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"पीड़ा के गर्भ से जन्म लेती हैं सबसे पुख्ता रूहें
सबसे उदात्त चरित्र ही सबसे अधिक चोटें खाते हैं''
खलील जिब्रान की जिंदगी की दास्तान एक महान कथा सरीखी है। ऊपर दी गई जिब्रान की उक्ति उनके जीवन पर बिल्कुल खरी उतरती है। खलील जिब्रान अपने तमाम जीवन-संघर्षों के बावजूद कला और दर्शन के इतिहास में अपना स्थान बनाने में सफल रहे। उनके जीवन की कहानी फर्श से अर्श तक पहुंचने की दास्तान है। वो बीसवीं सदी के सबसे प्रसिद्ध लेबनानी-अमेरिकी कलाकार, निबंधकार, उपन्यासकार और धर्मशास्त्री थे। वे शेक्सपीयर और लाओत्से के बाद दुनिया के तीसरे सबसे अधिक प्रसिद्ध कवि हैं। 1923 में आई उनकी किताब ''दि प्रोफेट'' उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब है। ''दि प्रोफेट'' काव्यात्मक अंग्रेजी में लिखे निबंधों की किताब है। यह किताब बेस्ट-सेलर रही है। इसका अब तक बीस से ज्यादा विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।
खलील मजहर कवियों' (आप्रवासी अरबी कवि) में सबसे अधिक लोकप्रिय कवि थे। उनकी गद्य काव्य की अलहदा लेखन शैली पुरातन अरबी साहित्य से बहुत अलग थी इसलिए उन्हें साहित्यिक और राजनीतिक विद्रोही माना जाता था। शायद यही वजह है कि आज भी लेबनान में उन्हें साहित्यिक हीरो का दर्जा दिया जाता है।
यह उस साहित्यिक जीनियस के जीवन की कहानी है जिसने अरब दुनिया से बाहर निकल कर वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रकाश फैलाया और कला व साहित्य के इतिहास में एक किंवदंती बन गया।

खलील जिब्रान का जन्म 6 जनवरी, 1883 को उत्तरी लेबनान के पहाड़ी इलाके में जिब्रान समुदाय के मैरोनाइट (लेवांट स्थित अरब-पूर्व सामी ईसाई नस्लीय धार्मिक समूह) पंथियों के बीच हुआ था। यह इलाका उस वक्त सीरिया में था। यहां तुर्की के आटोमन साम्राज्य का राज था। उनका बपतिस्मा मैरोनाइट के रोमन कैथोलिक चर्च में हुआ था। उनका नाम उनके दादा के नाम पर ''जिब्रान खलील जिब्रान'' रखा गया। वो अपने माता-पिता कमीला और खलील की सबसे बड़ी संतान थे। खलील की मां एक मैरोनाइट पादरी की बेटी थीं। खलील के जन्म के समय उनकी मां की उम्र तीस साल थी। उनका खलील से छह साल बड़ा एक और बेटा बुट्रस भी था। बुट्रस को घर वाले प्यार से पीटर बुलाते थे। कमीला का यह बेटा उनकी अपने चचेरे भाई हन्ना अब्देल सलाम रहमान से हुई शादी से था।
खलील के बाद कमीला को दो बेटियां हुईं। उनके नाम मरीना और सुल्ताना थे। खलील जीवन भर अपनी मां और दोनों बहनों से घनिष्ठता से जुड़े रहे। उनकी मां एक समृद्ध धार्मिक परिवेश से आईं थीं। खलील की यही विरासत उनके अमेरिकी प्रवास के दिनों में अपने परिवार के लालन-पालन में काम आई। खलील को अपने पिता से कभी कोई प्रोत्साहन नहीं मिला लेकिन उनकी मां के साथ उनका संबंध बहुत गहरा और पारस्परिक समझदारी से परिपूर्ण था। वह उनके लिए एक आंतरिक संबल थीं। उन्होंने खलील के कलात्मक रुझानों को सदा ही सराहा। अशिक्षित होने के बावजूद उनमें संगीत की प्रतिभा थी। खलील को प्रारंभिक शिक्षा अपने घर पर अपनी मां से ही मिली। वह एक होशियार महिला थीं तथा अरबी, फ्रेंच और इंग्लिश बोल सकती थीं।
बशरी के हरे-भरे इलाके में रहने वाले खलील एक गंभीर और एकांतप्रिय बच्चे के रूप में बड़े हुए। उन्हें हरियाली, पहाड़ियां, पेड़-पौधे एवं अपने आसपास पसरी प्राकृतिक सुंदरता बहुत पसंद आती थी। हम उनके चित्रों और लेखन में इस अनुपम प्राकृतिक सुंदरता का प्रभाव देख सकते हैं। वे दस वर्ष की उम्र में एक बड़ी चट्टान की चोटी से गिर गए थे। जिससे उनके बाएं कंधें में चोट आ गई थी। इस चोट के कारण जीवन भर उनका बायां कंधा कमजोर रहा। यह घटना उनकी स्मृति में हमेशा के लिए बस गई। वो इस घटना को ईसा मसीह के जंगलों में भटकने की घटना के प्रतीक के समान मानते थे।
खलील के परिवार की आर्थिक हालत खराब थी। उनके पिता के गैर-जिम्मेदाराना तौर-तरीकों ने उनकी गरीबी और दुख को और बढ़ा दिया था। सूनसान इलाके में स्थित उनके गांव में ज्यादा भौतिक सुविधाएं नहीं थी। इन्हीं कारणों से खलील को बचपन में कोई पारंपरिक शिक्षा नहीं मिल पाई। हालांकि, कई पीढ़ियों से चली आ रही किंवदंतियों और बाइबिल के किस्सों के रूप में उन्हें एक समृद्ध आध्यात्मिक विरासत जरूर प्राप्त हुई थी। उन्हें जो भी थोड़ी-बहुत शिक्षा मिली थी वह गांव के पादरी से मिली थी, जिसके पास वो अक्सर जाया करते थे। पादरी ने उनका परिचय बाइबिल की शिक्षाओं और धर्म के अन्य आधारभूत तत्वों से कराया। उसने सीरियाई और अरबी भाषाओं से भी उनका प्रारंभिक परिचय कराया। उसने खलील की जिज्ञासु और शिष्ट प्रकृति को पहचान लिया था। वह खलील को अक्षरमाला और भाषा की बुनियादी तालीम देने लगा। इस तरह खलील के लिए भाषा, इतिहास और विज्ञान के दरवाजे खुल गए। अपने गांव के पादरी से मिली शिक्षा के अलावा खलील के ऊपर सलीम दाहिर की शिक्षा का भी गहरा प्रभाव पड़ा था। सलीम दाहिर के बारे में बस इतना ही पता चलता है कि वो एक हकीम थे और गांव के सबसे ज्यादा शिक्षित व्यक्ति थे। कहा जाता है कि उन्होंने उस वक्त दस साल से भी कम उम्र के खलील को अपनी सरपरस्ती में ले लिया था। उन्होंने उसकी कलात्मक प्रतिभा को बढ़ावा दिया और उसे किताबों का महत्व समझाया।
दाहिर ने खलील की तीक्ष्ण और संवदेनशील मेधा से उपजी जिज्ञासा को सदैव प्रोत्साहित किया। खलील के पिता उसके चाचा के दवाई की दुकान में काम करते थे। जुए की आदत के कारण चढ़े भारी कर्ज के कारण उन्हें यह नौकरी छोड़कर आटोमन सम्राट द्वारा नियुक्त स्थानीय प्रशासक के लिए काम करना पड़ा। लेकिन उनके दुर्भाग्य का यहीं अंत नहीं हुआ। जनता द्वारा बार-बार शिकायत करने पर स्थानीय प्रशासक को हटा दिया गया और उसके कर्मचारियों की जांच की गई। खलील के पिता को जालसाजी के शक में गिरफ्तार कर लिया गया और उनकी पारिवारिक संपत्ति आटोमन साम्राज्य द्वारा जब्त कर ली गई। असहाय और बेघर खलील की मां ने कुछ दिनों के लिए अपने रिश्तेदारों के यहां शरण ली। हालांकि खलील के पिता 1894 में रिहा हो गए थे लेकिन तब तक खलील की मां ने अमेरिका जाकर अपनी किस्मत आजमाने का फैसला कर लिया था। खलील अमेरिका जाने को लेकर अपना मन नहीं बना पाए थे। उनके अलावा परिवार के बाकी सभी लोग न्यूयॉर्क के लिए सफर की तैयारी में लग गए।

25 जून, 1895 को कमीला ने 12 वर्षीय खलील, मरीना, सुल्ताना और पीटर के साथ लेबनान छोड़ दिया। वह अमेरिका के मैसाचुसेट्स राज्य में बोस्टन स्थित साउथ एण्ड में आकर बस गईं। वहां वह अपने कुछ रिश्तेदारों से मिली और ओलिवर प्लेस में एक छोटे से कमरे में रहने लगी। नए माहौल में आने के बाद भी कमीला को इस बात की खुशी थी कि वो अपने परिचित समुदाय में रह रही है जो अरबी रवायतों का अनुसरण करता है और अरबी बोलता है। उन दिनों यह समुदाय अमेरिका का दूसरे सबसे बड़ा सीरियाई-लेबनानी अमेरिकी समुदाय था। कमीला की जिम्मेदारियां पहले से बढ़ गई थीं। पहले वह एक गृहणी मात्र थीं। अब उन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण भी करना था। उन दिनों सीरियाई आप्रवासियों की छवि काफी नकारात्मक थी। एक तो उनके अपारंपरिक अरबी तौर-तरीकों के कारण और दूसरे उनकी कथित अधिक जनसंख्या के कारण। इसलिए उनमें से ज्यादातर की रोजी-रोटी का जरिया फेरी लगाना था। कमीला ने भी यही राह चुनी और वो घूम-घूम कर सिलाई के सामान, गोटे और लिनेन इत्यादि बेचने लगी।
इधर उसके चारों बच्चों में से खलील को स्कूल जाने का अवसर मिला। खलील की मां चाहती थीं कि उन्हें पारंपरिक शिक्षा प्राप्त हो जो उनके माता-पिता को नहीं मिल सकी थी। शुक्र है कि उस समय सुविधाविहीन इलाकों की समाजसेवी संस्थाएं आप्रवासियों के बच्चों को पब्लिक स्कूल में दाखिल करवा देती थीं। इस तरह ये बच्चे गलियों में भटकने से बच जाते थे। यद्यपि पश्चिम एशियाई समाजों में लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी और आर्थिक मुश्किलों के कारण खलील की बहनों का दाखिला स्कूल में नहीं हो पाया। और शायद यही कारण था कि खलील जिब्रान ताउम्र महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक बने रहे।
खलील की मां के अथक परिश्रम के चलते उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी। अमेरिका पहुंचने के एक साल के अंदर ही उन्होंने बीच स्ट्रीट पर पीटर के लिए एक दुकान खोल दी। मरीना और सुल्ताना भी दुकान में काम करने लगीं। भावनात्मक और भौतिक मुश्किलों ने परिवार के सभी सदस्यों के बीच पारस्परिक संबंध को काफी मजबूत कर दिया था। कमीला को खलील से ज्यादा लगाव था जो कि सामाजिक जीवन से कुछ ज्यादा ही कटा हुआ रहता था। खलील को उनके संकोची स्वभाव से उबारने में कमीला उसकी पूरी मदद करती थीं। धीरे-धीरे खलील बोस्टन के कला और साहित्य जगत के लोगों से घुलने-मिलने लगे।


30 सितम्बर, 1895 को अमेरिका पहुंचने के बस दो महीने बाद खलील ने 'क्वींसी पब्लिक स्कूल' में अपनी पढ़ाई शुरू कर दी। खलील इससे पहले स्कूल नहीं गए थे इसलिए स्कूल के अधिकारियों ने खलील को आप्रवासी बच्चों के लिए अंग्रेजी के प्रारंभिक ज्ञान की शिक्षा देने वाली विशेष कक्षा में प्रवेश दिया। स्कूल में पंजीकरण के दौरान हुए हिज्जे की गलती के कारण उनका नाम हमेशा के लिए जिब्रान खलील जिब्रान से खलील जिब्रान हो गया। अपने नाम को सही कराने का उनके सभी प्रयास व्यर्थ साबित हुए। अतः वो अपने अंग्रेजी लेखन में अपने संक्षिप्त नाम खलील जिब्रान का प्रयोग करते थे तथा अपने अरबी लेखन में अपना बपतिस्मा वाला नाम 'जिब्रान खलील जिब्रान' का प्रयोग करते थे। उस स्कूल में अपने दो साल के अध्ययन के दौरान खलील अपने साथी अमेरिकी लड़कों से ज्यादा अंक लाते रहे। इस तरह उनके अध्यापकों ने उनकी विलक्षणता को पहचानना शुरू किया।
खलील ने घर के पास स्थित एक कला स्कूल डेनीजन हाउस में भी प्रवेश ले लिया। यह एक पुनर्वास केन्द्र था जिसे ''कालेज सेटलमेंट एसोशिएशन'' से आर्थिक सहायता मिलती थी और ''वेलीजली कालेज'' के स्वंयसेवक यहां आकर बच्चों को पढ़ाते थे। खलील के जीवन में उस वक्त एक निर्णायक मोड़ आया जब इस पुनर्वास केन्द्र के एक कला अध्यापक फ्लोरेंस पीयर्स की दृष्टि खलील पर पड़ी। उन्होंने देखा कि खलील के रेखांकन और चित्रांकन अत्यधिक प्रभावशाली हैं। खलील अपने इस शौक को लेबनान के दिनों से ही विकसित कर रहे थे। उन्होंने बीसीएसए (बोस्टन चिल्ड्रेन सर्विस एसोशिएशन) घरेलू पुस्तकालय परियोजना के संयोजक और प्रभावशाली समाजसेवी जेसी फ्रेमांट बीयल का ध्यान इस बच्चे की तरफ दिलाया। परिणामस्वरूप बीयल ने कलाकार, प्रकाशक और अमेरिका में उस वक्त नई कला के रूप में विकसित हो रही फोटोग्राफी के पुरोधा फ्रेड हालैण्ड डे को इस बच्चे के बारे में एक खत लिखा। पीयर्स को पूरा विश्वास था कि कलात्मक प्रतिभा सम्पन्न किसी नौजवान के दिशा-निर्देश के लिए हालैण्ड पर पूरा भरोसा किया जा सकता है। उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि खलील ने उनकी कला की कक्षा में जिस तरह की प्रतिभा का प्रदर्शन किया है, उसे देखते हुए उन्हें महसूस होता है कि यदि इस बच्चे को कला की सही शिक्षा मिले तो यह गलियों में फेरी लगाने के बजाए कोई बेहतर काम कर सकता है।
और इस तरह खलील दिसम्बर, 1896 में फ्रेड हालैण्ड डे से मिले। यहीं से खलील की प्रसिद्धि और कलात्मक पहचान की यात्रा शुरू हुई। हालैण्ड ने ही बाद में बोस्टन के सांस्कृतिक संसार से खलील का परिचय कराया। खलील फ्रेड से प्रभावित और प्रेरित थे। अरबी और अंग्रेजी में कमजोर होने के बावजूद भी वो तेजी से सीखने लगे। खलील को कला के बारे में शिक्षित करने के साथ ही उनके आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को बढ़ावा देने में भी फ्रेड की मुख्य भूमिका थी। फ्रेड ने खलील का परिचय ग्रीक मिथकों, विश्व साहित्य, समकालीन लेखन, फोटोग्राफी, बेल्जियम के नाटककार 'मौरिस मैटरलिंक' तथा अमेरिकी पत्रकार और कवि वाल्ट व्हिटमैन के लेखन से कराया। फ्रेड द्वारा दी गई एक किताब पढ़ने के बाद ही खलील ने अपना पहला महत्वपूर्ण धार्मिक विचार जाहिर किया, ''अब मैं ईसाई नहीं रहा, मैं काफिर हूँ।''
खलील जिब्रान की बड़ी-बड़ी और चमकीली आंखें,, तीखे नाकनक्श, सुंदर होंठ, उदात्त और रूहानी रूप-रंग के कारण फ्रेड उनका प्रयोग फोटोग्राफी के लिए मॉडल के रूप में भी करते थे। फ्रेड खलील को हमेशा अपनी कला को विकसित करते रहने के लिए प्रेरित करते थे। उनकी सहायता से ही खलील कला में अपनी निजी तकनीक और शैली विकसित कर पाए। अंततः 1898 में फ्रेड ने खलील के एक रेखाचित्र का प्रयोग अपने प्रकाशन संस्था ''कोपलैण्ड एण्ड डे'' के कवर डिजाइन के लिए किया। फ्रेड इस संस्था के साझीदार था। धीरे-धीरे खलील बोस्टन के कला समाज में जगह बनाने में कामयाब हुए। उनकी कलात्मक प्रतिभा ने कम उम्र में ही उन्हें प्रसिद्धि का स्वाद चखा दिया।
1898 में फ्रेड ने अपने छायाचित्रों की एक प्रदर्शनी लगाई। इस प्रदर्शनी में कुछ ऐसे चित्र भी शामिल थे जिनमें 15 वर्षीय खलील ने मॉडल के रूप में काम किया था। इस प्रदर्शनी को बोस्टन में उम्दा प्रतिक्रिया मिली और इससे खलील के पैर बोस्टन समाज में अच्छी तरह जम गए। उनका परिचय 24 वर्षीय अमेरिकी कवि और नाटककार जोसेफीन प्रेस्टन पीबॉडी से हुआ। उनके सौंदर्य और खुशमिजाजी ने खलील को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया।
1898 तक खलील ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी कर ली थी। उनके परिवार को लगा कि उन्हें लेबनान वापस जाकर अपनी आगे की शिक्षा पूरी करनी चाहिए और पश्चिमी सौंदर्य संस्कृति की बजाए अपनी परंपरा और विरासत को अपनाना चाहिए। खलील धाराप्रवाह अरबी बोल तो लेते थे लेकिन वो पढ़ या लिख नहीं पाते थे। उन्हें लगा कि उन्हें अपनी मातृभाषा और उसमें उपलब्ध ज्ञान को सीखना चाहिए। लेबनान जाने से पहले उन्होंने जोसेफीन का एक चित्र बनाया। इस चित्र पर उन्होंने लिखा, 'प्यारी अज्ञात जोसेफीन पीबॉडी के लिए'। उन्होंने फ्रेड से अनुरोध किया कि वो यह चित्र जोसेफीन को दे दें।

खलील अगस्त, 1898 में अपने पिता के निवास स्थान बेरुत पहुंचे। उन्होंने ''मदरसात-अल-हिकमाह (ज्ञान का विद्यालय) में प्रवेश लिया। इसकी स्थापना मैरोनाइट बिशप जोसेफ डेब्स ने किया था। इस विद्यालय का पाठ्यक्रम राष्ट्रवादी झुकाव वाला था। इस पाठ्यक्रम में चर्च के लेखों, इतिहास और उपासना-पद्धति पर जोर रहता था। जिद्दी और दृढ़निश्चयी होने के कारण खलील चाहते थे कि विद्यालय में उनके लिए उनकी शैक्षणिक रुचियों के हिसाब से अलग से पाठ्यक्रम बनाया जाए। खलील ने इसके बारे में विद्यालय के वरिष्ठ एवं सम्मानित सदस्य फॉदर यूसुफ हद्दाद से बात की। खलील ने उनसे शिकायत करते हुए कहा कि वह अंग्रेजी विषय पढ़ चुके हैं फिर भी उन्हें प्रारंभिक अंग्रेजी की कक्षाओं में भेजा जा रहा है। उन्होंने कहा कि वह लेबनान अपने देश की भाषा एवं साहित्य पढ़ने के लिए आए हैं ताकि वो इन चीजों के बार में अपने विचार लिख सकें। फॉदर ने यह कहकर खलील को समझाना चाहा कि शिक्षा पाना सीढ़ी चढ़ने के समान है। एक समय में आदमी को एक डण्डे पर ही चढ़ना चाहिए। इसका जवाब खलील ने यह कह कर दिया कि ''क्या अध्यापकों को यह नहीं पता कि चिड़िया उड़ना सीखने के लिए सीढ़ियां नहीं चढ़ती।'' इस घटना से खलील का विद्रोही स्वभाव जाहिर होता है, जो कि समय के साथ बढ़ता ही गया। फॉदर हद्दाद खलील के दृढ़निश्चय से प्रभावित हुए थे इसलिए उन्होंने विद्यालय के प्रधानाध्यापक से खलील के बारे में बात की। बहुत मनाने के बाद प्रधानाध्यापक खलील को अपनी शर्तों पर विद्यालय में पढ़ने देने के लिए तैयार हो गए।
खलील अरबी भाषा में लिखी बाइबिल पर मुग्ध हो गए थे। वो उसमें डूब गए थे। फॉदर हद्दाद की देखरेख में खलील ने क्लासिक अरबी साहित्य और फ्रांसीसी तथा सीरियाई उपन्यासकारों एवं कवियों के अनुवाद पढ़े। सभी अध्यापक और छात्र इस नए लड़के से प्रभावित थे। वो उसके आत्मविश्वासी, विद्रोही, मनमौजी और स्वकेंद्रित स्वभाव और असामान्य लम्बे बालों को पसंद करते थे। लेकिन स्कूल के कड़े अनुशासनों एवं रूढ़िवादिता ने खलील को निराश किया। इसलिए उन्होंने अपने धार्मिक उत्तरदायित्व निभाने से मना कर दिया, कक्षाओं से मनमर्जी तरीके से गायब रहने लगे थे और अपनी किताबों में रेखाचित्र बनाते रहते थे। इन रेखाचित्रों में ज्यादातर तो उनके अध्यापकों पर बनाए गए व्यंग्य-चित्र होते थे। अपने निरंकुश एवं तुनकमिजाज पिता से भी खलील की अनबन रहने लगी। खलील की रचनात्मक प्रतिभा की सदा मुखालफत करते रहने के कारण पिता से खलील की बहस हो गई। खलील अपने चचेरे भाई के घर रहने चले गए। एक बार फिर से उन्हें बुरी स्थिति में रहना पड़ रहा था। इसके लिए खलील ताउम्र झेंपते रहे।

इस समय एक अच्छी बात यह थी कि खलील का कवयित्री जोसेफीन, जिससे वो अमेरिका में मिले थे, के साथ रूमानी संबंध विकसित हो रहा था। लेबनान आने के तीन महीने बाद अचानक ही खलील को जोसेफीन का खत मिला। खत में उसने लिखा था कि फ्रेड ने उसे खलील के बनाए कई चित्र दिखाए और उन चित्रों से जोसेफीन अत्यधिक प्रभावित हुई। 3 फरवरी, 1899 को खलील ने जोसेफीन को लिखे जवाबी खत में उसका खत पाने से हुई खुशी जाहिर की। यह पत्राचार करीब 9 सालों तक चलता रहा। इस संबंध में खलील ने प्रेम, आनन्द, पीड़ा, दुख एवं निराशा के सभी रूप देखे।
सन् 1900 में 17 वर्षीय खलील ने उन महान अरबी विचारकों के चित्र बनाने शुरू कर दिए जिनके बारे में वो पढ़ रहे थे। इसके पहले इन विचारकों की कोई तस्वीर उपलब्ध नहीं थी। और अपने विद्यालय के आखिरी साल में खलील की मुलाकात जोसेफ हवाईक से हुई। उसके साथ मिलकर खलील ने ''अल-मनराह'' (आकाशदीप) नामक साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित की। खलील इस पत्रिका के लिए संपादन और रेखांकन करते थे। बाद में उन्हें विद्यालय का कवि चुन लिया गया। 1902 में विद्यालय से बहुत ही आसानी से उत्तीर्ण होने के बाद खलील सीरिया और लेबनान के सभी ऐतिहासिक स्थानों, प्राचीन सभ्यताओं के स्मारकों और अवशेषों का भ्रमण किया। हालांकि दुर्भाग्य ने खलील का साथ कभी नहीं छोड़ा। लेबनान में काफी खराब स्थिति में वो पहले से रह रहे थे लेकिन उनके परिवार के खराब स्वास्थ्य की खबर से वो और ज्यादा परेशान हो गए। उसी साल मार्च में अपनी बहन सुल्ताना की सख्त बीमारी के बारे में सुनकर खलील लेबनान छोड़ कर अमेरिका के लिए रवाना हो गए। और खलील फिर कभी लेबनान वापस नहीं आ पाए।

दुर्भाग्यवश खलील अपनी बहन सुल्ताना को जीवित देखने के लिए बोस्टन समय से नहीं पहुंच सके। 4 अप्रैल, 1902 को मात्र 14 साल की उम्र में सुल्ताना का देहांत हो गया। खलील अपने परिवार को बहुत ज्यादा प्यार करते थे। उनकी बहन की मृत्यु की मातमपुर्सी के समय फ्रेड और जोसेफीन एक मजबूत सहारे की तरह उनके साथ रहे। उन लोगों ने बोस्टन के कला प्रदर्शनियों एवं सभाओं के माध्यम से खलील का ध्यान बंटाने की पूरी कोशिश की।
जोसेफीन खलील से उम्र में काफी बड़ी थी लेकिन खलील का उसके प्रति प्रेम दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था। वो उसके प्यार में पूरी तरह डूब चुके थे। खलील एक कलाकार के रूप में जोसेफीन को अपने जीवन का प्रकाशस्तम्भ मानते थे। जोसेफीन भी उन्हें 'मेरा नौजवान पैगम्बर' कहती थी। वैसे यह प्रेम एकतरफा ही था क्योंकि बाद में जोसेफीन ने दावा किया कि वह खलील की कलाकार साथी या दोस्त मात्र थी। जोसेफीन ने खलील का परिचय कई अतिमहत्वपूर्ण लोगों से कराया। वह खलील को जीनियस मानती थी। पर उसने खलील के विवाह-प्रस्ताव को ठुकरा दिया। संभव है कि खलील के लिए उसके मन में क्षणिक आकर्षण मात्र रहा हो या फिर वो उन दोनों की उम्र के बीच के अंतर के कारण शादी से पीछे हट गई हो। खलील ने अपनी मशहूर किताब ''दि प्रोफेट'' जोसेफीन के प्रेम और लगाव से प्रेरित होकर ही लिखी थी। इस किताब का शीर्षक 1902 में लिखी जोसेफीन की एक लम्बी कविता से लिया गया था। इस कविता में जोसेफीन ने अपनी कल्पना के आधार पर खलील के बशरी प्रवास के बारे में लिखा था। जब ''दि प्रोफेट'' प्रकाशित हुई तो खलील ने इस किताब को जोसेफीन को समर्पित किया।
खलील के परिवार का दुःख खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। फरवरी, 1903 में उनकी मां के कैंसरयुक्त ट्यूमर का ऑपरेशन हुआ। इस भावनात्मक बोझ के साथ ही खलील को पारिवारिक बोझ भी उठाना पड़ा। उनका भाई ज्यादा धन कमाने के लिए क्यूबा चला गया था। पीटर की जगह उन्हें परिवार के व्यवसाय और दुकान को देखना पड़ रहा था। उस वक्त मात्र 20 साल के खलील को इन जिम्मेदारियों के कारण अपने कलात्मक रुझानों को विकसित करने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था। अपने आसपास की गरीबी, बीमारी और मौतों से खलील इतना उकता चुके थे कि वो अक्सर घर से बाहर रहना पसंद करते थे। इसी साल मार्च में पीटर क्षय रोग से बुरी तरह पीड़ित होकर बोस्टन वापस आया। 12 मार्च को उसका भी देहांत हो गया। उनकी मां का कैंसर भी बढ़ता ही जा रहा था। और अंततः 28 जून, 1903 को उनका भी देहांत हो गया। अब खलील की बहन मरीना भी अपने परिवार की जीविका चलाने के लिए दर्जिन का काम करने लगी थी।

एक के बाद एक मौतों से खलील पस्त हो गए। उन्होंने अपना पारिवारिक व्यवसाय बेच दिया तथा अंग्रेजी और अरबी में अपनी लेखन क्षमता बढ़ाने में लग गए। दूसरी तरफ फ्रेड और जोसेफीन ने उन्हें अपनी पहली कला प्रदर्शनी आयोजित करने में सहायता की। यह प्रदर्शनी 3 मई, 1904 को आयोजित हुई थी। प्रदर्शनी में उनके चारकोल चित्रों के प्रतीकों एवं रूपकों के माध्यम से उनकी अनुभवातीत और आध्यात्मिक दृष्टि प्रकट हुई। उनके चित्रों ने बोस्टन के कला समुदाय को मोहित कर लिया। कला समीक्षकों ने भी उनके चित्रों की तारीफ की और कुछ चित्रों की बिक्री भी हुई।
यह प्रदर्शनी इसलिए भी खास है क्योंकि इसी के दौरान खलील के जीवन में एक नई स्त्री का प्रवेश हुआ। जोसेफीन ने मैरी एलिजाबेथ को खलील के चित्रों को परखने के लिए बुलाया था। एलिजाबेथ उम्र में खलील से दस वर्ष बड़ी थी। वो ''मिस हैस्केल स्कूल फॉर गर्ल्स'' की मालकिन थी। बाद में वह ''दि कैम्ब्रिज स्कूल'' की प्रधान अध्यापिका बनी। उन्होंने खलील को अपने आश्रय में ले लिया। जोसेफीन के रूमानी मिजाज के उलट एलिजाबेथ दृढ़ और आत्मनिर्भर महिला थी। वो स्त्री-स्वतंत्रता की भी प्रबल पैरोकार थी। इस मुलाकात से एक आजीवन चलने वाले संबंध की शुरुआत हुई। इस संबंध ने खलील के लेखन पर गहरा प्रभाव डाला। खलील अपने से बड़ी महिलाओं के प्रति ज्यादा आकर्षण शायद इसलिए महसूस करते रहे होंगे कि उन्हें अपने लिए एक परिपक्व महिला, संभवतः उनकी मां जैसी, की तलाश थी। संभव है कि उनकी भावनात्मक असुरक्षा इसकी एक मुख्य वजह रही हो और वो भौतिक आकांक्षाओं की बजाय अपने भावनात्मक और आध्यात्मिक तितिक्षा की पूर्ति चाहते रहे हों। जो एक स्नेहमयी मां सरीखी महिला से ही मिल सकती थी।
मैरी ने खलील के कलात्मक विकास के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। उसने खलील को कलाकार बनने के सपने को पूरा करने के लिए प्रेरित किया। मैरी ने उन्हें पेरिस में रहकर एक कला स्कूल में पढ़ने के लिए धन दिया ताकि वो एक प्रतीकवादी चित्रकार बनने का अपना स्वप्न पूरा कर सकें। मैरी ने खलील को अपने अरबी लेखन का अंग्रेजी में अनुवाद करने से रोका। उसने खलील को सीधे अंग्रेजी में लिखने के लिए प्रेरित किया। मैरी की सलाह पर अमल करते हुए खलील ने अपने अंग्रेजी लेखन पर ध्यान देना शुरू किया। मैरी की साझेदारी और संपादन ने खलील के लेखन को परिष्कृत करके परिपूर्ण बना दिया। वह उनके साथ घण्टों बैठकर उनके लेखों को सुधारती रहती थी और उन्हें लेखन के नए-नए विषय सुझाती रहती थी। यहां तक कि खलील की भाषा और विचारों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझने के लिए मैरी ने अरबी सीखना शुरू कर दिया था।

1904 में मात्र 21 साल की उम्र में अरब प्रवासियों के अखबार ''अल-मुहाजिर''(प्रवासी) में खलील का पहला लेख प्रकाशित हुआ। उनका पहला लेख 'विजन' एक रूमानी लेख था। इसमें ढेर सारे प्रतीकों के सहारे पिंजरे में कैद एक चिड़िया के बारे में बताया गया था। अपने बशरी प्रवास के दौरान खलील ने अरबी भाषा और पारंपरिक शब्द-संपदा पर अधिकार प्राप्त करने के लिए बहुत सारी अरबी कहानियां पढ़ी थी। इसलिए उनके लेखन में एक देशज पुट था। खलील के अनुसार भाषा के पारंपरिक नियम बनाए ही इसलिए जाते हैं कि उन्हें तोड़ा जा सके। उन्होंने प्रवासी अरबी लेखकों को एकरस परंपरा से निकल कर अपनी स्वतंत्र शैली विकसित करने की सलाह दी।
खलील के लेखन में भावों की तीव्रता और काव्यात्मक आस्वाद था। उनके लेखन का मुख्य उद्देश्य लेबनानियों को प्रबुद्ध बनाना था ताकि वो अपनी गुलामी और तंद्रा से बाहर आ सकें। इसके बावजूद उनके लेखन में एक सार्वभौमिक पुकार, महत्व और प्रमाणिकता भी थी। खलील एक द्रष्टा थे जिसने नैतिक आधार पर समाज के सुधार के लिए प्रयास किया। उनके जीवन काल में उनके अरबी लेखन को अंग्रेजी लेखन की तरह आलोचकीय महत्व नहीं मिला। इसलिए उन्होंने अपने अरबी शैली को परिष्कृत करने की बजाय अंग्रेजी लेखन पर ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया।
खलील बोस्टन में अपने रेखाचित्रों, कविताओं और गद्य-कविताओं (मुक्तक) के माध्यम से अपनी जीविका चलाते थे। वो ''मीरात अल-गर्ब (पश्चिम का आईना) जैसे अन्य अरबी अखबारों में भी लेख लिखते थे। 1905 में 22 वर्षीय खलील की पहली किताब ''नुब्ताह फी फन अल-मुसिका (संगीत पर एक पम्फलेट) आई। पीटर द्वारा बजाए जाने वाले ऊद और फ्रेड के साथ जाकर सुने गए ओपेरा से प्रभावित हुए खलील ने संगीत की प्रशंसा में यह किताब लिखी। इसी साल 22 वर्षीय खलील ने न्यूयॉर्क के अग्रणी अरबी अखबार ''अल-मोहाजिर'' (आप्रवासी) में एक स्तम्भ लिखना शुरू किया। स्तम्भ का नाम था ''आंसू और हंसी''। इसी स्तम्भ के लेखों के संग्रह के रूप में खलील ने अपनी पहली किताब '' एक आंसू और एक मुस्कान'' प्रकाशित कराई। ''अल-मोहाजिर'' में स्तम्भ लिखने के दौरान ही अमीन रिहानी नामक आप्रवासी अरबी लेखक ने खलील की तारीफ करते हुए एक लेख लिखा। रिहानी ने दूसरे आधुनिक अरबी लेखकों की पुराने अरबी लेखकों की भद्दी नकल और पैसे के लिए कविता लिखने के लिए आलोचना की। आगे चलकर यह अमीन रिहानी एक सुविख्यात अरबी लेखक बने। ये जीवन भर खलील के मित्र बने रहे। हालांकि खलील ने मिखाइल नैमी की दोस्ती के लिए अमीन रिहानी का साथ छोड़ दिया था। मिखाइल ''न्यूयॉर्क पेन लीग'' से जुड़े लेबनानी लेखक एवं कवि थे। मिखाइल भी आजीवन उनके संगी रहे।
खलील के लेखन में अन्याय और दमन के विरुद्ध विद्रोही स्वर उभरने लगा। 1906 में प्रकाशित 'अराइस अल-मुरूज' का अनुवाद '' चारागाहों की बहुएं'' या 'रुहानी बहुएं' हुआ था लेकिन खलील इसे ''घाटी की परियां'' कहते थे। यह किताब उत्तरी लेबनान पर आधारित तीन रूपकों का संग्रह थी। इस पुस्तक में युवा खलील ने अपने सामंतवाद विरोधी और पुरोहितवाद विरोधी मान्यताओं को व्यक्त किया था। तीनों रूपकों, ''मार्था, ''पागल योहन्ना'' और '' युगों की धूल एवं चिरस्थायी अग्नि'' में वेश्यावृत्ति, धार्मिक शोषण, पुनर्जन्म एवं प्रेम की नियति पर विचार रखे गए थे। ये रूपक मुख्यतः बशरी में खलील द्वारा सुनी गई कहानियों, बाइबिल के प्रति अत्यधिक लगाव तथा रूमानी प्रेम की अवधारणा से प्रभावित थे। खलील ने अपने अंग्रेजी किताब ''दि मैडमैन'' में पागलपन पर विचार किया था। हालांकि इस किताब का बीज उनके आरंभिक अरबी लेखन में भी देखा जा सकता है। खलील की प्रारंभिक अरबी रचनाओं में विरोधाभासों, कहानियों की व्यावहारिकता, आम नागरिकों का चरित्र-चित्रण तथा धर्म विरोधी प्रवृत्तियां थीं। इसलिए खलील का लेखन रूपवादी एवं पारंपरिक अरबी लेखन से मेल नहीं खाता था।
खलील के 1908 में प्रकाशित चार कहानियों के संग्रह ''अल-अरवाह अल-मुतामरिदाह'' (विद्रोही चेतना) को बेरुत में सार्वजनिक रूप से जलाया गया। सीरियाई सरकार ने इसमें व्यक्त विद्रोही विचारों के लिए इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया। इस किताब का एक अंश इस प्रकार है - ''आइए अपनी अनासक्ति से बाहर निकल कर उन निर्बलों की सेवा करें जो हमें बल देते हैं और जिस देश में हम रहते हैं उसे साफ करें। आइए स्वर्गीय तोहफों और जीवन की गरिमा एवं स्वतंत्रता के सदके हम इस बेचारे देश को मुस्कराना और जश्न मनाना सिखाएं।'' इस किताब में लेबनान की सामाजिक समस्याओं पर विचार रखे गए थे। इसमें एक महिला को उसके पति से स्वतंत्र होते, एक धर्मद्रोही को स्वतंत्रता की मांग करते तथा एक दुल्हन को अनचाही शादी से बचने के लिए आत्महत्या करते दिखाया गया था। किताब में 19वीं सदी के लेबनान के सामंती शाहों के अन्याय का भी चित्रण किया गया था। खलील ने चर्च और राज्य दोनों की सत्ता की आलोचना की थी। ग्रामीण प्रशासन द्वारा उनकी आलोचना की गई क्योंकि उन्होंने भिक्षुक के धन की तुलना गरीब किसानों के आय से की थी और किसानों को शासकों के खिलाफ विरोध करने के लिए प्रोत्साहित किया था। अपने जीवन के परवर्ती काल में जब खलील मृत्यु, बीमारी, और प्रेम से विरक्त थे तब उन्होंने मैरी से इस किताब को लिखते वक्त के कठिन हालात का जिक्र किया था।

मैरी हस्कल से आर्थिक सहायता प्राप्त कर 25 वर्षीय खलील 1 जुलाई, 1908 को कला सीखने दो वर्षों के लिए पेरिस चले गए। उन्होंने ''अकैडिमी जुलियेन'' में अपना नामांकन कराया। यह अकादमी प्रसिद्ध परीक्षा ''एकोले डेस ब्यूक्स-आर्टस'' की तैयारी करवाती थी। खलील ने प्रसिद्ध फ्रांसीसी मूर्तिकार अगस्त रोडिन के संरक्षण में कला का प्रशिक्षण लिया। खलील पेरिस के सांस्कृतिक परिवेश से चकित थे। वो अक्सर विभिन्न संग्रहालयों और प्रदर्शनियों में रखे चित्रों का विश्लेषण किया करते थे। पेरिस आने से पहले वे आधिकारिक प्रशिक्षण लेने से बचते रहे थे क्योंकि उन्हें अपनी क्षमता पर पूरा भरोसा था। लेकिन पेरिस आने के बाद उन्हें कलात्मक प्रशिक्षण का अभाव महसूस हुआ। वे अपने रेखांकनों को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने लगे। अकादमी में उनका मन नहीं लगता था इसलिए उन्होंने अकादमी छोड़ दी और अपनी कला का निर्बाध आत्म-अन्वेषण करने लगे।
खलील जोसेफ हवाईक (जिनके साथ मिलकर उन्होंने लेबनान में अल-मनराह पत्रिका की शुरुआत की थी) के साथ मिलकर रेखांकन करते थे और प्रदर्शनियों में घूमते थे। 1910 में खलील अपने पुराने परिचित अमीन रिहानी से भी मिले जो पेरिस से होते हुए न्यूयॉर्क जा रहे थे। खलील रिहानी के तीखे व्यंग्य और लेखन शैली को पसंद करते थे। दोनों ने लेबनान के दिनों, अपने साझा मैरोनाइट पृष्ठभूमि और तात्कालिक सामाजिक मुद्दों से अपने लगाव के बारे में बातें की। वे दोनों एक साथ लंदन गए। लंदन के कला जगत से परिचित होने के लिए हफ्तों साथ-साथ पूरे शहर में घूमते रहे। खलील लंदन से पेरिस लौट आए और रिहानी अमेरिका चले गए। इसके कुछ दिनों बाद खलील भी बोस्टन लौट आए।
वापसी के बाद उन्होंने यहां स्थायी रूप से रहकर अपने लेखन पर विशेष ध्यान देने का निर्णय लिया था। उन्होंने मैरी से न्यूयॉर्क जाने की अपनी योजना के बारे में बात की। खलील के अनुसार न्यूयॉर्क में उनके लिए ज्यादा कलात्मक अवसर उपलब्ध थे।
इसी साल दिसम्बर में मैरी ने खलील से जुड़े अपने अनुभवों को एक डायरी में लिखना शुरू कर दिया था। उसकी डायरियों में दर्ज खलील के जीवन के करीब साढ़े सत्रह सालों के ब्यौरे उनके जीवन और कार्य के बारे में सबसे प्रामाणिक दस्तावेज हैं। इन डायरियों में उसने खलील के कलात्मक विकास, उनकी निजी और बौद्धिक बातचीत, तथा उनके गहरे विचार को दर्ज किया। इस डायरी ने आलोचकों को खलील के निजी जीवन और विचारों के बारे में जानने का अवसर दिया अन्यथा वो इसे गुप्त ही रखते।
10 दिसम्बर, 1910 को खलील ने मैरी से शादी का प्रस्ताव रखा। दुर्भाग्यवश मैरी ने उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनके बीच उम्र का बड़ा अंतर इस इनकार की मुख्य वजह थी। मैरी उनसे दस साल बड़ी थी। लेकिन शादी के लिए इनकार करने के बाद भी उनका संबंध यथावत रहा। एक ऐसा संबंध जो सहयोगी के रूप में शुरू होकर एक रूमानी संबंध में बदल गया था और बाद में यह संबंध एक कलात्मक साझेदारी में परिवर्तित हो गया। उनके बीच एक अन्य बाधा धन की थी। खलील को लगता था कि यदि मैरी यूं ही उनकी आर्थिक सहायता करती रही तो उनका रूहानी रिश्ते पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। आर्थिक रूप से मैरी का ऋणी होने की भावना खलील को लगातार परेशान करती थी और इसको लेकर उन दोनों के बीच अक्सर झगड़े भी होते थे। हालांकि मैरी ने कभी भी इस आधार पर खुद को खलील से श्रेष्ठ नहीं माना कि वो उसे पैसे देती है। सच तो यह है कि मैरी खलील के अलावा अन्य कई लोगों की भी आर्थिक मदद किया करती थी। वह जिन-जिन आप्रवासी बच्चों को प्रतिभाशाली समझती थी उन सभी की आर्थिक मदद करती थी। पर उनमें से कोई अन्य बच्चा खलील जितना प्रसिद्ध नहीं हुआ।

1911 में 28 वर्षीय खलील ने प्रसिद्ध कवि ''डब्ल्यू बी यीट्स'' का चित्र बनाया। यह चित्र उस चित्र-श्रृंखला का एक अंग था जिसे बाद में खलील ने '' कला का मंदिर'' नाम दिया। इस श्रृंखला के अंतर्गत उन्होंने ''डीबूसी (क्लासिकीय संगीतकार), ''रोस्टलैण्ड'', ''अगस्त रोडिन'' (फ्रांसीसी मूर्तिकार), ''साराह बर्नहार्ड, ''चार्ल्स रसेल'', ''हेनरी रौचेफोर्ट''(आलोचक), ''कार्ल जी जुंग''(स्वीडिश मनोवैज्ञानिक एवं मनोविश्लेषक) और ''अब्दुल-बहा'' (बाहाई धर्म के नेता) इत्यादि के चित्र बनाए। खलील यहां राजनीतिक गतिविधियों में भी शामिल होने लगे। वो आप्रवासी सीरियाई नौजवानों की बेहतरी के लिए काम करने वाले समूह ''गोल्डेन लिंक्स सोसाइटी'' से जुड़ गए। उसी साल इटली ने तुर्की के साथ युद्ध की घोषणा कर दी। सीरियाई उदारपंथी आटोमन साम्राज्य के प्रभाव से मुक्त स्वराज की कल्पना करने लगे। आटोमन साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की खलील की इच्छा को उस वक्त बल मिला जब वो इटली की सेना के जनरल ''गियुसेप्पे गैरीबाल्डी'' से मिले। गियुसेप्पे इटली के महान सेनानी गैरीबाल्डी का पौत्र था। आगे चलकर प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भी खलील आटोमन साम्राज्य के खिलाफ सभी अरब देशों की संयुक्त सैन्य कार्रवाई के प्रबल पैरोकार और नेता बन गए थे।
खलील इस दौरान 'मिरात अल-गर्ब' जैसे अरबी अखबारों से भी जुड़े रहे। वो 1912 तक इन अखबारों में लेख लिखते रहे। 12 अप्रैल, 1912 में मैरी के सिफारिश पत्र के साथ खलील बेहतर कलात्मक जीवन की उम्मीद में न्यूयॉर्क पहुंचे। शुरुआत में वो रिहानी के साथ ठहरे उसके बाद उन्होंने ग्रीनविच गांव में '51 वेस्ट 10 स्ट्रीट स्टूडियो फॉर आर्टिस्ट' पर एक स्टूडियो किराए पर ले लिया। यहां पर वे चित्र भी बनाते थे और अरबी एवं अंग्रेजी में कहानियां और लेख भी लिखते थे। खलील शहर की कला और जीवनशैली से परिचित होने लगे। आमदनी के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण लोगों के पोट्रेट भी बनाए। उन्होंने रेखाचित्रों की अपनी किताब पूरी की और रिहानी की एक किताब के मुख्यपृष्ठ के लिए एक चित्र भी बनाया। इसी साल खलील को अपने पिता की मृत्यु का समाचार मिला।
1912 में खलील की अरबी में प्रसिद्ध रचना - ''अल-अजनिहा अल-मुताकसिरा'' (टूटे हुए पंख) प्रकाशित हुई। यह किताब मैरी को समर्पित थी लेकिन इसमें लिखे हुए अनुभवों का उससे कोई संबंध नहीं था। यह बेरुत की पृष्ठभूमि पर रचा गया एक काव्यात्मक उपन्यास था जिसमें सामाजिक बंधनों के कारण दम तोड़ देने वाले त्रासद प्रेम का वर्णन था। यह एक ऐसे नौजवान की कहानी थी जो सलमा करामी नामक युवा महिला से प्रेम करता था। सलमा की शादी एक प्रमुख धार्मिक व्यक्ति के भतीजे से तय हो गई थी। सलमा उस नौजवान से चोरी-चोरी मिलने लगी। एक दिन वे पकड़े गए। इसके बाद सलमा के घर से निकलने पर पाबंदी लग गई। अंत में अपने शिशु को जन्म देते समय सलमा की मृत्यु हो जाती है। उपन्यास में खलील ने औरतों की स्थिति की तुलना पिंजड़े में कैद ऐसे पंक्षी से की जिसके पंख टूटे हुए हों।
किताब में प्रेम की शक्ति, प्रार्थना, त्याग इत्यादि की चर्चा की गई थी। उस क्षेत्र के तात्कालिक विभिन्न सामाजिक मुद्दों जैसे महिलाओं की स्थिति, मर्दवाद, धार्मिक भ्रष्टाचार और पाखण्ड जैसे विषयों पर भी खलील ने इस उपन्यास के माध्यम से एक आलोचनात्मक नजरिया प्रस्तुत किया था। यह उपन्यास खलील के जीवन-अनुभव पर आधारित था। जब वो लेबनान में पढ़ाई कर रहे थे उस दौरान 22 वर्षीय विधवा सुल्ताना ताबित से उनका संक्षिप्त प्रेम-संबंध हुआ था। कहा जाता है कि उन्होंने मैरी को सुल्ताना के संग अपने प्रेम-संबंध के बारे में बताया था। उन्होंने मैरी को बताया था कि वो सुल्ताना के साथ प्रेम पत्रों और किताबों का आदान-प्रदान करते थे। किंतु बीच में ही सुल्ताना का आकस्मिक निधन हो गया। खलील के पास याद के तौर पर सुल्ताना के गहने और वस्त्र ही रह गए। कुछ आलोचकों ने इस उपन्यास का संबंध खलील के लेबनानी किशोरी हाला दाहिर के साथ हुए असफल प्रेम संबंध से जोड़ा। हाला दाहिर खलील से दो साल बड़ी थी और वो खलील के सरपरस्त सलीम दाहिर की बड़ी लड़की थी। कुछ लोग इस उपन्यास का संबंध जोसेफीन के 1904 में लिखे एकांकी ''दि विंग्स'' से भी जोड़ते हैं। इस नाटक के लिखे जाने के समय जोसेफीन और खलील का प्रेम-संबंध जारी भी था।
1913 में 30 वर्षीय खलील ने प्रवासी अरबों की पत्रिका ''अल-फुनून'' के पैनल से जुड़ गए। न्यूयॉर्क के अरबी समुदाय द्वारा प्रकाशित किए जाने वाले इस जर्नल के माध्यम से साहित्यिक और कलात्मक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाता था। इस पत्रिका का मिजाज खलील के खुले विचारों से मेल खाता था। खलील ने इस पत्रिका में कई लेख लिखे। ये लेख उनकी पहली किताब ''दि मैडमैन'' का आधार बने। खलील एक अन्य प्रवासी पत्रिका ''अल-साइ'' (यात्री) में भी लेख लिखते थे। .
खलील ने 1913 में ''दि मैडमैन'' लिखना शुरू किया। यह किताब एक तथाकथित पागल आदमी द्वारा कही गई कविताओं और नीति-कथाओं का संग्रह थी। इस किताब का विचार उनके जेहन में उसी वक्त आ गया था जब उन्होंने लेबनान में लोगों का पागलों के साथ व्यवहार देखा था। उन्हें पता चला कि लोगों की मान्यता है कि पागल लोगों के ऊपर जिन्न(शैतान) का साया होता है और चर्च के लोग झाड़-फूंक करके उनका जिन्न उतारते हैं। इस किताब के अंग्रेजी संस्करण का एक अंश इस प्रकार है, ''पहली-पहली बार सूरज ने मेरे नंगे चेहरे को चूमा और मेरी आत्मा सूरज के लिए प्यास से दहक गई, और मुझे अब किसी नकाब की जरूरत नहीं महसूस हो रही थी। और ऐसा लगा जैसे कि इसी सिद्धावस्था में मैं चीखा, ''उन चोरों का भला हो, भला हो जिन्होंने मेरा नकाब चुरा लिया'। इस प्रकार मैं एक पागल आदमी बन गया।''
इसी दौर में खलील को नीत्से की लेखन शैली और उनकी किताब 'विल-टू-पॉवर' पसंद आने लगी थी। हालांकि नीत्से की किताब की अवधारणा ईसा के बारे में खलील की अपनी अवधारणा से उलट थी। जर्मन दार्शनिक नीत्से मानते थे कि ईसाई धर्म और सामाजिक संस्थाएं ही मनुष्य के पतन और 'गुलाम नैतिकता' के उद्भव के लिए जिम्मेदार हैं। नीत्से ने ईसा को एक कमजोर आदमी के रूप में चित्रित किया लेकिन खलील के लिए ईसा एक प्रशंसनीय व्यक्ति थे। खलील ने 1928 में लिखी अंग्रेजी में अपनी सबसे लम्बी रचना ''जीसस, दि सन ऑफ मैन'' ईसा को ही समर्पित की थी।
मैरी और खलील ''दि मैडमैन'' का सतत संपादन करते रहे। 1914 में 31 वर्षीय खलील की अरबी में पांचवीं किताब ''दाम-आ वा इब्तीसामा'' (एक आंसू और एक मुस्कान)

प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारंभ होते ही खलील राजनीति में सक्रिय हो गए। उन्होंने आटोमन साम्राज्य को खत्म करने के लिए ईसाई और मुस्लिम एकता की जरूरत पर जोर दिया। वे अपने देश की स्वतंत्रता के विचार से इतने ज्यादा जुड़े हुए थे कि उन्होंने मैरी से लेबनान जाकर युद्ध में लड़ने की इच्छा जाहिर की। लेकिन मैरी ने इसके लिए कड़ाई से मना कर दिया। 1914 में एक अमेरिकी वास्तुविद अल्बर्ट पिनकम राइडर खलील की कला प्रदर्शनी में औचक रूप से पहुंचा। खलील उससे अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने उसके सम्मान में एक अंग्रेजी कविता लिखी। यह खलील का अंग्रेजी में पहला प्रकाशन था जो जनवरी, 1915 में छपने गया।
1915 में खलील को अपने बाएं कंधे का विद्युत उपचार कराना पड़ा। दोबारा उभरी यह चोट खलील को उस वक्त लगी थी जब वो बचपन में लेबनान में एक टीले की चोटी से गिर गए थे। दर्द के अलावा युद्ध के दौरान खलील अवसादग्रस्त भी हो गए थे। इससे उनका जेहन भटक गया तथा सेहत और ज्यादा बिगड़ गई। आटोमन साम्राज्य के खिलाफ लड़ रहे अरबों के पक्ष में मुखरता से लिखते रहने के बावजूद खलील खुद को बेबस महसूस करते थे। उन्होंने अपनी पूरी बचत भूख से जूझ रहे सीरिया को दान दे दी।
खलील बेचैन कर देने वाले युद्ध संबंधी विचारों से बचने के लिए 1916 में ''दि सेवेन आर्ट्स'' नामक पत्रिका से जुड़ गए। इस पत्रिका से जुड़ने वाले वो पहले प्रवासी अरब थे। उनके लेखन की काफी मांग थी। लोग उनके लेखन का पाठ सुनना चाहते थे। 1918 में उन्होंने मैरी को अपने नई किताब के बारे में बताया। वो इसे ''माई आईलैण्ड मैन'' कहते थे। यह एक तरह से उनकी सबसे महत्वपूर्ण किताब ''दि प्रोफेट'' की शुरुआत थी। मैरी ने अपनी डायरी में इस किताब के बारे में खलील के विचार इस प्रकार दर्ज किए हैं, ''मेरे जीवन की पहली किताब - पहली असल किताब, मेरे परिपक्व विचार'। इस किताब के विकास में मैरी की प्रमुख भूमिका रही। उसी ने उन्हें यह किताब अंग्रेजी में लिखने की प्रेरणा दी। 1919 में खलील ने इसके लिए 'दि प्रोफेट' नाम सोचा। लेकिन मैरी इस नाम के खिलाफ थी। उसने इसके लिए 'दि काउंसलर' नाम सुझाया। किताब के प्रकाशन के बाद भी वो इस किताब के लिए इसी नाम का प्रयोग करती थी।
खलील की अंग्रेजी में पहली किताब ''दि मैडमैन'' 1918 में अमेरिकी प्रकाशन संस्थान एलफ्रेड ए नॉफ से प्रकाशित हुई थी। पाठकों में इस किताब की अच्छी प्रतिक्रिया हुई थी। इस किताब में जिंदगी में यकीन पैदा करने वाली कविताएं और नीति-कथाएं शामिल थीं जो मनुष्य के अहंकार, मान्यताओं और लालसाओं पर कुठाराघात करती थीं। इस किताब में खलील के तीन चित्र भी शामिल थे। इस किताब की सफलता से उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि वो काम में बहुत ज्यादा मशरूफ हो गए और अपने पुराने साथियों फ्रेड और जोसेफीन को लगभग भूल ही गए। अब रिहानी के साथ भी उनके संबंध पहले जैसे नहीं रहे। 1919 में उनके चुनिंदा चित्रों का संग्रह ''ट्वेंटी ड्राइंग्स'' न्यूयॉर्क से प्रकाशित हुआ। इस किताब की भूमिका एलिस रफैल ने लिखी थी।
खलील ने मैरी से ऐसी किताब लिखने की इच्छा जाहिर की जो जेब में रखने योग्य हो और जिसे एक बार में पढ़ा जा सके। 1918 से लेकर 1926 के बीच उन्होंने ऐसी चार किताबें ''दि मैडमैन(1918)'', ''दि फोररनर(1920)'', ''दि प्रोफेट(1923)'' और ''सैण्ड एण्ड फोम(1926)'' लिखी। ये अंग्रेजी में लिखी उनकी प्रारंभिक किताबें थीं। ''दि फोररनर'' और ''सैण्ड एण्ड फोम'' जनश्रुतियों और सूक्तियों के संकलन थे। इन किताबों में पूर्वी परंपरा के अनुकूल राजा, साधु, संत, दास, रेगिस्तान, बात करने वाले जानवर तथा हंसने वाली हवाएं शामिल थीं।
खलील की परंपरागत अरबी कविताओं के अनुकूल तुकबंदी और मीटर वाली पहली कविता ''अल-मवाकिब'' (जलूस) 1919 में प्रकाशित हुई। ये कविता दो व्यक्तियों के संवाद के रूप में थी। एक व्यक्ति जिसे आध्यात्मिक मुक्ति मिल चुकी है और दूसरा व्यक्ति जो अभी भी सांसारिकता के बंधन में है। बहरहाल अरबी मीडिया में इसे मामूली सफलता मिली। यद्यपि खलील आजीवन ऐसी पत्रिकाओं और सभाओं से जुड़े रहे जो अरबी में नई शैली के लेखन को प्रोत्साहित करती थी और विदेशी अरबी साहित्य को एकजुट करती थी लेकिन फिर भी उन्हें अरबी लेखक के रूप में ज्यादा सफलता नहीं मिली। उनका लेखन अभी भी अव्वल दर्जे का नहीं था इसलिए उन्हें अरबी मीडिया में अपेक्षित स्वीकार्यता नहीं मिली। इसके बावजूद अरबी में उनकी अन्य कई रचनाएं आईं। 1920 में ''अल-औसिज (तूफान)'' प्रकाशित हुई। यह किताब कविताओं और निबंधों का संकलन थी। इस किताब में 'आत्म-मुक्त मनुष्य की खातिर आत्म-बंदी मनुष्य के खिलाफ विद्रोह' को मुख्य विषय बनाया गया था। 1923 में ''अल-बदई वाल-तरैफ(नया और शानदार)'' प्रकाशित हुई। यह बहुत से किस्सों और निबंधों का संग्रह था।
1919 में 36 वर्षीय खलील एक अन्य स्थानीय पत्रिका ''फतत बोस्टन'' के संपादक मण्डल में शामिल हो गए। इस पत्रिका में उन्होंने कई अरबी लेख लिखे। यहां मिखाइल नैमा से उनका संबंध प्रगाढ़ हुआ। मिखाइल से वे वर्षों पहले मिल चुके थे। मिखाइल एक आलोचक थे और वो पहले अरब लेखक थे जिसने अरबी साहित्य में खलील को रेखांकित किया था। उन्होंने इस बात पर ध्यान दिलाया कि खलील अरबी परंपराओं और पृष्ठभूमि के उचित प्रयोग से अरबी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।
1920 में खलील और मिखाइल एक साथ दस सदस्यों वाले अरब प्रवासियों के एक संगठन ''अल-राबित अल-कलामिया'' के सदस्य बने। यह संगठन अरबी साहित्य के पुनरुद्धार के लिए प्रयासरत था। इसे ''अल-कलामिया'' भी कहा जाता था। अंग्रेजी में इसे ''दि पेन लीग'' कहा गया था। इस संगठन को ''अल-महजर(प्रवासी)'' भी कहते थे। यह पहला अरब-अमेरिकी साहित्यिक संगठन था। इसकी स्थापना सर्वप्रथम 1915-1916 में ''नसीब अरीदा'' और ''अब्दुल मसीह हद्दाद'' ने की थी। बाद में खलील और उनके साथियों ने 1920 में इस संगठन को पुनर्गठित किया। इस आंदोलन के माध्यम से खलील कलात्मक स्वतंत्रता की मांग उठाई। उन्होंने अरबी लेखकों को नियम तोड़ने और अपनी निजी शैली विकसित करने के लिए प्रेरित किया। खलील ने इस आंदोलन के द्वारा अरबी लेखकों की नई पीढ़ी को बढ़ावा दिया। इस समूह के दस सदस्य थे - खलील जिब्रान (अध्यक्ष), मिखाइल नैमी(सचिव), नसीब अरिदा, राशिद अयूब, वादी बहौत, विलियम कैटजेफलिस, अब्दुल मसीह हद्दाद, नुद्र हद्दाद, ''एलिआ अबू मादी एवं अमीन रिहानी।
1920 तक खलील ने ''दि प्रोफेट'' का एक तिहाई हिस्सा पूरा कर लिया था। 1922 में 39 साल की उम्र में उन्हें हृदय रोग की शिकायत हुई। इसके परिणामस्वरूप वो अवसाद के शिकाए हो गए। इस अवसाद की एक अन्य मुख्य वजह एक कलाकार के हताश मन का आंतरिक द्वंद भी था। खलील अपनी कलात्मक क्षमता को अच्छी तरह जानते थे और यकीन रखते थे कि वो अपने-आप को साबित कर सकेंगे लेकिन काफी प्रयासों के बावजूद वो अपनी ही उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पा रहे थे।
दरअसल एक बार उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि, “'' मेरी सबसे बड़ी पीड़ा शारीरिक नहीं है। मेरे अंदर कुछ विशाल है......मैंने इसे हमेशा महसूस किया है पर मैं इसे व्यक्त नहीं कर सकता। यह एक विशाल स्व है जो मेरे अंदर बैठकर मेरे लघु रूप को तमाम चीजें करते हुए देखता रहता है।''
इसी बीच ''दि प्रोफेट'' पूरी हो चली थी। मैरी ने उनकी हर संभव सहायता की। उसने उन्हें लेखन शैली, शामिल किए जाने वाले विषय, बड़े अक्षरों का प्रयोग, व्याकरणिक चिह्न, पैराग्राफ का स्वरूप इत्यादि के बारे में राय दी। किताब प्रकाशित होने के कुछ महीने पहले खलील ने मैरी को इस किताब का सार बताते हुए कहा - ''प्रोफेट एक ही बात कह रहा है : 'आप खुद को जितना जानते हैं आप उससे कहीं ज्यादा महान हैं' - और जो भी है, अच्छा है।'' यह किताब अंततः अक्टूबर 1923 में प्रकाशित हुई।
1923 तक 40 वर्षीय खलील अपने लेखन के दम पर अरबी दुनिया में एक सम्मानित लेखक बन चुके थे। अब अंग्रेजी लेखन को लेकर भी उनका आत्मविश्वास बढ़ गया था। धीरे-धीरे आर्थिक मदद और संपादन में सहायता के लिए मैरी पर उनकी निर्भरता कम होती जा रही थी। पैसे को लेकर होने वाले उनके नियमित झगड़ों के बाद खलील इस बात पर सहमत हो गए थे कि वो अपना उधार चुकाने के लिए मैरी को अपने कुछ चित्र देंगे। हालांकि अपने लेखन के बारे में मैरी की राय पर वे बहुत ज्यादा भरोसा नहीं रखते थे लेकिन उसकी उपस्थिति उनके चित्रों के लिए सतत प्रेरणा जरूर थी।

1923 में खलील के जीवन में एक नए शख्स का प्रवेश हुआ। ''मे जैदा'' नामक अरबी लेखिका से उनका अंतरंग संवाद स्थापित हो गया था। वो एक प्रबुद्ध लेखिका थी और महिलाओं की आजादी की प्रबल समर्थक भी थीं। 1912 में उसने खलील को एक खत लिखा था और बताया था कि वो ''दि ब्रोकेन विंग्स'' की सलमा की कहानी से अत्यधिक प्रभावित हुई थी। वह अंग्रेजी, फ्रेंच और अरबी भाषाओं में प्रवीण थी। उसने 1911 में ''इसीस कोपिया'' के छद्म नाम से कविताएं प्रकाशित करवाईं थी। जैदा ने धीरे-धीरे खलील की रचनाओं के संपादक और सलाहकार के रूप में मैरी का स्थान ले लिया। यद्यपि वे कभी भी रू-ब-रू नहीं हुए लेकिन उनका पत्राचार खलील के जीवन के अंतिम समय तक चलता रहा। उनके शुरुआती पत्राचार में साहित्यिक चीजों पर ही राय-बात होती थी। धीरे-धीरे उनका पत्राचार आध्यात्मिक और भावनात्मक स्तर तक पहुंच गया। खलील पर लिखे उसके लेख ने खलील को तो अरबी दुनिया में लोकप्रिय किया ही वह खुद भी इन लेखों के माध्यम से एक आलोचक के रूप में स्थापित हुईं।
इस दौर में खलील राजनीतिक घटनाओं में सक्रिय भागीदारी करते रहे और समाज के सांस्कृतिक मुद्दों पर गहराई से लिखते रहे थे। उन्होंने उभरते हुए अरब देशों को पश्चिमी सभ्यता से अच्छी बातें सीखने की वकालत की। दूसरी तरफ उनके अपने देश में चर्च और पादरियों के बारे में उनके विचारों पर विवाद होने लगा था। इसलिए उन्होंने अरबी लेखक के रूप में मान्यता प्राप्त करने का प्रयास छोड़कर अंग्रेजी लेखन पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया।
यद्यपि इस समय तक उनके लेखकीय जीवन में मैरी की भूमिका बहुत कम हो गई थी फिर भी कभी भावनात्मक संबल के लिए तो कभी जमीन-मकान की खरीद में हुए नुकसान को संभालने के लिए मैरी हमेशा उनके साथ रही। खलील ने मैरी से ''दि प्रोफेट'' का दूसरा और तीसरा भाग लिखने की योजना पर भी चर्चा की ताकि वो इस किताब की त्रयी पूरी कर सकें। पहली किताब उस समय घटित होती है जब प्रोफेट ऑरफैलेस से अपने देश जा रहे थे। वे दूसरे भाग का नाम ''गार्डेन ऑफ दि प्रोफेट'' रखना चाहते थे क्योंकि यह किताब मनुष्य और प्रकृति के संबंध पर आधारित थी। इसमें उस समय का जिक्र था जब प्रोफेट द्वीप पर अपनी माता के बगीचे में समय गुजारते हैं और अपने सहयात्रियों से बातचीत करते हैं। तीसरे भाग का नाम '' दि डेथ ऑफ प्रोफेट'' रखने की योजना थी क्योंकि इसमें मनुष्य और ईश्वर के संबंध की चर्चा की जानी थी। इसमें प्रोफेट के द्वीप से वापस आने, जेल जाने और आजाद किए जाने के बाद पत्थर मार-मार कर मारे जाने का वर्णन होना था। बहरहाल अपने खराब होते स्वास्थ्य और अंग्रेजी में अपनी सबसे लम्बी किताब ''जीसस, दि सन ऑफ मैन'' को लिखने में लगे होने के कारण खलील की ''दि प्रोफेट'' का दूसरा और तीसरा भाग लिखने की इच्छा अधूरी रह गई।
खलील ने अपने लेखों के संपादन और स्टूडियो की देखभाल के लिए हेनेरीटा ब्रेकेनरिज बाउटन को अपना नया सचिव नियुक्त किया। इस समय तक 43 वर्षीय खलील एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त व्यक्ति हो चुके थे। वे ''न्यू ओरिएंट'' नामक त्रैमासिक जर्नल में लेख लिखते थे। यह जर्नल पूरब और पश्चिम की एकता पर जोर देता था। उन्होंने अपने नए अंग्रेजी एकांकी ''लैजारस एण्ड हिज बिलव्ड'' पर भी काम करना शुरू किया। यह एकांकी उनके एक अरबी एकांकी पर आधारित था। खलील प्रकाशन से पहले किताबों के संपादन के लिए अभी भी मैरी पर भरोसा करते थे। (हालांकि मैरी की जैकब फ्लोरेंस मिनिस नामक एक दक्षिणी जमींदार और व्यापारी से शादी हो चुकी थी।) ईसा पर एक ऐसी कहानी लिखना और उन्हें ऐसे स्वरूप में प्रस्तुत करना जैसा पहले किसी ने नहीं किया हो, खलील के जीवन की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा थी। यह किताब नवम्बर, 1928 में प्रकाशित हुई और स्थानीय मीडिया में इसकी काफी सराहना भी हुई। 1929 तक हर संगठन 46 वर्षीय खलील का सम्मान करना चाहता था। खलील के साहित्यिक सफलता के सम्मान में ''अराबिता'' ने ''अस्सनाबिल'' शीर्षक से खलील के चुनिंदा आरंभिक लेखों का एक संकलन प्रकाशित किया।
इस समय तक खलील को शराब की लत लग चुकी थी। शराब पीने से उन्हें असहनीय बदन-दर्द से आराम मिलता था। अचानक वो अपने मकबरे के बारे में विचार करने लगे और ईसाई कारमाइटों के बशरी स्थित एक मठ को खरीदने के लिए पूछताछ भी करने लगे। 1919 में ही डाक्टरों ने पाया था कि वो यकृत-वृद्धि से परेशान हैं। अपनी बीमारी की गंभीरता की अनेदखी करने के लिए खलील ने दवाइयां लेनी बंद कर दी और शराब पर निर्भर होते गए। अपना ध्यान बंटाने के लिए उन्होंने 1911 में लिखे अपने पुराने गद्य-काव्य '' दि अर्थ गाड्स'' पर ध्यान देना शुरू कर दिया। यह गद्य-काव्य धरती के तीन देवताओं की कहानी थी जो एक प्रेमी-युगल के प्रेम में पड़ते हुए देख रहे थे। मैरी ने इस किताब का संपादन किया और यह मार्च, 1930 में प्रकाशित होने के लिए गई। इधर शराब की लत के कारण खलील का स्वास्थ्य खराब होता जा रहा था। सो उन्होंने अपनी आखिरी वसीयत बनवा ली। उन्होंने मैरी से अपने पैतृक गांव बशरी में एक पुस्तकालय बनवाने की इच्छा व्यक्त की। इसमें उन्होंने अपनी मित्र मे जैदा से मृत्यु के भय से उपजी पीड़ा को यूं व्यक्त किया, ''मे, मैं एक ऐसा छोटा ज्वालामुखी हूँ जिसका मुंह हमेशा बंद रहा है''।
उनके यकृत कैंसर को डाक्टर पकड़ नहीं पाए थे। कैंसर के कारण वो अचेत हो गए और 10 अप्रैल, 1931 को सेंट विसेंट हास्पीटल, न्यूयाँर्क में उनका निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही एक खास रूमानी युग का भी समापन हो गया। साहित्य उनके जादुई पद्य से महरूम हो गया। मनुष्य की चेतना के सबसे घने अंधेरे को अपने उदात्त विचारों से प्रकाशित करने वाला और नैसर्गिक मानवता को जगाने वाला ''प्रोफेट'' चला गया। अमेरिका और लेबनान दोनों जगहों पर इस 48 वर्षीय विलक्षण प्रतिभा के निधन पर शोक मनाया गया। उन्होंने अपनी वसीयत में अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा अपने देश सीरिया के लिए दिया था। वो चाहते थे कि सीरियाई नागरिक दूसरे देशों में जाने की बजाय अपने देश में ही रहकर विकास करें। तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद खलील और मैरी का संबंध बना रहा। खलील की मैरी के प्रति गहरी श्रद्धा और कृतज्ञता थी। उन्होंने अपनी संपत्ति का एक हिस्सा मैरी के नाम किया था। उनके स्टूडियो का सारा सामान और दूसरी चीजें मैरी को मिली। इन चीजों में सबसे खास वो पत्र थे जो मैरी ने खलील को लिखे थे। पहले-पहल उसने इन खतों को जला देना चाहा लेकिन बाद में उनके ऐतिहासिक महत्व को समझते हुए उसने इन पत्रों को यूनिवर्सिटी ऑफ कैरोलिना को दे दिया। इनमें से छह सौ पत्रों का चयनित अंश ''बिलव्ड प्रोफेट'' नाम से प्रकाशित हुआ। मैरी, मरीना और हेनरीटा ने खलील के स्टूडियो को संभाला, उनके लेखों को एकत्रित किया और उनकी किताबों, रेखांकनों, चित्रों को व्यवस्थित किया। खलील की मृत्यु के बाद हेनरीटा ने एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य किया। खलील ने ''गार्डेन ऑफ दि प्रोफेट'' को आधा लिखा था जिसे उसने ''बारबारा यंग'' के छद्मनाम से पूरा किया तथा 1933 में खलील के मरणोपरांत प्रकाशित किया। बहरहाल इस किताब के खलील के प्रमाणिक कार्य होने-न-होने को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद है।
खलील की इच्छा के अनुसार मरीना और मैरी जुलाई, 1931 में खलील के गृह प्रदेश बशरी में उन्हें दफनाने गईं। मातम मनाने की बजाय एक लम्बे जुलूस ने उनके शव का स्वागत किया। लेबनान के लोगों ने खलील के घर वापसी पर जश्न मनाया। उनकी मृत्यु ने उन्हें और प्रसिद्ध बना दिया। लेबनानी कला मंत्री ने उनके ताबूत को खोला और उसे ललित कला पदक से विभूषित किया। जनवरी 1932 में मरीना और मैरी ने मार सरकिस मठ खरीद लिया। इस तरह खलील के अवशेष को इस मठ में एक शिला की छाया में हमेशा के लिए एक आरामगाह मिल गई। यह जगह उस पवित्र घाटी से बहुत ही समीप थी जिसमें महलील का बचपन बीता था। मैरी ने अपने निजी संग्रह से खलील के सैकड़ों मूल चित्रों को जार्जिया के ''तेलफेयर म्यूजियम ऑफ आर्ट'' को दे दिया। यह जार्जिया में खलील के चित्रों का सबसे बड़ा सार्वजनिक संग्रहालय है। मैरी के सुझाव पर खलील की निजी किताबें जिन्हें वो पढ़ते थे, उनके कई लेख और रेखांकन को उनके मठ में ले जाकर वहां एक खलील संग्रहालय बनाया गया।
खलील की पत्र-मित्र और रूहानी दोस्त में जैदा भी खलील ही की तरह अविवाहित थीं। अपने माता-पिता और खलील की मृत्यु के बाद वो अवसादग्रस्त हो गईं। उनके चाचा ने उन्हें एक मानसिक अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल में उनके साथ बहुत कठोर एवं अमानवीय व्यवहार हुआ। वो अंततः अमीन रिहानी जैसे अपने लेखक दोस्तों की बदौलत अस्पताल से आजाद हो पाईं। 1941 में 55 वर्ष की अवस्था में उनका भी निधन हो गया।
अरबी दुनिया खलील ज्रिबान की मृत्यु के बाद एक जीनियस और देशभक्त के रूप में उनकी अत्यधिक आदर करती है। अरबी विद्वान रूढ़ अरबी कविता का पश्चिमी रूमानवाद और मुक्त छंद शैली से परिचय कराने के लिए खलील की तारीफ करते हैं। खलील जिब्रान की कब्र पर निम्न वाक्य अंकित है - ''मैं तुम्हारी तरह ही जीवित हूँ और तुम्हारे साथ खड़ा हूँ। अपनी आंखें बंद करो और आसपास देखो, तुम मुझे अपने पास पाओगे....'' खलील जिब्रान ने अपने जीवन और कर्मों से यह दिखा दिया कि ''अप्रैल का महीना शायद खत्म हो जाए....लेकिन खुशियों की सौगात कभी खत्म नहीं होती।''
खलील जिब्रान की बायोग्राफीज | 0 टिप्पणी >>
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