प्रेम कोरे शब्दों या भावों से नहीं, आपस में करनेवाले व्यवहारों के अंतिम परिणाम से सिद्ध होता है। आपके आसपास सभी प्रसन्न व स्वस्थ - तो आपका प्रेम सच्चा।
-दीप त्रिवेदी
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प्रेम कोरे शब्दों या भावों से नहीं, आपस में करनेवाले व्यवहारों के अंतिम परिणाम से सिद्ध होता है। आपके आसपास सभी प्रसन्न व स्वस्थ - तो आपका प्रेम सच्चा।
-दीप त्रिवेदी
इस संसार में सच्चे प्रेम से बढ़कर दूसरी कोई ‘‘औषधि’’ नहीं हो सकती।
-दीप त्रिवेदी
प्रेम सीढ़ी-दर-सीढ़ी ही संभव है। अपने से हो, तो ही मनुष्य आसपास वालों से प्रेम कर सकता है। उनसे प्रेम करे तो सम्पूर्ण मनुष्यता के प्रेम में उतर सकता है। ...पर कई लोग तो सीधे पत्थरों व जानवरों के प्रेम में पड़ जाते हैं। समझ नहीं आता कि यह धोखा वे किसको दे रहे हैं?
-दीप त्रिवेदी
इस संसार में प्रेम का रिश्ता सिर्फ दो पूर्णतः आत्मनिर्भर व्यक्तियों के बीच ही शक्य है। सवाल यह कि दो ऐसे व्यक्ति साथ रहेंगे ही क्यों?
-दीप त्रिवेदी
प्रेम और क्रोध एक ही ऊर्जा के दो नाम हैं। एक का ठीक तरीके से उपयोग करना सीख जाओ...दूसरे की ऊर्जा स्वतः ही परिणामकारी कर्मों में लग जाएगी।
-दीप त्रिवेदी
प्रकृति में ऊर्जा के दो ही केन्द्र बिन्दु हैं, एक ‘क्रोध’ व दूसरा ‘प्रेम’। परंतु दुर्भाग्य से Science... Psychology की दृष्टि से देखना जानता ही नहीं। यहां ऊर्जा उत्पन्न या तो दो वस्तुओं के घर्षण यानी ‘क्रोध’ से होती है, या यह ऊर्जा उत्पन्न दो वस्तुओं के मिलन यानी ‘प्रेम’ से होती है।
-दीप त्रिवेदी
जीवन में मानसिक तौर पर पागल होने से बचना चाहते हो तो अपने प्रेम व क्रोध को खुला छोड़ दो। ...यह दोनों दबाने से विकृत हो जाते हैं।
-दीप त्रिवेदी
‘‘क्रोध’’ व ‘‘प्रेम’’...मनुष्य जीवन में ऊर्जा के यही दो केन्द्र हैं। धर्म, शिक्षा व समाज ने मिलकर इन दोनों को ही मनुष्य में से खत्म कर दिया है। इसी से पूरी मनुष्य जाति मर-मरकर जीने को मजबूर है।
-दीप त्रिवेदी
एक सच्चा ‘प्रेमी’ वह है जिसमें उसकी प्रेमिका को प्रेमी ही नहीं, दोस्त, पिता, गुरु, भाई, पुत्र सब नजर आए।
-दीप त्रिवेदी