कोटेशन्स
प्रकृति

यह प्रकृति अपने नियम से चलती है। यहां नाशवान वस्तु नाश पा ही जाती है। इसीलिये यहां वक्त के साथ रावण की लंका ही नहीं ‘‘कृष्ण’’ की द्वारका भी डूब ही जाती है।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य जीवन हो या ब्रह्मांड, यहां सब कुछ नियम से घटता है। ...यानी प्रकृति के नियम एक ऐसा Formula है कि उसको समझने के बाद कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। जो चाहो Formula अपना लो व पा लो।

-दीप त्रिवेदी

प्रकृति का मनुष्य के जीवन में कोई Interference नहीं। प्रकृति की ओर से वह पूर्णरूपेण स्वतंत्र है। इस लिहाज से अपने सुख-दुःख का जिम्मेदार मनुष्य स्वयं नहीं तो और कौन है?

-दीप त्रिवेदी

अगले क्षण क्या करना यह इस क्षण तय कर लेना प्रकृति के खिलाफ जाना है। आश्चर्य है लोग-बाग तो बड़े होकर क्या बनना से लेकर कब मंदिर जाना व कब उपवास व रोजे रखना यह भी तय कर लेते हैं। अब प्रकृति के इतने खिलाफ जाओगे तो उसके कोप का भाजन तो बनना ही पड़ेगा।

-दीप त्रिवेदी

यह प्रकृति चारों ओर से दो-विरोधाभासों से संतुलित है। पृथ्वी पर जितने उभार हैं, उतनी ही गहरी खाइयां हैं। जितना विशाल Space है उतना ही विशाल Time है। यहां जितनी Negative शक्ति है उतनी ही Positive शक्ति भी है। ...बस प्रकृति को उसका यह Balance ही उसे टिकाये हुए है। और हमारा यह हाल इसलिए है कि हम अपना यह Balance बिगाड़ चुके हैं।

-दीप त्रिवेदी

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