दुनिया के सारे दुःखों का मूल ‘‘मेरे’’ में छिपा हुआ है। यदि मेरा धन है तो खोने का दुःख, मेरा शरीर है तो उसकी बीमारी का दुःख। ...जबकि वास्तव में तो आपका अपने ‘‘होनेपन’’ के एहसास के अलावा और कुछ नहीं।
-दीप त्रिवेदी