दूसरों पर हिंसा वही मनुष्य कर पाता है, जो जाने-अनजाने स्वयं को सता रहा हो। बाकी स्वयं से प्रेम करने वाला कभी दूसरों का अहित कर ही नहीं सकता।
-दीप त्रिवेदी
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दूसरों पर हिंसा वही मनुष्य कर पाता है, जो जाने-अनजाने स्वयं को सता रहा हो। बाकी स्वयं से प्रेम करने वाला कभी दूसरों का अहित कर ही नहीं सकता।
-दीप त्रिवेदी