कोटेशन्स
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मनुष्य जन्म लिया है तो मन के हजारों शौक पालना व पूरे करना अच्छी बात है। यह आपके मन का विकास ही करेगा। परंतु चैतन्य के स्तर पर ‘ध्येय’ बड़ा व एक ही रखना। बुद्ध, जीसस, एडीसन, बिल गेट्स, शेक्सपीयर...सब चैतन्य के स्तर पर ‘एक-लक्षी’ होने के परिणाम हैं।

-दीप त्रिवेदी

सवाल यह कि कृष्ण, जीसस व बुद्ध जैसे अद्भुत व्यक्तित्व से ‘‘बुुद्धिमान’’ दूर क्यों हो गये? क्योंकि अपनी-अपनी दुकानें मजबूत करने हेतु धर्मगुरुओं ने उनके साथ चमत्कार जोड़ दिये। अब बुद्धिमान मनुष्य चाहे जो स्वीकारे पर ‘चमत्कार’ कभी नहीं स्वीकार सकता।

-दीप त्रिवेदी

हम अपने को शरीर के तल पर विशिष्ट मानना छोड़ दें, फिर हमारे आधे दुःख स्वतः ही तिरोहित हो जाएंगे। बीमारी से लेकर मृत्यु व Accident से लेकर हादसे; जो दूसरों के साथ घटते हैं वे हमारे व हमारे प्रियजनों के साथ भी घट ही सकते हैं। ...फिर इन सबका दुःख कब तक पालना?

-दीप त्रिवेदी

जो सब जगह सबको समान रूप से प्रभावित करता है वही अल्लाह की नेमत है। जैसे सूरज, चांद, हवा, पानी व मनुष्य का जीवन। ऐसे में अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग शास्त्र होना व अपनी भिन्न-भिन्न मान्यताएं होना कैसे धार्मिक हो सकता है?

-दीप त्रिवेदी

बुद्धि तोड़कर देखती है, क्योंकि उसे सिर्फ वस्तुओं की पहचान है। जबकि मन वस्तुओं को अलग से जानता ही नहीं; वह तरंगों व उनकी गहराइयों को ही समझता है। बस इन दोनों में आपसी Communication न बिठा पाने के कारण ही सभी पूरी तरह असफल हैं।

-दीप त्रिवेदी

‘‘द्रष्टा’’ की उपस्थिति का सबसे बड़ा सबूत तो यह है कि कुछ भी गलत करते वक्त दूसरा कोई जाने या न जाने, ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसे खुद अपने गलत करने का एहसास न होता हो।

-दीप त्रिवेदी

हम यह सीधा सत्य क्यों नहीं समझते कि हमें अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा सिर्फ अपने साथ बिताना होता है। फिर क्यों हम किसी मनुष्य या वस्तु पर निर्भर हो दुःख को आमंत्रित करते हैं? भला अपने आनंद हेतु दूसरों पर निर्भर रहने वाला कभी खुश हो ही कैसे सकता है?

-दीप त्रिवेदी

हमारे सारे दुःखों की जड़ में हमारा परिस्थिति के लिये मानसिक तौर पर तैयार न होना है। समझ नहीं आता कि जो दूसरों के साथ घटता है वह आपके साथ भी घट ही सकता है, यह आप मानकर ही क्यों नहीं चलते?

-दीप त्रिवेदी

सम्पूर्ण विज्ञान की पहुंच Time और Space के भीतर है। ...जबकि जगत के सारे रहस्य Time व Space की सीमा के बाहर है। इसलिये कई रहस्य विज्ञान के लिये हमेशा रहस्य ही बने रहेंगे।

-दीप त्रिवेदी

‘भय’ और ‘लोभ’ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक से स्वयं को बचा लो...दूसरे से स्वतः ही छुटकारा मिल जाएगा।

-दीप त्रिवेदी

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