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‘‘मैं रास्ते में हूँ।’’
आपने यह बात निश्चित रूप से कही होगी। सोचिए, आपने यह वाक्य कितनी बार कहा है ? क्या आपने कभी यह अपने टेलीफोन से कहा है? एक ऐसे टेलीफोन से जो तांबे के मोटे से तार से जुड़ा होता है। जी हां, हम लैंडलाइन से जुड़े फोन की बात कर रहे हैं। क्या आपके घर में ऐसा टेलीफोन है? आपको नहीं लगता कि कितना अजीब दिखेगा कि आप कहीं जा रहे हों और यह तार वाला फोन आपके साथ हो? और जरा सोचिए कि तब क्या हालत होती जब सब अपना-अपना टेलीफोन लेकर घूमते और सबके पीछे एक-एक तांबे का तार लटक रहा होता? या तो ऐसे झमेले कोई पालता ही नहीं और अगर ऐसा होता तो चारों ओर सब कुछ उलझा हुआ दिखाई पड़ता। पर रुकिए, आखिर मैं आपसे ये सब बातें क्यों कर रहा हूँ?
क्योंकि मुझे बीसवीं सदी के मो........बा......इ.........ल फो........न........" का शोर सुनाई दे रहा है।
हां, मैंने इनके बारे में बहुत सुना है। यहां तक कि एक मेरे पास भी है। आजकल तो छठवीं-सातवीं में पढ़ने वाले बच्चे भी मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। आजकल मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन 1970 में यह बड़ी बात थी। तब तक किसी को नहीं पता था कि मोबाइल फोन किस चीज का नाम है। क्योंकि तब मोबाइल फोन का कोई वजूद ही नहीं था। तब फोन पर बात करने का एक ही तरीका था और वह था लैंडलाइन या फिर कार रेडियो। यहां तक कि कॉर्डलेस फोन भी नहीं थे। आपको यह शायद ही पता हो कि कार रेडियो क्या होता है? आप इसे पुराने जमाने का मोबाइल फोन कह सकते हैं।
मोबाइल फोन की वजह से पिछले कुछ सालों में कई चीजें बदल चुकी हैं। बस एक फोन करके हर रोज कई लोगों की जानें बचाई जा रही हैं। जागरुकता से किए गए एक फोन से या तो कई तरह के अपराध रुक गए या फिर खत्म हो गए। इसी मोबाइल फोन की वजह से हम दूर बैठे हुए भी यह जान पाते हैं कि हमारे करीबी लोग ठीक-ठाक हैं या नहीं । हम अपनी किसी भी योजना को तुरंत बदल सकते हैं और लोगों को इसकी सूचना दे सकते हैं। जरूरत पड़ने पर इसकी मदद से हम अपने किसी दोस्त को रास्ता भी बता सकते हैं। विदेशों में आसानी से फोन कर के हम किसी का हाल-चाल जान सकते हैं। हम जिसे चाहें, जब चाहें फोन कर सकते हैं। मोबाइल फोन में और भी ऐसी बहुत सारी बातें हैं जो इसे खास तौर पर हमारे लिए उपयोगी बनाती हैं।
आज सेलफोन के बिना दुनिया की कल्पना करना भी मुश्किल है। दरअसल, हम इसका प्रयोग दिन भर में अनगिनत बार करते हैं। यह हमारे जीवन का हिस्सा कुछ इस तरह से बन चुका है कि अगर यह किसी वजह से हमारे पास न हो तो वह दिन बड़ा अजीब-सा लगता है। इसके बिना हमें डर लगता है कि हमारा संपर्क बाकी दुनिया से कट ना जाए। व्यक्तिगत रूप से मैं तो सेलफोन के बिना अपने आप को अपाहिज महसूस करता हूँ। सेलफोन के प्रयोग के बाद से जीवन काफी आसान हो गया है।
और इसका श्रेय जिस व्यक्ति को जाता है, वे हैं- मार्टिन कूपर.... एक व्यक्ति जिसकी लगन और विश्वास ने सेलफोन का आविष्कार किया। एक ऐसा आविष्कार जिसने संचार की दुनिया को हर मायने में बदल दिया। एक ऐसा आविष्कार जो आम लोगों के लिए बेहद उपयोगी साबित हुआ और जिसने अपना असर काफी गहराई तक छोड़ा।
आज मार्टिन कूपर की वजह से ही हम सबके पास खुद का फोन नंबर है। उन्होंने हमें तांबे के तारों से मुक्ति देकर संचार की एक असीमित स्वतंत्रता दी। मार्टिन कूपर का जन्म यूएसए के शिकागो के पास इलिनोइस इलाके में 26 दिसम्बर, 1928 को हुआ। मार्टिन मैरी और आर्थर कूपर की पहली संतान थे। जिस वक्त मार्टिन कूपर का जन्म हुआ, उस वक्त दुनिया भर में आर्थिक मंदी छाई हुई थी। आर्थर और मैरी युक्रेन ( पूर्ववर्ती सोवियत संघ का हिस्सा) से विस्थापित होकर अमेरिका आए थे। यहां आकर उन्होंने आम जीवन-शैली अपनाई । वे घर-घर जाकर किश्तों पर सामान बेचा करते थे। कूपर के परिवार में शिक्षा को काफी अहमियत दी जाती थी। मार्टिन के जीवन की ठोस नींव रखने में यह बात काफी मददगार साबित हुई। कूपर की मां एक ऊर्जावान महिला थी। मार्टिन को यह गुण उन्हें अपनी मां से ही मिला था। वे कहते हैं कि ‘मेरे पिता एक बहुत ही विचारशील व्यक्ति थे, और मैं आज जो भी हूँ वो अपने अच्छे आनुवांशिक गुण और अच्छी पारिवारिक संस्कृति की वजह से हूँ।’ मार्टिन का एक छोटा भाई भी था। उसका नाम विल कूपर था जो मार्टिन से तीन साल छोटा था।
अपने शुरुआती जीवन में मार्टिन अपने परिवार के साथ कनाडा के विनिपेग इलाके में रहे। अपने बचपन के दिनों से ही वे बहुत जिज्ञासु थे। वे हमेशा यह जानने की कोशिश करते रहते थे कि चीजें कैसे काम करती हैं। जब मार्टिन चार साल के हुए तो वे अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए चीजों को खोल दिया करते और उनके अदंर जो भी होता, उसे बाहर निकाल लेते। एक दिन मार्टिन को कुछ बच्चे दिखे, जो मैग्निफाइंग ग्लास से खेल रहे थे। उन्होंने पास जाकर देखा तो पाया कि वे इस ग्लास से किरणों को एक जगह केंद्रित कर रहे हैं और फिर उन किरणों से कागज के टुकड़े जला रहे हैं। मार्टिन यह देखकर बहुत हैरान हुए। वे हर हाल में यह जानना चाहते थे कि यह कैसे होता है। मार्टिन के पास वह कांच का टुकड़ा नहीं था और जिन बच्चों के पास यह था वे मार्टिन से काफी बड़े थे। वे मार्टिन को कांच देने वाले नहीं थे। लिहाजा, मार्टिन ने एक दूसरा रास्ता निकाला। उन्होंने मैग्निफाइंग ग्लास पाने के लिए सोडा पॉप की एक बोतल ली और उसे तोड़ दिया। ऐसे ही कई अन्य उदाहरण देखने को मिलते हैं जिनमें मार्टिन ने अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए कई अपरम्परागत तरीके अपनाए। तारीफ इस बात कि कि इस तोड़-फोड़ के बावजूद भी मार्टिन के माता-पिता ने उन्हें रोका नहीं बल्कि अपनी जिज्ञासा खुद शान्त करने के लिए उन्हें स्वतंत्रता दी।
फिर इसके बाद,यानी 9 साल की उम्र में मार्टिन के दिमाग में उत्तर से दक्षिण की ओर दूर तक चलने वाली रेलों के यातायात को बेहतर बनाने का विचार आया। उन्होंने हाल ही में घर्षण के बारे में जानकारी हासिल की थी। वे जानते थे कि घर्षण की वजह से ट्रेन की गति में रुकावटें आती हैं, इसलिए घर्षण से छुटकारा पाना बहुत जरूरी है। उन्होंने सोचा कि क्यों न घर्षण को कम करने के लिए चुम्बक को आधार बनाया जाए। इस समय तक वे इतना तो जान चुके थे कि एक ही तरह के आवेश वाले दो चुम्बक जब नजदीक आते हैं तो वे एक दूसरे को दूर ढकेलते हैं। उन्होंने आगे चलकर यह भी जानकारी जुटाई कि हवा की वजह से भी घर्षण पैदा होता है। उन्हें इससे भी छुटकारा पाने का हल खोजना था। फिर उन्हें यह खयाल आया कि क्यों न रेल को एक एयर टाइट वैक्यूम टनल यानी बिना वायु दाब वाली सुरंगों से होकर चलाया जाए। बाप रे! 9 साल की छोटी-सी उम्र में मार्टिन की सोच की गहराई के बारे में जानकर हमें हैरानी होती है।
मार्टिन ने अपनी शिक्षा शिकागो के लॉसन एलीमेंटरी स्कूल से शुरू की। उन्हें पढ़ाई में काफी रुचि थी । इससे उनकी जिज्ञासा काफी हद तक शान्त हुआ करती थी। इसके बाद मार्टिन शिकागो के ही क्रेन टेक्निकल हाईस्कूल में दाखिल हुए। यहां वे दो ऐेसे व्यक्तियों से मिले जिनसे उन्हें काफी प्रेरणा मिली। उनमें से एक थे अध्यापक केनी, जो हर काम को पूरी लगन और पूर्णता से किया करते थे। उन्होंने मार्टिन को घर संवारने और लकड़ियों की दुकान चलाने आदि के बारे में बताया। वे मार्टिन से काफी काम लेते थे, हालांकि वे बाहर से कठोर दिखते थे पर अंदर से बहुत संवेदनशील थे। वे चाहते थे कि मार्टिन अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करे। मार्टिन ने बिना किसी शिकायत के हर काम पूर्णता के साथ किया। मार्टिन के जीवन को प्रभावित करने वाली दूसरी हस्ती थीं अध्यापिका कोरिजेन। वह उन्हें इंग्लिश पढ़ाती थीं। दूसरे क्योंकि मार्टिन की ज्ञान जुटाने में बेहद दिलचस्पी थी इसलिए किताबें उनका जुनून बन गई और इसमें कोरिजेन ने हमेशा मार्टिन की सहायता की। वे हमेशा मार्टिन को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करतीं और इसके लिए उनकी सराहना करती थीं।
आगे की पढ़ाई के लिए मार्टिन शिकागो गए। यहां इलिनॉइस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पढ़ाई करके उन्होंने भौतिक विज्ञानी बनने का फैसला किया, और काफी हद तक वे सफल भी हुए। लेकिन रसायनशास्त्र की जटिलताओं ने उनका विचार बदल दिया। जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि अगर भौतिक विज्ञानी बनना है तो रसायन शास्त्र का अध्ययन करना ही पड़ेगा। जब मार्टिन ने रसायनशास्त्र की कक्षा में अपना पहला प्रयोग किया, तब उन्होंने इसकी तुलना खाना पकाने से की। उनके शब्दों में : इससे मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं होता क्योंकि रसायन विज्ञान कुल मिलाकर बहुत सारे मिश्रण और उनके सही प्रयोग का नाम है। मेरा मतलब है कि अगर आप कभी रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला में गए होंगे तो आपने वहां की गंध को जरूर महसूस किया होगा। आप सड़े हुए अंडों और चमेली के इत्र को एक हौज में मिलाने की कल्पना कीजिए। रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला कुछ ऐसी ही बेतुकी चीजों की जगह होती है और शायद इसीलिए बचपन से ही मार्टिन इससे दूर रहे। हो सकता है कि प्रयोगशाला में बीकर, वीजल, बर्नर और स्टोव आदि उन्हें डराते रहे हों। इसलिए निश्चित तौर पर मार्टिन हमेशा प्रयोगशाला में कुछ-न-कुछ कबाड़ा ही करते थे। मार्टिन ने अपनी पसंद के बारे में एक बार फिर विचार किया। उन्होंने इसीलिए भौतिकविज्ञानी बनने के बजाए इंजीनियर बनने के बारे में सोचा। मार्टिन ने इसके लिए इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग से स्नातक करने का फैसला किया। यहां एक विषय के तौर पर उन्होंने गणित को भी चुना। इलिनॉइस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में अपनी पढ़ाई का खर्चा उठाने के लिए मार्टिन ‘रिवर्स ऑफिसर्स ट्रेनिंग कोर्स’ में भर्ती हुए। उन्होंने 1950 में अपनी डिग्री प्राप्त की और परास्नातक के लिए भी अपनी पढ़ाई उसी विश्वविद्यालय में जारी रखी।
1950 के दौरान कोरियन संघर्ष में अमेरिका सक्रिय भागीदारी कर रहा था। यह संघर्ष उत्तर कोरिया, जो कि कम्युनिज्म के प्रभाव में था, और दक्षिण कोरिया के बीच था, जो कि पूंजीवादी देशों के साथ था। कोरियाई युद्ध के दौरान मार्टिन अमेरिकी नौसेना में भर्ती हुए। यहां उन्होंने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। इस बेहतरीन प्रदर्शन के लिए उन्हें कोरिया के राष्ट्रपति सिनमैन री के हाथों पदक से सम्मानित भी किया गया।
इसके बाद मार्टिन न्यू लंदन स्थित सबमरीन स्कूल गए। यहां उन्होंने अपनी कक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया। इसके पुरस्कार के रूप में उन्हें यूएसएस टैंग एससी नाम की हवाई स्थित पनडुब्बी में तैनात किया गया। यह उस समय की सबसे आधुनिक पनडुब्बियों में से एक थी। इसी दौरान उन्हें स्कूबा डायविंग का शौक चढ़ा। लगता है कि एक युद्ध लड़ने के बाद भी उनके पास बहुत ऊर्जा बची थी। वे अपनी नौकरी तो अच्छी तरह कर ही रहे थे, साथ ही उनके दिमाग में अपने जीवन को थोड़ा व्यवस्थित करने का विचार भी पिछले कुछ अरसे से चल रहा था। इसी वजह से साढ़े तीन साल के बाद मार्टिन ने नौसेना से सबमरीन ऑफिसर की नौकरी छोड़ दी। क्या आपको नहीं लगता कि एक इंजीनियर के लिए यह एक बहुआयामी सफर रहा?

नौसेना छोड़ने के बाद मार्टिन ‘बेल सिस्टम’ में शामिल हुए। यह ‘अमेरिकन टेलीफोन एंड टेलीग्राफ’ (‘ए टी एंड टी’) का एक प्रभाग था। आज के विपरीत उन दिनों ‘ए टी एंड टी’ की प्रतिष्ठा अमेरिका के संचार के क्षेत्र में शिखर पर थी। इसी ‘ए टी एंड टी’ की बेल प्रयोगशाला में 1946 में सेल्युलर टेलीफोन सिद्धांत की कल्पना की गई और रेडियो संचार के क्षेत्र में इसने अपना एकाधिकार स्थापित किया। ‘ए टी एंड टी’ में उन दिनों कामकाज बहुत औपचारिक तरीकों से होते थे। इसके लिए एक लम्बी प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता था। बेल सिस्टम के तौर-तरीकों में मार्टिन काफी असहज महसूस कर रहे थे । उन्हें सुबह 9 बजे काम शुरू करना होता था जहां एक कमरे में उनके साथ लगभग एक सौ पचास इंजीनियर और भी होते थे। शाम को 5 बजे की घंटी बजने पर उनकी छुट्टी होती थी, तब वे सबके साथ बाहर निकलते थे। यह एकरसता मार्टिन को पसंद नहीं आई। यहीं काम करते हुए उन्होंने एक ऐसी घटना देखी जिसने उनके मन में कम्पनी के प्रति घृणा भर दी। एक बार ऑफिस में एक सुपरिंटेंडेंट आया, उसका ओहदा उस व्यक्ति से कम था जो उससे पहले ऑफिस में बैठा करता था। इसलिए कम्पनी प्रमुख ने ऑफिस से कालीन को हटवा दिया। मार्टिन को लगा कि कर्मचारियों के सामाजिक स्तर को इस तरह प्रदर्शित करना गलत और गैरजरूरी है।
इसके बाद मार्टिन ने बेल सिस्टम को छोड़ दिया और टेलीटाइप कार्पोरेशन में भर्ती हो गए। यह वेस्टर्न इलेक्ट्रिक की सहायक कम्पनी थी। तीन महीने तक टेलीटाइपराइटर मशीन पर काम करने के बाद मार्टिन ने टेलीटाइप मशीन ‘मॉडल 28’ को खोला और फिर से बंद कर दिया। मार्टिन ने देखा कि उन्होंने इस दौरान कुछ पार्टस नहीं लगाए, वे बाहर ही रह गए। इसके बावजूद मशीन सही तरीके से काम कर रही थी। परंतु इसके बाद भी उन्हें मशीनों में सुधार लाने और उन्हें बेहतर बनाने की अपनी क्षमता का एहसास नहीं हुआ।
टेलीटाइप कॉर्प.में काम करने के दौरान मार्टिन को ‘मोटोरोला’ की ओर से काम करने का प्रस्ताव मिला। उन्होंने 1954 में स्कमबर्ग, इलिनॉइस स्थित ‘मोटोरोला इन्क’ में नौकरी कर ली। उस समय मोटोरोला रेडियो सम्बन्धित उत्पादों के व्यापार में सक्रिय थी। यह ‘ए टी एंड टी’ के बेल सिस्टम के मुकाबले छोटी कम्पनी थी लेकिन यहां काम का माहौल पूरी तरह से अलग था। ‘ए टी एंड टी’ के बेहद औपचारिक और अनुशासित माहौल की तुलना में यहां का माहौल सुकून भरा और लचीला था। मार्टिन को यह काफी पसंद आया। काम के बाद उन्हें अक्सर यहां तकनीकी विचारों और सम्बन्धित मुद्दों को लेकर बहुत अच्छी तरह से चर्चा करते पाया जाता। और पता है? यहां काम करने के साथ-साथ मार्टिन ने लिखना-पढ़ना भी जारी रखा। उन्होंने अपनी परास्नातक की डिग्री पूरी करने के लिए रात में अध्ययन करना और कक्षाओं में जाना जारी रखा। फिर भी पढ़ाई की वजह से उनके काम में कभी ढिलाई नहीं आई। दो सालों के अंदर ही उन्हें ‘सिलेक्टिव सिग्नलिंग डिवाइस’ के लिए पेटेंट मिल गया और 1957 में उन्हें परास्नातक की उपाधि भी मिल गई। अगले ही साल मार्टिन को सबसे पहले ‘ऑटोमैटिक पुश बटन रेडियो टेलीफोन‘ के लिए भी पेटेंट मिल गया जिसका प्रयोग यूएसए के ग्रामीण क्षेत्रों में किया गया।
1960 में मार्टिन ने सीएमओएस शीट बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह पहले सूचना प्रौद्योगिकी तक ही सीमित था। इसमें उन्होंने अधिक व्यापक ‘इंटर-सिटी’ लिंक बनने की संभावना को देखा।
नोट : दरअसल कॉम्प्लीमेंटरी मेटल-ऑक्साइड-सेमीकंडक्टर(सीएमओएस) एक ऐसी तकनीक है जिससे इंटिग्रेटेड सर्किट बनाए जाते हैं। सीएमओएस टेक्नोलॉजी का प्रयोग माइक्रोप्रोसेसर्स, माइक्रोकंट्रोलर्स, स्टेटिक रैम और दूसरे डिजिटल लॉजिक सर्किट्स में किया जाता है। सीएमओएस का प्रयोग संचार के लिए इस्तेमाल में आने वाले अन्य दूसरे तरह के एनालॉग सर्किट्स जैसे- इमेज सेंसर (सीएमओएस सेंसर), डाटा कन्वर्टर्स और उच्च स्तर के इंटिग्रेटेड ट्रांसरिसीवर्स आदि में किया जाता है।
मार्टिन ने उन क्रिस्टलों के दोष को भी दूर किया जिन्हें ‘मोटोरोला’ ने रेडियो में प्रयोग करने के लिए बनाया था। इससे कम्पनी बड़े पैमाने पर पहली बार क्वार्ट्ज क्रिस्टल बनाने के लिए प्रेरित हुई। इसके साथ ही उन्हें ‘रेडियो कंट्रोल ट्रैफिक लाइट सिस्टम’ के लिए भी एक पेटेंट मिला।
1963 में, आईईईई वेहिक्युलर टेक्नोलॉजी सोसाइटी ने मार्टिन को अपना अध्यक्ष चुना और उन्हें सैंटेनियल मेडल से सम्मानित किया। जब मार्टिन के मालिक, जॉन एम मिशेल ने उनपर गौर किया तो उन्होंने महसूस किया कि मार्टिन बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति हैं। जॉन जल्दी ही यह भी समझ गए कि मार्टिन को किसी भी तरह की समस्याओं को हल करने में महारत हासिल है। उन्होंने मार्टिन को एक खास प्रभाग में काम करने को कहा। यह प्रभाग सबसे पहला हाथ में लिया जा सकने वाला पोर्टेबल पुलिस रेडियो बनाने के लिए काम कर रहा था। यह काम 1967 में शिकागो में शुरू किया गया। बाद में मार्टिन ने उच्च क्षमता के ‘पेजिंग मार्केट’ के बाजार को स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने ‘पेजब्वॉय टू’ को पेश किया जो अपनी तरह का पहला, उच्चक्षमता युक्त राष्ट्रव्यापी रेडियो था। वे उस समूह का भी हिस्सा थे जिन्होंने पूरे शहर में उच्च क्षमता युक्त पेजिंग के लिए मददगार नेटवर्क को बनाया। इसी समय उनकी मुलाकात लॉस एंजिल्स में होमर हैरिस से हुई। होमर का परिवार भी पेजिंग के व्यवसाय में था और अपने एक लाख पेजर टर्मिनल के लिए मोटोरोला का कस्टमर बन गया था । इन सब वजहों से जॉन का विश्वास मार्टिन पर बढ़ता गया। मार्टिन की पदोन्नति हो गई । उसे डिविजनल मैनेजर बना दिया गया।
‘ए टी एंड टी’में एक महत्वपूर्ण तकनीकी विचार सामने आया। यह विचार लोगों के बीच संवाद का तरीका ही बदलने वाला था। इस विचार के तहत फोन के सिग्नल्स एक ट्रांसमीटर से दूसरे ट्रांसमीटर के जरिए होते हुए एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र से होकर अलग-अलग संवादग्राही उपकरण की सीमा तक ले जाए जा सकते थे। दिसम्बर 1971 में ‘ए टी एंड टी’ ने एफसीसी (फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन) यानी संघीय संचार आयोग के सामने एक प्रस्ताव रखा जिससे मोटोरोला का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता था। एफसीसी एक सरकारी निकाय है जो रेडियो, टेलीविजन, तार और केबल के द्वारा होने वाले अंतर्राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय संचार को नियंत्रित करता है। ‘ए टी एंड टी’ ने प्रस्ताव रखा कि वह ‘एअर टू ग्राउण्ड सर्विस’ उपलब्ध कराएगा जो कि एक ‘पब्लिक स्विच टेलीफोन सर्विस’ होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो यह निजी ‘लैंड-मोबाइल’ होगा। इसके लिए उन्होंने 30 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम हासिल करने की बात कही। इससे ‘ए टी एंड टी’ के हर शहर में तीस चैनल होने थे और जिसका मतलब था एकाधिकार।
मार्टिन समझ गए कि यदि एफसीसी ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तो ‘ए टी एंड टी’ या तो उन पर नियंत्रण करेगा या फिर उन्हें इस व्यवसाय से बाहर कर देगा। मार्टिन को जो बात नागवार गुजर रही थी वह यह कि ‘ए टी एंड टी’ की सेल्युलर टेलीफोनी को लेकर दृष्टि ‘कार-फोन’ के रूप में थी। कार-फोन वे फोन थे जो कार के डैश बोर्ड से जुड़ने वाले थे। इस मॉडल को काफी ऊर्जा की आवश्यकता थी जो कि उसे कार की बैटरी से मिलती और इसीलिए इसे कार में फिट किए जाने की योजना थी। इसकी अनुमानित कीमत 3 से 5 हजार डॉलर थी।
मोटोरोला ने अपने लैंड मोबाइल व्यापार के अनुभव के जरिए यह समझ लिया था कि लोग वास्तव में हमेशा चलते-फिरते ही रहते हैं। मार्टिन को वह बात भी याद आई जो ‘टू वे कार रेडियो’ पर काम करने के दौरान एक बार शिकागो के सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस ने उनसे कही थी। वह वाक्य कुछ इस तरह से था, ‘असली समस्या यह है कि मेरे अधिकारियों को लगातार सम्पर्क में रहना होता है, और हमारे बात करने का जो साधन होता है वह कार में होता है और उन्हें जिन लोगों की रक्षा करनी होती है, वे सड़क पर होते हैं। यह कैसे संभव होगा कि मेरे अधिकारी एक ही साथ मेरे और बाकी लोगों के सम्पर्क में रहे?’ मार्टिन ने पाया कि यह बात हवाई अड्डे का प्रबंधन करने वाले, व्यवसायों और जमीन आदि के कारोबार से जुड़े व्यक्तियों के सम्बन्ध में भी सही है। इससे उन्हें यह समझ आया कि संचार का वास्तविक माध्यम ऐसा होना चाहिए कि उसे व्यक्ति अपने साथ ही रख सके। कोई भी व्यक्ति हमेशा घर या कार से ही चिपके रहना नहीं चाहता है बल्कि वह यहां-वहां जाना भी चाहता है।
मार्टिन ने अपना यह विचार ‘मोटोरोला’ के सामने रखा। उन्होंने कहा कि “लोगों की चाहत घर से, ऑफिस से या फिर कार से बात करने की नहीं है, असल में लोग दूसरे लोगों से बात करने की चाहत रखते हैं । अगर उनके पास विकल्प हो तो वे जहां भी हैं, वहीं से संवाद की स्वतंत्रता की मांग करेंगे। यानी लोग फोन के पीछे जुड़े लम्बे से तांबे के तारों से आजादी चाहते हैं।“ उनका मानना था कि सेल्युलर टेलीफोन कार-फोन से कहीं ज्यादा बेहतर उत्पाद हो सकते हैं। वास्तव में एकाधिकार के प्रति तीव्र विरोध ने उन्हें ए टी एंड टी को हराने हेतु कोशिशें करने के लिए प्रेरित किया।
ए टी एंड टी ने यह भी घोषित किया कि वह दुनिया की इकलौती ऐसी संस्था है जिसके पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त तकनीकी और आर्थिक क्षमता है। मार्टिन का भरोसा था कि उत्कृष्ट विकास के लिए प्रतियोगिता का होना जरूरी है। लेकिन ए टी एंड टी का वर्तमान प्रस्ताव नैतिक रूप से एक गलत नीति है और यह जनहित के विरुद्ध है। उन्होंने सुझाव दिया कि उनके पास मोटोरोला में ऐसी तकनीक पैदा करने की क्षमता है। लेकिन सिर्फ क्षमता होना भर पर्याप्त नहीं था। कर्मचारियों की संख्या और संसाधन के मामले में ए टी एंड टी मोटोरोला से काफी आगे थी। यहां तक कि अगर मोटोरोला भी वैसा ही उत्पाद पेश करता तो ए टी एंड टी भी प्रतियोगिता में आकर वैसा ही उत्पाद सस्ते दामों में बना सकती थी। इसलिए एक कदम आगे बढ़ाते हुए, मार्टिन ने दावा किया कि वे कुछ और बेहतर बना सकते हैं। कुछ ऐसा जो ए टी एंड टी के प्रस्ताव को बिना किसी परेशानी के पछाड़ सके। मार्टिन ने विचार किया कि वे एक बिना तार का हाथ में पकड़ा जा सकने वाला सेलफोन बना सकते हैं।
इसके लिए पहला कदम यह उठाना था कि एफसीसी को ए टी एंड टी के प्रस्ताव को पारित करने से रोका जाए। इसलिए मोटोरोला के कानूनी मामलों की टीम ने एफसीसी से पारित करवाने के लिए एक अन्य प्रस्ताव पर काम करना शुरू किया। इस प्रस्ताव में निजी कम्पनियों को रेडियो फ्रिक्वेंसी पर नेटवर्क कम्युनिकेशन को स्वयं संचालित करने के अधिकार देने की बात कही गई थी। यह मोबाइल फोन सेवा बाजार में उतरने और ए टी एंड टी के एकाधिकार को खत्म करने के लिए पहला आवश्यक कदम था। मोटोरोला के लिए सरकारी संस्था को यह भी दिखाना जरूरी था कि मोबाइल फोन व्यावहारिक दृष्टि से भी सम्भव है। जबकि ए टी एंड टी दावा कर रही थी कि कार-फोन ही संचार का भविष्य है।
आज ए टी एंड टी के उस दावे के बारे में सोचकर ही अजीब-सा लगता है। जरा सोचिए, कार-फोन ही अगर संचार का भविष्य समझा जाता तो उन लोगों का क्या होता जिनकी क्षमता कार खरीदने की नहीं होती।

नवम्बर 1972 में अपने मालिक को राजी करने के बाद, मार्टिन ने अपने विचार को आविष्कार में बदलना शुरू किया। उनके उत्साह ने उनके आसपास के लोगों को सम्मोहित कर दिया और सभी इस काम में उनके पीछे चल पड़े। उन्होंने कम्पनी में सारे इंजीनियरिंग के काम बंद कर दिए और सभी ने फोन और उसके बुनियादी ढांचे पर काम करना शुरू कर दिया। मोटोरोला पहले से ही इंटिग्रेटिंग पर काम कर रही थी और कई विभाग चीजों को पोर्टेबल बनाने के लिए काम कर रहे थे। मोटोरोला के पास सेमीकंडक्टर्स का अपना एक प्रभाग था। यह एक ऐसा पदार्थ था जो विद्युत को अनुकूल परिस्थितियों में प्रवाहित कर सकता था, जिससे इन्हें विद्युत-प्रवाह के नियंत्रण के लिए अच्छा माध्यम मिलता। मार्टिन की टीम ने इस काम में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कामयाबी के साथ 90 दिनों के भीतर ही नमूने के रूप में एक फोन बना डाला। बस इसमें सबसे बाहरी ढांचा भर नहीं था। इसके लिए मार्टिन ने मोटोरोला में एक प्रतियोगिता का आयोजन किया। यहां तक कि इसमें उन्होंने उन विभागों को भी शामिल किया जो उनके नियंत्रण में नहीं थे। यह प्रतियोगिता सेलफोन के बाहरी ढांचे या उसकी बॉडी को बनाने के लिए थी। उन्होंने पांच प्रतिभागियों को चुना और इसके लिए उन्हें दिसम्बर तक का समय दिया गया, यानी प्रतिभागियों को यह काम पूरा करने के लिए दो महीने का समय मिला। प्रतियोगिता के अंत में मार्टिन ने उस फोन को चुना जो बहुत आकर्षक तो नहीं था लेकिन प्रयोग करने में आसान था। उनका मानना था कि एक सरल तरीके से काम करने वाला उत्पाद ही प्रयोग में आसान होता है और इसी से वह लोकप्रियता पाता है। अपने आकार के चलते मोटोरोला के कर्मचारियों ने इसे नाम दिया ‘शू फोन‘ जिसे मोटोरोला में काम करने वाले इंजीनियर रूडी क्रोलोप ने डिजाइन किया था। शुरुआती डिजाइन का फोन तो सिर्फ दो इंच ही लम्बा था ।लेकिन जब इंजीनियर्स ने इसके सभी हिस्सों को जोड़ा तो इसका आकार तीन गुना बढ़ गया।
अपनी तरह के इस पहले फोन का नाम “मोटोरोला डायना टी ए सी” (डायनमिक एडेप्टिव टोटल एरिया कवरेज) रखा गया। इसका वजन 2.5 पाउण्ड और लम्बाई 9 इंच, मोटाई 5 इंच और चौड़ाई 1.75 इंच थी। यह भारी था और इसमें ‘रबर डक‘ एंटीना भी लगा हुआ था। एक बार चार्ज करने पर इसे 25 मिनट तक चलाया जा सकता था और इसे दोबारा चार्ज करने में 10 घंटे का समय लगता था । इस फोन से बस नम्बर डायल करके बात की जा सकती थी, और जिनसे बात की जाए उनकी आवाज सुनी जा सकती थी ।
एक इंटरव्यू में मार्टिन ने मजाक में कहा था कि ’इस फोन का वजन बहुत काम आया क्योंकि बैटरी सिर्फ 25 मिनट तक ही चलती थी और यह उतना ही समय था जितने समय तक कोई शक्तिशाली व्यक्ति इसे अपने कान के पास लगाकर रख सकता था।’
इस फोन के लिए मोटोरोला को जो कीमत चुकानी पड़ी वह भी अच्छी-खासी थी लेकिन फिर भी उनका पैसा बर्बाद नहीं गया। मार्टिन ने न्यूयॉर्क में एक बेस स्टेशन की स्थापना की। एफसीसी के लिए कुछ शुरुआती परीक्षण करने के बाद मार्टिन कूपर मोटोरोला फोन की तकनीक को जनता के सामने प्रदर्शित करने के लिए न्यूयॉर्क आए। वास्तव में यहां उन्होंने उन लोगों को फोन दिखाने के अलावा कुछ और नहीं किया, जो फोन देखना चाहते थे। शायद इसीलिए जिन लोगों ने फोन देखा, उन लोगों ने इस फोन के बारे में अनगिनत कहानियां बनाई और सुनाई होंगी। और शायद इसीलिए मार्टिन की ओर मीडिया ने अपनी खास दिलचस्पी दिखाई होगी।

इस नए आविष्कार को प्रदर्शित करने के लिए न्यूयार्क में एक पत्रकार-वार्ता का आयोजन किया गया। पत्रकार-वार्ता में जाते समय मार्टिन को एक विचार आया। वे चाहते थे उनके प्रतिद्वंद्वी और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा ए टी एंड टी की थोड़ी-सी चुटकी ली जाए। यह एकाधिकार के विरुद्ध एक बड़ी जीत थी। ए टी एंड टी दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनियों में से एक थी, और इस बात से उसे काफी जलन होने वाली थी कि मोटोरोला जैसी छोटी कम्पनी ने उसे पछाड़ दिया। 3 अप्रैल 1973 को मैनहट्टन हिल्टन के पास सड़क पर घूमते हुए 44 साल के मार्टिन के मन में एक विचार आया, उन्होंने अपना ‘डायना टैक’ फोन निकाला और बेल लैब्स का नम्बर डायल कर दिया। फोन काम करने लगा, यह बिना किसी तार के ही डायना टी ए सी सिस्टम से कनेक्ट हो गया जो मोटोरोला ने बर्लिंग्टन कंसोलिडेटेड नाम की एक इमारत में लगाया था। जैसे ही उन्होंने ढाई पाउण्ड के उस फोन को अपने कान पर रखा बेस स्टेशन ने उन्हें लैंड लाइन से जोड़ दिया। हालांकि वे कई बार परीक्षण करके देख चुके थे लेकिन फिर भी उनके मन में कुछ शंकाएं थीं, जब कोई काम पहली बार किया जा रहा हो तो कुछ भी बहुत यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता है। उनके आस-पास जो लोग थे उनमें से एक पत्रकार भी था, इसलिए मार्टिन को यह मौका दोबारा मिलने वाला भी नहीं था। तभी मार्टिन ने दूसरे छोर पर मौजूद फोन पर घंटी जाने की आवाज सुनी, यह फोन काम कर रहा था।
आगे क्या होगा यह सोचकर ही उनके दिल की धड़कनें बढ़ गईं। जैसे ही फोन गया, मार्टिन के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान फैल गई। फोन जोल एंगेल ने उठाया, उस समय वे बेल लैब्स में सेल्युलर प्रोग्राम के डिविजनल मैनेजर थे, यह ओहदा मार्टिन के ओहदे के बराबर ही था। और फोन उठा लिया गया।
‘हाय’- जोल ने कहा।
अपने खास लहजे में मार्टिन बोले, ‘हाय जोल, मैं मार्टिन कूपर बोल रहा हूँ।’
मार्टिन ने नोटिस किया कि उनके आस-पास के लोग उन्हें बड़ी हैरानी से देख रहे हैं। इससे मार्टिन की खुशी और बढ़ गई।
’मैं तुमसे एक सेलफोन के जरिए बात कर रहा हूँ, एक असली सेलफोन के जरिए।’ इतना कहकर वे रुक गए। वे प्रत्येक शब्द में जोल को चिढ़ाना चाहते थे। उन्होंने आगे कहा ‘एक पर्सनल (कुछ क्षण रुककर), हाथ में पकड़ा जा सकने वाला सेलफोन।’
दूसरे छोर की चुप्पी मार्टिन को बहुत आनंद दे रही थी। यहां तक कि उन्होंने इस बात की भी कल्पना कर ली कि कैसे जोल वहां गुस्से से अपने दांत पीस रहा होगा। मार्टिन के चेहरे पर एक मुस्कान फैल गई। जोल ने जवाब दिया और कुछ देर तक वे दोनों विनम्रता से बात करते रहे। जोल के बात करने के अंदाज से मार्टिन समझ गए कि यह सच जानकर जोल को बहुत गुस्सा आया है; उसे यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि मार्टिन ने उन्हें पछाड़ दिया। मार्टिन जब पत्रकार-वार्ता में गए तो उनकी आंखों में एक चमक थी। और मुझे पूरा यकीन है कि वे खुशी से अपना हाथ उठाकर चिल्लाए होंगे ’वू....हू.....।’ मोटोरोला के लिए जश्न का समय था।
मार्टिन अब पूरी तरह आश्वस्त थे। उनके आस-पास अब एक आभामंडल था जिससे सब प्रभावित थे। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आए पत्रकारों को अनुमति दे दी कि वे खुद भी इससे फोन मिलाकर देख सकते हैं। जिस पहले पत्रकार को यह फोन दिया गया उसने ऑस्ट्रेलिया में अपनी मां को फोन किया, उसे बहुत आश्चर्य हुआ जब उसे फोन पर अपनी मां की आवाज सुनाई पड़ी। उसे समझ नहीं आया कि कैसे एक छोटे-से फोन ने हजारों मील दूर उसकी मां से बात करवा दी। उसने कहा छोटा-सा फोन..... वैसे 9 इंच का यह फोन इतना छोटा भी नहीं था, लेकिन उस समय के लिए यही सच था।
बाद में जब सभी पत्रकार-फोन का परीक्षण कर चुके तब मार्टिन ने उन्हें कहा कि ’मोटोरोला डायना टी ए सी का काम फोन के तार से छुटकारा दिलाना है। आज सभी सूचनाएं तार के माध्यम से ही जाती हैं। कुछ इंटिग्रेटेड सर्किट्स, चिप्स और कुछ अन्य यंत्रों का प्रयोग करके हम वही काम कर रहे हैं जिसके लिए सामान्य फोन में हजारों पुर्जों को जोड़ना पड़ता है।’ मार्टिन ने यह भी कहा कि यह नेटवर्क 1976 तक उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध हो जाएगा। उन्होंने अनुमान लगाया कि इसका मासिक खर्च 60 से 100 डॉलर तक होगा।
तब सवाल यह उठाया गया कि क्या ‘सेलफोन’ के आने के बाद लैंडलाइन और कार-फोन खत्म हो जाएंगे? उन्होंने कहा ‘बिल्कुल नहीं, सेलफोन ऐसे समय में प्रयोग के लिए बनाए गए हैं कि जब कोई अपने घर या ऑफिस में न होकर रास्ते में हो, और जहां लैंडलाइन फोन उपलब्ध न हो।’ आज के संदर्भ में हम यह समझ सकते हैं कि मार्टिन का यह उत्तर थोड़ा गलत था।
4 अप्रैल,1973 में मोटोरोला ने बिना तार का फोन पेश किया, जिसे वायरलेस टेलीफोन कहा गया। न्यूयॉर्क टाइम्स में यह मुख्य समाचार बना। मार्टिन कूपर ’रेडियो टेलीफोन सिस्टम’ के आविष्कारक माने गए।
मार्टिन के ‘डायना टी ए सी’ के बारे में जुलाई 1973 के पॉप्युलर साइंस पत्रिका के कवर पर छापा गया। इस तकनीकी सफलता से मोटोरोला को बहुत फायदा हुआ, इसके बाद एफसीसी ने निजी कम्पनियों को रेडियो फ्रिक्वेंसी पर वायरलेस कम्युनिकेशन नेटवर्क को संचालित करने की अनुमति दे दी। इस तरह अमेरिका में पूंजीवाद के प्रसार में मार्टिन की भूमिका अहम रही, कम-से-कम संचार के क्षेत्र में तो ऐसा ही हुआ।
27 अक्टूबर 1973 को अमेरिकी पेटेंट ऑफिस में ‘डायना टी ए सी’ को पेटेंट के लिए दाखिल किया गया। जिसके लिए यूएस पेटेंट 3.906.166 प्रपत्र जारी किया गया जिसमें मार्टिन, उनके साथ मोटोरोला में काम करने वाले इंजीनियर्स और उनके मालिक जॉन एफ मिशेल का नाम लिखा गया।
इन सब उपलब्धियों से ज्यादा मार्टिन को इस बात की प्रसन्नता थी कि इस क्षेत्र को एकाधिकार के नियंत्रण से बाहर कर दिया गया।
काम पूरा नहीं हुआ था। लड़ाई अभी बाकी थी। मार्टिन और उनकी टीम ने तुरंत ही सेलफोन के व्यवसायीकरण के लिए काम करना शुरू कर दिया। शुरू में उनका विचार था कि इस फोन को सभी पुलिसकर्मियों और लोकसेवकों को ही दिया जाए। लेकिन जल्द ही उन्होंने इसे सबको देने के बारे में सोचा। हालांकि इस राह में उनके सामने अनगिनत रोड़े थे। इन सभी समस्याओं को हल करने के लिए मार्टिन और उनकी टीम ने दिन-रात काम करना शुरू किया। इनमें से एक समस्या यह थी कि जब मार्टिन और उनकी टीम ने नमूने के तौर पर वह फोन बनाया था तब उनके पास तीस चैनल्स थे। इस फोन में उन्होंने 12 चैनल्स का प्रयोग किया था, जबकि बाकी के चैनल्स को उन्होंने अलग-अलग क्रिस्टल्स से बंद कर दिया। बाद में उन्हें पता चला कि अब चैनलों की संख्या बढ़ाकर 611 कर दी गई है। यह एक ऐसी समस्या थी जिसे जल्दी-से-जल्दी हल किया जाना जरूरी था। मार्टिन जानते थे कि फोन में इतने सारे क्रिस्टल्स लगाना असंभव है। इसके लिए उन्होंने एक अन्य विभाग को एक खास चीज बनाने के लिए कहा। इसे सिंथेसाइजर कहा जाता था। उन्हें सेमीकंडक्टर विभाग के साथ भी गहन रूप से काम करना था ताकि उनकी क्षमता को बढ़ाया जा सके और बाजार में उतारने से पहले फोन का वजन कम किया जा सके। वे लगातार सभी विभागों पर इस बात के लिए जोर बनाते रहे कि चिप को पतला बनाया जाए। यह उनके लिए बड़ी चुनौती थी क्योंकि उनके पास कुछ ही एप्लीकेशन्स थे और उन्हें सीएमओएस जैसे बुनियादी एप्लीकेशन का प्रयोग करना था। यहां तक कि उस समय पर्सनल कम्प्यूटर्स भी नहीं थे। बहुत कड़ी मेहनत और माथापच्ची के बाद सेमीकंडक्टर टीम एक प्राथमिक प्रोसेसर बनाने में कामयाब हुई। इससे वे जिन समस्याओं का सामना कर रहे थे उनमें से एक तो समाप्त हो गई।
1977 में मोटोरोला ने मार्टिन को उनके प्रयासों के लिए पुरस्कृत किया और उन्हें उपाध्यक्ष बना दिया। अधिकार के साथ बड़ी जिम्मेदारियां भी आती हैं। जनवरी 1979 में मार्टिन से शनिवार को एक बैठक में शामिल होने के लिए कहा गया पर मार्टिन का वहां जाने का मन नहीं था। उन्हें कार्मल के क्वेल लॉज में कुछ लोगों से मिलना था। उन्होंने सोचा यह तो बड़ी मुसीबत है। इसलिए मार्टिन ने अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुए अपने व्यक्तिगत कार्पोरेट जेट से मोनोटेरी रवाना हो गए। यहां वे अपनी कम्पनी के प्रतिनिधि से मिले। यहां से वे एक बार में अनौपचारिक मीटिंग के लिए पहुंचे। यहां उनकी मुलाकात होमर हैरिस, उनकी पत्नी डेलोरिस हैरिस और उनकी बेटी अर्लेन से हुई। बातचीत के दौरान उन्हें पता चला कि अर्लेन ने 12 साल की उम्र में काम करना शुरू कर दिया था और इसी समय उन्होंने भी काम करना शुरू किया था। अर्लेन अपने पारिवारिक व्यवसाय, इंडस्ट्रियल कम्युनिकेशन सिस्टम इंक के लिए टेलीफोन स्विचबोर्ड ऑपरेटर का काम करती थी।
मार्टिन और अर्लेन को लगा कि उन दोनों की रुचियां एक जैसी हैं और फिर इसके बाद वे सम्पर्क में रहने लगे। अपनी उम्र के अंतर के बावजूद उन्हें एक-दूसरे का साथ भाने लगा। मार्टिन की कोशिश रहती कि वे अर्लेन को प्रभावित करें जबकि अर्लेन उन्हें प्रभावित करने की कोशिश करती रहती। दोनों को इस बात का अंदाजा ही नहीं हुआ कि वे एक-दूसरे के प्यार में डूब चुके हैं। वे इसके बाद लगातार मिलते रहे और एक-दूसरे के बहुत करीब आ गए। उस समय तक मार्टिन कम्पनी में अनुसंधान और विकास निदेशक बन चुके थे।
इन सालों में मार्टिन ने देखा कि कुछ व्यक्ति सेलफोन की परियोजना की सफलता को लेकर सवाल खड़े करने लगे हैं। उन्होंने इन बातों को अनदेखा किया और अपने लक्ष्य पर नजरें जमाए रहे। मार्टिन की टीम ने सफलतापूर्वक यह काम कर दिखाया। फोन को आधिकारिक रूप से पेश करने से पहले उस पर चार बार काम किया गया। हर बार यह मॉडल पहले से छोटा और बेहतर होता गया। जब सेलफोन का उत्पादन शुरू किया गया तब मार्टिन को अस्वीकार करने वाले व्यक्तियों के चेहरे पर निराशा और शर्म के भाव दिखे। उनकी टीम की कड़ी मेहनत और अपने उद्देश्य के प्रति लगन फलदायी रही।
इसके विकास पर लगभग दस करोड़ डॉलर खर्च करने के बाद मोटोरोला डायना टैक फोन को यूएस एफसीसी से 21 सितम्बर 1983 को स्वीकार्यता मिली। संभावित खुदरा विक्रेताओं को यह दिखाने के लिए कि यह फोन कैसे काम करता है, मोटोरोला ने फोन के साथ एक टीम भी भेजी। इस टीम में खुद मार्टिन और एक इंजीनियर था। मार्टिन को फोन का प्रदर्शन करना था और इंजीनियर को इसके रखरखाव के बारे में आवश्यक निर्देश देने थे। क्योंकि फोन में एक हजार से ज्यादा पुर्जे थे। प्रदर्शन की यात्रा के दौरान मार्टिन ने महसूस किया कि इसके लिए सही बिलिंग सिस्टम की भी जरूरत है। यह बात ध्यान में रखते हुए मार्टिन ने मोटोरोला को छोड़कर अपनी खुद की कम्पनी शुरू कर दी। उन्होंने अर्लेन के साथ मिलकर सेल्युलर ऑपरेटर्स को बिलिंग सिस्टम उपलब्ध कराने के लिए एक कम्पनी बनाई। दक्षिणी कैलिफोर्निया स्थित इस कम्पनी का नाम रखा गया सेल्युलर बिजनेस सिस्टम।
1984 में मोटोरोला ने अपना पहला कमर्शियल फोन ‘डायना टैक 8000 एक्स’ बनाया जो सभी के लिए उपलब्ध था। इससे 30 मिनट तक बात की जा सकती थी और इसका स्टैंडबाइ समय 8 घंटे था। इसमें नम्बर डायल करने या रिडायल करने के लिए एक एलईडी डिस्प्ले भी लगाया गया, इसमें तीस फोन नम्बरों को स्टोर किया जा सकता था। इस फोन की कीमत थी 3,995 डॉलर। यानी आज के समय में 9000 डॉलर से भी ज्यादा। इसका मासिक खर्च था 50 डॉलर, और पीक ऑवर में कॉल दर थी .40 डॉलर प्रतिमिनट जबकि नॉन पीक ऑवर में .24 डॉलर प्रति मिनट। मोटोरोला ने यह भी कहा था कि जैसे-जैसे बाजार में इनकी मांग बढ़ेगी, कीमतें भी कम होती जाएंगी।
हालांकि संचार के क्षेत्र में यह एक बड़ी सफलता थी लेकिन फिर भी लोगों में इसको लेकर बहुत ज्यादा रुझान नहीं था,क्योंकि उस समय बहुत ज्यादा लोग इसे खरीदने में सक्षम नहीं थे। सेलफोन उस समय बहुत ही दुर्लभ था। सिर्फ अमीर लोग ही इसे खरीद पाते थे। लेकिन मार्टिन और उनकी टीम के कुछ सदस्य जानते थे कि यह स्थिति जल्द ही बदल जाएगी। लोगों को समझाने की उनकी क्षमता ने उन्हें इस बात का भरोसा दिलाया। इसे प्रयोग करने वाले लोग इससे बहुत प्रभावित हुए उन्हें हर जगह अपने साथ रखे जा सकने वाले फोन के विचार ने काफी प्रभावित किया। यह बात बाकी लोगों तक भी पहुंची और लोगों ने सेलफोन खरीदना शुरू कर दिया। यह मांग इतनी ज्यादा बढ़ी कि एक समय डायना टैक 8000 एक्स को खरीदने के लिए हजारों लोग प्रतीक्षा सूची में थे। मार्टिन इस बार भी सही साबित हुए। इस फोन को प्रयोग करना बहुत आसान था इसलिए लोगों ने बहुत जल्दी अपनाया। रूडी क्रोलोप की डिजाइन 15 साल तक बाजार में बिकती रही।

अपने इस नए आविष्कार की वजह से मार्टिन की नई कम्पनी सीबीएसआई ने बहुत अच्छी तरह से काम किया। इस व्यवसाय ने उनके अंदर की संभावित उद्यमशीलता को जगा दिया। 1986 में नए तैयार हुए सेल्युलर फोन व्यवसाय में 70 प्रतिशत शेयर प्राप्त करने के बाद उन्होंने सिनसिनाटी बेल को अपनी कम्पनी 23 मिलियन डॉलर में बेच दी। अब तक मार्टिन के पास भव्य तरीके से जीवन-यापन करने के लिए पर्याप्त धन था। लेकिन इसके बाद भी वे अपने काम को लेकर संतुष्ट नहीं थे। मार्टिन और अर्लेन ने एक दूसरी कम्पनी शुरू की जिसका नाम रखा गया ‘‘डायना एल एल सी’’।
यह कम्पनी मार्टिन और अर्लेन के वायरलेस तकनीक से जुड़े काम को गति देने के लिए बनाई गई थी। इस कम्पनी ने व्यवसाय से व्यवसाय और व्यवसाय से उपभोक्ता उत्पाद और सेवाओं को उपलब्ध कराया। उन्होंने इस कम्पनी को एक प्लेटफॉर्म के रूप में प्रयोग किया और ‘सबस्क्राइबर कम्प्यूटिंग इंक, सेल्युलर पे फोन इंक और एसओएस वायरलेस जैसी कम्पनियां भी शुरू कीं। डायना कंपनी ने नए विचारों को जन्म देने और उनको विकसित करने में महत्वपूर्ण मंच की भूमिका निभाई।
व्यावसायिक सहयोगी के रूप में पिछले ग्यारह साल के दौरान मार्टिन और अर्लेन अविश्वसनीय रूप से एक-दूसरे के नजदीक आ गए थे। उन्होंने आखिरकार इस रिश्ते को एक नाम देने के बारे में सोचा और 1991 में शादी कर ली। मार्टिन की हंसमुख प्रवृत्ति ने उन दोनों की उम्र के दो दशकों का अंतर कम कर दिया। दोनों की जोड़ी बहुत जमती थी। उन्हें देखकर शायद ही कोई कह सकता था कि मार्टिन अर्लेन से 20 साल बड़े हैं।
कुछ सालों बाद मार्टिन को रिचर्ड की ओर से एक फोन आया। रिचर्ड स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक शोधकर्ता थे। उनके पास ‘स्मार्ट एंटीना’ का प्रयोग करके मोबाइल टेलिकॉम को और ज्यादा प्रभावी बनाने की युक्ति थी। स्मार्ट एंटीना एक डिजिटल वायरलेस कम्युनिकेशन सिस्टम था जो ट्रांसमीटर, रिसीवर या फिर दोनों के स्तर पर कुछ लाभदायक हो सकता था। यानी सरल शब्दों में कहें तो यह ट्रांसमिशन को सभी दिशाओं में भेजने के बजाए केवल उसी दिशा में भेज सकता था जहां रिसीवर मौजूद हो। रिचर्ड रॉय ने मार्टिन से सम्पर्क किया और मदद के लिए कहा। मार्टिन महीने में एक या दो दिन का समय देने के लिए तैयार हो गए। कुछ ही महीनों में मार्टिन को एहसास हो गया कि यह तकनीक भविष्य के कम्यूनिकेशन के लिए काफी महत्वपूर्ण है। उन्होंने इसे एक ऐसे माध्यम के रूप में देखा जिसे कुशलता बढ़ाने और स्पेक्ट्रम के उपयोग को बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता था। मार्टिन ने इस संभावना के बारे में और अधिक गंभीरता से विचार करना शुरू किया। वे पूरे समय इसके बारे में सोचते रहते। 1992 में अर्लेन और रिचर्ड रॉय के साथ मार्टिन ने ‘एरीकॉम’ का गठन किया।
नोट : एरीकॉम, योमी एलएलसी की सहायक कंपनी है। 1968 से योमी कंपनीज ने संचार तकनीक के क्षेत्र में कई नए-नए आविष्कार किए हैं जिससे कई नए क्षेत्र खुले, जैसे कि व्यावसायिक आधुनिक एमएएस बेडबैंड तकनीक जिससे स्पेक्ट्रम की दक्षता को अधिकतम किया जा सका और यह अभी भी सक्रिय है।
मार्टिन के नेतृत्व में कम्पनी ने सेन जोस, कैलिफोर्निया में सेल्युलर संचार को अधिक दक्ष बनाने की दिशा में विशेषज्ञता के लिए काम किया। उनका मुख्य कार्यालय बफैलोग्रोव, इलिनॉइस में था। एरीकॉम की टीम में अमेरिका, चीन, इस्रायल और जापान में स्थित 40 इंजीनियर थे।
1995 में मार्टिन को उनके कम्यूनिकेशन के क्षेत्र में टेक्नॉलॉजी से जुड़े इनोवेशन्स के लिए ‘वार्टन इनफोसिस बिजनेस ट्रांसफॉर्मेशन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। साथ ही उन्हें रेडियो क्लब ऑफ अमेरिका की ओर से ‘फ्रेड लिंक अवार्ड’ से भी सम्मानित किया गया।
कम्पनी का नेतृत्व करते हुए मार्टिन ने एक बात महसूस की। 1997 में उन्होंने अपने इस अनुभव को ‘मार्टिन्स लॉ’ यानी मार्टिन का सिद्धांत नाम दिया। इस सिद्धांत में उन्होंने कहा कि रेडियो स्पेक्ट्रम से प्रसारित की जाने वाली सूचनाओं की मात्रा प्रत्येक 30 महीने में दोगुनी हो जाती है। मार्टिन ने यह भी कहा कि ऐसा 1897 से देखने को मिल रहा है जब मार्कोनी ने वायरलेस टेलीग्राफ का पेटेंट कराया था, और यह भविष्य में भी निरंतर चलता रहेगा।
2004 में मार्टिन को वायरलेस कम्यूनिकेशन के क्षेत्र में काम करने के लिए डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की गई। यह उपाधि उसी संस्थान ने दी जहां से उन्होंने स्नातक की उपाधि ली थी। उनकी उपलब्धियां ही वह ताकत थी जिसने उन्हें लगातार काम करने के लिए प्रेरित किया।
बाद के वर्षों में, मार्टिन को कई और पुरस्कार प्राप्त हुए। वे उन्हें वायरलेस तकनीक में पिछली और हाल ही में पाई गई उपलब्धियों के लिए दिए गए थे। कई लोग मार्टिन को ‘सेलफोन का जनक’ कह कर भी पुकारते हैं, हालांकि यह उपाधि मार्टिन को खासपसंद नहीं। मार्टिन कहते हैं ‘यह उपाधि मुझे अजीब लगती है।’ तकनीक के क्षेत्र में प्रशंसकों की संख्या बहुत बड़ी है। विद्यार्थी, प्रोफेसर्स और यहां तक कि कई व्यवसायी भी उनकी तरह बनना चाहते हैं। इतनी पहचान और प्रशंसा प्राप्त करने के बाद किसी को घमंड आना या उसके अंदर अहंकार बढ़ना स्वाभाविक है। आमतौर पर देखा जाता है कि सफलता विनम्र लोगों को भी अक्खड़ बना देती है। लेकिन मार्टिन के मामले में ऐसा नहीं कहा जा सकता। सफलता के शिखर पर पहुंचने और दुनिया को इतना कुछ देने के बाद भी मार्टिन जमीन से जुड़े रहे। आर्थिक उपलब्धियां और प्रसिद्धि की चाह उनके विचारों पर कभी हावी नहीं हो सकी। शायद यही कारण है कि दुनिया को उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता और उन्हें भी इससे कोई खास शिकायत नहीं है। उनका सपना दुनिया में सभी लोगों के जीवन-स्तर को बेहतर बनाना है। मार्टिन ने अपना पूरा समय इसी लक्ष्य को पाने में लगाया। उनका विश्वास है कि वायरलेस तकनीक अभी प्रारम्भिक अवस्था में है और इसकी सम्भावनाओं को अभी तक आंका नहीं जा सका है। वे मानते हैं कि आने वाली पीढि़यों के पास आज के सेलफोन के अलावा और भी बहुत कुछ होगा।
खाली समय में मार्टिन विद्यार्थियों के प्रश्नों के उत्तर देते हैं और उन्हें इनोवेशन्स के लिए प्रेरित करते हैं। वे कहते हैं कि ‘‘अगर शिक्षा को मनोरंजक बना दिया जाए तो बच्चों को बहुत शानदार ढंग से विकसित किया जा सकता है। इस बात से मैं सहमत हूँ।’’
विज्ञान और तकनीक की एक पत्रिका में उन्होंने खेल और पढ़ाई की तुलना करते हुए कहा कि ’अगर आपको कोई खेल पसंद नहीं है तो आप उसे छोड़कर कुछ और काम करेंगे। और अगर आपको यह खेल आनंददायक लग रहा है तो फिर वक्त भी आपको रोक नहीं सकता है।’
मार्टिन कहते हैं ‘‘सार्थक तकनीक सहज, पारदर्शी और अदृश्य है। आजकल कम्पनियां क्या कर रही हैं? वे सभी को इंजीनियर बना रही हैं। आजकल के फोन के साथ जो निर्देश पुस्तिका दी जाती है वह फोन से भारी होती है। इसका कोई मतलब समझ में नहीं आता।’’
2006 में मार्टिन ने अर्लेन की ग्रेटकॉल के प्रसिद्ध जिटरबर्ग की स्थापना करने में मदद की। यह आधुनिक समय का सबसे सरल फोन था। इसे प्रयोग करने वालों को ऑपरेटर के डोमेन से फोन करने का अनुभव देने के लिए बनाया गया था। फोन कुछ सामान्य प्रश्न पूछता था जिसके उत्तर हां या ना में देने होते थे। फोन करने के लिए व्यक्ति हॉटलाइन से हमेशा जुड़ा रहता था। जहां ऑपरेटर हमेशा उपलब्ध रहता था। ऐसे में व्यक्ति को बस अपनी पसंद के लोगों के नंबर्स को सहेज कर रखना होता था बाकी सारे काम ऑपरेटर खुद कर देता था। यहां तक कि ऑपरेटर आपके फोन नंबर्स को सहेजने और उन्हें बदलने आदि का काम भी कर सकता था।
मार्टिन ने विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और वेबसाइट्स आदि के लिए कई साक्षात्कार दिए। उनमें से एक में मार्टिन ने कहा ‘ लोग मुझसे पूछते रहते हैं कि कौन-सा फोन खरीदा जाए? अब आप चीजों को सैद्धांतिक रूप से नहीं समझ सकते हैं आपको एक उत्पाद, इसकी प्रणाली और कैसे प्रयोग किया जाए यह समझने के लिए खुद उसमें डूबना होता है। और इसीलिए मैं हर महीने नया फोन लेता हूँ।’
85 साल की उम्र में लोगों को बिस्तर से उठना ही मुश्किल लगता है, उन्हें बिना चश्मे के दिखाई नहीं देता और बिना छड़ी के वे चल नहीं सकते। मार्टिन के साथ भी ऐसा ही होता है लेकिन अंतर यह है कि वे छड़ी का इस्तेमाल बर्फीले पहाड़ों में स्कींइग के लिए करते हैं और चश्मा स्वीमिंग के दौरान लगाते हैं ताकि उनके आंखों में पानी न जाए। मार्टिन अभी भी पूरी तरह स्वस्थ हैं और अपनी पत्नी के साथ कयाकिंग और लॉन टेनिस जैसे खेल खेलते हैं। अर्लेन स्वीकार करती हैं कि, कभी-कभी तो उनके साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना मुश्किल होता है, उनमें बहुत ऊर्जा है। ऐसा अर्लिन तब कह रही हैं जबकि वो उनसे 20 साल से भी ज्यादा छोटी हैं। इस हस्ती ने ऐसा रोमांचक और सक्रिय जीवन जिया है; यह जानकर बहुत आश्चर्य होता है। वाकई मार्टिन के वे राज जानना आवश्यक है जिससे वे इतने स्वस्थ और सक्रिय रह पाते हैं। मार्टिन इस बात पर भी जोर देते हैं कि हमें नए तकनीकी आविष्कार करना चाहिए न कि जो है, उन्हें ही बेहतर बनाते रहें। वे मानते हैं कि वायरलेस तकनीक न सिर्फ जान बचा सकती है बल्कि उसे बेहतर बनाने में भी मदद कर सकती है।
वे स्वप्न देखते हैं कि ‘स्वास्थ्य उद्योग में क्रांतिकारी बदलाव आने वाले हैं। हमारे शरीर में कई तरह के सेंसर्स लगे होंगे जो शरीर के बदलावों को माप रहे होंगे। इसके साथ ही हम हर वक्त डॉक्टर या कम्प्यूटर की निगरानी में होंगे।’
लेकिन इसकी क्या जरूरत है डॉ. मार्टिन? हर साल मेडिकल जांच तो अभी भी कराई जा सकती है।
‘सालाना मेडिकल जांच किसी काम का नहीं है।’
क्या ! वे क्या कहना चाहते हैं? यह किसी काम का क्यों नहीं है?
‘क्योंकि किसी एक समय में शरीर के परीक्षण करने से डॉक्टर को बहुत कुछ पता नहीं चलता है, लेकिन यदि परीक्षण सतत रूप से चलता रहे तो आप हृदयाघात और मधुमेह आदि की संभावनाओं का पूर्वानुमान लगा सकते हैं और इन सभी बीमारियों को समय रहते रोक सकते हैं।’ हम्म्म्म्.... उनके विचार में दम है। कुछ कम्पनियां वायरलेस हैल्थ मॉनिटरिंग डिवाइस बनाने की कोशिश भी कर रही हैं।
स्वास्थ्य से लेकर बाजार की प्रतियोगिता तक मार्टिन के अपने विचार और स्वप्न हैं, जिनका सम्बन्ध मोबिलिटी प्रोडक्ट्स से हो सकता है। एक पुस्तक ‘एवरीवन इज रॉन्ग’ भी प्रकाशित की गई है जिसमें मार्टिन ने आम-तौर पर पूछे जाने वाले सवालों के जवाब दिए हैं। इस पुस्तक में मार्टिन ने अपने दृष्टिकोण को साझा किया है और बताया है कि वे दुनिया में संचार क्षेत्र को किस तरह विकसित होते देखना चाहते हैं। वे विश्वास करते हैं कि ऐसा भी दिन आएगा जब मोबाइल फोन व्यक्ति के कान के पीछे त्वचा के अंदर लगाए जाएंगे। लोगों से उनके अत्याधुनिक कम्प्यूटर्स जुड़े होंगे जो उनके सिर्फ बोलने से उनके आदेश मानेंगे। यह मार्टिन को मोटोरोला में बिताए दिनों की याद दिलाता है ‘ हम मजाक किया करते थे कि आपको जन्म के समय एक फोन दिया जाएगा और आप जब तक जीवित रहेंगे तब तक इसके साथ रहेंगे।’
फिलहाल मार्टिन सामाजिक रूप से सक्रिय हैं और वे एफसीसी के तकनीकी सलाहकार समूह में अपनी सेवा दे रहे हैं। मानव-जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में वे अभी भी निरंतर प्रयासरत हैं। मुझे लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ किया भी है। अगर वे न होते तो हम अब भी अपनी कारों में ही बैठकर फोन लगा रहे होते। हमारे पास न तो ह्वाट्सऐप होता और न ही बीबीएम।
मार्टिन कूपर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहते हैं :“जब मैं युवा था, तब सपने देखने का विचार बहुत ही नकारात्मक माना जाता था। अगर आप सपने देखते थे तो आप नकारा थे। आपने समाज में कोई योगदान नहीं दिया। लेकिन ‘स्टार ट्रेक’ ने सपने देखने को स्वीकार्यता दिलाई। मेरे विचार से यह बहुत बड़ा योगदान था।
–मार्टिन कूपर
मार्टिन कूपरकी बायोग्राफीज | 0 टिप्पणी >>
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