि अर्नेस्ट हकीकत में ऐसा कर नहीं पाए लेकिन ए फेयरवेल टू आर्म्स में ऐजनेस को कैथरीन के पात्र के रूप में पेश किए। उपन्यास में कैथरीन नायक की रखैल के रूप में चित्रित की गई है जिसे अपने बच्चे को जन्म देते वक्त मौत की सजा दी जाती है।
अर्नेस्ट 1919 में घर लौटे। युद्ध उनके लिए सीखने का प्रतिमान साबित हुआ। इसने उन्हें ओक पार्क के धार्मिक हठधर्मिता और भावनाओं से बिल्कुल बाहर निकाल दिया। युद्ध से वापस आने के बाद उनकी मानसिक स्थिति काफी खराब रही।
अर्नेस्ट का अपने ओक पार्क के वाले घर में लौटना सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं थी बल्कि इससे बढ़कर मानसिक स्तर पर एक बदलाव की प्रक्रिया भी थी। युद्ध ने उन्हें स्तब्ध कर दिया था और साथ ही मजबूत भी। इस मर्दाना खिलाड़ी को जिन्दगी अब काफी नीरस लगने लगी थी। उन्होंने विभिन्न जगहों पर घूमते हुए पूरी तरह उन्मुक्त जिंदगी जी थी। युद्ध, जैसा कि यह हर किसी के साथ करता है, उन्हें काफी व्यावहारिक और परिपक्व बना दिया था। इसी दौरान उनका अपने माता-पिता के साथ रिश्तों में भी तनाव आया। वे न तो अपने बेटे की प्रत्यक्ष परिपक्वता को समझ पा रहे थे और न ही युद्ध का अहम हिस्सा बनने और बहादुरी दिखाने के लिए उसकी तारीफ कर पा रहे थे। उनके पिता की बहुत इच्छा थी कि वे डॉक्टरी की पढ़ाई करें। और पिता के इस इसरार के कारण अर्नेस्ट नौकरी तलाशने पर मजबूर हुए और उन्हें अपनी शिक्षा भी जारी रखनी पड़ी जो कि उनके लिए काफी कष्टप्रद काम था।
यु़द्ध में आए जख्मों के लिए उन्हें अभी भी 1000 डॉलर्स की बीमा राशि मिलती थी जिसके सहारे वे अपना काम चलाते थे और अपने माता-पिता के घर में रहकर पढ़ते-लिखते थे।
एकबार उन्होंने मिशिगन सार्वजनिक पुस्तकालय में बात की जहां उनकी मुलाकात वूलवर्थ कंपनी के एक अधिकारी की पत्नी हैरियट कोनेबल से हुई। उसको अर्नेस्ट और अपने बेटे में काफी फर्क नजर आया।
उसके आग्रह पर उन्होंने उसके बेटे को प्रशिक्षित किया जो बाद में ’टोरंटो स्टार’ अखबार से जुड़ गया। जब वे अपने दोस्त के घर रह रहे थे, उसी दौरान नवम्बर 1920 के उत्तरार्द्ध में उनकी मुलाकात एलिजाबेथ हैडली रिचर्डसन से हुई। उम्र में अर्नेस्ट से आठ साल छोटी हेडली लम्बी, सुंदर और प्रतिभावान थी। अर्नेस्ट ने उसके सामने मर्दाना अंदाज में अपने प्यार का इजहार किया। फिर दोनों ने 3 सितम्बर, 1921 को शादी कर ली और पेरिस चले गए जहां अर्नेस्ट टोरंटो स्टार के लिए यूरोपियन संवाददाता के रूप में काम करने वाले थे।
8 दिसम्बर, 1921 को यह जोड़ा 74 रु. कार्डिनल लेमाइन स्थित अपने सागदीपूर्ण अपार्टमेंट में रहने आ गए। हालांकि इस मकान में पानी भी नहीं आता था फिर भी ऐसी स्थिति में भी हेडली ने कोई शिकायत नहीं की, जबकि वह अपेक्षाकृत अच्छी जिंदगी जी चुकी थी।
अर्नेस्ट इटली, स्पेन और फ्रांस के लैटिन सभ्यता के प्रति आकर्षित थे। ये ऐसी जगहें थीं जो पुराने ओक पार्क की तुलना में ज्यादा रुढ़िमुक्त थीं। उन्हें महसूस हुआ कि यहां वे युद्ध के अनुभवों को फिर से जी सकते हैं। इस दौर के लेखन में उनकी यात्रा और पड़ाव का जिक्र अक्सर होने लगा। दूसरी ओर अब वे फ्रेंच, स्पैनिश और इटैलियन धाराप्रवाह बोलने भी लगे थी।
खुद पर अपने माता-पिता के प्रभाव को उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी शादी में दोहराया। अर्नेस्ट हेडली के लिए यह सुनिश्चित करते थे कि वह सप्ताह में छह दिन पूरी रात मोटरसाइकिल दौड़ देख सके जबकि वास्तव में उसे इसमें मजा भी नहीं आता था। वे इस बात का भी पक्का खयाल रखते थे कि वह उनकी यात्राओं और रोमांचक अभियानों में भी उनके साथ रहे। हेडली ने एकबार टिप्पणी की थी ‘‘मैंने देखा है हेमिंग्वे परिवार में आप वही करते हैं जो अर्नेस्ट चाहते हैं।’’
इस बीच पेरिस के कुछ बेहतरीन लेखकों जैसे- एजरा पाउण्ड, गेरट्रूड स्टिन और सिल्विया बीच से परिचय होने से अर्नेस्ट का लेखकीय कैरियर भी ठोस रूप लेना शुरू कर दिया था। अर्नेस्ट और पाउण्ड ने एक दूसरे में प्रशंसक देखा। दोनों को हर कलात्मक चीज से प्यार था और वे एक-दूसरे का साथ काफी पसंद करते थे। अर्नेस्ट ने पेरिस में सफलतापूर्वक एक साहित्यिक कीर्तिमान बनाया। वे वहां एक फीचर लेखक के तौर पर काम करते थे और घटनाओं व कार्यक्रमों के बारे में लिखा करते थे।
यहां उनका पहला बड़ा काम था ’जेनेवा आर्थिक सम्मेलन’ का कवरेज जिसमें उन्हें युद्ध के बाद की स्थितियों और इसके नेताओं को समझने का मौका मिला। उन्होंने अक्टूबर में ग्रीक-तुर्की युद्ध कवरेज किया जिसमें ग्रीक सेना पीछे हट गई थी। नवम्बर में उन्होंने लॉसेन सम्मेलन भी कवर किया। उनकी कविता ‘‘दे ऑल मेड पीस-वाट इज पीस?’’ अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक बिरादरी में नैतिक भ्रष्टता पर केंद्रित थी तथा यह सम्मेलन के ठीक बाद लिखी गई थी। हेडली 1922 के मध्य दिसम्बर में स्की खेलते हुए छुटि्टयों का लुत्फ उठाने के लिए अर्नेस्ट के पास लॉसेन आ गई। सफर के दौरान उसने अर्नेस्ट की कुछ बेहतरीन कहानियां और कानसस शहर से संबंधित पांडुलिपियां खो दी। इसके लिए अर्नेस्ट उसे माफ नहीं कर पा रहा था। उन्होंने सोचा कि वह लापरवाह है और एक लेखक की जिंदगी को नहीं समझ सकती। यह उनकी शादी के लिए एक बहुत बड़ा झटका-सा था। इसके बाद उन्हें एक और बड़ा झटका तब लगा जब उन्हें पता चला कि हेडली गर्भवती है। उन्हें लगा कि इस अनचाहे गर्भ की वजह से उनकी आजादी खत्म हो गई और वे उसे एक ऐसे महिला के रूप में देखने लगे जो उनकी रचनात्मक शक्ति को मिटा रही थी।
हैडली के गर्भवती होने के कारण उन्हें मजबूरन यूरोप छोड़कर टोरंटो लौटना पड़ा क्योंकि उन्हें लगता था कि पेरिस की तुलना में उत्तरी अमेरिका में चिकित्सीय सुविधाएं बेहतर हैं। इस जोड़े का पहला बच्चा जॉन हेडली निकनॉर अर्नेस्ट, उपनाम बम्पी 10 अक्टूबर, 1923 को पैदा हुआ।

1924 में अर्नेस्ट अपनी पत्नी और बेटे के साथ वापस फ्रांस आ गए, जहां वे 113 नोट्रे डेम डेस चैम्प्स में एक शोर करने वाले आराघर के ऊपर एक फ्लैट में रहते थे। बेहद साधारण परिवेश और सुविधाओं वाले इस अपार्टमेंट में गैस, बिजली, शौचालय या पानी की भी सुविधा नहीं थी।
उसी समय एजरा पाउण्ड की सिफारिश पर उन्हें ‘द ट्रांसअटलांटिक रीव्यू’ संपादित करने का मौका मिला। पाउण्ड ने जाने-माने लेखक फोर्ड से कहा कि, ‘‘ वह एक असाधारण पत्रकार है। वह बहुत अच्छा पद्य लिखता है और उसका गद्य पूरे विश्व में शैली के मामले में बेहतरीन है।’’
सन् 1925 में अर्नेस्ट और हैडली एक ब्रिटिश-अमेरिकन प्रवासी दल से जुड़े और स्पेन के सान फेरनिन उत्सव में शामिल होने के लिए रवाना हो गए। उस दौरान अर्नेस्ट अपनी कुछ बेहतरीन रचनाएं जैसे- ’इन आ ’र टाइम’ और ‘द सन अल्सो राइज’ लिख चुके थे। इन आ ’र टाइम जो अर्नेस्ट का पहला उपन्यास भी था, 1926 में प्रकाशित हुआ। यह सफर करते एक ऐसे प्रवासी समुदाय के बारे में है जो पेरिस से पैम्पलोना, (स्पेन) सांढ़ों की लड़ाई देखने जा रहा है। यह उपन्यास अर्नेस्ट की एक महान कृति है जिसमें उन्होंने युद्धोपरांत अपनी पीढ़ी के मोहभंग की मनोदशा की पड़ताल बेहद कलात्मक ढंग से किया है।
1925 से 1929 तक, इन चार सालों के दौरान अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने अपनी कुछ शानदार रचनाएं पेश की। हालांकि अर्नेस्ट के पास पैसों की तंगी थी, परंतु उन्हें महसूस हुआ कि व्यावसायिक बुद्धि उनकी साहित्यिक रचनाधर्मिता को खत्म कर देगी। उन्होंने कहा, ‘‘मेरे लिए ये ज्यादा महत्वपूर्ण है कि मैं बाजार पर नजर रखे बिना, बिना ये सोचे कि इस लेखन से क्या होगा, या ये कि क्या ये कभी प्रकाशित भी होगा, एकांत में शांति से लिखूं, जितना हो सकता है उतना अच्छा लिखने की कोशिश करूं, वरना मैं पैसे बनाने के जाल में फंस जाऊंगा जो ज्यादातर अमेरिकन लेखकों को बर्बाद करता है।’’
जैसा कि पहले जिक्र किया जा चुका है, अर्नेस्ट बेहद प्रतियोगी थे। वे मानते थे कि लिखना भी एक प्रतियोगी गतिविधि ही है जहां सभी नौसिखिए और दिग्गज एक-दूसरे से आगे निकल जाने के लिए लिखित शब्दों का जंग लड़ते हैं। वे टॅाल्स्टॉय, डी. एच. लॉरेंस, स्टिफन क्रेन और कॉनरैड से काफी प्रभावित थे।
1925 से 1929 तक, इन चार सालों के दौरान अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने अपनी कुछ शानदार रचनाएं पेश की। हालांकि अर्नेस्ट के पास पैसों की तंगी थी, परंतु उन्हें महसूस हुआ कि व्यावसायिक बुद्धि उनकी साहित्यिक रचनाधर्मिता को खत्म कर देगी। उन्होंने कहा, ‘‘मेरे लिए ये ज्यादा महत्वपूर्ण है कि मैं बाजार पर नजर रखे बिना, बिना ये सोचे कि इस लेखन से क्या होगा, या ये कि क्या ये कभी प्रकाशित भी होगा, एकांत में शांति से लिखूं, जितना हो सकता है उतना अच्छा लिखने की कोशिश करूं, वरना मैं पैसे बनाने के जाल में फंस जाऊंगा जो ज्यादातर अमेरिकन लेखकों को बर्बाद करता है।’’
जैसा कि पहले जिक्र किया जा चुका है, अर्नेस्ट बेहद प्रतियोगी थे। वे मानते थे कि लिखना भी एक प्रतियोगी गतिविधि ही है जहां सभी नौसिखिए और दिग्गज एक-दूसरे से आगे निकल जाने के लिए लिखित शब्दों का जंग लड़ते हैं। वे टॅाल्स्टॉय, डी. एच. लॉरेंस, स्टिफन क्रेन और कॉनरैड से काफी प्रभावित थे।
उनकी ‘डेथ इन द आफ्टर नून’ और ‘द ग्रीन हिल्स ऑफ अफ्रीका’ जैसीकथेत्तर रचनाएं भी एक हद तक प्रभावपूर्ण रहीं। उनका लेखन दो सिद्धांतों पर आधारित था: पहला सिद्धांत उनके अखबार के अनुभव से विकसित हुआ था जिसने उन्हें वास्तविक भावनाओं और बौद्धिक अनुभवों को आधार बनाने के साथ ही कल्पना शक्ति का प्रयोग करते हुए लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्हें लगता था कि गद्य लिखना सबसे ज्यादा मुश्किल है। उन्होंने कहा था कि सबसे डरावनी चीज जिससे उनका कभी सामना हुआ था वो था ‘‘एकखालीपन्ना।’’उन्हें यह भी लगता था कि लिखने के लिए आदमी के पास शब्दों का भण्डार होना चाहिए। दूसरे सिद्धांत की बात करें तो उनका मानना था कि रचनात्मक लेखनका मूल्यांकन लेखक द्वारा छोड़ दी गईचीजों से होना चाहिए।और उनका यह भी मानना था कि हर महान लेखक में ‘‘फालतूलेखनकोपहचानलेनेकी’’जन्मजात खूबी होती है।
इससे उन्होंने हिमशैल के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसकी काफी सराहना हुई और आज भी हो रही है। उनका मानना था कि हिमशैल का 7/8 हिस्सा पानी के अंदर रहता है और सिर्फ 1/8 हिस्सा ऊपर दिखाई देता है। उसी तरह सिर्फ जरूरी चीजें कहानी में दिखनी चाहिए और जिसका जिक्र खास महत्व नहीं रखता उसे निकाल देना चाहिए। उनका लेखन बिल्कुल स्पष्ट होता था और वे बहुत कम उपमा का प्रयोग करते थे तथा विवरण से ज्यादा संवादों पर जोर देते थे।
एक तरफ लॉरेंस और स्कॉट फिटजेरैल्ड जैसे दिग्गज अर्नेस्ट हेमिंग्वे के काम को त्रुटिरहित बता रहे थे, वहीं दूसरी तरफ उनका शुद्धतावादी परिवार शायद ही उनकी साहित्यिक प्रवृति को समझ पा रहा था। उनके पिता का कहना था कि अनैतिक विषयों पर लिखने के बजाय वे अर्नेस्ट का मर जाना पसंद करेंगे। ग्रेस का भी यही कहना था और उसने भी उनकी साहित्यिक प्रतिभा की आलोचना ही की।

1926 में द सन अल्सो राइजेज के प्रकाशन के बाद अर्नेस्ट ने पेरिस की एक लेखिका पॉलीन फीफर से शादी करने के लिए 4 अप्रैल, 1927 को हैडली को तलाक दे दिया। पॉलीन एक मजबूत और संपन्न घराने से थी और उसके माता-पिता लोवा में रहते थे। वह लाड़-प्यार में पली एक स्थिर और सुदृढ़ महिला थीं जबकि अर्नेस्ट बिखरे हुए और शराबी व्यक्ति थे।
उनकी बढ़ती हुई लोकप्रियता का मतलब था कि उन्हें अपनी हैसियत के हिसाब से एक नई पत्नी चाहिए थी। पॉलीन अपने कपड़ों, व्यक्तित्व और जुबान से पूरी तरह पेरिसियन थी। वे हैडली और एक अनचाहे बच्चे से ऊबकर पॉलीन की समृद्ध जीवनशैली की ओर आकर्षित हुए थे। इस धारणा ने भी उन्हें किसी और की तलाश करने के लिए मजबूर किया कि हैडली बच्चे के जन्म के बाद एक पत्नी से एक मां की भूमिका में आ गई थी। पॉलीन दिखने में अच्छी थी और समझदारी में भी अर्नेस्ट के बराबर थी। साथ ही, पॉलीन धर्मपरायण कैथोलिक थी और अर्नेस्ट ने भी उसके लिए खुद को परिवर्तित कर लिया था। लेकिन हैडली से उनके तलाक और परिवर्तन को ओक पार्क में अच्छा नहीं माना गया। अर्नेस्ट और पॉलीन का प्रेम-संबंध गर्मजोशी भरा था और बाद में उन्होंने मई 1927 में शादी कर ली।
जब ये सब चल रहा था तब अर्नेस्ट का लघु कहानियों की अपनी किताब ’मेन विदाउट वीमेन’ पर काम करना जारी था। ‘कैट इन द रेन’, ‘आउट ऑफ सीजन’, ‘ए कैनरी फॉर वन’ जैसी अपनी रचनाओं में उन्होंने अपनी शादी का दर्द जाहिर किया है।
पॉलीन गर्भवती थी और अब एक बच्चे को जन्म देने वाली थी। उसने कानसस शहर के एक अस्पताल में भर्ती होने का फैसला किया और जहां उसने 28 जून, 1928 को एक बच्चे को जन्म दिया। उन्होंने उसका नाम पैट्रिक रखा और के वेस्ट में जाकर बस गए।
अर्नेस्ट ने हमेशा मौत से प्यार किया और इसका सबूत इस उपन्यास में भी मौजूद है। इसमें नायक मौत से लड़ते हुए अपने कर्तव्यों को पूरा करता है जिसे अर्नेस्ट ने ‘‘ग्रेस अंडर प्रेशर’’ के रूप में उल्लेख किया है।
अमेरिका के सबसे दक्षिणी छोर पर बसे के वेस्ट शहर के बारे में अर्नेस्ट ने वर्णन किया है ‘‘मैं जब भी, जहां कहीं भी रहा हूँ उनमें यह सबसे बेहतरीन जगह है, फूल, इमली के पेड़, अमरुद के पेड़, नारियल, ताड़....।’’ यह एक ऐसी जगह थी जिसने उनकी रचनात्मक शक्ति को और बढ़ा दिया...सक्रिय कर दिया।
इसी बीच अर्नेस्ट को अपनी मां का तार मिला जिसमें लिखा था कि अचल संपत्ति की कई खरीदारियों में पैसे की हानि, लम्बी बीमारी और अवसाद की वजह से उनके पिता ने खुद को गोली मार ली है। इस तरह की व्यक्तिगत परेशानियों के बावजूद अर्नेस्ट ने अपना उपन्यास ’ए फेयरवेल टू आर्म्स’ लिखना जारी रखा और इसे 1929 में पूरा कर लिया। इसके बाद उन्होंने ’डेथ इन द आफ्टरनून’ पूरी की जो स्पेन में सांढ़ से होने वाली लड़ाई का तमाशा देखने के बारे में है। इतिहास, कला, संस्कृति और खेलों के उत्साही निरीक्षक अर्नेस्ट ने लिखा है कि ‘‘ मेरा मकसद आधुनिक स्पैनिश सांढ़-युद्ध का एक परिचय प्रस्तुत करने का है और मैंने तमाशे को भावनात्मक और व्यावहारिक रूप से व्याख्यायित करने की कोशिश की है। यह किताब मैंने इसलिए लिखी क्योंकि इसके बारे में स्पैनिश या अंग्रेजी में कोई किताब उपलब्ध नहीं है।’’
अर्नेस्ट की अनगिनत स्वास्थ्य समस्याएं जैसे किडनी में दर्द, आंख की दिक्कतें, गले में संक्रमण और बहुत ज्यादा पीने की आदत ने उनके अंदर की ताकत को निचोड़कर उन्हें खोखला कर दिया था। इसके बावजूद उन्हें मोंटाना के कूक शहर में शिकार करना काफी पसंद था और वे मानते थे कि यह पश्चिमी अमेरिका की सबसे सुंदर जगह है।
हेमिंग्वे परिवार इस साल अपना क्रिसमस पिग्गॉट में मनाया और जनवरी 1931 में अपनी चौथी सर्दियों में के वेस्ट लौट आया। पॉलीन को कुछ दिनों बाद दुबारा गर्भवती होने का अनुभव हुआ और उसे यह उम्मीद थी इसबार बच्ची पैदा होगी लेकिन जैसा कि नियति को मंजूर था, उसने 12 नवम्बर, 1931 को एक बच्चे को जन्म दिया। पॉलीन अर्नेस्ट के प्यार में इतनी गहरी डूबी थी कि उसने अपने-आप को अपने बच्चों से ज्यादा अपने पति को समर्पित कर चुकी थी। उसने अपने बच्चों को एक मां की तरह कभी गले नहीं लगाया। पॉलीन बाद में ग्रेगरी के सामने इस बात का खुलासा भी किया ‘‘गिग, मुझे लगता है कि जिसे मातृत्व-बोध कहते हैं, वो मुझमें नहीं है। बच्चे जब तक पांच या छह साल के न हो जाएं, मैं उन्हें नहीं सम्भाल सकती। मुझे डर लगता है।’’
इस दौरान भी अर्नेस्ट नियमपूर्वक लिखते, खेलते और घूमते रहे। हालांकि अपने पिता की आत्महत्या के बाद उन्होंने अपने कंधों पर जिम्मेदारियां उठानी शुरू कर दी थी और खुद को परिवार का मुखिया मानने लगे थे। यहीं से उन्होंने खुद को ’पापा’ कहलवाना भी शुरू किया। लेकिन अर्नेस्ट का अपने परिवार के सदस्यों के साथ संबंध अभी भी अच्छे नहीं थे। वे अपने पिता को खुलेआम कायर कहते थे तथा अपने पिता की मौत के लिए अपनी मां को दोषी मानते थे। अपनी बहन मर्शलीन से भी झगड़ा करते थे और अपने पसंद के लड़के से शादी करने की वजह से अपनी छोटी बहन कैरोल की भी निंदा करते थे।
ऐसा लगता था जैसे अर्नेस्ट हेमिंग्वे एक विरोधाभासी व्यक्ति थे। एक तरफ वे एक लेखक थे, वहीं दूसरी तरफ एक मजबूत खिलाड़ी थे। एक तरफ वे मानते थे कि लेखन व्यावसायिक हुए बिना शुद्ध होना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ वे सभी-सुविधाएं भी चाहते थे। उन्होंने इन विरोधाभासी पहलुओं के बारे में कहा:
‘‘मैं एक खुशमिजाज आदमी हूँ, इसलिए अपना वक्त मजे से गुजारता हूँ और अपनी जिंदगी, अपने बच्चों, सागर से प्यार करता हूँ। लिखना, पढ़ना पसंद करता हूँ। मैं शराबखाने में पीना, अच्छी पेंटिंग्स देखना, अपने बिल्स खुद ही भरना और अन्य मिश्रित सुख भी पसंद करता हूँ।’’
अर्नेस्ट अक्सर अपनी जिंदगी में घटी घटनाओं को अपनी रचनाओं में इस्तेमाल करते थे और बहुत बार इसे बढ़ा-चढ़ाकर भी पेश करते थे। तथ्यों के साथ घटनाएं गढ़ने की योग्यता यानी कि मिथोमानिया की तरफ उनका रुझान होना स्वाभाविक था क्योंकि वे खुद को या अपने पाठकों को शर्मिंदा नहीं करना चाहते थे। इसीलिए वे सच्चाई के साथ कल्पना भी मिश्रित करते थे।
इसी बीच स्क्रिबनर्स पत्रिका ने ए फेयरवेल टू आर्म्स के प्रकाशन के अधिकार के लिए उन्हें $16000 की मोटी राशि दी। वैसे अनैतिक भाषा के इस्तेमाल की वजह से यह किताब बोस्टन में प्रतिबंधित थी, लेकिन जैसा कि अक्सर होता है और वे भी कहते थे कि किसी भी प्रकार का प्रचार अच्छा ही होता है। आलोचकों ने भी उनके पहले की रचनाओं से इसकी ज्यादा तारीफ की। 1933 में प्रसिद्ध नाटककार टी. एस. इलियट ने भी आलोचनाओं को खारिज किया और कहा कि अर्नेस्ट ने अपनी मौलिक भावनाओं को ही जाहिर किया है।
ए फेयरवेल टू आर्म्स के नाटक और फिल्म संस्करण को औसत सफलता मिली। फिल्म अधिकार हस्तांतरण $ 24000 के लिए मिलने के बावजूद अर्नेस्ट को फिल्म पसंद नहीं आई और उन्होंने टिप्पणी की ‘‘ इस फिल्म ने सबकुछ बर्बाद कर दिया...जैसे कुछ अच्छे के बारे में बात कर रही हो।’’

1933 की गर्मी में हेमिंग्वे परिवार और उनके के वेस्ट के दोस्त चार्ल्स थॉम्पसन भ्रमण करने के लिए अफ्रीका गए जिसका वर्णन अर्नेस्ट ने द ग्रीन हिल्स ऑफ अफ्रीका में किया है। काफी सोच-विचार करने के बाद आखिरकार उन्होंने 1935 में इसे प्रकाशित किया जिसमें उनके भ्रमण का एक अर्ध-वास्तविक चित्रण था। उनकी दूसरी कहानियों से भी, कोई भी ये फौरन जान सकता था कि अर्नेस्ट पर पौरुष और बहादुरी का धुन सवार रहता था।
उनके अफ्रीकी-प्रवास ने उन्हें उनकी दो कहानियों के लिए सामग्री भी दिया जिनके नाम हैं ’द स्नोज ऑफ कीलीमंजारो’ और ’द शॉर्ट हैप्पी लाइफ ऑफ फ्रांसिस मैकोम्बर’। इसमें कहानी के मुख्य पात्र को ऐसे चित्रित किया गया है जो अपनी पीने की आदत, औरत और दौलत की बदौलत कमजोर और नकारा हो चुका है। चित्रण में ज्यादातर , अर्नेस्ट के जीवन में आई औरतों के बारे में उनके विचार प्रतिबिंबित हैं। उनके कथा-साहित्य में कथेत्तर साहित्य के मुकाबले वास्तविक घटनाएं ज्यादा प्रतिबिंबित हुई हैं। उदाहरण के लिए प्रथम विश्व युद्ध में लगी चोटें ’ए फेयरवेल टू आर्म्स’ के मुख्य पात्र फ्रेडरिक हेनरी के चोटों के समान ज्यादा लगती हैं।

1936 में अर्नेस्ट ने उत्तरी अमेरिकन समाचारपत्र गठबंधन (NANA) के लिए स्पेन में छिड़े गृहयुद्ध की रिपोर्टिंग की जिसमें उन्होंने कई तरीके से रिपब्लिकन सरकार का समर्थन किया। युद्ध के दौरान उन्होंने NANA के लिए लगभग अट्ठाइस रिपोर्ट लिखे और बाद में युद्ध के व्यक्तिगत अनुभवों के रिपोर्टिंग के आधार पर उन्होंने अपना तीसरा बड़ा उपन्यास ’फॉर हूम द बेल टॉल्स’ लिखा।
अर्नेस्ट की तीसरी शादी की बात करें तो उसमें भी कम समस्याएं नहीं थीं। इस बीच अर्नेस्ट एक युवा लेखिका मार्था गेलहॉर्न से मिले थे जो टाइम पत्रिका की तरफ से युद्ध कवर करने आई थीं। उनकी वर्तमान यह तीसरी शादी चार सालों तक चली जिसके बाद अर्नेस्ट ने 4 नवम्बर, 1940 को पॉलीन को तलाक दे दिया और तीन सप्ताह बाद मार्था से शादी कर ली। स्पेन से लौटने के बाद मार्था और अर्नेस्ट क्यूबा चले गए और वहां पूर्वी हवाना में ’फिनसिया विजिया’ नाम के एक फॉर्म हाउस में रहने लगे।
’फॉर हूम द बेल टॉल्स’ अर्नेस्ट का त्रुटिरहित और व्यावसायिक रूप से सबसे सफल उपन्यास बनने की प्रक्रिया में था। अपने युद्ध के अनुभवों का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने एक अमेरिकन शिक्षक रॉबर्ट जॉर्डन की कहानी बयां की जो युद्ध में राजभक्तों के लिए लड़ा।
1941 की शुरुआत में मार्था चीन और जापान के युद्ध ( द्वितीय विश्व युद्ध का हिस्सा) को कवर करने के लिए गई तो अर्नेस्ट को भी अपने साथ ले गई। उसकी अपनी एक स्थापित युद्ध संवाददाता की छवि होने के बावजूद अर्नेस्ट निश्चित रूप से उससे ज्यादा लोकप्रिय थे और जब वे रिपोर्टिंग के लिए गए तो सबपर छा गए। सच्चाई यही थी कि वे एक ही क्षेत्र में थे इसलिए अक्सर वे एक-दूसरे के प्रतियोगी बन जाते थे। फलत: दोनों में ईर्ष्या की एक अस्वस्थ होड़ शुरू हो गई जिसकी वजह से 21 दिसम्बर, 1945 को उन दोनों का तलाक हो गया। इस तरह अब तक के अनुभव के अधार पर कहा जाए तो अर्नेस्ट की शादियां बहुत ही कम सफल हो पा रही थीं। हालंाकि मार्था से अलग होना उनके लिए सबसे ज्यादा तकलीफदेह साबित हुआ। उनको लगता था कि ऐजनेस से ज्यादा उन्हें किसी ने आघात नहीं पहुंचाया। उन्होंने मोहक और तेजस्वी व्यक्तित्व वाली मार्था को दिल की गहराइयों से प्यार किया था और उनका मानना था कि उनकी सभी पत्नियों में सिर्फ एक वो ही ऐसी थी जो ज्ञान और विवेक के मामले में उनके बराबर थी।
अर्नेस्ट ने मार्था को आखिरी बार तब देखा जब वे अमेरिका के लिए रवाना हुए और लंदन से होते हुए गुजर रहे थे। जब वे लंदन पहुंचे तो वहां वे मैरी वेल्श से मिले जो टाइम पत्रिका की संवाददाता थी। बाद में वे उसकी तरफ आकर्षित हो गए और 14 मार्च, 1946 को उससे शादी कर लिए।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अर्नेस्ट पेरिस के बाहर एक छोटे-से समूह के स्व-घोषित नेता बन गए थे। द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहासकार पॉल फसेल ने उल्लेख किया है ‘‘ एक विरोधी समूह जिसके लोगों को उन्होंने स्वयं संगठित की थी, के पैदल सेना में कैप्टन की भूमिका निभाते हुए अर्नेस्ट काफी मुश्किल में फंस गए क्योंकि एक संवाददाता सैन्य दल का नेतृत्व नहीं कर सकता है, वह अच्छी तरह से कर सकता हो तो भी नहीं।’’
उसके बाद, जब सेना जर्मनी की तरफ बढ़ रही थी तब वे युद्ध देखने के लिए अपने दोस्त जनरल बक लैनहम के पास उत्तरी फ्रांस गए। इस यात्रा से ही उन्हें ’अक्रॉस द रिवर एण्ड इंटू द ट्रीज’ लिखने की प्रेरणा मिली। हालांकि आलोचकों ने किताब को नकार दिया लेकिन अर्नेस्ट अपना सम्मान पाने पर अड़े हुए थे।
आखिरकार ’द ओल्ड मैन एण्ड द सी’ ने उन्हें उनकी अहम जगह दिलाई। यह एक बूढ़े आदमी सैंटिएगो की कहानी थी जो खाड़ी की नदी में अकेले मछलियां पकड़ता था। चौरासी दिनों में वह एक भी मछली नहीं पकड़ पाया था और वह बेहद हतोत्साहित महसूस कर रहा था। शुरू के 40 दिनों तक उसके साथ एक बच्चा आता रहा। बाद में उस बच्चे के माता-पिता ने उसे उस बूढे़ आदमी के साथ जाने से मना कर दिया क्योंकि वह अभागा था। अंतत: चौरासिवें दिन एक मर्लिन मछली उसके हाथ लगी। उपन्यास में आगे उस मछली और बूढ़े आदमी के बीच के संघर्ष का वर्णन है।
’द ओल्ड मैन एण्ड द सी’ को कथा-साहित्य के लिए वर्ष 1953 के पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1953 में यह अमेरिकन कथा-साहित्य की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब थी और बहुत जल्द ही बेस्टसेलर्स की सूची में शामिल हो गई थी। हालांकि कोलम्बिया विश्वविद्यालय ने किन्हीं अज्ञात राजनीतिक कारणों से इसपर प्रतिबंध लगा दिया था।
1953 में अर्नेस्ट और मैरी अफ्रीका घूमने और इसकी प्राकृतिक सुंदरता देखने के लिए एक छोटे-से निजी विमान में सवार हुए। लेकिन अचानक विमान हवा में एक तार से टकरा गया और बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। फिर अचानक धमाके के साथ वह नीचे उतरा। अर्नेस्ट को मामूली चोटें आईं। युगांडा के एक फ्लाइट में भी एकबार फिर इसी तरह का एक हादसा हुआ, लेकिन इसबार चोटें थोड़ी गंभीर थीं।
हेमिंग्वे ने वापस क्यूबा के लिए रवाना होने से पहले वेनिस जाने का फैसला किया। 28 अक्टूबर, 1954 को अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने ’द ओल्ड मैन एण्ड द सी’ के लिए साहित्य का नोबल पुरस्कार जीता लेकिन अपनी चोटों की वजह से वे समारोह में शामिल नहीं हो सके। नोबल पुरस्कार की राशि $ 36000 थी और विजेता को एक स्वर्ण पदक के साथ-साथ एक डिप्लोमा भी दी गई। इसी बीच ’द ओल्ड मैन एण्ड द सी’ के पहले हार्डकवर संस्करण की 50,000 प्रतियां प्रकाशित हुईं और अर्नेस्ट को काफी पैसे मिले।
1940 के बंजर दशक में ’गार्डेन ऑफ इडेन’ और ’अक्रॉस द रिवर’ जैसी अधूरी रचनाएं रचने के बाद 1950 के दशक में अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने काफी लेखन कार्य किया। हालांकि इस दौरान उन्होंने जो भी लेखन कार्य किया वो काफी सतही था। ‘आइसलैंड्स इन द स्ट्रीम’ और ‘अफ्रीकन जर्नल’ जैसी रचनाओं को तत्कालीन साहित्यकारों ने निरर्थक प्रयास कहकर नकार दिया था।
मार्च 1952 में अर्नेस्ट ने अपने परिवार में हुई मौतों का जिक्र किया जिनकी वजह से वे बेहद निराश हो चुके थे और इस निराशा से निकलना मुश्किल हो गया था। उनकी मां ग्रेस और पूर्व पत्नी पॉलिन की मौत, नौकरानी की आत्महत्या और बर्लिन में उनके पोते की मौत जैसी बड़ी घटनाएं उन्हें ईश-निंदा के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रही थीं। इन मौतों के बारे में बहुत कुछ पता नहीं था और वास्तव में बहुत सारी मौतों की बात खुलकर तभी सामने आई जब अर्नेस्ट ने स्वयं उनका उल्लेख किया। इन दु:खद घटनाओं के परिणामस्वरूप वे अब पहले जैसा उत्साह भी नहीं महसूस कर रहे थे। उन्हें लगा कि उनकी रचनात्मक शक्ति खत्म हो रही है। अब वे इस बात से भी दुखी थे कि वे अपने पुराने जोश और उत्साह के साथ नहीं लिख सकते थे। खैर, वे दूसरी बार 1953-1954 के दौरान भ्रमण के लिए निकले और स्पेन तथा अफ्रीका को फिर से अपने शब्दों में समेटने का प्रयास किया।
अबकी उन्होंने अपने पूर्व यात्रा की कुछ पांडुलिपियों को सुदृढ़ कर उनपर काम करना शुरू कर दिया। इस प्रयास के परिणामस्वरूप जो रचना सामने आई वो थी ‘ए मूवेबल फीस्ट’ परंतु इसका प्रकाशन उनके मरणोपरांत 1984 में ही हो पाया। इस समय तक वे अपने गिरते हुए स्वास्थ्य और शुरू से ही बहुत ज्यादा पीने की आदत की वजह से अंदर से बिल्कुल खोखले हो चुके थे। अपनी सारी शारीरिक बीमारियों के अलावा अर्नेस्ट को गरीब हो जाने और अपने लेखों के खो जाने का डर भी था, काम नहीं कर पाने की असमर्थता थी। इन्हीं सब वजहों से बाद में वे आत्महत्या की ओर बढ़े।
जुलाई, 1960 में अर्नेस्ट ने क्यूबा छोड़ दिया और आयडाहो स्थित केचम चले गए जहां साल भर पहले ही उन्होंने एक फ्लैट खरीदा था। आयडाहो आकर अर्नेस्ट को लगा कि वे फिर से वही उच्च स्तरीय जिन्दगी जीने लगे हैं जो अब तक उन्होंने जी थी। लेकिन अफसोस कि आयडाहो के सुंदर कुदरती परिवेश से भी उनके स्वास्थ्य में कोई खास सुधार नहीं आया।
1960 के पतझड़ में अर्नेस्ट विमान से मिनेसोटा के रोचेस्टर गए और हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत की वजह से मायो क्लीनिक में भर्ती हुए। उनकी आत्महत्या करने प्रवृति अबतक काफी बढ़ चुकी थी तथा उनकी पत्नी मैरी भी इसे और रोक नहीं पा रही थीं। अर्नेस्ट की मानसिक बीमारी ठीक करने के लिए जल्द ही उन्हें बिजली के झटके दिए जाने लगे। और इसकी वजह से उनकी याद्दाश्त चली गई जिसके बाद उनका अवसाद और बढ़ गया क्योंकि अब लिखने के लिए शब्द दिमाग में आसानी से नहीं आते थे।

अर्नेस्ट ने अपने पिता की आत्महत्या को उनकी कायरता बताकर हमेशा उनकी निंदा की लेकिन जब खुद उस पीड़ा से गुजरे तो इनको भी समझ में आया कि क्यों उनके पिता ने ऐसा कदम उठाया था। 2 जुलाई, 1961 को लगभग 7 बजे सुबह में अर्नेस्ट तहखाने में गए, बंदूक हाथ में लिया, उपकक्ष में सीढ़ियों पर गए, घोड़ा दबाया और खुद को गोली मार ली।
उनके अंतिम संस्कार की विधियां चर्च में नहीं बल्कि कब्रगाह में हुईं। उन्हें कैथोलिक परंपरा के अनुसार दफनाया गया लेकिन कोई उच्च-स्तरीय अनुष्ठान नहीं किया गया क्योंकि पॉलीन को तलाक देने के कारण वे चर्च द्वारा बहिष्कृत कर दिए गए थे और इसी वजह से उनका विधिवत अंतिम संस्कार नहीं हुआ।
खैर, इस दुनिया से जाने के बाद भी अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उदास विषय, सरल संवाद और भावहीन शैली आज भी पूरी दुनिया के लेखकों को प्रेरित कर रही है। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिसने अपनी जिन्दगी साहस के साथ जीया और दुनिया को भी ‘‘साहस और मजबूती के साथ बिना रुके आगे बढ़ने’’ की सलाह दी। एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी साहित्यिक प्रतिभा की अमिट छाप छोड़ गया। एक ऐसा व्यक्ति जिसने दुनिया को ‘‘दिखाया कि हेमिंग्वे के रास्ते पर’’ कैसे चला जा सकता है!
साहस करो, लड़खड़ाओ मत
भले ही तुम्हारी राह में रात जैसा अंधेरा हो
एक टिमटिमाता हुआ तारा करेगा तुम्हारा मार्गदर्शन
ईश्वर पर भरोसा रखो और अच्छे काम करते रहो
रास्ता भले ही कठिन और सुनसान हो
तथा इसका आखरी छोर इतना दूर हो कि दिखाई न देता हो
फिर भी साहस और मजबूती के साथ बिना रुके आगे बढ़ते रहो
ईश्वर पर भरोसा रखो, ईश्वर पर भरोसा रखो,
ईश्वर पर भरोसा रखो और अच्छे काम करते रहो।
अर्नेस्ट मिलर हेमिंग्वेकी बायोग्राफीज | 0 टिप्पणी >>
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