Copyright © 2012. ---
अल्झाइमर रोग में इंसान अपनी मानसिक क्षमताओं को लगातार खोता चला जाता है। यह बीमारी ज्यादातर बढ़ती उम्र में होती है। इस हालत में मरीज अपने दैनंदिन जीवन की छोटी-मोटी साधारण बातों को भी भूलने लगता है जैसे कि उसने सुबह क्या नाश्ता किया है। और धीरे-धीरे यह बीमारी बढ़कर इंसान को उस अवस्था में पहुंचा देती है जब व्यक्ति दिन और तारीख भी भूल जाता है, अपने घर का रास्ता भूल जाता है, अपने आसपास की जगह को भूल जाता है। जब यह बीमारी थोड़ी और बढ़ती है तब इंसान रोजमर्रा की जिंदगी के काम भी नहीं कर पाता और धीरे-धीरे वह मौत की तरफ बढ़ता चला जाता है।
एक जर्मन डॉक्टर अलॉइस अल्झाइमर को इस बीमारी को ढूंढ़ने का श्रेय दिया जाता है। वे न्यूरोपैथॉलॉजिस्ट और सायक्रेटिस्ट थे। सन् 1901 में जब वे फ्रैंकफर्ट हॉस्पीटल में काम कर रहे थे तब उनकी मुलाकात 51 साल की एक वृद्ध स्त्री से हुई जो मरीज थी। वह कुछ अजीब लक्षण दिखा रही थी। जब डॉक्टर उससे सवाल पूछ रहे थे तब वह कुछ अलग ही जवाब दे रही थी और कई बार तो वह जवाब देते वक्त बीच में ही रुक रही थी यहां तक कि अपना वाक्य भी पूरा नहीं कर पा रही थी। ऐसा लग रहा था कि मानो वह कहीं खो गई हो। अल्झाइमर को उसकी यह अवस्था काफी अलग महसूस हुई। बढ़ती उम्र के साथ जुड़े एक सामान्य भुलक्कड़पन से यह अलग था। डॉक्टर ने उसका पांच साल तक इंटरव्यू लिया और सन् 1906 में उस स्त्री की मौत हो गई। ऐनाटॉमी लेबोरेट्री के हेड होने के कारण अलॉइस अल्झाइमर को उसका ब्रेन आगे के विश्लेषण के लिए दिया गया। जब डॉक्टर ने उसके ब्रेन को ऐनलाइज किया तब उन्हें उसके ब्रेन के ऊपर कुछ खिंचाव (स्ट्रेन्स) और चोट दिखाई दी। उसके नर्व सेल्स अथवा न्यूरॉन्स प्लैक को काफी हानि पहुंची थी और वहां पर कुछ अलग संरचना दिखाई दे रही थी। अलॉइस इस बीमारी के लिए काम करते रहे और आखिरकार सन् 1911 में उन्होंने अपने निष्कर्ष प्रकाशित किए। इसलिए उनके अगाध रिसर्च और निष्कर्षों के सम्मान स्वरूप इस बीमारी का नाम ही ‘अल्झाइमर रोग’ कर दिया गया।
इसके लिए किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह स्थिति कई कारणों की वजह से पैदा होती है। सबसे महत्वपूर्ण है आनुवंशिक तत्व, औपचारिक शिक्षा का अभाव, और प्रारंभिक जीवन में कोई ट्रॉमा, इन्जरी, लाइफस्टाइल के फैक्टर्स जैसे डायटरी हैबिटस् और ओबेसिटी, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज इत्यादि। संक्षेप में कहा जाए तो कई कारणों की वजह से अल्झाइमर की बीमारी इंसान को हो जाती है।
लगातार चल रहे व्यापक अनुसंधानों ने इस हालत के लिए कई जवाब ढूंढ़े हैं। इनके अनुसार सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर है उम्र तथा आनुवंशिक इतिहास। पुरुषों से ज्यादा स्त्रियों पर इसका प्रभाव पड़ता है क्योंकि औसत तौर पर महिलाएं पुरुषों से ज्यादा उम्र तक जिंदा रहती हैं। दूसरा रिस्क फैक्टर होता है कम उम्र में हाई ट्रॉमा (गहरा घाव, अथवा सिर पर चोट)। कुछ ड्रग्स् जो नॉन स्टेरॉयडल और ऐन्टी इनफ्लेमेटरी होते हैं, वे भी अल्झाइमर के प्रभाव पर असर करते हैं। सामान्यत: यह हालत उम्र बढ़ने के साथ-साथ ब्रेन के सेल्स में अपेक्षित वृद्धि में कमी या रुकावट होने के कारण होती है। लेकिन यह बीमारी कभी-कभार 40-50 साल की उम्र में भी हो जाती है जो कि इंसान की जीवनशैली पर निर्भर होता है।
डिमेन्शिया (मनोभ्रंश) अथवा मेमरी लॉस तो अल्जाइमर से जुड़ा ही हुआ है, इसके दूसरे लक्षण इस प्रकार के हैं :-
1.मेमरी लॉस :- यह नॉर्मल है कि इंसान कभी कभार चीजों को भूल जाता है। लेकिन अगर यह भूलना एक आदत बन जाए तो खतरा हो सकता है।
2.लैंग्वेज बैरियर (भाषा की रुकावट) :- पीड़ित व्यक्ति को वार्तालाप करना मुश्किल हो जाता है तथा अपना विचार व्यक्त करना और कठिन हो जाता है।
3.नंबर भूलना :- महत्वपूर्ण सम्पर्क नंबर और सभी गणितीय क्रियाओं को भूलना।
4.दैनिक क्रिया को भूलना :- जैसे कपड़ों को ठीक तरह से पहनना या मौसम के अनुसार कपड़ों को पहनने में असमर्थ होना।
5.टॉयलेट फंक्शन्स :- शौच की सामान्य विधियों को भी खुद ना कर पाना और उसके लिए दूसरों की सहायता लेना।
6.कम गतिशीलता (लेस मोबिलीटी) :- रोज के कामकाज करने के लिए मरीज को मदद की और सुपरविजन की जरूरत होती है।
7.तालमेल ना होना (नो कोऑर्डिनेशन) :- उनके काम में और उनकी जो रोज की आवश्यकताएं होती हैं, उसमें कोई भी तालमेल नहीं होता।
संक्षेप में कहा जाए तो रोजमर्रा के कामकाज करने में मंद गति, उन्हें मदद और सुपरविजन की जरूरत या अपने आसपास की जगह से भटक जाना; ये सब घातक लक्षण हैं और इस वजह से कभी-कभी उनका ऐक्सिडन्ट भी हो जाता है और वे मौत के शिकार हो जाते हैं।
अल्झाइमर रोग को निश्चित करने के लिए कोई एक खास टेस्ट आजतक उपलब्ध नहीं है। इसलिए सबसे पहले तो डॉक्टर को यह तय करना होता है कि रोगी का मेमरी लॉस अबनॉर्मल है और यह लक्षण अल्झाइमर रोग से संबंधित है। तब उसके लिए खास मेमरी टेस्ट की जरूरत होती है। रोगी में दूसरी बीमारी के लक्षण जैसे विटामिन डेफिशियन्सी (विटामिन्स की कमतरता), मालन्यूट्रिशन (कुपोषण), डिप्रेशन, थायरॉइड डिसऑर्डर, अल्कोहल अब्यूस, कुछ खास दवाइयों के साइड इफेक्ट्स और दूसरे मेटॉबोलिक डिसऑर्डर अगर मरीज में नहीं पाए जाते हैं तो फिर अल्झाइमर रोग है या नहीं, यह तय करना पडता है। इन सबमें परिवार की जानकारी लेना भी काफी महत्वपूर्ण होता है। जहां पर डॉक्टर परिवार के लोगों का इन्टरव्यू लेते हैं और उनके काग्निटिव अबिलिटी (ज्ञानसंबंधी क्षमताओं) के बारे में जानकारी लेते हैं और इसके साथ ही उनकी शारीरिक जांच भी की जाती है। न्यूरोलॉजिस्ट या जिमेन्शिया अथवा जेरीऐट्रिक स्पेश्यलिस्ट काफी सारे टेस्ट करते हैं जैसे मेडिकल इवैल्युएशन और हिस्ट्री, ब्लड टेस्ट, ब्रेन स्कैन जैसे एमआरआई और पेट न्यूरॉलॉजिकल और न्यूरोसायकलॉजिकल असेसमेन्ट्स और साथ में डिमेंशिया टेस्ट (जो परिवार के लोगों का इंटरव्यू लेकर किया जाता है) भी किए जाते हैं। नए टेक्निक जैसे बायो मार्कर्स अल्झाइमर की बीमारी के लिए उपलब्ध है, लेकिन अभी तक कोई एक सिंगल टेस्ट निश्चित नहीं हुआ है।
नहीं, अभी तक 100% इलाज उपलब्ध नहीं है। हालांकि शोध अनवरत जारी है। लेकिन अभी तक कोई ऐसी दवा उपलब्ध नहीं हो पाई है जो बे्रन के नर्व सेल्स के लगातार बिगड़ने की गति को रोक सके। कुछ ऐसी दवाइयां जरूर बताई गई हैं जो अल्झाइमर के लक्षणों को थोड़ा कम करती है। भरपूर आर्थिक सहायता और लगातार रिसर्च के कारण लोगों को एक आशा जरूर है कि शायद किसी दिन इसकी थेरपी अथवा इलाज मरीजों को मिल जाएगा, जो इस घातक हालात में जीवन जी रहे हैं। दुनिया भर में इस बीमारी से लाखों लोग पीड़ित हैं और यह बीमारी बाकी लोगों को भी होने का खतरा है।
‘अल्झाइमर रोग’ को ‘फेमिली डिजीज’ के नाम से भी जाना जाता है। अपने प्रिय व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक हालत खराब होते देखना परिवार के लिए काफी दु:खदायक होता है। अल्झाइमर के रोगी की देखभाल करते समय केअर गिवर को पहले उनकी हेल्थ का ध्यान रखना पड़ता है। इमोशनल और प्रैक्टिकल सपोर्ट, भरोसा-अफजाई, साधनों की जानकारी और शिक्षा संबंधी कार्यक्रम (एज्युकेशनल प्रोग्राम्स); ये सारे उत्तम साधन होते हैं। केअर गिवर को अपने प्रिय व्यक्ति की देखभाल करते समय इनसे काफी मदद मिलती है। ट्रेनिंग के माध्यम से परिवार (केअर गिवर) का देखभालकर्ता मरीज का चैलेजिंग बिहेवियर संभालना सीख सकते हैं। उनका कम्यूनिकेशन स्किल्स सुधारने और मरीज को इस हालत में भी सुरक्षित रखने में उन्हें मदद मिलती है। अगर मरीज की देखभाल करनेवाले को यह समझ में आ जाए कि उनके प्रिय व्यक्ति का यह बर्ताव उन्हें सताने के लिए नहीं होता बल्कि उनकी इस खास अवस्था में उन्हें प्रेम और देखभाल की जरूरत है। और यहीं से देखभाल करनेवालों की यात्रा शुरू होती है कि वे अल्झाइमर रोग से पीड़ित मरीज के लिए सुरक्षित और आरामदायक माहौल का निर्माण करे।
सन् 1980 से 1989 तक यानी दो टर्म तक रोनाल्ड रीगन यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के प्रेसिडेन्ट रहे। पॉलिटिक्स में शामिल होने से पहले वे एक यशस्वी हॉलीवुड ऐक्टर थे। प्रेसिडेन्ट के रूप में दो टर्म खत्म करने के बाद वे पॉलिटिक्स से रिटायर हुए और सन् 1994 में उनके लिखे एक पत्र से पता चला कि वे अल्झाइमर की बीमारी से ग्रस्त थे। लगभग 10 साल के बाद 93 वर्ष की उम्र में साल 2005 में उनकी मौत उनके घर में हुई।