Heading

-    Text Size    +

Content on this page requires a newer version of Adobe Flash Player.

Get Adobe Flash player

प्राचीन और मिथकों से भरपूर भारतीय उप-महाद्वीप विविध भाषा-भाषी और विविध सांस्कृतिक समुदाय के निवासियों का एक ऐसा खूबसूरत गुलदस्ता है जिसे एक प्रजातान्त्रिक डोर ने आपस में जोड़ रखा है। भारतीय जनमानस में राजनीति, अर्थशास्त्र और धर्म इस कदर घुले-मिले हैं कि इनके लिए वे राजनेता खासे पूजनीय बन जाते हैं जो असाधारण कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए आम-जनों के दिलोदिमाग में नायक की-सी छवि बना लेने में कामयाब हो पाते हैं। ऐसी ही महान व्यक्तित्व की स्वामिनी थी इंदिरा गांधी- भारत की आयरन लेडी। वे भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री थीं जिन्होंने 1966 से 1977 तक और पुनः 1980 से शुरू कर चार सालों से कुछ ज्यादा दिनों तक देश की सेवा की। इंदिरा के अदम्य नेतृत्व ने समस्त भारतीयों के मन-मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ी है। एक ओर आम जनता द्वारा उनके लिए किए जाने वाले घनघोर महिमा-गानों और चाटूक्तियों, जिनमें अजेय दुर्गा जैसी उपमा देकर उन्हें पूजित किया जाता रहा, का इंदिरा गांधी ने बहुत आनंद उठाया तो दूसरी ओर 1975 का कुख्यात आपातकाल लागू कर आतंक का माहौल रच देने की वजह से वे जनता के क्रोध और विद्वेष से त्रस्त भी हुईं। परिणामतः 1977 के चुनावों में उन्हें बुरी तरह हारने का अपमान सहना पड़ा लेकिन पुनः सर्वोच्च नेता के रूप में 1980 में उनका पुनरुत्थान भी हुआ जब फिर से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर लाखों भारतवासियों के हृदय पर अपना आधिपत्य कायम करने के साथ ही उन्होंने अपने अवचेतन मूल्यों, भयों और विश्वासों में निष्पक्ष दृष्टिकोण का समावेश कर दिखाया जो कि इंदिरा गांधी के गूढ़ व्यक्तित्व को परिलक्षित करते हैं। वैश्विक स्तर पर भारत को एक महत्वपूर्ण और उत्तरोतर विकसित राष्ट्र के रूप में निर्मित करने की दिशा में इंदिरा गांधी के नेतृत्व का आज भी व्यावहारिक प्रभाव कायम है जबकि विश्वासपात्र सुरक्षाकर्मियों द्वारा उनकी नृशंस हत्या के 28 साल गुजर चुके हैं। 

पावन नगरी इलाहबाद भारत के लाखों श्रद्धालुओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण और केन्द्रीय तीर्थस्थल है। यहां प्रयाग के पवित्र संगम में, जहां अपकेंद्री ऊर्जा के संतुलन की प्रतीक तीन नदियां: गंगा, यमुना और सरस्वती एकाकार होती हैं; अपने पाप धोने के लिए देशभर से जन-सैलाब उमड़ आता है। यहीं एक सुसंपन्न और प्रभावशाली वकील पंडित मोतीलाल नेहरू इलाहबाद हाई कोर्ट में वकालत किया करते थे। भारतीय बुद्धिजीवियों के प्रभावी प्रतिनिधि और उदारवादी मोतीलाल का ब्रिटिश लॉर्ड्स और वायसरायों से काफी मेल-जोल था। उनकी पत्नी स्वरूप रानी अपने पूर्वज कश्मीरी पंडितों की परम्पराओं और रीति-रिवाजों के प्रति दृढ़ आस्था रखती थीं। उन्होंने 'आनंद भवन' नाम की 42 कमरों वाली अपनी वैभवशाली हवेली को पर्सियन कालीनों और बोहेमियन कटलरी से सुसज्जित किया था। वे सेविल रो से सिलकर आए सूट पहना करती और बहुत सुरुचिपूर्ण ढंग से रहती थीं। मोतीलाल ने अपने तीनों बच्चों जवाहरलाल नेहरू, विजयलक्ष्मी और कृष्णा के लिए प्रसिद्ध शिक्षकों को बुलवाकर उत्तम शिक्षा की व्यवस्था की।  

जवाहरलाल ने लंदन के सम्मानित ट्रिनिटी कॉलेज से अपनी शिक्षा पूरी की। मोतीलाल ने उनके लिए दुल्हन के रूप में सौम्य और मनोहारिनी कमला कौल का चयन किया जिनका लालन-पालन एक पारंपरिक भारतीय परिवेश में हुआ था जो आनंद भवन के अंग्रेजी वातावरण के बिल्कुल विपरीत था। बहुत ठाट-बाट से यह शादी 8 फरवरी, 1916 को वसंत पंचमी के दिन संपन्न हुई थी। आनंद भवन में आकर कमला सासू माता के निरंकुश स्वभाव और विनीत किन्तु भाई जवाहर के प्रति केवल अपना अधिकार समझने वाली ननद विजयलक्ष्मी के रवैये से बहुत घबराहट महसूस करती थी। भाई के आस-पास कमला की उपस्थिति से विजयलक्ष्मी द्वेष और ईर्ष्या से भर जाती थीं। 

Indira-Gandhi-girl

कमला के उम्मीद से होने की खबर पाकर पूरा परिवार खुशी से झूम उठा था और स्वरूप रानी तो पारंपरिक रिवाज के मुताबिक थाली बजाकर पोते के जन्म की उद्घोषणा करने के सपने संजोने लगी थीं। 19 नवंबर 1917 को पूरे नेहरू खानदान के साथ शंकाकुल जवाहर सांस रोके बच्चे के जन्म की प्रतीक्षा कर रहे थे जब उन्हें अपनी मां स्वरूप रानी द्वारा केवल एक शब्द में बेहद उदासीन समाचार मिला, 'हुआ'। हैरान मोतीलाल तुरंत समझ गए कि जवाहरलाल को एक कन्यारत्न की प्राप्ति हुई है। इस कन्या का नाम उन्होंने इंदिरा प्रियदर्शिनी रखा। माता-पिता इंदिरा पर जान छिड़कते तो दादा-दादी लाड़-दुलार में उसे बिगाड़े ही जा रहे थे। लॉन में खेलने, पेड़ों पर चढ़ने, दादी स्वरूप रानी के साथ माघ-मेला जैसे वार्षिक उत्सवों में सम्मिलित होने में इंदिरा का वक्त बीतता। हालांकि बचपन के ये रमणीय दिन जल्दी ही खत्म हो गए जब 1919 में रौलेक्ट एक्ट लागू किया गया। भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के क्रांतिकारी प्रदर्शनकारियों पर लगाम कसने के उपाय के रूप में यह एक्ट लागू किया गया था और इसी के तहत 13 अप्रैल, 1919 को जालियांवाला बाग नरसंहार की त्रासद घटना को अंजाम दिया गया था जिसमें जनरल डायर द्वारा अंधाधुंध गोलियां चलवाकर 379 अहिंसक और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को मौत के घाट उतार दिया गया था। क्रोध से आग-बबूला हुए मोतीलाल नेहरू ने अपनी समृद्ध होती वकालत को त्यागकर अबतक की अपने परिवार की उदार छवि को कायांतरित कर ब्रिटिश शासन का कट्टर विरोधी बन जाने के साथ ही भारतीय स्वतंत्रता सघर्ष में अपने जीवन की आहूति देने का प्रण कर लिया। घर की साज-सज्जा की सभी वस्तुओं की होलिका जला दी गई और आनंद भवन को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का हेडक्वार्टर बना कर इसके दरवाजे हमेशा के लिए आम जनता के लिए खोल दिए गए।

 

Indira-Gandhi-littel

मोतीलाल नेहरू के कारावास और उसके बाद 1920 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में जवाहरलाल के बंदी बना लिए जाने जैसे विशद यादों का जखीरा था इंदिरा का शुरुआती बचपन। 1921 में चार साल की इंदिरा ने भीड़ भरी अदालत में शर्मिंदा होते हुए एक जज को अपने प्यारे ‘दादू’ यानी दादाजी से सवाल-जवाब करते देखा। पारिवारिक संपत्ति पर कब्जा करने जब पुलिस की टीम उनके घर पहुंची तब साहसी इंदिरा अपनी आत्मसंयमी मां की पकड़ से एक शेरनी की तरह अपने साम्राज्य में घुस आए भेदियों जैसे दिग्भ्रमित पुलिस वालों पर उछल पड़ी। उन्होंने अपने दादू की बन्दूकों, चांदी व अन्य कीमती सामानों को जब्त करने से बिल्कुल मना कर दिया। पचास सालों के बाद इंदिरा ने कहा था, "तीन साल की उम्र से ही मैं खुद को अपने लिए उत्तरदायी समझने लगी थी। मैं थी या नहीं यह महत्वपूर्ण नहीं था, साथ ही अपने माता-पिता के लिए भी मैं उग्र रूप से जिम्मेदार महसूस करती थी क्योंकि मैं समझती थी कि वे सुरक्षाहीन थे और रिश्तेदार व दोस्त-मित्र उनकी अच्छाइयों का फायदा उठाया करते थे। मैं कुछ बहुत बड़ा सुरक्षित कर लेने की भावना से ओत-प्रोत थी।"

इंदिरा लड़कों की तरह खादी का कुर्ता-पायजामा और टोपी पहनती और कांग्रेस वर्किंग कमिटी की गुप्त बैठकों में जाने से रोकने वाले पहरेदारों को चकमा देकर दादू की गोद में जा बैठने में आनंदित हुआ करतीं। इंदिरा अपने दादाजी के मूल्यों को आत्मसात करती जा रही थीं जैसा कि उनके एक वक्तव्य से जाहिर होता है, "मेरे दादाजी ने एक बार बताया था कि लोग दो तरह होते हैं : एक वे जो कार्य करते हैं और दूसरे वे जो श्रेय लेते हैं। उन्होंने मुझसे पहले तरह के लोगों जैसा बनने को कहा; इसमें प्रतियोगिता भी कम हुआ करती थी।" पतंग उड़ाने जैसी हुल्लड़बाजियां करते, पेड़ पर चढ़ने और सहज बोध से प्रकृति से तारतम्य बैठाने जैसे क्रिया-कलापों में उनके दिन बीतते थे। उन्हें शारीरिक शक्ति बढ़ाने के लिए दौड़ लगाने को भी प्रोत्साहित किया जाता था। आनंद भवन में उनका कमरा उनके लिए एक सुरक्षित स्वर्ग था जहां वे खुद को जॉन ऑफ आर्क या झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के रूप में परिकल्पित किया करतीं। भयाक्रांत होने के बावजूद वे पिता की आज्ञा के अनुसार लम्बा अंधेरा गलियारा पार कर अपने कमरे में जातीं। पिता को यह उम्मीद थी कि शायद इससे अंधेरे में पीछे से छुपकर आती काल्पनिक परछाइयों के आतंक से वे मुक्त हो सकेंगी। 

भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की सतत मांग और इस बृहदतर उद्देश्य के प्रति नेहरू परिवार की वचनबद्धता का अर्थ था इंदिरा के बचपन का एक स्थिर घर की सुरक्षा से वंचित रहना क्योंकि घातक कारावास का तनाव या परिवार के किसी सदस्य की जान जाने का डर कटु सत्य की तरह अचल हो चुका था। छः साल की होने तक इंदिरा अपनी मां कमला की समानुभूतिक हो चुकी थीं। निरंकुश सास-ननद के वर्चस्व के अधीन विनीत पत्नी की उपेक्षा करने वाले पति की लापरवाही से मुर्झा चुकी अपनी मां की वे एकमात्र संगी थीं। फिर नवंबर 1924 में कमला नेहरू के पुत्र रूप में जन्मी दूसरी संतान के गुजर जाने के आघात ने उन्हें अवसाद की तीव्र वेदना में धकेल दिया। उनकी रहस्यमय बीमारी ने बाद में टीबी का भयानक रूप ग्रहण कर लिया। मार्च 1926 में क्षीणकाया कमला के इलाज के लिए साढ़े आठ साल की इन्दिरा को साथ लेकर जवाहरलाल जेनेवा गए। इंदिरा, जिन्हें प्यार से उनके माता-पिता 'इंदू' पुकारते थे, बेहद आत्मनिर्भर बच्ची थीं। वे इतनी आत्मविश्वस्थ थीं कि खुद ट्राम और ट्रेन से रोज लेकोले इंटरनेशनल स्कूल आती-जाती जहां उनका दाखिला करवाया गया था। एक सुसंस्कृत पिता की संतान होने की वजह से उन्हें कई विशिष्ट व्यक्तियों जैसे वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन, लेखक-दार्शनिक रोमेन रोलैंड आदि से मिलने का सौभाग्य मिला। कमला जब स्वस्थ हो गईं तब इस परिवार ने लंदन और पेरिस में अजायबघरों, कला-दीर्घाओं और ऐतिहासिक स्मारकों की खूब यात्राएं की। चूंकि परीकथाएं पढ़ने से पिता की ओर से मनाही थी, इसलिए इंदिरा का झुकाव स्पेनिश साम्राज्य पर विजय हासिल करने वाली वेनेजुएला की क्रांतिकारी जेनरल सिमोन बोलिवर, इटली के राष्ट्रवादी मज्जिनी और उनके कॉमरेड गैरीबाल्डी आदि के बारे में पढ़ने की ओर हुआ। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए किए अपने संकल्पों को निबाहते हुए जवाहरलाल मार्मिक पत्रों के जरिए इंदिरा से संवाद कायम रखते। इन पत्रों में सहनशीलता, पारिवारिक कृतज्ञता, दृढ़ता और उच्चतर उद्देश्यों के लिए समर्पित हो जाने की व्यक्तिगत इच्छाओं को संबल देने जैसे तमाम पहलुओं की चर्चा हुआ करती। घरेलू समस्याओं से दो-चार होते हुए इंदिरा के ज्ञानाकाश को विस्तृत करने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय संदर्भों पर भी विचार किया जाता।

Indira-Gandhi-sena

1929 में इंदिरा के पिता जवाहरलाल नेहरू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए और बारह वर्ष की हो चुकी घनघोर पाठिका इंदिरा 'पूर्ण स्वराज' यानी ब्रिटिश शासन से पूरी तरह स्वतंत्र हो जाने का पूरा मसौदा स्वयं पढ़कर इसके लिए खुद को समर्पित कर दिया। 1930 में इंदिरा के लिए पिता-तुल्य महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की जिसका उद्देश्य दांडी जाकर खुद नमक तैयार कर ब्रिटिश सरकार के नमक कानून को तोड़ना था। गांधी जी की अगुवाई में शांतिप्रिय सत्याग्रहियों को साबरमती आश्रम से 385 किलोमीटर दूर सूरत जिले के दांडी नामक एक गांव तक की यात्रा करनी थी। गांधी जी ने शराब और विदेशी कपड़े बेचने वाली दुकानों के घेरावों में महिलाओं द्वारा निभाई गई क्रांतिकारी भूमिका के लिए उनकी बहुत सराहना की थी। इंदिरा की उत्कट इच्छा थी कि वे भी दांडी यात्रा में हिस्सा लेकर एक ऐतिहासिक घटना का साक्षी बनें। नेहरू परिवार की महिलाएं, खासकर कमला नेहरू ने आम सभाओं को संबोधित करने, दुकानों का घेराव करने और लाठीचार्ज के आगे अविचलित खड़ी रहते हुए अपनी दृढ़ता और सहनशीलता का परिचय देकर सबको अचंभित कर दिया था। मां से प्रेरित होकर इंदिरा ने तो एक बार जीजस एंड मेरी कॉन्वेंट स्कूल से अपना नाम कटवा लिया था और अदम्य इच्छाशक्ति के साथ उन्होंने वानर सेना का गठन किया। यह 5 से 18 वर्ष के बच्चों की सेना थी। वानर सेना द्वारा उन्होंने उत्कृष्ट संचालन शक्ति का प्रदर्शन किया था। इसके माध्यम से उन्होंने यथार्थपरक रूप से स्कूल में हड़ताल, पर्चा वितरण आदि जैसे कई कार्यक्रमों को अंजाम दिया। एक मौके पर इंदिरा को गुप्त दस्तावेजों से भरी एक कार की पिछली सीट पर बैठाया गया था और वे बड़ी सफाई से स्कूल पहुंचने में देर होने का बहाना बना कर उन दस्तावेजों को जब्त करने के लिए कार का निरीक्षण कर रहे सार्जेंट को चकमा देने में सफल रही थीं।  

Indira-Gandhi-complexted

 

Indira-Gandhi-s6

मोतीलाल नेहरू यानी इंदिरा के प्यारे दादू, जो उनपर अपना स्नेह बरसाते नहीं थकते थे, के देहांत से इंदिरा शोक में डूब गईं। यह 6 फरवरी, 1931 की तारीख थी जब मौत के क्रूर हाथों से मोतीलाल नेहरू की इहलीला समाप्त हो गई थी। इसके साथ ही इंदिरा के बचपन के चंचल, लापरवाही भरे खुशगवार दिन खत्म हो गए। घर की महिलाओं में तनाव व्याप्त हो गया और बूआ विजयलक्ष्मी इंदिरा पर अक्सर एक फब्ती कसतीं, "वह बदसूरत और बेवकूफ है।" दादाजी की मृत्यु के सदमे से उबर रही किशोरी इंदिरा बेतरह टूट गईं और हमेशा के लिए उनके दिमाग पर इस विचार का दंश छा गया कि वे न तो सुंदर हैं, न ही बुद्धिमान जो कि नेहरू खानदान का विशिष्ट गुण था। वे निर्मम और अक्षमाशील हो गईं और खुद को विध्वंसक व विकट मौन में समेट लिया। विरासत में पाई नेहरू परिवार के गौरव के कारण, जो दुःख या अन्य भावनाओं के आवेशपूर्ण इजहार की इजाजत नहीं देता, उनमें द्वंद्वों को अपने भीतर ही पचा लेने का स्वभाव विकसित हुआ जो अच्छे-बुरे हर मौके पर आजीवन उनके व्यक्तित्व का एक विशिष्ट गुण बन गया। 

जवाहरलाल की जिद्दी और दुराग्रही बेटी को बिना उनकी सहमति लिए माता-पिता ने उन्हें पूना के पीपल्स ओन बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया।  बीमार मां से दूर रहने और जेल में कैद पिता से नहीं मिल पाने की मजबूरी का इंदिरा पर गंभीर प्रभाव पड़ा। इसके साथ ही परिवार की बदली हुई आर्थिक दशा से कदम मिलाती इंदिरा ने अपनी मां का अनुकरण करते हुए बेहद सादा, संयमी और मितव्ययी जीवन जीना शुरू कर दिया था। उनकी मां ने परिवार की बिगड़ती आर्थिक दशा को देखते हुए बेटी का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए अपने सभी जेवर बेचकर इकठ्ठा किए धन को एक ट्रस्ट में जमा कर दिया था।   

Indira-Gandhi-peace

 

Indira-Gandhi-s6

पूना से मैट्रिक पास कर लेने के बाद इंदिरा की शिक्षा 'शांति की आश्रयस्थली'- शांतिनिकेतन में जारी हुई। शांतिनिकेतन इंदिरा के लिए सुरम्य प्राकृतिक परिवेश से एकाकार होने की दिव्य जगह बन गई जहां उन्होंने फ्रेंच, जर्मन और बंगाली जैसी भाषाओं का अध्ययन किया। इंदिरा अपने आतंरिक मौन का शोध करने के प्रति उन्मुख की गईं और उनमें कला, नाट्य और काव्य रूपों में संप्रेषित रचनात्मक अभिव्यक्ति को सराहने का गुण और समझ विकसित होना शुरू हुआ। "हर किसी को सक्रियता के बीच अचल हो रहना और सघन विश्राम (नींद) में भी जोशपूर्ण ढंग से जीवंत बने रहने की कला सीखनी चाहिए", यह था शांतिनिकेतन में उनके गहन एकान्तिक अनुभवों का सार। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का वे बहुत आदर करती थीं और उच्च सौंदर्यबोध से परिपूर्ण व्यक्तियों की संगति में प्रकृति की तारतम्यता के साथ उनकी शिक्षा-दीक्षा चल रही थी। इन्हीं दिनों फिरोज गांधी नाम के एक पारसी युवा ने, जो इलाहाबाद कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि स्वयंसेवी के तौर पर कमला नेहरू को राजनीतिक कार्यों में सहयोग कर रहे थे, इंदिरा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। हालांकि भारत की चिंताजनक और चुनौतीपूर्ण राजनीतिक स्थितियों के मद्देनजर इस प्रस्ताव को बेहूदा और तुच्छ समझते हुए इंदिरा ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। उनकी शिक्षा के बीच में जून 1935 में एक मध्यांतर उपस्थित हुआ जब मां के तेजी से गिरते स्वास्थ्य की चिकित्सा के लिए इंदिरा को उनके साथ बर्लिन जाना पड़ा। जवाहरलाल नेहरू को संकट की स्थिति को संभाल लेने की इंदिरा की योग्यता पर पूरा भरोसा था लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस यात्रा में शर्मीली, आत्मकेंद्रित और अंतर्मुखी इंदिरा का व्यक्तित्व का रूपांतरण एक बहिर्मुखी व्यक्ति के रूप में हो जाना चाहिए जो अंतर्राष्ट्रीय चेतना को खुली बांहों समेटने में कामयाब हो सके।  

Indira-Gandhi-peace

बदेंवेइलर सेनेटोरियम में कमला नेहरू की स्थिति बद से बदतर होती गई और फिर डॉक्टरों ने भी उनके ठीक होने की उम्मीद छोड़ दी। परेशान इंदिरा कड़कती बिजली के साथ आने वाले अनिष्टसूचक प्रचंड तूफान को पीड़ित और सुरक्षा-कवच हीन अपनी मां की ओर बढ़ता हुआ उग्र रूप से कुपित मृत्यु के पंजे से जोड़ा करतीं। परिणाम यह हुआ कि विनाशकारी तूफान से जीवन भर के लिए उनके मन में एक आतंककारी भय समा गया। इंदिरा ने बेक्स के मिल हेमर्लिन स्कूल में दाखिला लिया जहां दिसंबर की बर्फ में स्कीइंग सीखने के अलावा वे और कोई आनंद नहीं उठा सकीं। 1935 के सितंबर में अल्मोड़ा जेल से छूटते ही पहली फ्लाइट से जवाहरलाल चिंताजनक रूप से बीमार अपनी पत्नी से मिलने जा पहुंचे। पिता के पहुंच जाने से इंदिरा को मनासिक कष्ट से बहुत राहत मिली और उनकी परेशानियां काफी कम हुईं। फिरोज गांधी जो कमला को अपना गुरु मानते थे, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जाने के रास्ते में उनसे मिलने आए थे। यह संभव है कि कमला ने अपनी आसन्न मृत्यु के बाद बेटी की अच्छी तरह देख-भाल की चिंता से अव्यक्त रूप से तसल्ली पाने के विचार से बुद्धिजीवी और विश्वासपात्र फिरोज से इंदिरा की शादी की बात की हो। इंदिरा बमुश्किल 18 वर्ष की थी जब उन्होंने बड़े ही साहस के साथ अपनी मां की असमय मृत्यु का सामना किया। मृत्यु के समय वे उम्र के महत्वपूर्ण मोड़ पर थीं। कमला नेहरू सिर्फ 37 वर्ष की छोटी-सी जिंदगी जीकर परलोक चल बसी थीं। उनकी दुखद और सदमा पहुंचाने वाली मौत ने इंदिरा के मन में कभी न भरने वाला घाव दे दिया था। इंदिरा को आतंरिक रूप से दृढ़ मजबूती और अदम्य जीवट का स्वभाव अपनी मां से विरासत में मिला था फिर भी वे अपने अंधकारमय भविष्य को लेकर निराश और जड़-हीन महसूस करने लगी थीं। जवाहरलाल नेहरू अपनी मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता के भाव से विभोर थे और कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद स्वीकार चुके थे। वे दुःख के पलों में अकेली बेटी को संघर्षरत छोड़कर तुरंत ही भारत लौट आए। दबंग सास और तिरस्कृत करने वाली ननद के हाथों कमला नेहरू के उत्पीड़न के संदर्भ में पिता का आत्मसंतोषी होने ने इंदिरा के मन में शंका उपजाया। इसके साथ ही पिता का अपनी पत्नी के प्रति उपेक्षा और बेपरवाही के संबंध की वजह से पिता-पुत्री के संबंध में दरार उत्पन्न हो गई। इसी दौरान इंदिरा धीरे-धीरे फिरोज की ओर आकर्षित होती गईं जो उनका बेहद ख्याल रखते हुए साथ देते और उनसे कमला नेहरू की बातें किया करते।  भारत लौटकर इंदिरा ने अपने पिता को काफी दूरस्थ और स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू की आकर्षक बेटी पद्मजा नायडू से भावनात्मक रिश्ते में फंसा पाया। इंदिरा जिन्हें अपने महान पिता पर बेहद नाज था, जिनके प्रति वे अधिकार भाव से भरी थीं, उनका पिता से मोह-भंग हो गया। बहुत दुखी होकर उन्होंने पेरिस लौट जाने का फैसला किया। 

पेरिस के खुशनुमा व रोमांटिक परिवेश में युवा इंदिरा ने आखिरकार फिरोज द्वारा दिया विवाह-प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। लेकिन स्वाभाविक तौर पर फिरोज से अंतरंगता की बात को पिता को लिखे पत्रों में उन्होंने जाहिर नहीं किया। वे एक प्रखर नेता का व्यक्तित्व पा सकें, पिता के इस सपने को साकार करने के उद्देश्य से इंदिरा ने अक्टूबर 1935 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सोमर्विले कॉलेज में दाखिला लिया। इंदिरा का व्यक्तित्व अप्रत्याशित गुणों से भरा था। उन्होंने अपने समकालीनों को बेहद आश्चर्य और असमंजस में डाल दिया जब इंडो-चाइना लीग द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में पिता द्वारा भेजे गए चीन के लिए सम्पूर्ण एकता के सन्देश को पढ़ने का दबाव डालने पर इसे पढ़ते हुए वे हकलाने लगीं। फासीवादी ताकतों के बढ़ते प्रभाव और प्लुरिसी (फेफड़े की झिल्ली में सूजन और जलन यानी फुप्फुसावरण शोध) की हो चुकी अपनी बीमारी से उबरने के लिए इंदिरा नवंबर 1938 में भारत लौट आईं। तबतक लैटिन की परीक्षा में अनुतीर्ण होने की वजह से उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई थी जिसे एक साल बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में वापस लौटकर पूरा करने का उन्होंने दुबारा असफल प्रयास किया। यहां वे फिर से प्लुरिसी की चपेट में आ गईं। एक किशोरी के रूप में पुनः स्वस्थ होने के लिए अंधेरे-उदास सेनेटोरियम में निराशाजनक वक्त बिताना उन्हें अपनी मां की याद दिलाता जो अंततः मौत से हार गई थीं। इस दौर में जिन मानसिक और भावनात्मक झंझावातों से वे गुजरी होंगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। प्रचंड तूफान में एक दूब के-से जीवट की तरह ही एक बेहद कमजोर और दुबली-पतली इंदिरा का पूरी प्रतिरोधक क्षमता से जिजीविषा के लिए संघर्ष की पीड़ा से दो-चार होने ने उन्हें जीवन के हर दुष्कर दौर को पराजित कर जीवित रहने में सक्षम बनया। जवाहरलाल नेहरू ने उनके अविचलित धैर्य की बहुत सराहना की क्योंकि वे शरीर की बीमारियों को मानसिक शक्ति से पराजित करने के घनघोर समर्थक थे। इंदिरा में भावनात्मक स्वतंत्रता का भाव जगाने के लिए उन्होंने लिखा था, "अपनी जिंदगी की तुम खुद मालकिन बनो, अपना वर्तमान अपना भविष्य खुद तय करते हुए आगे बढ़ो, मेरी राय अवश्य लो लेकिन अपने लिए खुद निर्णय लो।" विश्वासी फिरोज इंदिरा पर प्रेम, सुरक्षा और उपहार न्योछावर करते रहे। वे अच्छी तरह जानते थे कि इंदिरा के साथ जीवन में आगे की यात्रा नेहरू परिवार के विरोध की वजह से अंगारे बिछे कांटेदार रास्ते पर चलने जैसा ही होने वाला है।   

अक्टूबर 1940 में असैन्य असहयोग आंदोलन के दौरान जवाहरलाल नेहरू कैद कर लिए गए। फिरोज गांधी के साथ इंदिरा एक दुःसाध्य यात्रा कर भारत वापस लौटीं। द्वितीय विश्व युद्ध के चढ़ान पर होने की वजह से यह यात्रा तमाम खतरों और परेशानियों से भरी थी। इंदिरा देहरादून जेल जाकर जवाहरलाल से मिलीं और अपने लिए एक साथी की और अपने बच्चों की परवरिश के लिए एक स्थिर घर की जरूरत का जिक्र करते हुए फिरोज से शादी करने की अपनी उत्कट इच्छा के बारे में उन्हें बताया। जवाहरलाल नेहरू अपने साथ धोखा हो जाने के भाव से घिर गए; न सिर्फ इसलिए कि इंदिरा ने विवाह के लिए एक ऐसे पारसी युवा को चुना था जो उनकी या उनके सम्बन्धियों की तरह विशिष्ट वर्ग से ताल्लुक नहीं रखता था, बल्कि इसलिए भी कि उत्कृष्ट नेहरू खानदान की उत्तराधिकारिणी होने का जिसे सौभाग्य प्राप्त हुआ और देश को गौरवपूर्ण ऊंचाइयों पर ले जाने का नेतृत्व करने की जिसकी नियति ही थी, वह लड़की एक साधारण घरेलू गृहिणी की भूमिका चुन लेने को तत्पर थी। पारिवारिक विरासत को छोड़कर फिरोज से शादी कर लेने की इंदिरा की जिद से पिता नरम पड़े। 16 फरवरी 1942 को राम नवमी (एक हिन्दू पर्व जो भगवान राम के जन्म दिन पर मनाया जाता है) के दिन महात्मा गांधी और करीबी मित्रों-रिश्तेदारों के आशीर्वादों के बीच विधिपूर्वक इंदिरा का विवाह फिरोज के साथ संपन्न हुआ जिसके बाद धूमधाम से रामनवमी का पर्व मनाया गया।


death-interface-02

Indira-Gandhi-peace

अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। सभी भारतीय अपने देश और अपनी नियति का नियंत्रण अपने हाथों में लेने के लिए कटिबद्ध हो चुके थे। मुंबई के गोवालिया टैंक पर एक विशाल जुलूस का आयोजन किया गया था जिसमें इंदिरा की उपस्थिति में राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था। मुंबई में जवाहरलाल के बंदी बना लिए जाने का इंदिरा पर गहरा प्रभाव पड़ा और वे इलाहाबाद चली गईं। वहां उन्होंने कांग्रेस पार्टी के हेडक्वार्टर स्वराज भवन को सैनिकों के कब्जे में पाया। अंग्रेजों की क्रूरता से क्रुद्ध और देशभक्ति की भावना के जोश में अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देते हुए इंदिरा ने विशाल जन-सभा को संबोधित किया नतीजतन पुलिस ने उनपर हमला कर बंदी बना लिया। यह वाकया इंदिरा की जिंदगी में क्रांतिकारी साबित हुआ जब भारत की स्वतंत्रता के महत्तर उद्देश्यों के आगे उनके लिए व्यक्तिगत संतुष्टि के सभी विचार भस्मीभूत हो गए। इसके बाद ही शर्मीली और संकोची इंदिरा, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी न बोलने की कसम खाई थी, भीड़ से सहानुभूतिपूर्वक जुड़ जाने वाली, उनमें जागृति का जोश जगा देने वाली एक प्रभावशाली नेता के रूप में बदलती चली गईं। इंदिरा ने आठ महीने कारावास में बिताए। ये आठ महीने उनके लिए सहनशीलता और स्व-चेतना का अनुसंधान कर लेने की यात्रा साबित हुआ जहां उनका सामना अपनी ही अंतरात्मा की आवाज से हुआ जो उन्हें उच्चतर नियति की ओर जाने की खुशामद कर रही थी।

Indira-Gandhi-peace

यह जानकर कि वे मां बनने वाली हैं, इंदिरा फूली न समाई। उतने ही खुश फिरोज बेहतरीन चिकित्सीय सुविधाएं मुहैया कराने के लिए इंदिरा को मुंबई लाए जहां 20 अगस्त, 1944 को उनके पहले पुत्र राजीव रत्न का जन्म हुआ। अहमदनगर जेल से जून 1945 में छूटने के बाद जवाहरलाल श्रीनगर जाकर अपने नवासे से मिले। यह एक बेहद भावनात्मक पारिवारिक पुनर्मिलन था। 1946 तक जवाहरलाल नेहरू अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त हो चुके थे। इंदिरा ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए इलाहाबाद छोड़कर उनके लिए व्यवस्थित किए गए आवास में पिता के साथ रहने दिल्ली चली आईं। एक शालीन मेजबान और मेधावी पर्यवेक्षक के तौर पर पिता से मिलने आने वाले अध्यक्षों, दार्शनिकों और निष्ठावान स्वतंत्रता सेनानियों को देखते-सुनते इंदिरा प्रोटोकॉल की बारीकियां, व्यवहार कुशलता और राजनीतिक जोड़-तोड़ में पारंगत हो गईं। लेकिन अंतरंगता और दाम्पत्य की यह शुरुआती सुखानुभूति जल्द ही खत्म हो गई और इनकी जगह तनाव के दंशों ने ले ली जिसका कारण संभवतः फिरोज गांधी की बेवफाई थी। फिरोज एक बेहद सतर्क और निपुण पत्रकार थे जो उन दिनों लखनऊ में जवाहरलाल नेहरू द्वारा संस्थापित एक समाचार-पत्रिका “नेशनल हेराल्ड” के लिए कार्य कर रहे थे। दिल्ली में रह रही इन्दिरा से दूर लखनऊ में रहते हुए फिरोज का किसी अन्य महिला से अन्तरंग संबंध बन चुका था। हालांकि उन्होंने दूसरे बेटे संजय के जन्म के समय इंदिरा का साथ देने का कर्तव्य पूरी मुस्तैदी से निभाया था। 18 दिसंबर 1946 को संजय का जन्म इंदिरा के लिए बहुत खतरनाक साबित हुआ था। एक घरेलू वातावरण में बच्चों की परवरिश करने की इंदिरा की तमाम कोशिशों के बावजूद राजीव और संजय का बचपन तीन मूर्ति भवन में बीता जो घर नहीं एक अजायबघर (म्यूजियम) था। प्रधानमंत्री के नवासे होने के सौभाग्य का आनंद उठाते हुए राजीव और संजय आलीशान स्थान के वैभव और विलास के बीच बड़े हुए। उन्हें पशुओं से काफी लगाव था और उनके पालतू पशुओं में पांडा, शेर के बच्चे, घोड़े और यहां तक कि एक घड़ियाल भी था। हालांकि इंदिरा इस बात की ताकीद रखती थीं कि भौतिक वस्तुओं जैसे महंगे खिलौनों और अन्य मुफ्त सुविधाएं बच्चों को बिगाड़ न दे। उन्होंने बच्चों को एलिजाबेथ गौबा द्वारा चलाए जा रहे प्राइवेट स्कूल में पढ़ने भेजा। राजीव मृदुभाषी, विनीत और सौम्य थे जबकि संजय उनसे ठीक विपरीत विद्रोही, मुंहफट, जिद्दी और दुराग्रही थे। मां और नाना के साथ राष्ट्रीय समारोहों जैसे आकर्षक व आडम्बरपूर्ण गणतंत्र दिवस आदि में शिरकत करते ये बच्चे भारतीय नागरिकों के लाड़-प्यार जताने का बहुत आनंद लेते। आश्चर्यजनक रूप से बच्चों को इंदिरा की विरासत के तौर पर गहन अध्ययन और किताबों के प्रति आजीवन लगाव का गुण नहीं मिला।  

Indira-Gandhi-destiny

death-interface-02

14 अगस्त, 1947 की आधी रात को जब पूरी दुनिया नींद में थी, अपनी नियति से पूर्वनिश्चित मुलाकात करने के लिए भारत जाग उठा था। अपनी मातृभूमि को अंग्रेजी सत्ता के शिकंजे से मुक्त देखकर भारतवासी खुशी से झूम उठे थे। जैसे ही ऐतिहासिक लाल किले से जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र ध्वज फहराया, उत्तेजना में स्तब्ध इंदिरा खड़ी हो गईं। अपरिमित विपत्तियां सहकर हासिल की गई आजादी के समारोह का काला पक्ष था देश का बंटवारा जिसने जाने कितने नर-संहारों, सांप्रदायिक युद्धों और लूट की वारदातों को जन्म दिया था। अपने दोनों बच्चों के साथ इंदिरा मसूरी से दिल्ली आ रही थीं कि बदमाशों ने ट्रेन रोककर मुस्लिम दिखते एक शख्स पर हमला कर दिया। आश्चर्यजनक कदम उठाते हुए बहादुर इंदिरा ट्रेन से कूद पड़ीं और उन्मादी भीड़ के कोप से उस व्यक्ति को बचाकर अपने डिब्बे के सुरक्षित घेरे में ले आईं। मुस्लिम शरणार्थी कैम्पों में जाकर इंदिरा उनकी निःस्वार्थ सेवा करतीं। वे सुबह 5 बजे से जागकर वहां की गलियों की सफाई, राशन की व्यवस्था आदि करने में मदद करतीं और देर रात तक घर लौटने के दौरान कट्टर हमलावरों से संघर्ष करने में अक्सर अपने जान को जोखिम में डाला करतीं। अनेक जानलेवा धमकियों की पूरी तरह उपेक्षा कर इंदिरा व्यर्थ की हिंसा की चपेट में आए असहाय लोगों की रक्षा करतीं। वर्ष 1948 का आरंभ महात्मा गांधी की दहला देने वाली हत्या के दर्दनाक और अशुभ समाचार से हुआ जिन्हें इंदिरा अपने ही परिवार का एक बुजुर्ग सदस्य समझा करती थीं। बेहतर भविष्य के लिए आजादी के दीवानों द्वारा अदा की जाने वाली कीमत की नग्न सच्चाई थी यह घटना। हताशा के अंधियारों में घिर गए पूरे देश के साथ इंदिरा भी गहरी व्यथा में डूब गईं।  

निजी स्तर पर इंदिरा का पति फिरोज से रिश्ता बिगड़ता ही जा रहा था। पत्नी की तुलना में कमतर प्रोटोकॉल की हैसियत हासिल होने की वजह से फिरोज अपमानित महसूस करते जबकि इंदिरा देश की प्रथम महिला के सदृश सम्मान और गर्व के साथ जवाहरलाल नेहरू के कार्यालयीय आवास तीन मूर्ति भवन में आयोजित होने वाले सभी औपचारिक समारोहों की अगुवाई करतीं। इंदिरा से संबंध के आरंभ से ही फिरोज इस तथ्य से अच्छी तरह परिचित थे कि वे खुद को उन्हें सम्पूर्ण रूप से अशर्त समर्पित करने में सक्षम नहीं हो सकेंगी। 1952 में रायबरेली से लोकसभा का चुनाव जीतकर फिरोज भी इंदिरा और अपने प्यारे बेटों, राजीव और संजय के साथ रहने के लिए तीन मूर्ति भवन आ गए। हालांकि जल्दी ही वे तीन मूर्ति भवन की भयावह एकांतमयता, जहां प्रोटोकॉल का कठोर अनुपालन हुआ करता था, से भयभीत होकर अपने सरकारी आवास में रहने चले गए। दोनों बेटे अपने जोशीले पिता के साथ रहने को बड़े इच्छुक रहते क्योंकि निश्चिन्त वातावरण में भरपूर हंसी-खुशी के साथ उन्मुक्त प्यार लुटाते हुए वे उनके साथ काफी वक्त गुजारते, बागवानी का आनंद उठाते, कार बनाते। इधर इंदिरा और फिरोज के रिश्ते में मतभेद की बढ़ती दीवार अलंघ्य होती जा रही थी। अंत में फिरोज विवाहेत्तर संबंधों में सांत्वना पाने की कोशिश करते हुए इंदिरा से तलाक के मुकाम पर पहुंच गए।


death-interface-02

बच्चों की शिक्षा-दीक्षा एक बोर्डिंग स्कूल में चलती रही। राजीव अपनी पढ़ाई में बहुत अच्छा कर रहे थे जबकि परम्परागत शिक्षा में दिलचस्पी नहीं होने की वजह से संजय ने देहरादून के प्रतिष्ठित दून स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। मां और नाना के पद-चिह्नों पर चलते हुए दोनों बेटों ने इंग्लैंड में उच्च शिक्षा जारी रखी। अब जबकि बच्चे दूर जा चुके थे, इंदिरा गांधी निरंतर काम में डूब गईं। अपने पिता के लिए कांग्रेस के सेंट्रल इलेक्शन कमिटी का सदस्य बनने के लिए चुनावी दौड़-धूप करने, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ भारतीय प्रतिनिधि मंडल का सदस्य होने की हैसियत से यू.एस.ए. और सोवियत यूनियन की यात्राओं पर जाने आदि में वे व्यस्त हो गईं। बाल-कल्याण उनका विशिष्ट कार्य-क्षेत्र था जिसके लिए उन्होंने बाल भवन की स्थापना करवाई। सृजनात्मक अभिव्यक्तियों, जो प्राणों को उत्साह-उल्लास से अभिसिंचित करती हैं, को प्रोत्साहन देने के लिए जनजातीय नर्तक-नर्तकियों और ग्रामीण कारीगरों को इंदिरा और जवाहरलाल ने संरक्षण प्रदान किया। अंतर्राष्ट्रीय चलन से कदम-ताल मिलाने वाली इंदिरा ने अहमदाबाद में साबरमती के सुरम्य तट पर प्रतिष्ठित नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाइन की स्थापना करवाई। कर्मयोग में दृढ़ आस्था रखने वाली इंदिरा बार-बार दोहराया करती थीं, "कार्य करने के प्रति पक्षपात पूर्ण नजरिया अपनाइए- इस क्षण में कुछ होता हुआ देखिए। किसी बड़ी योजना को आप छोटे-छोटे भागों में बांटिए और पहला कदम बस तुरंत ले डालिए।"

फिरोज गांधी ने एक बेधड़क और तेज-तर्रार सांसद के रूप में युवा शक्ति को नई स्फूर्ति से भर डाला। एक विचारवान पत्रकार और सूक्ष्म पर्यवेक्षक होने के गुणों के चलते उन्हें राष्ट्रीय समसामयिक मुद्दों की गहरी समझ थी। फिरोज से जवाहरलाल नेहरू की बातचीत में घमंड का तंज होने की वजह से दामाद के साथ कभी भी उनका करीबी रिश्ता नहीं बन सका। शायद इन्हीं वजहों से भड़के फिरोज ने नेहरू के विश्वासी मंत्रियों जैसे टी.टी.कृष्णामाचारी और विशेष सहयोगी एम.ओ.मथाई द्वारा किए गए घोटालों और अनियमितताओं को उजागर करना शुरू किया। नेहरू परिवार की एकता को बदनाम करने वाले इस अभियान से इंदिरा और ज्यादा क्रुद्ध हो गईं जो कांग्रेस पार्लियामेंट्री बोर्ड (कांग्रेस संसदीय समिति) में उच्च स्थान ग्रहण करती जा रही थीं जबकि हाशिये पर कर दिए जाने से उनके पति का क्लेश बढ़ता ही जा रहा था। एक तूफानी शादी का प्रचंड विवादों और अहम् की टकराहटों से बोझिल होकर निराशा और अवसाद से घिर जाने ने इंदिरा की राजनैतिक सफलता को धूमिल कर दिया। मानसिक उलझनों के भंवर-जाल में फंसी होने के बावजूद इंदिरा के बाह्य-व्यवहार से संतुलन और गरिमा की ही झलक मिलती थी। इसी दौरान फिरोज को दिल का दौरा पड़ा और इंदिरा ने बड़े प्यार से उनकी सेवा की। आपसी रिश्ते में प्रेम और सामंजस्य बढ़ाने के उद्देश्य से वे दोनों बच्चों के साथ छुट्टियां मनाने श्रीनगर चले गए। 

41 साल की युवा इंदिरा फरवरी 1959 में कांग्रेस अध्यक्ष के सर्वोच्च पद के लिए चुनी गईं। यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी जो उनकी राजनैतिक कुशाग्रता बयां करने के लिए काफी है। उनपर गौरवान्वित होते हुए जवाहरलाल नेहरू ने एक बेहद मर्मस्पर्शी संभाषण करते हुए कहा था, "पहले इंदिरा गांधी मेरी मित्र और सलाहकार थीं, फिर मेरी सहयोगिनी बनीं और अब वे मेरी नेता बन चुकी हैं।" इंदिरा की जिद के चलते 1950 के दशक के मध्य में केरल की मार्क्सवादी सरकार के गिरने और राष्ट्रपति शासन लागू होने के मुद्दे पर उनके और फिरोज के बीच जमकर राजनीतिक झगड़े हुए जो एक-दूसरे पर दुर्भावनापूर्ण व्यक्तिगत हमलों में बदल गए। फिर भी जानलेवा हृदयाघात से सिर्फ 48 वर्ष के फिरोज गांधी के असामयिक दुखद निधन से इंदिरा क्षत-विक्षत हो गईं। क्योंकि तमाम मतभेदों और गलतफहमियों के बावजूद पति-पत्नी के बीच निष्ठा का मजबूत बंधन कायम रहा था। इस दुखद घटना के बाद इंदिरा यूनेस्को के साथ काम करने में पूरी तरह डूब गईं और फिर अगाध शक्ति से निजी दुःख की निरीहता से खुद को उबारती हुई वे त्वरित उत्थान की हर विघ्न-बाधाओं को पार करती चली गईं।    

Indira-Gandhi-destiny

Indira-Gandhi-s12

रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन के प्रभाव में आकर जवाहरलाल नेहरू ने चीनी सेना को कमतर आंका जिसका नतीजा यह हुआ कि 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीनी सेना ने भारतीय फौज को पराजित कर दिया। असम के तेजपुर से सिर्फ तीस मील की दूरी पर टिकी हुई चीनी सेना के भय से अफरा-तफरी का जो माहौल उत्पन्न हुआ कि जिला-आयुक्त समेत पूरा प्रशासनिक तंत्र अपना कार्य-भार छोड़कर भाग खड़ा हुआ। ऐसी कायरता से कुपित हुई इंदिरा पिता की अवज्ञा कर और बंधक बना लिए जाने की सभी धमकियों को ताक पर रखते हुए उन असामियों को सांत्वना और शांति का संदेश देने तेजपुर की ओर उड़ चली जो भारत सरकार द्वारा खुद को छला हुआ महसूस करने लगे थे। ठीक उसी दिन नेहरू ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की लेकिन मिडिया द्वारा इसकी कटु आलोचना होने से कुम्हलाए नेहरू पर भुवनेश्वर में आयोजित कांग्रेस के 68वें अधिवेशन में पक्षाघात का गंभीर दौरा पड़ा। इंदिरा उनकी जीवन-स्रोत थीं और उन्होंने पूरे प्राण-पण से उनकी सेवा करने के साथ ही उनका काम-काज भी संभाला था। हालांकि उत्तराधिकार संभालने की किसी योजना के अभाव में नेहरू की बीमारी के दौरान प्रधानमंत्री पद के कई योग्य दावेदार मंत्रियों के बीच वर्चस्व का संघर्ष खुलकर सामने आया।  

27 मई, 1964 को जवाहरलाल नेहरू चल बसे और इंदिरा जड़ होकर उनके अंतिम संस्कार की कार्यवाहियां देखती रहीं। गुलदान में सजी सफेद गुलाब के निष्कलुष सौंदर्य-सी प्रदीप्त इंदिरा अकेले में क्षति की भयावहता का अंदाजा पाकर फूट-फूटकर रो पड़ीं। नेहरू के देहांत का सबसे व्यावहारिक और परेशानीमूलक पक्ष था तीन मूर्ति भवन छोड़कर 1, सफदरजंग रोड पर स्थित एक छोटे बंगले में आकर रहना। लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्रीत्व में इंदिरा गांधी ने सूचना और प्रसारण मंत्री का कार्यभार संभाला। महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे दक्षिण भारतीयों पर जबर्दस्ती हिंदी भाषा आरोपित करने जैसे अपने विचारों और निर्णयों को लेकर वे हमेशा अडिग रहीं चाहे इसके लिए उन्हें प्रधानमंत्री की आलोचना ही क्यों न सहनी पड़ी हो। पिता की विरासत को श्रद्धांजलि देते हुए इंदिरा ने नेहरू की जिंदगी और कार्यों पर प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसका उद्घाटन न्यूयॉर्क में किया गया और फिर नई दिल्ली आने के क्रम में उन्होंने सोवियत रूस और लंदन की यात्राएं भी की। प्रदर्शनी के लिए लंदन की यात्रा के दौरान इंदिरा अपने व्यस्त कार्यक्रमों में से कुछ वक्त निकालकर कैम्ब्रिज में पढ़ रही एक प्यारी इटालियन लड़की सोनिया माइनो से भी मिली जिससे राजीव का गहरा प्रेम-संबंध था। राजीव अपने रिश्ते को शादी में बदलने के इच्छुक थे। 

1965 के युद्ध में, जब पाकिस्तान ने कश्मीर में घुसपैठ की थी, भारतीय सैन्य-दलों को सकते में डालते हुए इंदिरा ने हाजी पीर के दर्रे पर जाने की गुस्ताखी की थी जिस दर्रे पर काफी खून-खराबे के बाद भारतीय फौज ने कब्जा जमा लिया था। युद्ध-विराम को औपचारिक जामा पहनाने के लिए बुलाए गए ताशकंद समझौते के दौरान जानलेवा दिल का दौरा पड़ने से 10 जनवरी, 1966 को लाल बहादुर शास्त्री के आश्चर्यजनक निधन हो जाने से इंदिरा देश का सर्वोच्च पद पाने के एक और कदम नजदीक आ गईं। 

golden-era

Indira-Gandhi-s12

अनुभवी कांग्रेसी नेता के.कामराज ने इंदिरा को प्रधानमंत्री पद प्रस्तावित करते हुए उनसे संपर्क साधा। उन्हें गलतफहमी थी कि निष्ठावान कांग्रेसियों के हाथों की कठपुतली मात्र होंगी इंदिरा। सच तो यह था कि बहुत अधिक यात्राएं कर चुकने की वजह से वे दुनिया भर के राजनीतिज्ञों की दृष्टि में भारत की छवि बन चुकी थीं। इसके साथ ही युवा पीढ़ी की विश्वस्त नेता होना उन्हें ज्यादा योग्य साबित करती थी। राजनीति के महारथी गुजराती नेता मोरारजी देसाई, जो वरिष्ठ होने के आधार पर यह महत्वाकांक्षी पद पाना चाहते थे, से इंदिरा को कड़ी टक्कर मिली। इंदिरा ने पहले महात्मा गांधी की समाधि, राजघाट पर जाकर उनका आशीर्वाद लिया और फिर तीन मूर्ति भवन पहुंच कर अपने प्यारे 'पापू', जिन्होंने इंदिरा के बचपन से ही उनके इस ऊंचाई तक पहुंचने का सपना संजोया था, को श्रद्धांजलि अर्पित की। अधिकांश कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों का समर्थन पाकर इंदिरा ने मोराजी देसाई पर बहुत बड़े अंतर से जीत हासिल की। 24 जनवरी, 1966 को भारतीय संविधान में निष्ठा व्यक्त करते हुए इंदिरा ने प्रधानमंत्री पद के लिए पद और गोपनीयता की शपथ ली। और यहां से इंदिरा और भारत के एक-दूसरे में गुंथी साझा नियति के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई।  

इंदिरा ने श्रेष्ठता-बोध का शिकार अनुभवी राजनीतिक धुरंधरों, जो उनके द्वारा नौकरशाही को प्रेरित करने की वजह से उनकी प्रौढ़ता और जोश को कमजोर कर रहे थे, की चालों और तिकड़मों के बीच अपनी सुरक्षित जगह बनाने में सफल रहीं। इंदिरा की सरकार चलाने की सक्रिय शैली का अर्थ था अनेक समस्याओं से एक साथ निबटने के लिए प्रयत्न करना, जैसे सूखा राहत कार्यान्वयन, उत्तर-पूर्व में छिड़ चुके संघर्ष का सामना, कठिन प्रयास द्वारा पुराने पंजाब में से हिंदी-भाषियों के लिए हरियाणा प्रदेश का गठन करना आदि। वे हर सुबह अपने घर पर 500 लोगों से मिलतीं और उनकी परेशानियों का त्वरित निराकरण करने की व्यवस्था करतीं। एक नौसिखिए सांसद के रूप में अच्छी तरह अभ्यास किए गए आलेखों को पढ़ने के बीच में उन्हें घबराने के लिए तत्कालीन धुरंधरों द्वारा जान-बूझ कर बाधा डालने की कोशिश की जाती थी। संसद के वरिष्ठ सदस्य और उनके आलोचक राम मनोहर लोहिया उनकी निरंतरता और स्वतःस्फूर्ति की कमी का मजाक उड़ाते हुए उन्हें 'गूंगी गुड़िया' कहा करते थे। 

इंदिरा को फ्रांस के प्रेसिडेंट चार्ल्स डे गौले की ओर से पेरिस आने का बुलावा भेजा गया। वे इंदिरा के कार्यों से काफी प्रभावित थे। इंदिरा वहां अमेरिकी प्रेसिडेंट लिंडन जॉनसन से भी मिलीं जिन्होंने भारत को दी जाने वाली सहायता की मियाद बढ़ा दी और खाद्य-साधन निर्गत कर दिया। इंदिरा भारत को आत्म-निर्भरता की ओर ले जा रही थीं। वे हरित क्रांति की सूत्रधार थीं जिसका परिणाम था खेती में मशीनों और खादों का उपयोग। इसी दौरान कुपोषण को लक्ष्य कर दुग्ध-उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 'श्वेत क्रांति' की शुरुआत हुई। इंद्रा का दृढ़ विश्वास था कि "अंततः किसी देश की शक्ति इस बात से परिलक्षित होगी कि यह खुद के बल पर क्या कर सकता है, इससे नहीं कि यह दूसरों से क्या उधार ले सकता है।" पूरी मजबूती के साथ उन्होंने भारतीय रुपये के विवादस्पद अवमूल्यन को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (इंटरनेशनल मोनेटरी फंड) की सलाह से संभाला। इंदिरा की दृढ़ता का अनुमान उड़ीसा में घटी घटना से भी लगाया जा सकता है। 1967 के चुनाव-अभियान में एक आम-सभा को संबोधित करते हुए इंदिरा पर अचानक एक पत्थर फेंका गया जो उनकी नाक पर आकर लगा और खून बहने लगा। लाजवाब और अनुकरणीय प्रतिरोधक्षमता का परिचय देते हुए इंदिरा ने अपनी साड़ी से खून पोछा और स्तब्ध जनता के साथ बातचीत जारी रखा। 1967 के चुनाव में इंदिरा विजयी हुईं और 20 जनवरी, 1968 को ऊर्जा और आत्मविश्वास से लबरेज 47 वर्षीय युवा इंदिरा का प्रधानमंत्री कार्यालय में बतौर प्रधानमंत्री शुभागमन हुआ।  

एक महीने के भीतर ही इंडियन एयरलाइन्स में पायलट हो चुके उनके बड़े बेटे राजीव ने अपनी प्रियतमा और संगिनी सोनिया माइनो से 25 फरवरी, 1968 को 1, सफदरजंग रोड के अपने आवास पर शादी रचा ली। एक मजिस्ट्रेट द्वारा पंजीकरण करवाने के साथ ही बेहद सादगी से विधिपूर्वक यह शादी संपन्न हुई। राजीव और सोनिया ने अपनी निजता बरकरार रखी और उन्हें 1970 में पुत्र राहुल और 12, जनवरी 1972 में पुत्री प्रियंका के गर्वित माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दादी बनकर इंदिरा गर्व से फूले न समाईं। पोते-पोती पर स्नेह छलकाती वे उनके साथ शब्दों के खेल खेलने में बहुत आनंद उठातीं।  

राजनैतिक दृष्टि से पार्टी के भीतर इंदिरा की हैसियत और मजबूत होती जा रही थी क्योंकि कामराज, एस.के.पाटिल, अतुल्य घोष जैसे अनुभवी नेताओं का विद्वेषपूर्ण गुट अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में हार चुका था। इस गुट के कड़े विरोध के बावजूद इंदिरा ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में जाकिर हुसैन को समर्थन दिया था और उनके जीत को न्यायोचित ठहराया गया था। हालांकि जाकिर हुसैन के अचानक निधन के बाद इंदिरा के उम्मीदवार जगजीवन राम के विरुद्ध इस गुट के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति पद के लिए विजयी रहे थे। हमेशा की तरह इंदिरा आवेशपूर्ण झगड़ों को चतुराई से टालती रहीं लेकिन अपमान को वे किसी कीमत पर माफ नहीं कर सकती थीं। वे मौका देखकर उस वक्त घातक पलटवार करतीं जब विरोधी सुरक्षित होने के भ्रम में खुद को निहत्था कर चुका होता। इंदिरा ने मोरारजी देसाई की छुट्टी कर वित्त मंत्रालय का कार्यभार खुद के जिम्मे ले लिया। इंदिरा का यह कदम दूसरों को भी उनके प्रचंड क्रोध को आमंत्रित नहीं करने का सबक देने के लिए काफी था। वित्तमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। कट्टर मतभेदों के चलते 1, नवंबर 1969 को इस गुट ने इंदिरा को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। "मेरी सभी चालें राजनैतिक चालबाजियां थीं; जॉन ऑफ आर्क की तरह मैं हमेशा ही अग्निबाणों के निशाने पर ही रही", इंदिरा का यह कथन विषम परिस्थितियों में उनके दृढ़ स्वभाव का परिचायक है। इस स्थिति से इंदिरा बहुत दुखी हुईं लेकिन वे आशान्वित भी थीं और 'युवा तुर्क' के नाम से मशहूर अपने अनुयायियों के बल पर उन्होंने राष्ट्रपति से लोक-सभा भंग करने का आग्रह किया। 

फरवरी 1971 में हुए चुनाव जीतकर इंदिरा ने दुबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। गरीबी के अभिशाप से आमजन को मुक्त करने के वादों के साथ "गरीबी हटाओ" का नारा लगाती इंदिरा की जनता ने जय-जयकार की जबकि उनके विरोधीगण इस चुनाव को व्यक्तिगत पुश्तैनी झगड़े की तरह इंदिरा को उनके पूर्व पद से हटाने का निमित्त भर समझते रहे।   

golden-era

प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा ने जिन चुनौतियों का सामना किया उनमें से एक महत्वपूर्ण चुनौती थी सीमापार से आया संकट जो पाकिस्तान के चुनाव से उद्भूत हुआ था। पाकिस्तान नेशनल एसेम्बली के चुनाव में अधिकांश सीटें शेख मुजीब-उर रहमान की आवामी लीग ने जीती थी। लेकिन जनादेश की अवहेलना करते हुए प्रेसिडेंट याह्या खान ने चुनावी प्रक्रिया द्वारा जीतकर आई पार्टी की सरकार बनाए जाने की मांग कर रहे निर्दोष जन-समूह का बर्बरतापूर्वक संहार कर देने के लिए सैन्य बल भेज दिया। परिणामतः पाकिस्तान से भागकर आए लाखों शरणार्थियों का विशालतम आर्थिक और सामाजिक भार भारत के मत्थे आ पड़ा। लगातार अपील करने के बावजूद यू.एस. प्रेसिडेंट आर.निक्सन के भारत और इंदिरा के प्रति विद्वेषपूर्ण और उदासीन रवैये के चलते अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने इस मसले को कोई अहमियत नहीं दी। अंततः 4 दिसंबर, 1971 को इंदिरा ने पूर्वी पाकिस्तान को मुक्त कराने के लिए युद्ध की घोषणा कर दी। जेनरल एस. मानेकशॉ के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पूर्वी बंगाल के एक क्रन्तिकारी संगठन “मुक्ति बाहिनी” के साथ मिलकर भारत के विजय की रणनीति तैयार की। यू.एस. ने भारतीय पक्ष पर भारतीय समुद्री सीमा के भीतर सेवेंथ फ्लीट (जहाजी बेड़ा) की प्रतिस्थापना कर देने के आदेश की धमकी देकर दबाव बनाने की कोशिश की लेकिन भारतीय आक्रमण इस कदर प्रचंड था कि पाकिस्तानी फौज की धज्जियां उड़ गई। सेवेंथ फ्लीट के आने से पहले ही पाकिस्तानी सेना समर्पण कर वापस जा चुकी थी। पार्टी लाइन्स को दरकिनार कर पूरा देश अब उस प्रधानमंत्री का गुणगान करते हुए जुलूस निकाल रहा था जिसने आम जनमानस में न्याय की रक्षा करने के लिए सभी आसुरी शक्तिओं को वीरतापूर्वक पराजित करने वाली 'अजेय देवी दुर्गा' की अमिट छवि निर्मित कर ली थी। देश में विजयोल्लास की उन्मत्तता के बीच इंदिरा ने धैर्य का दामन नहीं छोड़ते हुए पश्चिम पाकिस्तान में युद्धविराम की घोषणा कर दी ताकि स्थिति बिगड़ कर विश्व युद्ध तक न जा पहुंचे। संसद में सभी सांसदों ने खड़े होकर इंदिरा को सम्मानित किया और इस तरह एक वैश्विक नेता के तौर पर उनकी क्षमता और उपलब्धियों की तूती बोलने लगी। राष्ट्रीय गौरव को बरकरार रखते हुए शांति के लिए अपनी वचनबद्धता निभाती इंदिरा का पाकिस्तान के प्रेसिडेंट जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ किए गए शिमला समझौते की सफलता उनकी उपलब्धियों का अगला सिरमौर थी। 

Indira-Gandhi-70

यू.एस. से मिलने वाली खाद्यान्न सहायता बंद होने, युद्ध की वजह से उत्पन्न आर्थिक बोझ, महंगाई और मुद्रास्फीति जैसी समस्याओं की वजह से 1973 से 1975 का कालखंड बहुत परेशानियों भरा था। इन निराशाजनक परिस्थियों में अपवादस्वरूप घटना थी इंदिरा द्वारा न्यूक्लियर पावर (नाभिकीय शक्ति) का सशक्त और सफल परीक्षण करवाना। इंदिरा के निर्देश पर भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों के प्रयत्नों से 7 सितंबर, 1974 को राजस्थान के पोखरन में भारत का पहला न्यूक्लियर टेस्ट किया गया। उधर गुजरात में चिमनभाई पटेल की भ्रष्ट सरकार के विरुद्ध जयप्रकाश नारायण द्वारा समर्थित एक हिंसक आंदोलन से खलबली मची हुई थी। यूनियन लीडर जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में बहुत बड़े पैमाने पर रेलवे कर्मचारियों के हड़ताल को अपराधियों पर कठोर जुर्माने का प्रावधान कर सख्ती से कुचल डाला गया। इंदिरा के छोटे बेटे, संजय गांधी, द्वारा प्रोत्साहित किए जा रहे विवादास्पद मारुति परियोजना के सिलसिले में इंदिरा सरकार पर खुल्लम-खुल्ला भाई-भतीजावाद करने का आरोप लगाकर चलाए जा रहे विद्वेषपूर्ण अभियान का सीधा निशाना इंदिरा ही थीं। विपक्ष ने भूमि-आबंटन के घोटालों, राष्ट्रीयकृत बैंकों से लिए गए उधार और व्यवस्थागत अनियमितताओं आदि का भंडाफोड़ किया जिसके फलस्वरूप आखिरकार बैंकों को अब और उधार नहीं देने के बारे में दिशा-निर्देश जारी किया गया। उनको नष्ट कर दिए जाने के षडयंत्रों के अफवाहों के कारण सतर्कता में इंदिरा ने खुद को रहस्यमयता के अभेद्य आवरण से घेर लिया जबकि जीतने से उत्पन्न हुए घमंड के कारण उनके शुभचिंतक भी एक-एककर उनसे दूर होते जा रहे थे। इसी बीच अपने प्रेम-संबंध के बारे में संजय के खुलासे ने इंदिरा के अस्थिर मानसिक चित्त को और अधिक उद्विग्न कर दिया। सामान्य परिस्थितियों में इंदिरा ने अपनी इच्छा से संजय की दुल्हन के रूप में एक सौम्य कश्मीरी लड़की का चयन किया होता लेकिन उनकी आशाओं पर पानी फेरते हुए संजय का भारतीय सेना में कार्यरत एक कर्नल की बेटी मेनका आनंद से विवाह का निश्चय कर लेना उन्हें बिल्कुल रास नहीं आया। संजय ने 23 सितंबर, 1974 को गुप-चुप तरीके से मेनका से शादी कर ली। दोस्तों व पारिवारिक जनों से आशीर्वाद लेने हेतु लिखे पत्र से यह खबर सार्वजनिक हुई। प्रबल ऊर्जा और उत्साह से छलकती मेनका तब बमुश्किल सत्रह साल की थी जो संजय, जो अपनी मां के दोस्त, विश्वासपात्र और सलाहकार थे; के राजनैतिक प्रयासों के प्रति बहुत उत्साहित थीं।

इंदिरा के लिए अप्रत्याशित रूप से एक अनर्थकारी घटना के रूप में सामने आया 12 जून, 1975 को इलाहबाद हाईकोर्ट का फैसला। फरवरी 1971 में हुए चुनाव में सर्व-सम्मति से इंदिरा के जीत दर्ज करने के मामले में कथित तकनीकी अनाचार के विरुद्ध उनसे हारे हुए प्रत्याशी राज नारायण द्वारा दायर किए गए मुकदमे में इलाहबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा को दोषी करार देते हुए उनके चुनाव को खारिज करने के साथ ही उनपर अगले छः सालों के लिए कोई भी पदभार ग्रहण करने पर पाबन्दी लगा दी। पुलिस और सेना को इंदिरा के आदेशों की अवज्ञा करने को उकसाने के लिए जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई ने एक व्यापक जुलूस का संगठन किया जिससे देश में कानून-व्यवस्था पर भयानक खतरा मंडराने का अंदेशा पैदा हो गया। ऐसी कठिन परिस्थिति में इंदिरा गांधी ने शिक्षा मंत्री सिद्धार्थ शंकर राय से सलाह मांगी। उन्होंने आतंरिक अराजकता के संकट से निबटने के लिए 25 जून, 1975 से आपातकाल लागू कर देने का मशविरा दिया। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने मंत्रिमंडल द्वारा इस निर्णय पर समर्थन हासिल करा लिए जाने के आश्वासन पर अपनी सहमति प्रदान कर दी। 

स्तब्ध देश के लिए मौलिक अधिकारों की समाप्ति, बेवजह जेल भरने और प्रेस पर पूर्ण सेंसरशिप जैसे अनेक भयावह अत्याचार बेहद अविश्वसनीय थे। प्रधानमंत्री के अनुमोदन के बाद ही टेलीविजन पर समाचार बुलेटिन प्रसारित होते और अखबारों के कार्यालयों में बिजली की आपूर्ति अनियमित रूप से रोक दी जाती। इंदिरा के छोटे बेटे और उनके प्राथमिक सलाहकार व विश्वस्त राजदार संजय गांधी ने अक्खड़ रवैये के साथ निरंकुश होकर नौकरशाही को कठोर नियंत्रण में रखा। दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से एक लोकतंत्र का राजतंत्र में बदलता महसूस किया जा रहा था। प्रेस पर सेंसरशिप का अर्थ था भारत की छवि धूमिल करने वाले अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारों को देश छोड़ देने को विवश करना।  जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, जॉर्ज फर्नांडिस और अन्य आलोचकों को खूंखार इंदिरा ने मौलिक अधिकारों का कुछ इस तरह हनन करते हुए जेल में डलवा दिया जिसकी कोई सानी नहीं मिल सकती। 85 साल के बुजुर्ग स्वतंत्रता सेनानी भीमसेन सचार ने अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बलपूर्वक दमन के असंवैधानिक, निरंकुश और तानाशाही रवैये पर दुःख और व्यथा जताते हुए प्रधानमंत्री को खुली चिट्ठी लिखी थी। 25 जुलाई, 1975 को उन सभी वरिष्ठ नागरिकों को कैद कर लिया गया जिन्होंने उस चिट्ठी पर हस्ताक्षर किए थे। इस समय इंदिरा उसी नीति के साथ धोखा कर रही थीं जो जवाहरलाल नेहरू की एकता को परिभाषित करती थी। हालांकि यह आशा की जा रही थी कि इंदिरा 15 अगस्त, 1975 को आपातकाल समाप्त कर देंगी लेकिन 15 अगस्त की सुबह बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीब-उर रहमान का पूरे परिवार सहित नृशंस हत्या हो जाने की खौफनाक खबर सुनकर वे असुरक्षा और हताशा से भर उठीं।  ऐसी ही घटना की साजिश का अगला शिकार वे बनने वाली हैं- इंदिरा को ऐसी चेतावनी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (आरएडब्लू यानी रॉ) के प्रमुख आर.एन.काव की ओर से मिली। इस चेतावनी से मानसिक रूप से इंदिरा इस कदर विचलित हो गईं कि उन्होंने तांत्रिकों और ज्योतिषियों का सहारा लेना शुरू कर दिया। ज्योतिषियों की भविष्यवाणी थी कि तबाह होने से इंदिरा तबतक बची रहेंगी जबतक संजय की निकटता कायम रहेगी। युवा संजय, जिनकी उम्र केवल 29 साल थी, बेहद जोशीले थे। उनका मानना था कि दीर्घसूत्रता, यानी कार्य में टाल-मटोल कर काफी ज्यादा समय में पूरा करने की प्रवृति, पर लगाम लगाना और भारतीय अर्थव्यवस्था को गरीबी व जनसंख्या की अधिकता के क्रूर पंजे से किसी भी कीमत पर बाहर लाना बेहद जरूरी है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर समझ विकसित करने की पूरी तरह उपेक्षा करते हुए मर्दों का जबरदस्ती बंध्याकरण किया गया। पूरा सरकारी तंत्र धुआंधार तरीके से नसबंदी करने वालों की तैनाती करने को पिल पड़ा और 1975 से 1977 तक के दो सालों में कल्पनातीत रूप से 1,07,56,964 व्यक्तियों की नसबंदी का कार्य संपन्न हो चुका था।

इसी दौरान संपूर्ण भारत के शहरों के सौंदर्यीकरण की एक महत्वाकांक्षी योजना उन्होंने हाथ में ली। और इस अति महत्वाकांक्षी सौन्दर्यीकरण अभियान का अर्थ था कि सार्वजनिक स्थलों और स्मारकों के आस-पास की जगहों में अतिक्रमण कर बस गए शरणार्थी बस्तियों का सफाया। इस अभियान के लिए अनपेक्षित तत्परता दंग कर देने वाली थी। बाढ़ की विभीषिका से त्रस्त लोगों के अस्थाई आवासों को जिस संवेदनहीनता और बेदर्दी से ताबड़तोड़ तोड़ा गया था वह निहायत ही शर्मनाक था। प्राचीन नगर वाराणसी की ऐतिहासिक धरोहरों को मूर्खतापूर्ण तरीके से मटियामेट कर देने से जनता गुस्से से बौखला गई। परेशान करने वाले हो-हल्ले के बारे में इंदिरा को नगण्य जानकारी देने वाले चाटुकार मंत्रियों ने उन्हें जनता के क्रोध का सामना करने से अलग-थलग ही रखा। 

भारतीय मिथकीय कहानियों, जिनमें नायक को मानसिक अंतर्द्वंद्वों और भ्रमजालों से मुक्त करने के लिए कोई ईश्वरीय संत उपस्थित हो जाता है, की तरह ही इंदिरा के तूफानी व उन्मादी व्यवहार से उत्पन्न उनकी मानसिक अशांति में उन्हें जे. कृष्णमूर्ति की उपस्थिति से राहत मिली। प्रज्ञावान दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति ने इंदिरा को मौन ध्यान के क्षणों में आत्म-बोध से गुजरने की प्रक्रिया का ज्ञान कराया और इंदिरा ने जनता को दीर्घ आपातकाल से मुक्त करने का सचेत निर्णय लिया। लोकतंत्र का आदर्श जो भारत के जगमगाते मुकुट का सबसे चमकीला नगीना था, जिसका संविधान निर्माता-गण महिमा-मंडन करते नहीं थके थे, को पूरे वैभव के साथ पुनः लागू करना अत्यावश्यक था। 18 जनवरी, 1977 को इंदिरा ने सभी विरोधी नेताओं को मुक्त कर देने और 19 मार्च को चुनाव करवाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया। संजय व अन्य राजनैतिक सलाहकारों ने इंदिरा को रोकने की कोशिश की। सलाहकारों के मुताबिक बर्बर आपातकाल की यादों से जनता निकल सके इसके लिए उन्हें एक शांतिप्रिय दौर जरूर देना चाहिए था लेकिन भगवद्गीता के कर्मयोग में दृढ़ आस्था रखने वाली इंदिरा परिणामों की चिंता किए बगैर सही निर्णय लेने के लिए वचनबद्ध थीं। इंदिरा की परेशानियां कई गुणित हो गईं जब आपातकाल खत्म कर देने की गुजारिश को ठुकराने से नाराज कांग्रेस पार्टी के कई निष्ठावान नेताओं के साथ मिलकर अनुभवी और बेदाग हरिजन नेता बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी नाम से एक अलग पार्टी बना ली। इंदिरा को यह समझने में देर नहीं लगी कि आने वाले चुनावों में राजनैतिक बिसात पर बाजी घातक रूप से उनके विरुद्ध करवटें लेने लगा है।   

golden-era

पांच हफ्ते से ज्यादा लगातार चुनावी अभियान में अथक रूप से संलग्न इंदिरा को जनता की दृष्टि में प्रशंसा की चमक की जगह उनकी सरकार के प्रति मोह-भंग की स्थिति के साथ ही परिवर्तन लाने के लिए कमर कस लेने का भाव दिखा। आपातकाल का दंश, खासतौर से नसबंदी कार्यक्रम ने जनता के दिलोदिमाग में घृणा का दावानल भड़का दिया था क्योंकि भारतीय मानस में मर्दानगी को संतानोत्पत्ति से जोड़कर देखने की मानसिकता बहुत गहरी पैठी हुई है। कांग्रेस पार्टी की अभूतपूर्व हार, जो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और हरियाणा में कुल एक सीट जीत पाई थी; जड़ कर देने वाली थी। इंदिरा खुद भी राज नारायण, जिन्होंने आम जन के प्रति इंदिरा की अरुचि का फायदा उठाते हुए खुद को मिट्टी का बेटा के रूप में प्रस्तुत किया था, से हार चुकी थीं। सर्वोच्च अधिकारी के रूप में हमेशा सुर्खियों में रहने वाली इंदिरा ने जिस गरिमा और बड़प्पन से अपनी हार स्वीकार की थी, वह अपरिमित साहस का उदहारण बन गया। धुंधलके की सघनता में धंसती जाती इंदिरा का राजनैतिक कैरियर खत्म हुआ माना जाने लगा था। राजीव, जिन्होंने आपातकाल का हमेशा ही सख्त विरोध किया था, निजी तौर पर इसके लिए और मां के शक्ति और अधिकार के उच्चस्थ शिखर से अपमानजनक हार की खाई की ओर गिरते जाने के लिए संजय को ही जिम्मेदार मानते थे।    

Indira-Gandhi-welcome

संसदीय चुनावों में हारने और प्रधानमंत्री पद के सभी अधिकारों से वंचित होने का सीधा अर्थ था सरकारी आवास खाली कर रहने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की तलाश करना क्योंकि जनता दल की सरकार उन्हें सरकारी घर से निकाल बाहर करने पर आमादा थी। साजो-सामान, नौकर-चाकर जैसे तमाम तामझाम बेतरह कम हो गए। मांगा जा रहा किराया दे पाने में असमर्थ होने से वे 12, विलिंग्टन क्रिसेंट के एक अपेक्षाकृत तंग मकान में रहने आ गईं। जनता सरकार ने दुर्भावनापूर्ण प्रचार के साथ एक बर्बर हमला शुरू करते हुए आपातकाल में हुई सभी ज्यादतियों की जांच-पड़ताल के लिए शाह कमीशन की स्थापना कर दी। इंदिरा और उनके बेटे संजय वर्तमान मंत्रियों के वैर-भाव के निशाने पर थे जो अपने पिछले कारावासों के कारण गुस्से से तमतमाए हुए बदला लेने को बेताब थे। इंदिरा के लिए उनका निकट भविष्य आशंकाओं से घिरा था और मातृत्व संबंधी पूर्वाभासों ने उन्हें अपने प्रिय बेटे संजय के रक्षार्थ बहुत ज्यादा सचेत बना दिया। इंदिरा ने एक शेरनी की तरह हर हिंसा, हर मुसीबत से अपने बच्चे की रक्षा की। संजय के विरुद्ध दुराग्रही अन्याय के किसी भी मामले में सीबीआई जांच-दल को पर्याप्त दस्तावेज या सबूत नहीं मिले।   

1977 में बेलची में जमींदारों द्वारा भूमिहीन हरिजनों के नर-संहार ने दलितों की असमर्थता का दर्दनाक दृष्टांत प्रस्तुत किया। इंदिरा ने बेपरवाह खतरनाक यात्राएं कर उनसे मिलने जा पहुंची। वे उन स्थानों से गुजरीं जो भयंकर बाढ़ की चपेट में आ चुके थे। कंधों तक ऊंचे बहते पानी में जहां ट्रैक्टर फंसे पड़े थे और यात्रियों की फेरी लगाने को नाविक भी अनिच्छुक थे, इंदिरा टस से मस नहीं हुईं। आखिरकार जिद्दी मंत्री और उनके दो भयभीत समर्थकों के लिए एक हाथी की व्यवस्था की गई। आतंकित हरिजनों के हृदय-विदारक क्रंदन से इंदिरा मर्माहत हो गईं। अठाइस सालों के अपने सार्वजनिक जीवन में किए गए प्रयत्नों के बावजूद उन लोगों को गरीबी और उत्पीड़न की बेड़ियों से अबतक मुक्त करा सकने की असफलता पर उन्हें बेहद अफसोस हुआ। हालांकि वे लोग उनसे बेहद कोमल संस्पर्श के साथ एक सुरक्षा-चक्र में होने का एहसास पाकर बहुत प्रभावित व संवेदित हुए और साथ ही वे उनकी विरोधी पार्टी को वोट देकर इनके साथ छल करने के पछतावे से भी भर गए। समय का पहिया एक पूरा चक्र घूम चुका था। अंदरूनी कलह, मतभेदों और विवादों से बिद्ध जनता पार्टी द्वारा सरकार चलाने में आती परेशानियों से असंतुष्ट जनता ने विभिन्न सभाओं-समारोहों में इंदिरा की जय-जयकार करनी शुरू कर दी। जनता सरकार ने चुनावों में जीप का इस्तेमाल करने जैसे कमजोर और बेतुके मुकदमे में बगैर उचित वारंट के इंदिरा को गिरफ्तार करवाया।

ालांकि बाद में मजिस्ट्रेट ने सबूत के रूप में दस्तावेज पेश नहीं किए जाने पर उन्हें बिना किसी शर्त के छोड़ दिया। इंदिरा द्वारा किए गए अलोकतांत्रिक कार्यों की दुरावस्था को ठीक करने के बजाए व्यक्तिगत तौर पर उन्हें ही जड़ से मिटा देने को तत्पर दिख रही जनता सरकार के इन कारनामों से अब आम जनता की नजरों में इंदिरा की छवि एक शहीद की बनने लगी थी। इंदिरा ने पूरे भारतवर्ष का दौरा किया ताकि वे सबसे निचले तबके तक की जनता से नाता जोड़ सकें। गुजरात में उन्हें एक ओर तो समर्पित जनों के हुजूम का समर्थन मिला वहीं दूसरी ओर विरोध-प्रदर्शन करती उग्र भीड़ के प्रकोप का भी उन्हें सामना करना पड़ा। उग्र भीड़ ने उस ट्रेन का विध्वंस कर दिया जिससे वे कामकोटि मठ के शंकराचार्य का आशीर्वाद ग्रहण करने कांचीपुरम जाने वाली थी। इंदिरा गांधी के विरुद्ध जनता सरकार का व्यक्तिगत द्वेष अब सत्ता की कूटनीतिक चालों में बदलने लगा था। कानूनी पचड़ों के सिलसिले में अदालतों में इंदिरा के पूर्व विश्वासपात्रों का समर्थन और विश्वास दांव पर लगा। इन सबका परिणाम यह हुआ की इंदिरा ने कांग्रेस वर्किंग कमिटी से इस्तीफा दे दिया और आगे चलकर उन्हें कांग्रेस से ही निकाल दिया गया। चालीस साल से अधिक समय तक कांग्रेस की सेवा करने के बाद उन्हें इस तरह निकाले जाने पर वे बहुत आहत हुईं और आखिरकार 3 जनवरी, 1978 को उन्होंने कांग्रस (आई) की स्थापना की जिसका चुनाव चिह्न था (आशीर्वाद देने की मुद्रा में खुली) हथेली।   


Indira-Gandhi-s12

इंदिरा के घर के माहौल में निरंतर राजनैतिक गतिविधियों की सरगर्मी बढ़ने लगी। कभी उनके मनहूस अभियोक्ताओं के आदेश से सीबीआई के अधिकारियों द्वारा उनसे पूछताछ होती, तो कभी पीड़ित आम-जन अपनी समस्याओं का हल पाने को मिलने आते, तो कभी संजय अपने वकीलों के साथ मिलकर भविष्य की गतिविधियों की रणनीति बनाने में मशगूल रहते। इन अनिष्टसूचक मुलाकातों-कार्यकलापों और अपनी निजता भंग होने की वजह से राजीव बेहद नाखुश रहते। मानसिकता और परवरिश में एड़ी-चोटी का अंतर होने की वजह से इंदिरा का अपनी बहू के साथ मतभेद चरम पर पहुंच गया जिसने इंदिरा को अलग होने की कगार पर ला खड़ा किया। सोनिया की नजर में हो-हल्ला भरा माहौल उनके बच्चों की सुरक्षा और विकास के लिए ठीक नहीं था। मेनका ने चुनौतियों के साथ ताल-मेल बिठाने की कोशिश तो की लेकिन बदले हुए राजनैतिक समीकरण में संजय के दबाव में रहने से भड़क उठीं।     

राजनैतिक दृष्टि से इंदिरा के लिए अगला महत्वपूर्ण संघर्ष था उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ का चुनाव। इंदिरा ने अपने प्रत्याशी के रूप में मोहसिना किदवई को स्वयं नामांकित किया। मोहसिना एक कट्टर कांग्रेस समर्थक मुस्लिम परिवार की महिला थीं। प्रतिदिन 14 घंटों से ज्यादा इंदिरा ने अथक चुनाव प्रचार किया और हरिजनों व भूमिहीन मजदूरों से अपील करती रहीं। भारी बहुमत से मिली मोहसिना की जीत ने राजनैतिक गणित में इंदिरा की अलौकिक कुशाग्रता साबित कर दी। आजमगढ़ में हार से प्रतिष्ठा पर आई आंच से जनता सरकार बौखला गई और इसी बौखलाहट में उसने आपातकाल से संबंधित एक मुकदमे में हुई संजय गांधी की जमानत को एन-केन प्रकारेन खारिज कर उन्हें तिहाड़ जेल में बंद कर दिया। जेल में बेटे को दी जाने वाली यंत्रणा की आशंका और आपातकाल के दौर से संदर्भित जनता सरकार द्वारा कई तरह की धमकियों से वे बेहद डर गईं। 

अपने राजनैतिक यात्रा के क्रम में इंदिरा ने 'चिकमंगलूर', जिसका शाब्दिक अर्थ होता है 'छोटी बेटी का डेरा', का दौरा किया। यहां के स्थानीय निवासियों द्वारा अपने लिए "इंदिरा मां" के संबोधन में अभूतपूर्व सम्मान और ममता का संस्पर्श पाकर इंदिरा का हृदय पिघल गया। इस निर्वाचन क्षेत्र से, जहां स्त्रियों की आबादी ज्यादा थी और उसपर भी अधिकतर घर अभी भी गरीबी-रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे थे, इंदिरा के जीतने की संभावना ज्यादा थी। कहा जाता है कि इंदिरा के राजनैतिक पुनर्जन्म में चिकमंगलूर की केंद्रीय भूमिका रही थी। उनके चुनावी दौरों को विरोधी पार्टी ने धड़ाधड़ पत्थर फेंकने और सड़क जाम कर देने जैसे कृत्यों से बाधित करने की बहुत कोशिशें की। हालांकि इंदिरा नन का-सा वेश बना कर और खटारा कार में यात्रा कर अपने विरोधियों को मात दे जाती थीं। एक प्रतिशोधात्मक और श्रेष्ठता-बोध का शिकार सरकार, जो उन्हें शोक-संतप्तता की भूल-भुलैया में भयभीत कर देने को कृतसंकल्प था, के विरुद्ध एक कमजोर और अकेली विधवा स्त्री का संघर्ष के लिए निकल पड़ने से निर्वाचक वर्ग यानी जनता के मन में उनसे सहज सहानुभूति पैदा हो गई। इंदिरा ने चिकमंगलूर का चुनाव 70,000 मतों से भी ज्यादा के अंतर से जीत लिया।

इंदिरा का संसद में प्रवेश करने पर सत्ताधारी पार्टी की तरफ से शत्रुतापूर्ण स्वागत हुआ और उत्तेजना व शोरगुल में बार-बार दोहराया गया कि बतौर प्रधानमंत्री अपने शासन में उन्होंने "प्रिविलेज ऑफ द हाउस" (संसद के विशेषाधिकार) में कभी कोई दरार नहीं पैदा की। हालांकि इंदिरा को दोषी करार दिया गया और 19 दिसंबर, 1978 को उन्हें बंदी बनाकर तिहाड़ जेल में भेज दिया गया। 


12_indiraCAMPAIGINING

golden-era

अपने दुःखों के चरम पर इंदिरा के मन-मस्तिष्क में महान संगीतकार बीथोवन का कथन गूंज रहा था, "मैं भाग्य को गले से पकड़ूंगा। यह मुझपर पूरी तरह कभी भी हावी नहीं हो सकता।" इंदिरा ने पीड़ा और बढ़ती परेशानियों के गुंजल्क में कसे जाने के एहसास से प्रभावित होना छोड़ दिया। अपने अंदरूनी स्रोतों और छठी इंद्रीय का भरोसा कर इंदिरा ने जनता सरकार के भीतर आपसी कलह और जलन का अपने हक में इस्तेमाल करने की योजना बनाई। 'युद्ध और प्रेम में सबकुछ जायज है' के सूत्र पर पक्का भरोसा करने वाली इंदिरा अपनी राजनैतिक कार्यवाही को न्यायसंगत सिद्ध करती कहती हैं, "मेरे पिता राजनीति-विशारद थे, जबकि मैं एक राजनीतिक स्त्री हूँ। मेरे पिता संत थे, मैं नहीं।" उनका राजनैतिक जोड़-तोड़ में पारंगत होना उनके व्यक्तित्व का एक खास पहलू था जो चौधरी चरण सिंह की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाए जाने से जग-जाहिर हो चुका था। चौधरी चरण सिंह अपनी जगह मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाए जाने से नाराज थे। जनता पार्टी तोड़ डालने के लिए इंदिरा और संजय बारी-बारी से बेहद सूक्षमता से डिजाइन की गई "फूट डालो और शासन करो" की नीति को बड़ी सफाई से अंजाम देने में लगे थे। शतरंज के बिसात-सी बिछी सक्रिय पार्टी-पोलिटिक्स एक लुभावनी पहेली-सी थी और संजय ने राज नारायण से दोस्ती करने की एक बेहद बारीक चाल चली। वही राज नारायण जो इंदिरा के प्रबल शत्रु थे और जिन्होंने 1971 के चुनावों के लिए उन्हें चुनौती दी थी। जनता पार्टी के भीतर बढ़ते हुए शत्रुतापूर्ण रवैये के प्रति इंदिरा ने जान-बूझकर निरपेक्ष और शांत बने रहने की मुद्रा अपनाई थी। राष्ट्रपति संजीव रेड्डी ने स्पेशल कोर्ट बिल को कानून बना दिए जाने पर मुहर लगा दी थी। 17 मई, 1979 को पाकिस्तानी प्रेसिडेंट जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी चढ़ा दिए जाने की अविश्वसनीय घटना से इंदिरा बेतरह आतंकित हो गईं। उनको यह साफ लगने लगा था कि वे और संजय इसी प्रकार के बर्बर उत्पीड़न का शिकार होने वाले हैं। अगली रणनीति निर्धारित करने के लिए छुट्टियां मनाने के बहाने संजय और मेनका को साथ लेकर इंदिरा दार्जिलिंग चली गईं जहां पहली सुनवाई के लिए उन्हें सम्मन भेजा गया था। हालांकि दार्जिलिंग में दम भर के आराम ने संजय और मेनका के रिश्ते को मजबूत बनाया। यहीं मेनका के उम्मीद से होने की खबर पाकर इंदिरा खुशी से झूम उठी थीं।

किस्मत के पलटवार से, जोश से भरे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को, जिनपर से सोवियत-संघ की यात्रा की सफलता का खुमार अभी उतरा भी नहीं था, विपक्षी नेताओं द्वारा आरम्भ किया गया 'अविश्वास प्रस्ताव' का सामना करना पड़ा। भाग्य इंदिरा पर मेहरबान हुआ जब अपने ही पार्टी के विश्वासपात्रों का समर्थन हासिल नहीं कर पाने की स्थिति से हैरान प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया। चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बनाए गए जिनको इंदिरा ने इस शर्त पर समर्थन दिया कि प्रमुख नीतिगत फैसलों में उनकी रायशुमारी अवश्य की जाएगी। हालांकि चौधरी चरण सिंह ने एक इंटरव्यू में सुस्पष्ट रूप से यह कहने की भारी भूल की कि विशेष अदालतें आपातकाल के मुकदमों की जांच जारी रखेंगी। अपने ही अंदाज में इंदिरा ने 20 अगस्त को होने वाले विश्वास प्रस्ताव से ठीक एक दिन पहले रहस्यमय ढंग से अपना समर्थन वापस ले लिया।  अपनी हार निश्चित जानकर लाचार चौधरी चरण सिंह ने राष्ट्रपति से लोकसभा भंग करने का अनुरोध किया।

golden-era

जिंदगी हर किसी को दूसरा मौका जरूर देती है। इसे 'आने वाला कल' कहते हैं। यह कहावत इंदिरा के लिए बिल्कुल सच साबित हुई। अपनी परेशानियों से निजात पाने के इस सुनहरे मौके का भरपूर फायदा उठाते हुए इंदिरा ने मतदाताओं से संपर्क साधने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। वे करीब दो महीनों तक रोजाना लगभग 1000 किलोमीटर की यात्रा करती रहीं। थकान को पछाड़ती इंदिरा ने करीब दस करोड़ भारतीयों को स्वयं संबोधित किया। खुद से आधी उम्र के व्यक्ति की-सी स्फूर्ति के साथ 60 साल की अथक इंदिरा धूल भरे आर्द्र वातावरण में भी अपनी साफ-सुथरी विशिष्ट उपस्थिति से जनता को विस्मित-विमुग्ध कर प्रभावित करने में सफल रहीं। सन् 1980 के मध्यावधि चुनाव में इंदिरा लोकसभा की 529 में से 351 सीटें जीतने में कामयाब रहीं। राजीव और संजय के बीच में चलती हर्षोन्मत्त इंदिरा ने आनंदित भीड़ को हाथ हिलाकर धन्यवाद ज्ञापित किया।


new-begining-01

golden-era

इस बार इंदिरा सरकार ने चार सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की। ये चार सूत्र थे: महंगाई घटाना, रोजगार बढ़ाना, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों का उपयोग करना। इन नीतियों को प्रभावी तरीके से लागू करने में किसी तरह का तनाव या व्यवधान न पैदा हो इसलिए इंदिरा ने उन राज्यों की विधान-सभाओं को भंग कर दिया जहां दूसरी पार्टियों की सरकारें थीं। जोशीले और बहादुर नेता संजय गांधी ने कांग्रेस पार्टी को युवा जोश से समृद्ध करने के लिए उत्साही युवाओं का खुद चयन किया। उन्होंने बुजुर्ग कार्यकर्ताओं को चुनौती देते हुए उनकी जगह लक्ष्य प्राप्ति के लिए दृढ़ संकल्पी युवा कार्यकर्ताओं को नियुक्त करने की योजना बनाई। इस पुनरुत्थान को 'सांस्कृतिक क्रांति' कहा गया। विश्व के महत्वपूर्ण नेतागण अब उस सशक्त और जुझारू महिला इंदिरा से मिलने को बेताब थे जिसने असीम शक्तिसंपन्न व्यक्तियों के आगे कभी घुटने नहीं टेके और अपने राष्ट्रीय गौरव के पूरे आत्माभिमान के साथ निर्भय और अविचलित खड़ी रही थीं।  

मुश्किल भरे दौर ने इंदिरा के व्यक्तित्व में जो आयाम जोड़ दिया था, वह था कर्मकांड और अंधविश्वास में उनकी बढ़ती आस्था। तंत्र, ज्योतिष, पृथ्वी के प्राणियों पर ग्रह-गोचरों के प्रभाव, जंतर-मंतर और यंत्र-ताबीज आदि में वे बहुत दिलचस्पी लेने लगी थीं। लगता था जैसे आगत आशंकाओं के बारे में इंदिरा को पूर्वाभास मिल जाया करता था। यह शायद उनको और संजय को नष्ट कर देने के षडयंत्रों के प्रति उनके अवचेतन मन के डर का परिणाम था। ज्योतिषियों ने ग्रहों के अशुभ योग की भविष्यवाणी की जो उनके खुशहाल दिनों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला था। राज्यों के विधान-सभा चुनावों में भी कांग्रेस (आई) ने शानदार जीत दर्ज की और इसी बीच एक बार फिर से दादी बन जाने से इंदिरा की खुशियों में चार चांद लग गए। संजय और उनकी पत्नी मेनका को 13 मार्च, 1980 को एक पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ था जिसका नाम फिरोज वरुण रखा गया। देश के युवाओं में गरिमापूर्ण जीवन जीते हुए मजबूत कदमों से सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ने का जोश जगाने वाले संजय अपनी प्रौढ़ता और आत्मविश्वास की बदौलत युवा वर्ग के प्रशंसित चहेते बन चुके थे। इंदिरा गांधी से संजय को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त करने का आग्रह किया गया लेकिन वे अपनी देख-रेख और गुरुता के संरक्षण में उन्हें राजनीति का और बड़ा महारथी बनाना चाहती थीं। रोमांच के जोश से छलछलाते संजय सावधानी बरतने के प्रति मां की हिदायतों को अक्सर नजरअंदाज करते हुए दिल्ली फ्लाइंग क्लब में दो सीटों वाले एयरक्राफ्ट में आकाश की नई ऊंचाइयों को छूने का आनंद लेने लगे थे।  

Indira-Gandhi-s20

यह 23 जून, 1980 की अमंगलकारी सुबह थी जब इंदिरा को अपनी जिंदगी के सबसे भयावह सत्य का सामना करना पड़ा। स्तब्ध और जड़ीभूत पत्नी और तीन माह का शिशु पीछे छोड़कर उनके प्रिय पुत्र संजय मृत्यु के निर्मम हाथों द्वारा छीने जा चुके थे। अपने दो सीटों वाले एयरक्राफ्ट में एक लूप (घुमावदार पथ) से गुजरते हुए संजय गांधी इसे ऊपर की ओर पर्याप्त तीव्रता से मोड़ नहीं पाए और यह एक नाले से जा टकराया था।  आगंतुकों को छोड़कर इंदिरा तेजी से अपनी कार की ओर दौड़ पड़ीं और ताबड़तोड़ दुर्घटना-स्थल पर पहुंचीं। बेटे के बुरी तरह क्षत-विक्षत शरीर को देखते ही वे हृदय-विदारक पीड़ा से रो पड़ीं। मर्मान्तक दुःख की इस घड़ी में भी इंदिरा ने असीम साहस का परिचय दिया। बेटे के साथ एम्बुलेंस में राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल तक की यह अंतिम यात्रा उन्होंने अविचल बैठकर पूरी की। हॉस्पिटल में उन्हें 'मृत लाया गया' घोषित किया गया। डॉक्टरों द्वारा पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए तैयार करने के बाद इंदिरा ने बेटे से अंतिम विदाई के कुछ अकेले पल बिताए। ईश्वर की मर्जी के सामने सम्पूर्ण समर्पित होते हुए जनता की भेदक निगाहों से बचने के लिए इंदिरा ने आंखों पर काला चश्मा और व्यक्तित्व पर गरिमामय संतुलन का आवरण चढ़ा लिया। वह पुत्र जो उन्हें हर हाल में प्रिय था, जिसपर वे सबसे अधिक विश्वास करती थीं, जो उनकी शक्ति का आधार-स्तंभ और उनकी आंखों का तारा था, वह इंदिरा के ही अस्तित्व के किसी एकांत स्थल में दफन हो गया था। उसके न रहने का दुःख इंदिरा के लिए अपरिमित था। दुःख से व्यथित-बेहाल मेनका को उन्होंने रक्षात्मक ढंग से संभाला। एक बार फिर इंदिरा ने किसी भी परिस्थिति में पूर्ण आत्मनियंत्रित रह सकने की अपनी योग्यता का परिचय दिया जब उन्होंने बेटे के पार्थिव शरीर से लिपटा कांग्रेस का झंडा देखा जो बस जलने ही वाला था और झंडा उतारने के लिए लकड़ियों को हटवाया।संजय गांधी के पार्थिव शरीर का अग्निदाह उनके नाना की समाधि शांतिवन के सामने ही भारी भीड़ के बीच हुआ जो भारत को वैभव की नई ऊंचाइयों तक ले जा सकने में सक्षम एक नेता की असमय दुखद निधन पर चुपचाप आंसू बहा रही थी।

हताशा के अंधेरे में छटपटाती इंदिरा के लिए फिरोज वरुण आशा का एकमात्र दीप-स्तम्भ था। इस नन्हें बच्चे की शिशु-सुलभ हर अदा में उन्हें संजय की झलक मिलती। शुरुआती दौर में मेनका के प्रति इंदिरा बेहद करुणामयी थीं लेकिन पार्टी-पॉलिटिक्स में मेनका को अपने करीब रखने के उनके प्रयत्न से बड़ी बहू सोनिया नाराज हो गईं। परिणामतः इंदिरा ने अपने कदम पीछे खींच लिए क्योंकि इस मोड़ पर अब उन्हें असुरक्षा-भय से मुक्ति पाने और जिम्मेदारियों में हाथ बंटाने के लिए राजीव व उनके परिवार की मदद की जरूरत थी। उधर मेनका शुरू से ही अपनी सासू-मां के प्रभुत्व जमाने के अंदाज से घबराई हुई-सी रहा करती थीं फिर भी संजय के प्रेममय आवरण में वे सुरक्षित थीं। अब संजय की याद में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मेनका ने उनकी फोटो-जीवनी प्रकाशित करवाने के कार्य में खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया। इस किताब के कुछ पहलुओं को लेकर प्रधानमंत्री और मेनका के बीच कुछ गलतफहमियां हो गई थी। अखबारों में मेनका की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं व इंदिरा के जाने-माने शत्रुओं के साथ किए गए कुछ व्यापारिक सौदों के साथ ही वैधव्य से उपजी मेनका की अपनी दुश्चिंता से उत्पन्न संशयग्रस्त आरोपों-प्रत्यारोपों के दुष्चक्र की परिणति आखिर बच्चे वरुण के साथ मेनका द्वारा इंदिरा का घर छोड़ देने में हुई। वरुण, जो शोक-संतप्त दादी के लिए राहत का स्रोत बन चुका था, के दूर चले जाने से वे बेहद दुखी हुईं लेकिन राजीव, जो आखिरकार राजनीति से जुड़ने को राजी हो गए थे, का सहयोग लेते हुए एक बार फिर इंदिरा ने सभी दुखों को पीकर खुद को राजनैतिक जिम्मेदारियों में डुबो दिया। 

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति की गति के साथ कदम मिलाने के लिए इंदिरा ने भारत में कम्प्यूटरीकरण की दिशा में बहुत दिलचस्पी ली। इंदिरा यू.एस. के दौरे पर गईं और ग्रेट ब्रिटेन में सम्पन्न भारत-उत्सव में भी शामिल होकर उसका मान बढ़ाया। मार्च 1983 में नई दिल्ली में आयोजित गुट-निरपेक्ष अभियान के शिखर सम्मलेन में इंदिरा ने एक उदार मेजबान की भूमिका बखूबी निभाई। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और परमाणु-प्रसार निरोध की वकालत करने वाली इंदिरा को अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी ने ज्ञान के एक प्रकाश-स्तंभ की तरह देखा और इंदिरा का मुखमंडल उपलब्धि के इस तेज से चमक उठा।

golden-era

इसी दरम्यान सीमा पार से कश्मीर में घुसपैठ करने वाले जासूसों की खबरें आने लगीं और देश एक बार फिर तबाही की कगार पर पहुंच गया। आंध्र प्रदेश में इंदिरा के समर्थकों ने तेलगु देशम पार्टी की सरकार को गिरा दिया और उधर सांप्रदायिक दंगों में पंजाब टूटकर बिखरने लगा जो हरित क्रांति का सबसे समृद्ध केंद्र बन चुका था। पंजाब की समस्या पांच साल पहले तब शुरू हुई थी जब प्रतिद्वंद्वी पार्टी अकाली दल के बढ़ते प्रभाव में कांग्रेस (आई) हाशिए पर आ गई थी। ऐसे में संजय गांधी ने एक गंवई उपदेशक जे.एस.भिंडरावाले को कांग्रेस (आई) के दूत के रूप में चुना था। लेकिन भिंडरावाले का विकास एक दुर्जेय कट्टरवादी के रूप में होने लगा जो स्वच्छंद रूप से अलगाव की और 'खालिस्तान' नाम से एक अलग देश के निर्माण की मांग करने लगा। पंजाब जिसकी पवित्र मिट्टी पर सिख गुरुओं ने एकता और भक्ति के उपदेश दिए थे, घृणा और असहिष्णुता के शिकंजे में कसे एक भयानक युद्ध के मैदान में बदल चुका था। आप्रवासी भारतीयों द्वारा प्रायोजित आतंकी गुटों और राज्य व केंद्र सरकारों की अपनी-अपनी अलग योजनाओं और रणनीति की वजह से असंबद्ध गतिविधियों और अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया। पंजाब शतरंज की एक बिसात हो गया था जिसपर सभी अपनी क्षुद्र राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और स्वार्थों की रोटियां सेंकने में मशगूल थे। लूटपाट, सिख-समुदाय से बाहर के लोगों का नर-संहार, आला नौकरशाहों की हत्या आदि द्वारा आतंक के दमघोंटू साम्राज्य की स्थापना की जा रही थी। भिंडरावाले ने अपने समर्थकों के साथ सिख धर्म के सारतत्व का प्रतिनिधित्व करते अमृतसर के पवित्र 'स्वर्ण मंदिर' के गर्भगृह, अकाल तख्त में शरण ले रखा था। इस समस्या का मैत्रीपूर्ण हल निकालने के इंदिरा के सभी प्रयास व्यर्थ साबित हुए और मरने वालों की बढ़ती संख्या से आम जनता दुःख के राज्य में खुद को लुटा-पिटा महसूस करने लगी थी। भिंडरावाले द्वारा जारी किए गए मृत्यु-दंड के प्रत्युत्तर में इंदिरा ने सैनिकों की एक टुकड़ी को आतंकवादियों का सफाया कर देने का आदेश दे दिया। चौबीस घंटे से ज्यादा चली इस भीषण लड़ाई में, जिसे ऑपरेशन ब्लू-स्टार का नाम दिया गया था, भिंडरावाले के साथ-साथ निर्दोष तीर्थयात्रियों की भी जानें गईं जो आतंकियों के प्रतिघाती हमले के निशाने पर थे। स्वर्ण मंदिर पूरी तरह नष्ट-भ्रष्ट हो चुका था।


Indira-Gandhi-s20

इंदिरा अपने अभिमत पर कायम रहीं कि स्वर्ण मंदिर की कार्रवाई का उद्देश्य आतंकियों को वहां से निकाल बाहर करना और आम जनता की सुरक्षा करना था। अपने सुरक्षाकर्मियों में से सिख अंगरक्षकों को हटा देने के मशविरे को उन्होंने सिरे से नकार दिया। ऐसा करके अपनी कार्यवाही को सिख-विरोधी समझे जाने की भावना की आग में घी डालकर वे इसे और भड़काना नहीं चाहती थीं। 

स्वर्ण मंदिर पर भयावह आक्रमण की कार्रवाई के गंभीरतम निर्णय का इंदिरा के अवचेतन मन पर बहुत गहरा असर पड़ा। उन्हें जल्दी ही मृत्यु से साक्षात्कार होने का पूर्वाभास मिलाने लगा। उनके द्वारा चंडी यानी आदि स्त्री शक्ति की सुरक्षा का आह्वान हेतु यज्ञ करवाने की जल्दबाजी से भी उनका मृत्यु के पूर्वबोध के प्रति जागरुक होने का पता चलता है। 10 दिसंबर को 'बुद्ध' पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन का उद्घाटन करती हुई इंदिरा ने आक्रामकता के संकट का जिक्र करते हुए कहा था, "जीत अपने पीछे उदासियों के चिह्न छोड़ता हुआ घृणा के बीज बो जाता है।"  

golden-era

जीवन के शरद काल में इंदिरा के व्यक्तित्व से संतुष्टि का प्रभामंडल झलकता प्रतीत होता था। राजनीति के निर्मम आघात-प्रतिघात, बचपन में ही मां के दुखद देहांत, तूफानी शादी, भव्यता की ऊंचाई से अपमानजनक हार तक का ह्रास, सबसे प्रिय बेटे की मौत का सदमा, युद्धों का खून-खराबा जैसी तमाम निर्दयी परिस्थितियों को भेद कर भी अपने आतंरिक उहापोह पर आत्मसंयम की लगाम कस, अपने दृढ़ विश्वासों और राष्ट्र की एकता से समझौता किए बिना बृहत्तर चुनौतियों का सामना करती सही-सलामत खड़ी इंदिरा एक साहसी स्त्री का प्रतीक बन चुकी थीं। पोते-पोती के साथ श्रीनगर की एक यात्रा में भव्य पर्वतों, जो उनके सदृश दृढ़ता के साथ भारत के भीतरी क्षेत्रों की रक्षा में खड़े थे, के बीच उन्हें इच्छित शांति और सुरक्षा का एहसास हुआ। 28 अक्टूबर को वे कश्मीरी ब्राह्मण समुदाय की कुलदेवी शिकारा जी के मंदिर में गईं। इंदिरा से अक्सर मिलने वाले धर्माचार्य लक्ष्मण जू को उनकी बातों में घुली बेचैनी का अंदाजा हो गया था जब एक इमारत का उद्घाटन करने के लिए आने का आग्रह करने पर उन्होंने जिज्ञासा जगाने वाला जवाब दिया था "जिंदा रही तो जरूर आऊंगी।" वे अपने पोती-पोतों से गहरा लगाव रखती थीं और उनकी सुरक्षा को लेकर जुनून की हद तक परेशान रहा करती थीं। उनके अपहरण कर लिए जाने या चोट पहुंचाए जाने की आशंकाओं से वे व्यथित रहती थीं। 30 अक्टूबर को उड़ीसा में उन्होंने एक जुलूस को संबोधित किया जहां अपने रहस्यमय नेता को नजदीक से देखने के लिए जन-सैलाब उमड़ पड़ा था।अपने संबोधन में उन्होंने कहा था,

"मैं आज यहां हूँ; कल को हो सकता है कि मैं न रहूं। लेकिन देश को संभालने की जिम्मेदारी हर एक भारतवासी के कंधे पर है। मैंने पहले भी कई बार यह कहा है। कोई नहीं जानता कि मुझे गोली मार देने के कितने ही प्रयत्न किए जा चुके हैं; मुझे पीटने के लिए लाठियां इस्तेमाल में लाई गईं। भुवनेश्वर में ही तो मुझे एक पत्थर आ लगा था। हर संभव तरीकों से उन लोगों ने मुझपर हमला करने की कोशिश कर डाली है। मैं मरूं या जीऊं, इसकी मुझे परवाह नहीं। मैं एक लंबी जिंदगी जी चुकी हूँ और मुझे गर्व है कि जिंदगी भर मैंने अपने देशवासियों की सेवा की। मुझे बस इसी बात का गर्व है और किसी का नहीं। अपनी आखिरी सांस तक मैं यह सेवा करती रहूंगी और जब मरूंगी, मैं कह सकती हूँ कि मेरे खून की हर बूंद भारत को ऊर्जा देगी और इसे बलशाली बनाएगी।"

31 अक्टूबर, 1984 की सुबह ब्रिटिश अभिनेता पीटर उस्तिनोव से साक्षात्कार के लिए वे तैयार हुईं। वे कुछ सरकारी कागजातों में उलझी थीं। फिर रोज की तरह पोते राहुल से मिलीं और जिन्दादिली से अपने घर के दरवाजे की ओर बढ़ चलीं। विश्वासी सुरक्षा अधिकारी बेअन्त सिंह को प्रति-नमस्कार करते हुए उन्होंने शालीनतापूर्वक हाथ जोड़े जबकि बेअन्त सिंह ने सैल्यूट करने को हाथ उठाने के बहाने इंदिरा के पेट में बड़ी बेरहमी से बेहद नजदीक से गोली मार दी। मिशन की परिशुद्धता में कोई कमी न रह जाए शायद इसीलिए कांस्टेबल सतवंत सिंह ने मृत नेता के शरीर को छेदती हुई गोलियों की बौछार कर दी। इंदिरा की औचक हत्या से पूरा देश बौखला उठा। विश्वासघात के इस कायरतापूर्ण कुकृत्य पर घृणा से जल उठा देश सिख-विरोधी दुर्भावना के ज्वार में विक्षिप्त होकर अनियंत्रित हो उठा और तीन दिनों के भीतर 3000 सिखों की हत्या से हाहाकार मच गया। जोशपूर्ण वीरत्व की साक्षात् प्रतिमूर्ति बन चुकी इंदिरा के कहे शब्द क्रोधित देश के कानों में बार-बार गूंज रहे थे, "यदि मैं एक हिंसक मौत मर जाऊं, जिसका बहुतों को डर है और अन्य कई जिसकी योजना में लगे हुए हैं, मैं जानती हूँ कि हिंसा सिर्फ विचारों और हत्या की कार्यवाही में हो सकती है, मेरे मरने में नहीं- क्योंकि घृणा की कोई भी छाया इतनी काली नहीं हो सकती जो देश और देशवासियों के प्रति मेरे असीम प्रेम को धूमिल कर सके, कोई भी शक्ति इतनी बलशाली नहीं हो सकती जो देश को प्रगति पथ पर ले जाने के मेरे उद्देश्यों और प्रयासों से मुझे डिगा सके।"  

उनकी पहली संतान, राजीव गांधी, ने राजनैतिक अस्थिरता भरे इस मुश्किल समय में देश की बागडोर संभाली। उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। 

golden-era

इंदिरा का दाह-संस्कार शांति वन, उनके प्यारे पिता और आंखों के तारे पुत्र के समाधि स्थल, के पास ही किया गया। इंदिरा की समाधि को 'शक्ति स्थल' का नाम दिया गया है। अब यहां लोहे की धारियों से इतराते विस्तृत और शानदार मैदान पर सूर्यकांत मणि का एक कठोर पत्थर लगा है जो जीवन के हर तूफान और अमंगल के बीच अपने विश्वासों पर अडिग खड़ी रहने की उनकी दृढ़ता और सहनशीलता का प्रतीक है। 

इंदिरा की विरासत को उनके बेटे राजीव ने आगे बढ़ाया। राजीव गांधी एक प्रखर नेता थे जो भारत की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए दृढ़ थे ताकि अपनी प्यारी मातृभूमि, जिसकी सेवा के लिए उनकी मां ने अपना जीवन कुर्बान कर दिया था, को विकास की नई ऊंचाइयों तक ले जा सकें।  दुर्भाग्य से भारत की नियति को उनका साथ बहुत कम समय तक ही मिला। 21 मई, 1991 को तमिलनाडु में मंदिरों के शहर श्रीपेरुम्बुदूर में एक चुनावी सभा के दौरान उनका जयघोष करती भीड़ के बीच से उनके पास आई एक सुसाइड बम 'धनु' ने उनकी निर्मम हत्या कर दी। विश्वासघात की इस कायरतापूर्ण घटना में इतिहास ने एक बार फिर खुद को दुहराया था जिसमें 46 वर्षीय राजीव गांधी की बर्बर हत्या हो चुकी थी। हिंसा और घृणा में लथपथ लहू की बौछारों वाला आख्यान, जिसने कभी इंदिरा को निगल लिया था, वक्त ने फिर से सुनाया था और एक बार फिर भारतीय जनता का एक होनहार व सुयोग्य नेता लील लिया गया था। कांग्रेस पार्टी के सदस्यगण नेतृत्व के लिए अब राजीव की विधवा सोनिया गांधी की ओर देख रहे थे जो प्रिय पति के यूं अचानक मौत के मुंह में चले जाने से शोक-संतप्त तो थीं ही साथ ही दोनों बच्चों, प्रियंका और राहुल, को अकेले पालने की दुष्कर जिम्मेदारी से व्यथित भी थीं। राजीव गांधी के बाद किसी सुयोग्य नेतृत्व के आभाव में कांग्रेस (आई) की धूमिल पड़ती शान और वैभव में नई जान डालने के उद्देश्य से सोनिया गांधी ने आखिरकार 1998 में अध्यक्ष पद ग्रहण कर पार्टी की कमान संभाल ली। वही सोनिया जो इंदिरा के जीवित रहते राजनीति से नफरत किया करती थीं, आज आशातीत कुशलता से गांधी वंश परंपरा की मशाल को लेकर आगे बढ़ रही हैं। सोनिया की दुर्दशा को पॉल डेटमैन की किताब "इंडिया चेंजेज कोर्स" के इस उद्धरण से बखूबी समझ जा सकता है:

"राजीव गांधी के जाने के बाद वर्षों मैंने राजनीतिक परिवेश से दूर रहते हुए एकान्तसेवी का जीवन जीया। मेरी पीड़ा और मेरी क्षति नितांत निजी थी। लेकिन एक समय ऐसा आया जब मैं व्यक्तिगत दुखों को किनारे कर आगे कदम बढ़ाने के लिए विवश हो गई। मैं उस परिवार का हिस्सा हूँ जो कर्तव्य को व्यक्तिगत मान्यताओं से हमेशा ही आगे रखने को दृढ़-प्रतिज्ञ है।"

2004 के चुनावों में अमेठी, उत्तर प्रदेश से बतौर सांसद चुनाव जीतकर इंदिरा के पोते राहुल गांधी ने भी माता-पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए राजनीति के क्षेत्र में अपने शुभागमन का बिगुल बजा दिया है। वर्तमान में ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के जेनेरल सेक्रेटरी का पदभार संभालने के साथ ही राहुल पार्टी के युवा-दल के खेवनहार भी हैं। हाल ही में राहुल को कांग्रेस पार्टी का उपाध्यक्ष (वाइस-प्रेसिडेंट) बनाया गया है और वे अगले आम-सभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। अब यह गांधी वंश-परंपरा की अगली पीढ़ियों के हाथ में है कि इंदिरा की विरासत की मशाल जलती रहे... 

इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधीकी बायोग्राफीज | 0 टिप्पणी >>

0 टिप्पणी

एक टिप्पणी छोड़ दो

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा| आवश्यक क्षेत्रः चिह्नित कर रहे हैं|


*:

*:

:

*:



Feedback/Testimonials
* इस वेबसाइट के किसी भी विवरण का किसी भी रूप में अंशतः या पूर्णतः निजी हित में उपयोग करते पाए जाने वाले व्यक्ति/कंपनी/संस्था के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।