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प्रख्यात अमेरिकी कवि,निबंधकार और व्याख्याता राल्फ वाल्डो एमर्सन ने कहा था कि “जीवन दर्शन प्लेटो है और प्लेटो ही जीवन दर्शन है” प्लेटो सुकरात और अरस्तु की त्रिमूर्ति के अभिन्न अंग थे, जिन्होंने पाश्चात्य दर्शनशास्त्र को एक नया रूप प्रदान किया।प्लेटो ने अपने प्रसिद्ध उपदेशों द्वारा परम प्रिय गुरु सुकरात की शिक्षाओं को लगभग अपने खुद के प्रयासों से परिभाषित और प्रचारित किया ।

प्लेटो के ज्ञान की विशालता दर्शनशास्त्र से राजनीति,काव्यात्मकता से धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र से लेकर शिक्षाशास्त्र तक को समाहित कर लेती है । निश्चित ही पाश्चात्य देश हमेशा से महान दार्शनिकों से आबाद थे जैसे-महान यूनानी गणितज्ञ पैथागोरस और जानेमाने प्राचीन यूनानी दार्शनिक हेराक्लिटस । त्रिमूर्ति के उत्थान के पहले के दार्शनिक प्राकृतिक संसार की भौतिक अभिव्यक्ति जैसे सितारों,निवासस्थान,सुन्दर परिदृश्यों और वनस्पतियों इत्यादि में तल्लीन रहते थे । सुकरात और उनके जीवनीकार छात्र प्लेटो के उत्थान के साथ मनुष्य का मस्तिष्क और आत्मा ही चिंतन का विषय बन गए । प्लेटो द्वारा सुकरात का कथन “खुद को पहचानो” तब तक प्रचारित की गई जब तक कि यह पश्चिमी विचारधारा की पहचान नहीं बन गई । सुकरात के विचारों और सिद्धांतों को प्रचलित करने का सबसे अधिक श्रेय प्लेटो को जाता है, जिन्होंने अपने चिंतन और अध्ययन से अपने परम गुरु सुकरात की शिक्षाओं को ना सिर्फ सरल अर्थों में समझाने का प्रयास किया अपितु उनके मतों को नए आयाम भी दिए ।

महानतम दार्शनिकों में से एक प्लेटो का जन्म 427 ईसा पूर्व एथेंस के एक समृद्ध घराने में हुआ था । इनके पिता एरिस्टन एथेंस के राजा कोड्रस और मेस्सेनिया के राजा मेलॉन्थुस की शाही वंशावली से सम्बन्ध रखते थे । प्लेटो का नामकरण उनके दादा अरिस्टोक्लेस के नाम से हुआ था । लेकिन इनकी मजबूत शारीरिक बनावट और चौड़े कन्धों के कारण इनका नाम प्लेटो पड़ा । प्लेटो की मां पेरिक्शन चार्माइड्स की बहन और क्रिटीयस की भतीजी थी, दोनों उन “थर्टी टायरांट्स ” के प्रमुख सदस्य थे जिन्होंने वहां की पुरानी लोकतान्त्रिक सरकार को हटा कर एथेंस के शहर और राज्यों पर हुकूमत की थी ।
प्लेटो ऐसे युद्ध के दौरान पैदा हुए जो तत्कालीन यूनानी राजनीति या नगर-राज्य का एक सामान्य क्रियाकलाप था । धार्मिक और सांस्कृतिक विचारों का आदान-प्रदान होने के बावजूद प्राचीन यूनानवासी प्रायः एक दूसरे से लड़ते रहते थे । इसलिए इस बात में कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि वो हमेशा शांति के आदर्शलोक की खोज में भी रहते थे । प्लेटो एथेंसवासियों के मस्तिष्क में हमेशा कुछ विशिष्ट गुण पिरोने की कोशिश करते रहते थे ताकि वहां पर शांति और तरक्की का मार्ग प्रशस्त हो सके । उनका सुखद बचपन निरंतर हो रहे युद्धों से उत्पन्न अशांति के कारण अन्धकार में था । मुख्यतः ‘पेलोपोलेसियन युद्ध’ के कारण जो कि 431 ईसा पूर्व से लेकर 404 ईसा पूर्व तक एथेंस और स्पार्टा के बीच हुआ था । जल्दी ही यह युद्ध अन्य नगर-राज्यों तक पहुंच गया और उन राज्यों को अपना पक्ष प्रदर्शित करने के लिए विवश करने लगा । एथेंस के बच्चों के लिए युद्ध के वातावरण में बड़ा होना एक परिपाटी बन चुकी थी लेकिन प्लेटो जैसे संवेदनशील आत्मा के लोग ऐसी स्थितियों से सीधे-सीधे मुंह नहीं मोड़ सकते थे ।
यद्यपि राज्य सम्बंधित मामलों के प्रति इनकी विरक्ति का कोई लिखित प्रमाण मौजूद नहीं है परन्तु यह स्पष्टता से इनके कार्यों में देखी जा सकती है । विपरीत परिस्थितियों ने बच्चों के लिए भी कठोर शारीरिक शिक्षा से गुजरना अनिवार्य बना दिया था । प्लेटो को भी इस कठोर शारीरिक शिक्षा से गुजरना पड़ा था । जिस तरह गणित, संगीत और दर्शनशास्त्र की शिक्षा अनिवार्य थी उसी प्रकार कठोर शारीरिक शिक्षा भी अनिवार्य थी । प्लेटो ने युवावस्था में ही व्यायामशाला में भाग ले लिया था, जहां उनको दौड़कर,कूदकर,गेंद खेलकर,मुक्केबाजी,कुश्ती और भाला तथा लोहे के भारी चक्र फेंक कर अपने आतंरिक बल को बढ़ाना होता था । कहा जाता है कि प्लेटो ने प्रतिष्ठित ” इस्थ्मेन” खेलों में कुश्ती लड़ी थी और अच्छा प्रदर्शन भी किया था । यहां तक माना जाता है कि प्लेटो सार्वजानिक प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए पाइथन खेलों में भी गए ,उन्हें पेलोपोलेसियन युद्ध में भाग लेने के लिए भी जाना जाता है जो कि 404 ईसा पूर्व में हुआ था ।
अतः यह निष्कर्ष निकला जा सकता है कि प्लेटो सांसारिक ही थे ना कि पारलौकिक ; जैसा कि उनके आलोचक उन्हें चित्रित करने का अक्सर प्रयास करते हैं ।

प्लेटो चार सगे भाई-बहन थे। दो भाई एडीमेंटस और ग्लॉकन और एक बहन पोटोन । ऐसा माना जाता है कि प्लेटो बहुत छोटी उम्र के थे जब उनके पिता का देहांत हो गया था । बाद उनकी मां ने अपने मामा पायरीलेम्पस से शादी कर ली । पायरीलेम्पस फारसी न्यायालय में राजदूत और एथेंस के लोकतान्त्रिक संघ के नेता पेरिकल्स के मित्र भी थे । पायरीलेम्पस और उनकी मां का पुत्र एंटीफन उनका सौतेला भाई था । प्लेटो 6 बच्चों के परिवार में पले-बढ़े जिनमें से दो सहोदर भाई समेत एक बहन और दो सौतेले भाई थे । ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें अपने पूरे परिवार से काफी लगाव था क्योंकि प्लेटो नियमित रूप से अपने संवादों में उनका उल्लेख करते रहते थे । चार्माइड्स के नाम पर एक किताब लिखी गई,क्रिटीयस का वर्णन ” चार्माइड्स”और “प्रोटागोरस” दोनों में किया गया जबकि एडीमेंटस और ग्लॉकन “द रिपब्लिक” में प्रमुख स्थान रखते हैं । बर्नेट के अनुसार ” चार्माइड्स ” का पहला दृश्य पूरे परिवार की समृद्धता को दर्शाता है । प्लेटो के संवाद सिर्फ सुकरात की यादें नहीं हैं बल्कि ये संवाद उनके अपने परिवार की खुशहाली के दिनों को भी याद दिलाते हैं।
तत्कालीन समय के समृद्ध और सम्पन्न युवकों की तरह प्लेटो के पास भी प्रतिष्ठित शिक्षक थे । प्लेटो ने नियमित यूनानी शिक्षा प्राप्त की । उन्हें व्याकरण,संगीत,चित्रकला और व्यायाम की शिक्षा यूनान के प्रतिष्ठित शिक्षकों द्वारा प्रदान की गई । अपनी युवावस्था में ही प्लेटो ने काव्य को अपने मुख्य विषय के रूप में चुन लिया था क्योंकि शारीरिक शिक्षा के अतिरिक्त अकादमिक और कला में भाग लेना बहुत ही गौरवमयी समझा जाता था । सर्वप्रथम उन्होंने डिथाइरैम्ब्स (मुख्यतः दाखरस के देवता बच्चुस के सम्मान में अत्यधिक उत्साह से भरे भजन हैं) लिखी । लेकिन बाद में वो गीत,कविताओं और दुखांत नाटकों की तरफ मुड़ गये । उनकी कविताओं का कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण हम उनके यथा उपलब्ध अन्य लेखन को देखकर केवल अनुमान लगा सकते हैं कि यदि वो काव्यात्मकता में तल्लीन रहते तो वो निश्चित ही एक महान कवि बन सकते थे । ऐसा माना जाता है कि सुकरात से मिलने के बाद उन्होंने अपनी सारी कवितायें जला दी थीं । सुकरात काव्यात्मकता और कवि को समाज के लिए नुकसानदायक समझते थे और इस तरह प्लेटो दर्शन की ओर मुड़ गए । निश्चित ही प्लेटो के पास शासन में शामिल होने का सुनहरा मौका था खासतौर पर जब “थर्टी टायरांट्स” के चार्माइड्स और क्रिटीयस ने प्लेटो को शासन में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया था । परन्तु प्लेटो को अपने लक्ष्य के प्रति कोई संदेह नहीं था और वो शासन के कठोर रवैये से काफी घृणा भी करते थे। प्लेटो उस समय बहुत क्षुब्ध हुए थे जब “थर्टी टायरांट्स” ने लोकतान्त्रिक जनरल लिओन ऑफ सालामिस का वध करने के षडयंत्र में सुकरात को शामिल होने के लिए विवश किया था । सुकरात ने इस घृणित और निंदनीय कार्य में भाग लेने से मना कर दिया और इस तरह उन्हें युवा वर्ग का काफी समर्थन प्राप्त हुआ जो कि पहले से ही “थर्टी टायरांट्स” के दमनकारी रवैये से अच्छी तरह परिचित थे।
403 ईसा पूर्व में लोकतंत्र पुनः स्थापित हुआ जब लोकतान्त्रिक सेना ने निर्वासन के दौरान फिर से संगठित होकर “थर्टी टायरांट्स” को युद्ध में पराजित किया था । क्रिटीयस और चार्माइड्स दोनों युद्ध में मारे गए । प्लेटो के जीवन का विवरण नहीं होने की वजह से उनकी बाद की उपलब्धियों के बारे में नहीं पता लगाया जा सकता । इस संबंध में एमर्सन आप्टली अपने विचार रखते हैं कि “सबसे महान लोगों की जीवनी सबसे छोटी है । उनके परिवार के लोग भी आपको उनके बारे में कुछ नहीं बता सकते । वो अपनी रचनाओं में तल्लीन रहते थे इसीलिए उनका घरेलू एवं व्यावहारिक जीवन नगण्य और साधारण है । यदि आप उनकी रुचि और स्वरूपों को समझ पायेंगे तब आप महसूस करेंगे कि उनके प्रमुख प्रशंसक उन्हीं के सामान होते हैं । प्लेटो का विशेष रूप से कोई पारिवारिक जीवन-परिचय नहीं है इसलिए यदि प्लेटो की कोई प्रेमिका,पत्नी या बच्चे रहें भी हों,फिर भी उनके बारे में हमें कुछ पता नहीं । उन्होंने इन सब प्रश्नों को समय के चादर में ढ़क दिया । जिस तरह से एक उत्तम चिमनी अपने धुंए को छोड़ती है ठीक उसी तरह एक दार्शनिक अपने भाग्य की सारी अमूल्य निधियों को बौद्धिक कर्मों में बदल देता है “।

महान दार्शनिक प्लेटो की व्यक्तिगत जानकारी के अभाव के बावजूद हम जानते हैं कि प्लेटो, उनके भाई एडीमेंटस और ग्लॉकन ने कैटीलस से दर्शनशास्त्र की असीम और अद्भुत अनुभूति का स्वाद चखा था । कैटीलस, जिन्होंने सर्वप्रथम प्लेटो और उनके भाइयों को दर्शनशास्त्र से अवगत कराया था, प्रतिष्ठित दार्शनिक हेराक्लिटस के शिष्य थे । हेराक्लिटस ने ही सर्वप्रथम भौतिक संसार के परिवर्तन की विचारधारा को लोकप्रिय बनाया था। हेराक्लिटस के अनुसार “संसार ऐसा नहीं है जैसा कि हमें दिखता है अपितु यह निरंतर परिवर्तित होता रहता है” । प्लेटो और उसके सहपाठियों को यह जीवन -दर्शन बहुत उत्कृष्ट और दिलचस्प लगा । अतः जब प्लेटो ने सुकरात के विषय में सुना तब उन्हें उनके गहन दर्शनशास्त्र में तल्लीन होने में जरा भी समय नहीं लगा । यद्यपि एरिस्टोफेंस ने अपने प्रसिद्ध नाटक “क्लौड्स” में सुकरात को उनकी ‘अलौकिक संसार’ की विचारधारा के कारण निर्दयतापूर्वक अपमानित किया था । एरिस्टोफेंस ने सुकरात का उपहास किया था क्योंकि सुकरात प्रायः यह दावा करते थे कि उन्हें भविष्य के दिव्य सन्देश प्राप्त होते हैं । सुकरात के विषय में एक ‘प्रचलित कथा’ के अनुसार प्लेटो के मिलने से कुछ दिनों पूर्व सुकरात ने एक सपना देखा था । स्वप्न में उन्होंने देखा कि एक हंस का बच्चा उड़ कर उनकी गोद में बैठ जाता है,शीघ्र ही वह बच्चा बड़ा होकर एक अतुलनीय हंस बन जाता है और मधुर गीत गाता है ।

यूनानवासियों के लिए सपने बहुत महत्वपूर्ण हुआ करते थे । सुकरात का विश्वास था कि स्वप्न में दिखा अतुलनीय हंस प्लेटो ही थे । उनका ये विश्वास और भी विश्वसनीय हो जाता था क्योंकि यूनान प्रसिद्ध भविष्यवक्ताओं की धरती थी । ये भविष्यवक्ता यूनान के में मंदिरों रहती थीं और इनकी भविष्यवाणियां सभी लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी । यूनानवासियों का विश्वास था की ईश्वर स्वंय इनके मुख से बात करते हैं । इनकी भविष्यवाणियों के आधार पर कई युद्ध भी लड़े गए और बड़े-बड़े राजाओं के उत्तराधिकारी देश से निकाल भी दिये गये।
अपने उम्र के बीसवें चरण से पहले ही प्लेटो सुकरात के प्रधान प्रशंसक बन चुके थे । जब सुकरात ने बड़ी निडरता और निर्भीकता से “थर्टी टायरांट्स” का विरोध किया था तब प्लेटो उनसे बहुत प्रभावित हुए थे जबकि “थर्टी टायरांट्स” सुकरात से धार्मिक ‘लिओन ऑफ सलामिस’ का वध करवाना चाहते थे । प्लेटो के जीवन के घटनाक्रम और कार्य पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं क्योंकि प्लेटो और सुकरात दोनों ही बहुत कम लेखन करते थे और कुछ घटनाएं जो उल्लेखित भी की गई हैं वो दूसरी घटनाओं की तिथियों से मेल नहीं खातीं । अतः उनके कार्यों की वास्तविक तारीख निश्चित रूप से निर्धारित नहीं की जा सकती । हालांकि हम सभी जानते हैं कि प्लेटो सुकरात से 28 वर्ष की आयु में मिले थे ।
सुकरात के दृष्टिकोण ने प्लेटो को ओतप्रोत कर दिया था । पूर्व में दर्शनशास्त्र को मुख्यतः प्राकृतिक और भौतिक संसार के प्रयोगात्मक अध्ययन से सम्बंधित माना जाता था लेकिन सुकरात दर्शनशास्त्र को नैतिकता,भलाई और समृद्धता की पराकाष्ठा पर ले गए । विश्व की रचना में ईश्वर की भूमिका तथा इस विश्व की कार्य प्रणाली के बारे में सुकरात की दार्शनिक पद्धति को इतना तार्किक तथा व्यापक देखकर प्लेटो को यह यकीन हो चुका था कि वह अपने गंतव्य को पा चुका था । यह तीनों भाइयों के लिए स्वाभाविक था कि वो अपनी ज्ञान-पिपासा की पूर्ति के अन्वेषण में सुकरात से मिले । प्लेटो के जीवन में ये समय बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ क्योंकि उन्होंने अपनी तीक्ष्ण बौद्धिक क्षमता से खुद को एक विद्वान शिक्षक के श्रेष्ठ विद्यार्थी के रूप में स्थापित किया । विशाल बौद्धिक और साहित्यिक क्षमता के साथ-साथ सुकरात की कार्यप्रणाली पर उनकी तेज पकड़ थी । ‘द स्टोरी ऑफ फिलॉसफी’ के लेखक विल दुरेंट के शब्दों में “और बुजुर्ग ‘गद्फ्लाई’(सुकरात का खुद को दिया गया नाम) के मार्गदर्शन के अंतर्गत वह थोड़े तर्क-वितर्क से चिंतनशील विश्लेषण और फिर उन्नत विचार-विमर्श से गुजरे थे “।
अपने गुरु सुकरात की बौद्धिक चपलता को प्रोत्साहित कर देने वाली झलकों ने प्लेटो को उनका आसक्त बना दिया । इसका प्रमाण बहुतायत से इनके सभी संवादों में मिलता है जैसे प्लेटो ने कहा था “मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि मैं सुकरात के युग में पैदा हुआ था”।

प्लेटो की पुस्तक “दि एपोलॉजी “से स्पष्ट होता है कि सुकरात स्थापित संस्थाओं का अंत कभी नहीं चाहते थे अपितु उन्होंने न्याय,समानता और शिक्षा के प्रति तत्कालीन प्रचलित मान्यताओं तथा रूढ़ियों का ही व्यवस्थित रूप से खंडन किया । प्रचलित मतों का खंडन करने और उनके आशय को उजागर करने की उनकी यह प्रक्रिया अपने प्रिय मित्रों,शिष्यों को प्रभावित करने में और रूढ़िवादी विचारधारा के लोगों में भय पैदा करने में कभी नहीं रुकी । उदाहरण के तौर पर प्लेटो के समय के यूनान और उसके भी पूर्व तर्क-वितर्क या किसी को किसी भी विषय पर विश्वास दिलाने की कला एक बहुत महत्त्वपूर्ण शैक्षिक, सामाजिक और राजनीतिक उपलब्धि मानी जाती थी और अपनी योग्यता के अनुसार तर्कशास्त्री किसी भी विषय पर प्रभावपूर्ण तरीके से तर्क कर काफी धन अर्जित करते थे । एक उचित रकम के लिए तर्कशास्त्री अपनी वाक्पटुता से किसी को गलत से सही और सही से गलत ठहरा देते थे । अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से तर्कशास्त्रियों ने राज्य के बड़े ओहदों पर कार्यरत शक्तिशाली मित्र बनाये । सुकरात ने गौर किया कि ये तर्कशास्त्री पूरी तरह से चतुर और शब्दों के धनी हैं जो कि बिना पर्याप्त ज्ञान रखते हुए भी किसी विषय को चतुराई और प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त कर सकते हैं । अतः उनकी ये कला छल या धोखा मात्र थी । किसी विषय पर किसी के पक्ष में बोलने के लिए इन तर्कशास्त्रियों को प्रचुर धन का भुगतान किया जाता था । सुकरात ने अपनी अद्भुत तार्किक क्षमता से तर्कशास्त्रियों को बुरी तरह से लताड़ा और उनकी इस धूर्तता का पर्दाफाश किया । सुकरात की इस प्रक्रिया ने उनके मित्रों और दोस्तों को बहुत प्रभावित किया लेकिन शक्तिशाली तर्कशास्त्रियों और उनके भ्रष्ट मित्रों को उनके विरोध में खड़ा कर दिया जिनका सुकरात के प्रति रोष जल्द ही अपनी चरमसीमा पर आ गया ।
सुकरात से प्लेटो और उसके सहपाठियों ने सभी तथाकथित रूढ़िवादी मान्यताओं के प्रति तर्क करने की कला सीखी और इसका इस्तेमाल हर प्रकार के ढोंग,मिथ्या और तार्किक कथनों को तोड़ने में किया।
सुकरात की किसी के प्रति कोई द्वेष भावना नहीं थी उनका एकमात्र उद्देश्य था कि एथेंस में बहुतायत से न्यायपरायण लोग हों । सुकरात ने प्लेटो को तर्कशास्त्रियों की व्यर्थ की बहस और तत्कालीन शासकों की अनैतिक योजनाओं से अवगत कराया जिनका मुख्य ध्येय लोगों के हित के बजाय लोगों की भोग-विलासिता से था । सुकरात ने प्लेटो को राज्य की आम जनता के अंधेपन से भी अवगत कराया जिसको सरकार चुनने का कार्य सौंपा गया था । सुकरात ने खुद को लेखन से ज्यादा प्रतिबद्ध नहीं किया । लिखित शब्दों पर उनका विश्वास कभी नहीं था बल्कि उनके लिए लिखित शब्द बोले गये शब्दों की नकल या प्रतिलिपि के सामान थे । सुकरात के अनुसार नकल किसी भी रूप में बनावटी ही रहती है और इससे दूर रहना चाहिए । उनके शिष्य प्लेटो और कुछ हद तक जेनोफोन ही सुकरात के विषय में लिखते थे यहां तक कि वो कभी-कभी सुकरात बनकर लिखते थे । प्लेटो ने निष्ठापूर्वक सुकरात की कार्यविधि की व्याख्या की और स्पष्ट किया कि ये कार्यविधि पुरानी धारणाओं को प्रभावहीन करने पर जोर देती है क्योंकि ये धारणायें प्रत्यक्ष उद्देश्यों पर आधारित थी । प्लेटो ने संवादों का प्रयोग बहुत प्रभावपूर्ण तरीके से किया क्योंकि जो सबसे गूढ विचार होते हैं उन्हें भी बड़ी तल्लीनता के साथ पढ़ा जा सकता है । यह काफी रोचक है कि सुकरात ने अपने विचारों को कभी नहीं लिखा जबकि इनके सबसे अग्रणी शिष्य प्लेटो ने अपनी लेखनी का श्रेय अपने प्रिय गुरु के सिवा किसी को नहीं दिया । इस तरह प्लेटो ने अपने किसी भी कार्य में खुद की सम्मति नहीं दी और सारा श्रेय सुकरात को दे दिया सिर्फ “दि एपोलॉजी ” को छोड़कर जिसमें उन्होंने अपने प्रिय गुरु सुकरात की मृत्यु पर गहरा शोक व्यक्त किया है ।

प्लेटो अपने जीवन के सिर्फ 9 वर्ष ही सुकरात के साथ व्यतीत कर सके क्योंकि जिस आशंका से प्लेटो और उनके सहपाठी भयभीत थे,दुर्भाग्यवश उनके प्रिय गुरु के साथ 399 ईसा पूर्व में एक दिन घटित हो ही गई । सुकरात की सुनवाई एक दिखावा-मात्र थी क्योंकि पहले से ही यह परिणाम निर्धारित था कि सुकरात के शक्तिशाली विरोधी अपने ओहदे का इस्तेमाल कर के सुकरात को खत्म कर देंगे । हालांकि निर्णायक समिति ने सुकरात को यह विकल्प दिया था कि वो माफी मांगकर या जुर्माना देकर सजा से मुक्त हो सकते हैं परन्तु सुकरात को इनमें से कोई भी विकल्प मंजूर नहीं था जिसकी वजह से उनके शिष्यों की व्याकुलता हताशा और निराशा में बदल गई । लेकिन उनका यह दृढ़ संकल्प कि उन्होंने जो कार्य किया था उसका कोई पछतावा नहीं करेंगे और मृत्यु की सजा से बचने के लिए नियमों की अवमानना नहीं करेंगे,निश्चित रूप से बहुत ही विश्वसनीय,साहसिक और आशावादी संकल्प था जबकि वो मृत्यु के मुख के सामने खड़े थे । सुकरात कहते हैं कि “इस न्यायिक सुनवाई ने मेरे लिए सबसे बुरे और खतरनाक प्रकृति के दुश्मन खड़े कर दिए हैं और झूठा अभियोग लगाने वालों को बहुत से मौके दिए हैं और लोगों ने मुझे बुद्धिमान कहा है क्योंकि मेंरा अनुसरण करने वाले हमेशा कल्पना करते हैं कि मैं जो ज्ञान अपने अन्दर रखता हूँ वो मैं दूसरों में देखना चाहता हूँ ; परन्तु हे एथेंसवासियों ! सत्य तो ये है कि सिर्फ महान ईश्वर ही ज्ञानी है…” इस तरह मृत्यु के सामने खड़े होकर भी सुकरात ने स्पष्टवादिता और न्यायपरायणता को ही दर्शाया था ।
प्लेटो और उनके सहपाठियों ने अपने प्रिय गुरु को मनाने का हर संभव प्रयास किया कि सुकरात जुर्माना देकर या क्षमा याचना करके मुक्त हो जाएं परन्तु जिस सच्चाई और निडरता का परिचय देते हुए उनके महान गुरु ने शान्ति से मृत्यु को गले लगाया था वो उनकी कल्पना से परे था । यह विडम्बना ही थी कि इसी भ्रष्ट लोकतांत्रिक सरकार ने स्वयं सुकरात को युवाओं को भ्रष्ट करने के लिए दोषी ठहराया था । सुकरात के महान जीवन और शिक्षाओं का मार्मिक चित्रण “दि एपोलॉजी “में किया गया है । विलियम विम्सेट और सी.ब्रूक्स ने “दि एपोलॉजी ऑफ सुकरात” को महान दार्शनिक प्लेटो की काव्यात्मक आत्मा का सबसे उत्कृष्ट उदहारण माना है । “फेडो” में सुकरात को विष दिए जाने पर प्लेटो विलाप करते हुए कहते हैं,” हमने इन्तजार किया,अपने दुखों के बारे में बात करते और सोचते हुए । वो हमारे पिता की तरह थे जिनसे हमें वंचित कर दिया गया है । अब हम अपनी सारी जिन्दगी आनाथों की तरह गुजारने जा रहे हैं और जब हमने देखा कि उन्होंने विष का प्याला पी लिया है । हम और ज्यादा सहन नहीं कर पाये और मेरी आंखों से आंसू खुद-ब-खुद तेजी से बहने लगे” ।
एक प्रबुद्ध और पूजनीय आत्मा के अन्यायपूर्ण वध ने प्लेटो की उन सारी उम्मीदों को मिटा दिया जो उन्होंने “थर्टी टायरांट्स” के हटाये जाने और लोकतंत्र की अगुआई में चुनी हुई सरकार के द्वारा एथेंस का कार्यभार संभालने पर देखी थी । अब उन्हें पूरी तरह विश्वास हो गया था कि सरकार का कोई भी रूप योग्य नहीं हो सकता । यदि सुकरात से मिलना प्लेटो के जीवन में एक क्रांतिकारी मोड़ था तो अपने प्रिय गुरु से बिछड़ना उनके जीवन में सबसे बड़ी विपत्ति थी ।

कुछ समय तक प्लेटो अपने प्रिय गुरु सुकरात की मृत्यु पर शोकाकुल रहे, परन्तु अपने शुभचिंतकों की सलाह और परामर्श पर उन्होंने कुछ दिनों के लिए एथेंस से बाहर जा कर दूर-दराज के देशों जैसे मिस्र,रोम और यहां तक कि भारत की यात्रा करने के लिये इच्छा प्रकट की ।

मिस्र के पुरोहित शासकों ने ग्रीक सभ्यता से अनभिज्ञ होने के बावजूद उनका बहुत सम्मान किया तथा उनके कार्यों की सराहना भी की।रोम में एक छोटी शासकीय शिक्षण संस्था की स्थापना की गई जिसे पैथागोरस ने प्रेरित किया और इस संस्था के काफी सारे मत और आधारभूत तत्व भारत के वैदिक ज्ञान से मिल रहे थे।प्लेटो और सुकरात के अनुयायियों को अस्थायी रूप से 399 ईसा पूर्व में कुछ दिनों के लिए मेगारा में युक्लिड के साथ शरण लेनी पड़ी । युक्लिड यूनान के महान गणितज्ञ थे,जिन्हें ज्यामिति का पिता माना जाता है । प्लेटो चालीस वर्ष की आयु में इटली,सिसली,मिस्र और सिरेन की यात्रा पूरी करके एथेंस वापस आये । अपनी यात्रा के दौरान प्लेटो ने बहुत कुछ सीखा था और अब वो अपने विचारों को मूर्तिरूप देने के योग्य हो गए थे ।

प्लेटो की साहसिक यात्रा यहीं खत्म नहीं होती।किसी-न-किसी कारण से वो हमेशा सिसली के शहर सेराक्यूस की राजनीति में संलिप्त रहते थे । जीवन के बदलते घटनाक्रमों से उन्हें अहसास हुआ कि उनके खुद के बनाये गए सिद्धांतों को व्यावहारिक जीवन में लागू करने में कितनी कठिनाइयां होती हैं । डिओजेन्स के अनुसार प्लेटो ने सर्वप्रथम डायोनिसियस के शासनकाल में सेराक्यूस शहर की यात्रा की थी।अपनी पहली यात्रा के दौरान डायोनिसियस के जीजा और सेराक्यूस शहर के उत्ताधिकारी उनके शिष्य बन गए । लेकिन इसे भाग्य का हास्यास्पद व्यंग ही कहिये कि अज्ञानी और अधर्मी डायोनिसियस प्लेटो के उन्नत और बुद्धजीवी विचारों को नहीं समझ पाया और खुद उनके विरोध में खड़ा होकर उन्हें गुलाम बना कर बेच दिया ।
एक प्रतिष्ठित दार्शनिक के इतने अपमानजनक तिरस्कार की मानसिक पीड़ा और दुख की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है । वो गरीबी दुःख और कष्टों से गुजर रहे थे उनके कष्टों ने उन्हें लगभग मृत्यु के करीब सिरेन शहर में छोड़ दिया था,जिससे एथेंस का युद्ध चल रहा था । भाग्यवश उनके एक प्रशंसक ने उन्हें पहचान लिया और उन्हें सुरक्षित उनके घर भेज दिया । इस घटनाक्रम ने उनके आत्मविश्वास को काफी तोड़ दिया था परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी । एक बार फिर से प्लेटो के हृदय में सेराक्यूस जाने की तीव्र इच्छा प्रकट हुई और भाग्यवश जब डायोनिसियस की मृत्यु हो गई तब डाएन ने प्लेटो से अनुरोध किया कि वो सेराक्यूस लौट आये और डायोनिसियस द्वितीय को एक बड़ा दार्शनिक राजा बनाने के लिए शिक्षित और मार्गदर्शित करें जो कि प्लेटो के प्रिय राजनीतिक सिद्धांतों में से एक था ।
प्लेटो की आशावादी विचारधारा की भूरि-भूरि सराहना की जा सकती है कि वो फिर से उसी सेराक्यूस शहर जाने को सहमत हो गए जिसने अतीत में उन्हें लगभग मौत के मुंह के करीब ला दिया था । उन्होंने अपने ज्ञान और आदर्शों को अपने डर से ऊपर रखा और एक बार फिर से वो सेराक्यूस शहर को एक दार्शनिक शासक द्वारा आदर्शवादी राज्य बनाने के लिए वापस गए । यह प्रकरण उनकी उदारवादी दृष्टिकोण को उजागर करता है । प्लेटो का कथन है कि “यदि कोई भी हमारे नियम और संविधान के सिद्धांतों को समझना चाहता है तो उसे अभी प्रयत्न करना आवश्यक है । मैंने घर से बाहर अपना कदम इसलिए रखा ताकि मैं अपनी ही नजरों में शर्मसार न हो जाऊं कि मेरे जैसा इंसान सिर्फ बोल सकता है परन्तु कुछ कर नहीं सकता।” किसी शासनविधि का औपचारिक रूप तब तक पर्याप्त नहीं है जब तक कि वह प्रयोग में ना लायी जाय। अतः प्लेटो ने एक बार फिर जोखिम और अनिश्चिताओं से भरे राजा डायोनिसियस के शहर सेराक्यूस की यात्रा की । प्रारंभ में डायोनिसियस प्लेटो की शिक्षाओं और विचारों से सहमत था,परन्तु अफसोस भाग्य ने एक बार फिर प्लेटो के साथ मजाक किया और प्लेटो के लिए यहां फिर से दलदल में फंसना सुनिश्चित हो गया क्योंकि डायोनिसियस द्वितीय अपने चाचा डाएन पे शक करने लगा था । जिसके परिणाम स्वरूप डाएन को देश से निकाल दिया गया और प्लेटो को जबरन नजरबंद कर दिया गया । अंत में प्लेटो डायोनिसियस द्वितीय से बातचीत कर समझौता करने में कामयाब हो गया। अंततः भाग्य ने प्लेटो का साथ दिया, डाएन सेराक्यूस शहर वापस आया और डायोनिसियस द्वितीय को हटा कर थोड़े समय तक शासन करने में सफल रहा । अंत में प्लेटो के ही शिष्य कैलिपस ने डाएन को युद्ध में हराकर सेराक्यूस शहर पर कब्जा कर लिया ।

387 ईसा पूर्व प्लेटो लम्बे समयांतराल के बाद लगभग 40 वर्ष की आयु में एथेंस वापस आये और ‘एकाडेमस या हेकाडेमस’ की धरती पर उन्होंने “दि अकादमी” की स्थापना की जो पाश्चात्य सभ्यता की सबसे पुरानी मानी जाने वाली औपचारिक शिक्षण संस्थाओं में से एक है ।
बहुत से प्रसिद्ध बुद्धजीवियों ने “दि अकादमी” में शिक्षा प्राप्त की,अरस्तु भी उनमें से एक था । यह प्लेटो की उन्नत लेखन का सबसे महत्वपूर्ण समय था । अधिकतम विद्वानों का मत है कि 399 ईसा पूर्व के तुरंत बाद प्लेटो ने विस्तारपूर्वक बड़े पैमाने पर रचना करनी शुरू कर दी थी । यद्यपि जिस क्रम से उन्होंने संवादों की रचना की थी वह एक बहस का विषय हो सकता है । प्लेटो की आदर्शवादी कार्यशैली किस तरह विकसित हुई इस पर कई मत प्रचलित हैं । प्लेटो के लेखन के विषय में ये मत तीन बड़े भागों में बंट जाते हैं । पहला हिस्सा सामान्यतः”सुकरात के संवाद ” के नाम से जाना जाता है जो संभवतः 399 और 387 के वर्षों के बीच लिखा गया था । ये लेखन “सुकरात के संवाद” नाम से इसलिए प्रचलित हैं क्योंकि इन संवादों में प्लेटो ऐतिहासिक सुकरात की शिक्षाओं और उनके द्वारा किये गये समर्थन के काफी करीब थे । इनमें से एक “दि एपोलॉजी ” संभवतः सुकरात की मृत्यु के तुरंत बाद लिखी गई । दा “क्रिटो”, “लाचेस”, “लिसिस”, ” चार्माइड्स “, “युथीफ्रो”, “हिप्पीअस माईनर एंड मेजर”, “प्रोटागोरस”, “गोर्जिअस” और “आयॉन” संभवतः इन्हीं बारह वर्षों की अवधि में लिखी गई ।
इससे प्रतीत होता है कि अगले 26 वर्षों में प्लेटो की दार्शनिक परिकल्पनायें अधिक व्यावहारिक हो गई थी और उनकी नाटकीय प्रतिभा में और निखार आ गया था । 387 से 367 के बीच का समय जिसे कि प्लेटो के मध्यकाल या संक्रमणकाल के नाम से जाना जाता है,प्लेटो अपने संवादों को बहुत अच्छा लिख सकते थे जो कि काफी क्लिष्ट और गूढ़ थे जैसे “द मेनो”, “युथिदेमस”, “मेन्क्सेनस”, “केटाइलस”, “रिपब्लिक”, “फेड्रस”, “सिम्पोसियम” और “फेडो” । ये लेखन इनके शुरुआती कार्यों से भिन्न थे क्योंकि इनमें इनका झुकाव भव्य आध्यात्मिक परिकल्पनाओं की तरफ था । जिसने हमें प्लेटोवाद के कई रूपों जैसे कि परिकल्पनाओं की पद्धति,पुनर्जन्म और निश्चित विचारों या सिद्धांतों से परिचित करवाया था,जैसा कि इनको संबोधित किया जाता था।प्लेटो की साहित्यिक गतिविधि के युग की अंतिम अवधि 360 से 347 ईसा पूर्व मानी जाती है । अतः उनके लेखन का मूल्यांकन करने के बजाय उनके दर्शन में छिपे हुए सिद्धांतों को समझना अधिक उचित होगा । प्लेटो के कुछ संवाद और रचनाएं उनकी वास्तविकता को लेकर विवादित हुए । हालांकि ये विवाद किसी व्याख्यात्मक मान्यता की अपेक्षा सैद्धांतिक ज्यादा सिद्ध हुए हैं । एलफ्रेड नॉर्थ व्ह्वाईटहेड ने सही प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “यूरोपियन दार्शनिक परम्परा का सबसे सुरक्षात्मक स्वरूप यह होता है कि ये प्लेटो के सन्दर्भों की श्रंखलाओं से सुशोभित है”।

प्लेटो के कार्यों से यह स्पष्ट होता है कि नीतिशास्त्र,राजनीतिशास्त्र,मनोविज्ञान और धर्म उनके कार्यों के अभिन्न अंग थे । प्लेटो के आधारभूत मत उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को विश्वसनीय बनाते हैं । उनके सबसे पुराने कार्य “सुकरात के संवाद” में सदाचारी बनने,प्रतिशोध की भावना से दूर रहने और “खुद कष्ट सहें परन्तु दूसरों को कष्ट ना दें ” की विचारधारा निहित है । कुल मिला कर सारे मत आत्मा की शुद्धता पर विशेष बल देते हैं । प्लेटो का अटूट विश्वास था कि गुणवान होने के साथ भला होना भी आवश्यक है और भलाई के साथ गुणी होना भी आवश्यक है अन्यथा कोई भी सृजनात्मक कार्य नहीं हो सकता । अतः किसी भी प्रकार का अन्याय करना आत्मा की शुद्धता के लिए नुकसानदायक होता है और इससे परहेज करना चहिये । अपने सुप्रसिद्ध कार्य “द रिपब्लिक” में प्लेटो ने समृद्धता से जीवन जीने की अवधारणा का व्याख्यान करते हुए कहा है कि राज्य के नियमों तथा आज्ञाओं का पालन और प्रोत्साहन करें,अच्छी तरह से जीयें क्योंकि जो नैतिकता से जीवन जीता है उसके लिए सारी नैतिकतायें एक समान होती हैं । “गोर्जियस” और “मेंनो” में प्लेटो का कथन है कि स्वाभाविक रूप से सभी लोग भले होते हैं और जो भी गलत कार्य या अपराध उनसे घटित होते हैं वो अज्ञानता एवं अनजाने में होते हैं अतः उनसे नफरत करने के बजाय उन्हें सही रास्ते पर लाना चाहिए यहां तक कि यदि कोई तर्कशास्त्री लोगों के मन में भ्रम पैदा कर रहा है फिर भी वह घृणा का नहीं अपितु उचित मार्गदर्शन का पात्र है ।

प्लेटो जानते थे कि उनके गुरु सुकरात को ईश्वरीय मार्गदर्शन प्राप्त था और जब भी वो निर्णय लेते थे उन ईश्वरीय संकेतों या भविष्यवाणियों का अनुसरण करते थे । इस प्रकार ये विचार कि अनुभव के स्तर से परे एक अपरिवर्तनशील सत्य कहीं निहित है, उनके कई सिद्धांतों का आधारभूत तत्व था । अपने प्रसिद्ध कार्य “अलेग्री ऑफ द केव” में प्लेटो ने सार्वभौमिकता का सिद्धांत प्रतिपादित किया और अपरिवर्तनीय एवं अचल अलौकिक संसार तथा निरंतर बदलने वाले धरती पर बसे परिवर्तनशील संसार की तुलनात्मक व्याख्या की है । ” द रिपब्लिक” अध्याय 7 में सुकरात और प्लेटो के भाई ग्लॉकन के बीच हुए संवाद में प्लेटो संसार के निरंतर परिवर्तित होने की प्रकृति की व्याख्या करते हुए उदाहरण देते हैं कि किस तरह एक-दूसरे से जकड़े हुए लोग एक गुफा की दीवार के सामने खड़े हैं और सिर्फ अपनी परछाई ही देखने में सक्षम हो पाते हैं जो कि ठीक उनके पीछे जल रही आग से उत्पन्न हो रही है । दार्शनिक किसी तरह गुफा से बाहर आता है और वास्तविकता की झलक प्राप्त करता है । लेकिन एक-दूसरे से जकड़े हुए अज्ञानी लोग उसकी परामर्श को नहीं सुनते और उसी अज्ञानता में उलझे रहते हैं।आत्मा इसी शाश्वत सत्य के दायरे के अंतर्गत आती है और तब तक मानवरूप में जन्म लेती रहती है जब तक कि वह अपनी वास्तविक प्रकृति को पहचान नहीं ले । प्लेटो निष्कर्ष निकालते हैं कि ज्ञान हमेशा सार्वभौमिकता के दायरे में विद्यमान है और हम मनुष्य इस ज्ञान को केवल खोज सकते हैं या स्मरण कर सकते हैं । आत्मा की पवित्रता को हमेशा बरकरार रखना चाहिए और आत्मा को बचाए रखने के लिए काव्यात्मकता से दूर रहना चाहिए जो कि उन सभी कारणों में से एक है जिनसे आत्मा अशुद्ध हो सकती है ।
प्लेटो का विश्वास था कि, “सांसारिक वस्तु एक धूमिल छाया मात्र है जो कि अपने आदर्श और पूर्णरूप का प्रतिनिधित्व करती है और एक दार्शनिक को वो अंतर्दृष्टि प्राप्त करनी चाहिए जो उसे उस पूर्णता की तरफ ले जाए” । वो हमारे दृष्टिकोण की तुलना गुफा के उन कैदियों से करते हैं जो कि आग से उत्पन्न अपनी परछाइयों को देख रहे थे और बहुत अस्पष्ट रूप से अनुमान लगा पाते हैं कि वास्तविकता कैसी होती है । ध्यानमग्न और एकाकी जीवन जीकर एक दार्शनिक उन आदर्श रूपों की पूर्णता के कुछ अर्थ समझ सकता है । हालांकि ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के पहले दशक में लिखी गई पुस्तक “ईयोन” में प्लेटो सुकरात की धारणा को दोहराते हैं कि काव्यात्मकता एक प्रकार की भविष्यवाणी है जो कि तब बोलती है जब कवि के मस्तिष्क में ज्ञान नहीं रह जाता । प्लेटो की पुस्तक “द रिपब्लिक” के खंड दो,तीन और दस में भी सुकरात का विश्वास था कि काव्यात्मकता “अभिलाषाओं का पालन-पोषण करती है” और अस्थिरता और व्यर्थता को हृदय में उत्पन्न करती है जो कि नैतिकता के विपरीत है ।
प्लेटो के आदर्श कवि 50 वर्ष से अधिक आयु के रहे होंगे और देशभक्ति गीत एवम् प्रतिष्ठित जन के लिए स्तुति गीत बनाते होंगे । दसवीं पुस्तक में प्लेटो ने स्पष्ट कहा है कि, “यदि तुम इसके परे जाओगे और “मधुमय काव्य” को प्रवेश करने की अनुमति दोगे तब नियम और मानवता के प्रयोजन के बजाय विलासिता और दुःख हमारे मालिक होंगे” । हालांकि प्लेटो खुद “मधुमय काव्य” की पकड़ से नहीं बच पाए क्योंकि उनकी खुद की रचनाएं काव्यत्मकता और मनोभावों से लिप्त रहती थी । लेकिन अपने गुरु के प्रति उनके संपूर्ण समर्पण ने उन्हें कविता के प्रति तिरस्कार से भर दिया था। सुकरात हमेशा अनुकरण या नकल करने का विरोध करते थे । इस सम्बन्ध से कविता कुट-तार्किकता के सामान है जो कि वास्तविक नहीं है,सिर्फ वास्तविकता की नकल करती है ।

प्लेटो की वास्तविकता या सार्वभौमिकता का सिद्धांत और अवास्तविक संसार का विरोधाभास उनके काव्य,कला,साहित्य और प्रेम के प्रति उनके दृष्टिकोण को दर्शाता है । प्रेम के प्रति आम धारणा उन चीजों में से थी जिनकी प्लेटो आलोचना करते थे । प्लेटोनिक प्रेम की प्रतिष्ठित और काफी हद तक गलत समझे जाने वाली धारणा प्लेटो की संकल्पना से सिद्ध होती है जैसे कि “प्रेम सुन्दरता में जन्म लेता है और जो आत्मा परिपूर्ण होती है वह ज्ञान और नैतिकता का चिंतन करती है ।” ‘फेड्रस’ में प्लेटो कहते हैं कि निम्न अभिलाषाओं को बढ़ावा देना प्रेम नहीं है । प्रेम और शारीरिक सौंदर्य आते -जाते रहते हैं केवल प्रेम की शुद्धता ही वास्तविक सुन्दरता को प्राप्त कर सकती है ।
जान मिल्टन ने “सत्य ही सुन्दरता है और सुन्दरता ही सत्य है” कथन द्वारा प्लेटो की इस विचारधारा को बड़ी खूबसूरती के साथ सारांशित किया । विम्मसैट और ब्रूक्स ने कहा है परम सुख (प्लेटो के लिए ) अभिलाषाओं में नहीं अपितु विवेकपूर्ण क्रियाकलापों में निहित है अन्यथा वह भावनाओं के बीच हास्यास्पद बन के रह जाता है । प्रेम रूमानी होने के साथ-साथ विवेकपूर्ण भी होना चाहिए ।
प्रेम के प्रति प्लेटो की विचारधारा अभिलाषाओं और प्रेम की उत्तेजना से भिन्न थी जैसा कि आज इसे माना जाता है । उनके दृष्टिकोण से सच्चा प्रेम एक परिष्कृत तथा महानता की ओर ले जाने वाला अनुभव है जो सुन्दरता को जन्म देता है और वास्तविकता के सबसे करीब होता है । “प्रेम महान ‘ईश्वरीय उन्माद’ को प्रकट करता है जिससे प्रेमी की आत्मा के पंख निकल आते हैं जो कि मानव जाति के लिए संभव सभी प्रकार की उच्चतम महत्वाकांक्षाओं और उपलब्धियों की ओर ले जाते हैं” । इन दोनों संवादों में प्लेटो स्पष्ट रूप से शारीरिक संसर्ग या सम्भोग को कामुक अभिव्यक्ति का सबसे निम्न और व्यर्थ रूप मानते हैं । प्लेटो के अनुसार काम का सच्चा उद्देश्य वास्तविक सुन्दरता है जो कि सुन्दरता का वास्तविक रूप है जिसे प्लेटो खुद सुन्दरता कहते हैं । प्लेटोनिक दर्शन में ही काम पूर्णता को प्राप्त करता है । जब तक कि वह प्रेम की शक्ति को महत्वपूर्ण लक्ष्यों में नहीं लगाएगा जो कि वास्तविक सुन्दरता के ज्ञान को अर्जित करती है, तब तक काम को हताशा ही मिलेगी । इस वजह से प्लेटो हमेशा सोचते थे कि दुखपूर्वक लोगों ने अपनी प्रेम की वास्तविक शक्ति को शारीरिक सौंदर्य के भोग-विलास में गंवा दिया । हालांकि इस धारणा ने उनके प्रेम-जीवन को विवादास्पद बना दिया लेकिन वास्तविकता यही है कि अगर प्लेटो की पत्नी या प्रेमिका होती तो अपने संवादों में उसका व्याख्यान जरूर करते जिस तरह उन्होंने बाकी परिवार वालों का व्याख्यान किया था ।

प्लेटो ने बताया कि एक कमजोर चरित्र भावनाओं,अभिलाषाओं और बुद्धिमता की अधिकता का परिणाम होता है जो कि मनुष्य को सारी बुराइयों के केंद्र में ले जाता है । प्लेटो के अनुसार ऊपर इंगित किये गये तीनों गुण यदि उचित संतुलन में हैं तो मनुष्य का व्यवहार कुछ विशिष्ट सामाजिक मानदंडों और आदर्शों का पालन करेगा । पहले दो गुणों की अधिकता के कारण स्वभाव में असंतुलन और अव्यवस्था उत्पन्न होती है,जबकि तीसरे गुण की अधिकता मनुष्य को महानता की ओर ले जाती है । प्लेटो का मानना था कि जब लोग अपनी सच्ची आत्मिक प्रकृति को भूलकर अपनी अभिलाषाओं का पीछा करते हैं तब समाज को कष्ट सहना पड़ता है । इस बुराई का अचूक निवारण यह है कि :-
“जब तक दार्शनिक राजा हैं या फिर इस संसार के राजाओं और राजकुमारों के पास दर्शन और ज्ञान का सामर्थ्य तथा शक्ति है एवं राजनीतिक नेतृत्व इन्हीं के हाथों द्वारा होता है तो राज्य बुराई और मानवजाति के संघर्ष से मुक्त रहेगा”।
(“द रिपब्लिक” से)
यह संभवतः सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कथन था जिसे प्लेटो ने अपने अनुभव और ज्ञान से प्रतिपादित किया । ‘गोर्जियास’ में प्लेटो ने कुछ नेताओं और नागरिकों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले न्याय और समानता के खोखलेपन को बहुत सराहनीय ढंग से उजागर किया है । प्लेटो ने महसूस किया कि कमजोर लोगों को सजा देने के लिए न्याय शक्तिशाली लोगों की ढाल बन चुका है जो अपने मन मुताबिक इसकी अवहेलना कर सकते हैं । प्लेटो एक दूसरे मिथक का खंडन करते हैं कि समानता समाज का वांछनीय अंग है । उन्होंने कहा कि “ये वो ईर्ष्यालु लोग थे जो सफल लोगों को अपने स्तर पर लाना चाहते थे और इसलिए समानता के लिए लड़ते थे । ‘गोर्जिअस’ में प्लेटो का कथन है कि “जीवन जीने का सबसे उचित तरीका है धार्मिकता और सदाचार का निरंतर अभ्यास करें,चाहे जीयें या मरें”।
प्लेटो के लिए ये समाधान आसान नहीं था,उन्हें लिंग,ओहदे और शक्ति की परवाह किये बिना लोगों को शिक्षित करना था । प्लेटो के समय में महिलाओं को सामान्य जनजीवन में भाग लेने की अनुमति नहीं थी । एथेंस में महिलाओं को केवल घरेलू काम-काज तक सीमित रहने की परंपरा को देखते हुए प्लेटो का महिलाओं को सर्व-जन शिक्षा के अभियान में जोड़ने की योजना एक क्रांतिकारी परिवर्तन था।वो महिलाओं के अधिकारों के समर्थन में सबसे पहले दृढ़तापूर्वक खड़े हुए । उनका मानना था कि महिलाएं भी शिक्षा और समाज में जीने का सामान अधिकार रखतीं हैं और उन्हें ये अधिकार अवश्य देना चाहिए । उनके शिष्य अरस्तु ने बड़े खेदजनक तरीके से प्लेटो के उन्नतशील विचारों से असहमति जताई और महिलाओं से हेय दृष्टि से व्यवहार करने की ऐथनियन परंपरा को वरीयता दी । हालांकि प्लेटो का विश्वास था कि मस्तिष्क,शरीर और आत्मा की सार्वभौमिक शिक्षा संरक्षकों और दार्शनिक राजाओं को जन्म देगी और वो निष्पक्षता और बुद्धिमता से शासन करेंगे । एक सशक्त संरक्षक दूसरे शिक्षार्थियों की अपेक्षाकृत आध्यात्म सीखने और उसे अपने जीवन में लागू करने में अधिक सक्षम होगा । धन संचय और सामान्य पारिवारिक लगाव को नकारते हुए,धैर्यपूर्वक,क्षमतापूर्वक एवं शारीरिक और भावनात्मक सहनशीलता के साथ वो हर दिन का सामना करने में असाधारण योग्यता का प्रदर्शन करेंगे।इस समाधान ने कटु आलोचनाओं और अपार प्रशंसाओं को जन्म दिया । लोकतंत्र को सरकार का अच्छा स्वरूप माने जाने के विचार को तिरस्कृत करने में वो विशेष रूप से सख्त थे । हमें याद रखना चाहिए कि सुकरात के साथ शासन ने जो किया उसके प्रति प्लेटो की कड़वाहट कुछ हद तक उन लोगों की तरफ भी इंगित करती है जिन्होंने सुकरात का वध बिना विरोध के स्वीकार कर लिया था । यह लोकतंत्र के प्रति उनके द्वेष को दर्शाता है जैसा कि ‘गोर्जियास’ में उनके उस द्वेष को उजागर किया गया है जिसने उन्हें 399 ईसा पूर्व में सुकरात को अनावश्यक रूप से मृत्युदंड दिए जाने पर बुरी तरह ग्रसित किया था।

संकलन का युग जिसे कि प्लेटो का समयकाल माना जाता था,इस युग में निस्सन्देह विशुद्ध तर्क, ज्यामिति, यथार्थवाद, आदर्श प्रेम, राजनीति, कला और न्याय का अनोखा संगम देखा गया था ।
निस्सन्देह प्लेटो की यथार्थवाद,आदर्शवाद और न्याय की अवधारणा की काफी आलोचना की गई लेकिन अथाह प्रशंसाओं ने तिरस्कार को जीत लिया । प्लेटो हमेशा से कम व्यावहारिक और अधिक गूढ़ स्वभाव के समझे गये । हालांकि उनकी अनुशंसा कि राष्ट्र की बाग- डोर हमेशा बुद्धिमान लोगों के हाथों में रहनी चाहिये,कभी भी बदली नहीं जा सकी यहां तक कि उनके सबसे कटु आलोचकों द्वारा भी नहीं । प्लेटो का एथेंसवासियों से आग्रह कि “हमेशा न्यायपरायण और धार्मिक बने” आज भी उतनी ही उचित प्रतीत होती है जैसे कि कोई आधुनिक युग का संत हमें तब सलाह दे रहा हो,जब हम घोर भौतिकवाद और भय से घिरे हुए हों । ज्ञान के प्रचार-प्रसार ने इनके सार्वभौमिकता के सिद्धांत को विश्वसनीयता प्रदान की जिन्हें कई प्राचीन सभ्यताएं और संस्कृतियां पहले ही जी चुकी और समझ चुकी थी । कई लोगों ने उनकी विचारधाराओं की उपयोगिता का खंडन करने का प्रयास यह आरोप लगाकर किया कि उनके सिद्धांतों में धार्मिक लेख ज्यादा पाये जाते हैं इसलिए वो दार्शनिकता की अपेक्षा धार्मिकता से ज्यादा सम्बन्ध रखते हैं।
हालांकि लोग यह सिद्ध करने में विफल रहे बल्कि प्लेटो ने लोगों को सदाचारिता से जीने के लिए सिर्फ सुझाव ही नहीं दिया अपितु उसका विस्तारपूर्वक विवरण और तार्किक कारण भी दिया । प्लेटो के पास कई प्रतिष्ठित शिष्य थे उनमें सबसे श्रेष्ठ सिकंदर महान का गुरु अरस्तु था । यद्यपि प्लेटो की शिक्षाएं नव-प्लेटोवादियों के साथ जारी रहीं परन्तु उनके सुप्रसिद्ध शिष्य अरस्तु के कारण मध्यकालीन युग के दौरान उनकी ख्याति पर पूरी तरह ग्रहण लग गया था । प्लेटो की वास्तविक रचनाएं मुख्यतः पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव की वजह से पूरी तरह खो गई थी और तब तक लुप्त रही जब तक कि रचनाएं पंद्रहवीं शताब्दी के शुरुआत में नव प्लेटोवादी ‘जॉर्ज जेमिस्टोस प्लेथन’ के द्वारा कॉन्सटेंटीनोपोल शहर से लाई नहीं गयी ।
पुनर्जागरण के दौरान पुरानी सभ्यताओं के सार्वजानिक पुनरुत्थान के साथ ही प्लेटो का दर्शन फिर से बड़े पैमाने पर पश्चिम में फैल गया । बहुत से महानतम नव वैज्ञानिकों और कलाकारों ने प्लेटो के सिद्धांतों को कला और विज्ञान के लिए उन्नति के आधार के रूप में देखा था । हालांकि उनके सबसे अग्रणी शिष्य अरस्तु उनसे कई महत्वपूर्ण तरीकों से भिन्न थे क्योंकि वह खुद को सिर्फ विचारों से ही नहीं,अपितु जीवन के उद्देश्यों से भी संबंध रखते थे । सार्वभौमिक दायरे से अधिक उनका ध्यान यथार्थ में था । दुरेंट के शब्दों में “सुकरात और प्लेटो के मतों में भौतिकता और वास्तविकता से दूर सिद्धांतों और विचारों पर ज्यादा जोर देने की प्रवृत्ति थी । अरस्तु के मत ठीक इसके विपरीत वास्तविकता की तरफ थे,वो यथार्थवाद को ज्यादा वरीयता देते थे”।
लगभग 347 ईसा पूर्व में 20 वर्षों के गहन अध्ययन के पश्चात् अरस्तु ने अपना शिक्षण संस्थान “लायसियम” स्थापित किया । ये तारीख भी अन्य दूसरी तारीखों की तरह विवादित है । हालांकि 283 ईसा पूर्व में यह संस्थान बंद कर दिया गया लेकिन 410A.D में नव प्लेटोवादियों द्वारा इसे फिर से स्थापित किया गया । आखिरकार 529 A.D में ईसाई शासक जस्टीनियन के द्वारा इस अकादमी को नास्तिक संस्थान के रूप में घोषित कर इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया । प्लेटो 347 ईसा पूर्व तक जीवित रहे और लोगों को शिक्षित करते रहे । उनकी विचारधाराएं और शिक्षाएं इन सभी युगों के द्वारा दबाई नहीं जा सकी।
उनकी मृत्यु की कहानी उनके जीवन की ही तरह प्रेरणात्मक है-एक दोपहर अपने शिष्य के विवाह की दावत में वो एक बड़े भोज का हिस्सा बने और बड़े खुश-मिजाज मन से अपने चाहने वालों से विदा लेकर अपने शयनकक्ष में अल्पनिद्रा लेने चले गए । जब लम्बे समय तक प्लेटो नहीं उठे तब उनके शिष्यों ने उन्हें जगाने की बहुत कोशिश की लेकिन अफसोस कि प्लेटो नीद में ही इस दुनिया से विदा ले चुके थे ।
यह एक महान नैतिक जीवन का उचित समापन था । जिन्होंने अंत तक विश्वास रखा कि “जीवन जीने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि न्याय-परायणता और उत्तम गुणों का निरंतर अभ्यास करें फिर चाहे जीयें या मरें”। इतिहासकार डिओजेन्स के अनुसार प्लेटो को उनके द्वारा बनाये गए संस्थान में ही दफनाया गया । हालांकि उनकी कब्र को अभी तक किसी भी पुरातात्विक अन्वेषण के द्वारा खोजा नहीं जा सका है । यूनान के अतिप्रिय और सम्मानित व्यक्ति प्लेटो अपने पीछे अपने कार्यों की काया छोड़ गए जिसने पाश्चात्य विचारों की रचना की । इस महान इतिहासकार के जीवन की यात्रा का समापन “प्लेटोस गोर्जियास “के सम्पादक राडिया और बैल्डिवक के शब्दों से करना उचित होगा “सुकरात और अरस्तु के साथ प्लेटो भी पश्चिमी सभ्यता की संपूर्ण बौद्धिक परम्पराओं के आकृतिकार थे”।
प्लेटोकी बायोग्राफीज | 1 टिप्पणी >>
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