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गंजापन में सिर की त्वचा से बाल झड़ जाते हैं। और ये बाल तब झड़ने लगते हैं जब शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से रोमछिद्रोंपर (यह ऐसी जगह है जहां से बाल उगते हैं) पर हमला करते हैं। इसलिए एलोपेसिया को ‘स्पॉट बाल्डनेस’ के नाम से भी जाना जाता है। जब सिर की त्वचा से बाल झड़ते हैं तब वहां पर गोलाकार अथवा अंडाकार पैच बन जाता है। या फिर कभी-कभी पूरे सिर के बाल झड़ने लगते हैं। कुछ मामलों में बालों के झड़ने का असर सिर की पूरी त्वचा और पूरे शरीर पर पड़ता है और कभी-कभी बाल वापस बढ़ते हैं और फिर झड़ने लगते हैं।
एलोपेसिया एरिएटा में ज्यादातर गुच्छ के रूप में बाल झड़ते हैं जिसकी वजह से सिर की त्वचा पर एक गोलाकार नरम पैच (चकती) बन जाता है। कई बार जब बाल झड़ते हैं तब वे हमेशा के लिए नहीं झड़ते क्योंकि रोमकूप नष्ट नहीं होते और बाल वापस 6 महीने के अंदर अथवा एक साल में बढ़ जाते हैं। कुछ केसेस में बिना किसी चकत्ते के बाल एकदम पतले हो जाते हैं। कभी-कभार बाल गिरते हैं और वापस जब बढ़ते हैं तब वे लंबाई में पहले से छोटे होते हैं जो सिर पर खड़े ही रहते हैं। और कुछ केसेस में तो पूरे शरीर और सिर के ऊपर से बाल एक साथ गायब हो जाते हैं। बाद में जो बाल वापस बढ़ते हैं, वे नरम और सफेद रंग के होते हैं।
ज्यादातर मामलों में कुछ समय के बाद बाल वापस बढ़ने लगते हैं और अंतर सिर्फ यही होता है कि अबकी बालों का रंग सफेद हो जाता है और पतला होता है। इस मर्ज में सिर्फ 10% प्रतिशत लोगों के बाल फिर कभी वापस नहीं आते। कुछ केसेस में आनुवांशिकता की वजह से हमेशा के लिए बाल झड़ जाते हैं। जबकि कुछ मामले में एलर्जी, दूसरी ऑटोइम्यूनिटी डिसऑर्डर, एक्सटेन्सिव हेअर लॉस, 20 साल की उम्र से पहले ही बालों का झड़ना इत्यादि भी इसका कारण होता है।
एलोपेसिया एरिएटा मुख्य रूप से फीजिकल एक्झामिनेशन से पता चलता है। इसमें मरीज के मेडिकल हिस्ट्री की भी जांच की जाती है। फीजिकल एक्झामिनेशन में बालों की लटों को खींचकर देखा जाता है और हेअर लॉस के पैटर्न की जांच की जाती है। अगर जरूरत पड़ी तो डॉक्टर हेअर स्काल्प ऐनलिसिस और ब्लड टेस्ट की सलाह देते हैं ताकि सही तरीके से इसका निदान हो सके।
एलोपेसिया खासकर 20 साल से कम उम्रवाले यानी यंग लोगों में दिखाई देता है। इसका असर पुरुष और स्त्री दोनों पर होता है। जेनिटिक अथवा हेरिडिटी फैक्टर इसका मुख्य कारण होता है। पूर्व में अगर परिवार के किसी व्यक्ति पर एलोपेसिया का असर हुआ है तो इसकी संभावना ज्यादा होती है कि परिवार की वर्तमान पीढ़ी के लोगों में भी हो। ऑटो इम्यून डिसीज इसका मुख्य कारण होता है जहां पर शरीर की ‘इम्यून’ (रोगक्षम) अथवा ‘डिफेन्स’ सिस्टम अपने ही सेल्स पर हमला करती है। जिन लोगों को कोई एलर्जी होती है या जो लोग तनाव से परेशान होते हैं, उन लोगों के बाल ज्यादा झड़ते हैं जिनकी वजह से वे गंजे हो जाते हैं।
अगर कोई गंजेपन से परेशान है और उसे स्टेरॉइड के दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट्स) का डर है तो उसे अपने ऊपर औषधियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए बल्कि उसे नेचरल तरीके से बाल वापस बढ़ने का इंतजार करना चाहिए या फिर नीचे दिए गए तरीकों की मदद लेनी चाहिए:-
हेअर विग्स :- आर्टीफिशल अथवा सिन्थेटिक बाल मार्केट में उपलब्ध है। इसे सिर के ऊपर टेप और पिन्स की मदद से लगाया जा सकता है।
हेअर विवींग :- सिर पर जो पहले से ही मौजूद बाल होते हैं उन पर और खोपड़ी पर कृत्रिम बालों को बुना जाता है ताकि सर के बाल घने और लंबे दिखाई दें। लेकिन इससे सिर को नुकसान पहुंचता है जिसके कारण बाल और ज्यादा झड़ते हैं।
कॉस्मेटिक उपाय :- इसमें ‘पर्मिंग ऑफ हेअर’ शामिल है। जिससे बाल घने और मोटे लगते हैं। सिर के चकत्तों को छिपाने के लिए कलर और डाय का भी इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन अधिक मात्रा में डाय और कलर इस्तेमाल करने से नुकसान पहुंचता है।
क्या एलोपेसिया से ग्रस्त लोग इनको अपनाते हैं?
एलोपेसिया, जो कि ऑटो इम्यून डिसऑर्डर है, के उपचार के लिए वैज्ञानिक लगातार शोध में लगे हैं और इसमें उन्होंने कुछ हद तक सफलता भी हासिल की है। गंजेपन के इलाज के लिए आज कई नई टेक्निक उपलब्ध है जिससे बाल बढ़ते भी हैं।
अल्ट्रा वॉयलेट लाइट के साथ सोरेलियन का उपयोग :- इस थेरेपी को ‘पूवा’ के नाम से जाना जाता है। जिन लोगों के सिर का ज्यादातर भाग एलोपेसिया से प्रभावित होता है उन लोगों के लिए यह थेरेपी इस्तेमाल की जाती है या किन्हीं अन्य कारणों से जो लोग दूसरे उपचार के तरीके नहीं अपना सकते तो उनके लिए भी इस थेरेपी का उपयोग किया जाता है।
इस थेरपी में एक मेडिसीन, जिसे सोरलेन (Psoralen) कहते हैं, उसे व्यक्ति के सिर पर लगाया जाता है जिसके कारण अल्ट्रा वॉयलेट लाइट के प्रति उनका स्किन ज्यादा संवेदनशील बन जाता है। फिर उस स्किन को अल्ट्रा वॉयलेट लाइट के सामने एक्सपोज किया जाता है।
एलोपेसिया एरिएटा में किसी तरह का दर्द नहीं होता और ना ही यह खतरनाक है। लेकिन इसका व्यक्ति के ऊपर इस हद तक मानसिक असर (सायकोलॉजिकल इफेक्ट) होता है कि उसके कारण इंसान डिप्रेशन में चला जाता है और वे लोगों से मिलना-जुलना बंद कर देते हैं।
चूंकि एलोपेसिया बहुत छोटे बच्चों को भी हो सकता है, इसलिए जरूरी है कि बच्चों को पहले से ही समुचित सलाह दी जाए। आजकल दवाइयों के साथ कई टेक्नीक भी उपलब्ध है जिससे हालात में सुधार लाया जा सकता है। यह बीमारी लोगों में फैलती नहीं, इसलिए बाहर जाइए और लोगों से मिलिए। इसका उदाहरण है प्रसिद्ध व्यक्ति ‘क्रिस्टोफर रीव’ जो 16 साल की कम उम्र में एलोपेसिया एरीएटा से ग्रस्त हुए थे। वे बड़ी होशियारी से अपने गंजे चकत्तों को छिपाते थे। अपनी किताब ‘नथिंग इज इम्पॉसिबल’ में उन्होंने लिखा है कि ‘सुपरमैन’ की शूटिंग के दौरान वे हर तीन महीने पर गंजेपन से लड़ने के लिए स्टेरॉइड का इंजेक्शन लेते थे।