कोटेशन्स
दुःख

दुनिया के सारे दुःखों का मूल ‘‘मेरे’’ में छिपा हुआ है। यदि मेरा धन है तो खोने का दुःख, मेरा शरीर है तो उसकी बीमारी का दुःख। ...जबकि वास्तव में तो आपका अपने ‘‘होनेपन’’ के एहसास के अलावा और कुछ नहीं।

-दीप त्रिवेदी

कुदरत का यह नियम है कि दुःख पड़ने पर वह मनुष्य को सहन करने की शक्ति दे ही देती है। गौर करना, हम जो दुःख वर्तमान में है उससे इतना दुःखी नहीं...जितना आने वाले दुःखों की सोच-सोच चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं।

-दीप त्रिवेदी

हमारे सारे दुःखों की जड़ में हमारा परिस्थिति के लिये मानसिक तौर पर तैयार न होना है। समझ नहीं आता कि जो दूसरों के साथ घटता है वह आपके साथ भी घट ही सकता है, यह आप मानकर ही क्यों नहीं चलते?

-दीप त्रिवेदी

हम अपने को शरीर के तल पर विशिष्ट मानना छोड़ दें, फिर हमारे आधे दुःख स्वतः ही तिरोहित हो जाएंगे। बीमारी से लेकर मृत्यु व Accident से लेकर हादसे; जो दूसरों के साथ घटते हैं वे हमारे व हमारे प्रियजनों के साथ भी घट ही सकते हैं। ...फिर इन सबका दुःख कब तक पालना?

-दीप त्रिवेदी

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