भूत या भविष्य का किसी भी स्वरूप में सामने आना या उस बाबत एक क्षण को भी कुछ सोचना ...यही तो ‘अहंकार’ है।
-दीप त्रिवेदी
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भूत या भविष्य का किसी भी स्वरूप में सामने आना या उस बाबत एक क्षण को भी कुछ सोचना ...यही तो ‘अहंकार’ है।
-दीप त्रिवेदी
कुछ पाने पर अहंकार पकड़ना सिर्फ इस बात का सबूत है कि आपको अपनी योग्यता से ज्यादा मिल गया है।
-दीप त्रिवेदी
हर कोई ‘अहंकार’ के ऊंचे शिखरों पर विराजमान होना चाहता है; परंतु कुदरत की लीला ऐसी है कि यहां अहंकार के सर्वोच्च शिखरों पर सिर्फ ‘निःअहंकारी’ ही विराजमान हो पाता है।
-दीप त्रिवेदी
अहंकार से बड़ा ‘‘धोखेबाज’’ इस संसार में कोई नहीं। देखना हो तो अच्छे शब्द प्रयोग करनेवालों, सदैव अच्छी बात करनेवालों व मंदिर जानेवालों को देख लेना। अहंकार इन लोगों के सर चढ़कर बोलता है व इनको पता तक नहीं चलता।
-दीप त्रिवेदी
आपके भीतर दो आधार मजबूती से उपस्थित हैं। एक आपका ‘द्रष्टा’ व दूसरा आपका ‘अहंकार’। अहंकार वह जो सब कुछ कर रहा है व द्रष्टा वह जो सबकुछ होता हुआ देख रहा है।
-दीप त्रिवेदी
जीवन में जिस किसी सफलता से आपको अहंकार पकड़ ले...समझ लेना कि यह आपके बढ़ने की Limit आ गयी। अब आप यहां से सिर्फ नीचे जा सकते हैं।
-दीप त्रिवेदी
यदि आप अपनी निगाह लगातार करनेवाले यानी ‘अहंकार’ की जगह, देखनेवाले यानी ‘द्रष्टा’ पर बनाये रखेंगे...तो आपका वस्तुओं, व्यक्तियों व कर्मों से तादात्म्य टूट जाएगा। संसार के सारे दुःखों का मूल इस तादात्म्य में ही छिपा हुआ है।
-दीप त्रिवेदी
इस संसार की सर्वोच्च सत्ता ‘‘प्रकृति के नियम’’ है। कृष्ण, क्राईस्ट व बुद्ध भी वे ही हैं जो उसकी शरणागति स्वीकार कर अपना जाती अस्तित्व यानी ‘‘अहंकार’’ मिटा चुके हैं।
-दीप त्रिवेदी
किसी की मदद करने के बाद आपने धन्यवाद की आशा रखी, तो बेकार। उसके धन्यवाद देने से आपको अच्छा लगा तो भी सब व्यर्थ। फिर तो समझ लेना कि आपने अहंकार पोसने हेतु ही उसकी मदद की थी।
-दीप त्रिवेदी
अहंकार संतुलन बनाना जानता ही नहीं। वह या तो संसार में डूबा रहता है या फिर घबराकर संन्यास ले लेता है। ...लेकिन संसार में रहकर मन से संन्यासी होना उसे आता ही नहीं...।
-दीप त्रिवेदी