आप प्रेम हो या व्यवसाय, दान हो या क्रोध, सबकुछ आधे-अधूरे मन से ही करते हैं। ऐसे में आप निर्णायक परिणाम की अपेक्षा ही कैसे रख सकते हैं?
-दीप त्रिवेदी
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आप प्रेम हो या व्यवसाय, दान हो या क्रोध, सबकुछ आधे-अधूरे मन से ही करते हैं। ऐसे में आप निर्णायक परिणाम की अपेक्षा ही कैसे रख सकते हैं?
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य के लिए उसके अपने जीवन हेतु सबसे ज्यादा कीमती समय, शक्ति व धन है। धार्मिक क्रियाएं इन तीनों का जमकर शोषण करती हैं।
-दीप त्रिवेदी
हमारे मन व जीवन के सिद्धांत, विज्ञान के सिद्धांतों से कहीं गहरे व ऊंचे हैं। दरअसल विज्ञान की भी सारी खोजें तो मन व जीवन के सिद्धांतों को ही आभारी हैं।
-दीप त्रिवेदी
आप मेरा विश्वास करें कि ‘आप’ अपने समेत सबके जीवन के उतार-चढ़ावों को सिर्फ देखने वाले हैं। आपकी दिक्कत यह है कि आप अपने को करने वाला मानते हैं।
-दीप त्रिवेदी
बेवकूफी व बदमाशी में फर्क क्या है? अन्जाम तो दोनों का बराबरी पर ही भुगतना पड़ता है।
-दीप त्रिवेदी
हम यह सीधा सत्य क्यों नहीं समझते कि हमें अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा सिर्फ अपने साथ बिताना होता है। फिर क्यों हम किसी मनुष्य या वस्तु पर निर्भर हो दुःख को आमंत्रित करते हैं? भला अपने आनंद हेतु दूसरों पर निर्भर रहने वाला कभी खुश हो ही कैसे सकता है?
-दीप त्रिवेदी
हमारे सारे दुःखों की जड़ में हमारा परिस्थिति के लिये मानसिक तौर पर तैयार न होना है। समझ नहीं आता कि जो दूसरों के साथ घटता है वह आपके साथ भी घट ही सकता है, यह आप मानकर ही क्यों नहीं चलते?
-दीप त्रिवेदी
अब वक्त आ गया है जब विश्वभर के सारे खुले विचारों वाले बुद्धिमान मुस्लिम अपना एक तगड़ा Association बना लें। यदि वे ही हिम्मत नहीं दिखाते, उन्हें ही अपने भाई-बंधुओं की नहीं पड़ी...तो दूसरा कब तक उनके पीछे प्रयास करेगा?
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य हिंदू, मुस्लिम, ईसाई या बौद्ध क्यों है? क्योंकि वह व्यक्तित्व-हीनता के कारण भीड़ में अकेले खड़े होने से घबराता है। ...जबकि ‘‘हिंदू’’ बने रहने पर उसे संबल बना रहता है कि उसके साथ सौ-करोड़ लोग हैं। यही सायकोलॉजी मुस्लिम, ईसाई व बौद्धों की भी है।
-दीप त्रिवेदी
दुनिया में दो ही तरीके के लोग सुखी व सफल हो सकते हैं। एक तो वे जो ईश्वर को सर्वशक्तिमान मान ले...फिर तो अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य सब उसकी मरजी से हो रहा है, बात समाप्त हुई। या तो वे जो मान ले कि ईश्वर है ही नहीं और अपनी सम्पूर्ण जवाबदारी स्वयं उठा ले, बात फिर भी समाप्त हो गयी। लेकिन क्योंकि सभी इन दो पाटनों के बीच में झूला झूल रहे हैं, इसलिए दुःखी व असफल हैं।
-दीप त्रिवेदी