दूसरों पर हिंसा वही मनुष्य कर पाता है, जो जाने-अनजाने स्वयं को सता रहा हो। बाकी स्वयं से प्रेम करने वाला कभी दूसरों का अहित कर ही नहीं सकता।
-दीप त्रिवेदी
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दूसरों पर हिंसा वही मनुष्य कर पाता है, जो जाने-अनजाने स्वयं को सता रहा हो। बाकी स्वयं से प्रेम करने वाला कभी दूसरों का अहित कर ही नहीं सकता।
-दीप त्रिवेदी
जिस व्यक्ति को अपने से ही प्रेम नहीं, भले ही वह अहिंसा के नाम पर मांसाहार न खाए; परंतु उसका चित्त कभी अहिंसक नहीं हो सकता है।
-दीप त्रिवेदी
जिसको स्वयं से प्रेम हो वह कम-से-कम चिंता और ईर्ष्या तो नहीं ही करेगा।
-दीप त्रिवेदी
आप कैसे हैं, यह इतना महत्वपूर्ण नहीं जितना कि ‘‘आप जैसे हैं वैसे दिखते हैं या नहीं।’’
-दीप त्रिवेदी
जिसे अपने से प्रेम नहीं वह विश्व में किसी से प्रेम नहीं कर सकता। और जिसे अपने से प्रेम हो वह कम-से-कम धर्म या शिक्षा के नाम पर किसी को सताएगा तो नहीं ही...।
-दीप त्रिवेदी
हम यह सीधा सत्य क्यों नहीं समझते कि हमें अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा सिर्फ अपने साथ बिताना होता है। फिर क्यों हम किसी मनुष्य या वस्तु पर निर्भर हो दुःख को आमंत्रित करते हैं? भला अपने आनंद हेतु दूसरों पर निर्भर रहने वाला कभी खुश हो ही कैसे सकता है?
-दीप त्रिवेदी
राजा वह है जो अपना मालिक स्वयं है। आप तो अपने धर्म, जाति, समाज, विचारों, इच्छाओं व चिंताओं के सेवक हैं।
-दीप त्रिवेदी