प्रकृति में कोई भी स्वार्थ-भावना से नहीं जी रहा है। हम अपनी स्वार्थ-प्रवृत्ति के कारण ही प्रकृति से टूट चुके हैं।
-दीप त्रिवेदी
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प्रकृति में कोई भी स्वार्थ-भावना से नहीं जी रहा है। हम अपनी स्वार्थ-प्रवृत्ति के कारण ही प्रकृति से टूट चुके हैं।
-दीप त्रिवेदी
हमारे जीवन व व्यवसाय के सिद्धांतों में कोई फर्क नहीं। दोनों सबके हित की सोचने से ही फलते-फूलते हैं। स्वार्थी प्रवृत्ति से दोनों विनाश के कगार पर आ खड़े होते हैं।
-दीप त्रिवेदी