कोटेशन्स
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प्रकृति में ऊर्जा के दो ही केन्द्र बिन्दु हैं, एक ‘क्रोध’ व दूसरा ‘प्रेम’। परंतु दुर्भाग्य से Science... Psychology की दृष्टि से देखना जानता ही नहीं। यहां ऊर्जा उत्पन्न या तो दो वस्तुओं के घर्षण यानी ‘क्रोध’ से होती है, या यह ऊर्जा उत्पन्न दो वस्तुओं के मिलन यानी ‘प्रेम’ से होती है।

-दीप त्रिवेदी

जिस व्यक्ति को अपने से ही प्रेम नहीं, भले ही वह अहिंसा के नाम पर मांसाहार न खाए; परंतु उसका चित्त कभी अहिंसक नहीं हो सकता है।

-दीप त्रिवेदी

पता नहीं यह मुस्लिम समाज वक्त के साथ अपनी कुनीतियां छोड़ने में इतना वक्त क्यों लगाता है? अब जब आज सऊदी अरब में स्त्रियों को मताधिकार का हक दिया जा सकता है, तो यह पचास-सौ साल पहले क्यों नहीं दिया जा सकता था?

-दीप त्रिवेदी

हर कोई ‘अहंकार’ के ऊंचे शिखरों पर विराजमान होना चाहता है; परंतु कुदरत की लीला ऐसी है कि यहां अहंकार के सर्वोच्च शिखरों पर सिर्फ ‘निःअहंकारी’ ही विराजमान हो पाता है।

-दीप त्रिवेदी

इस संसार में ‘जो’ हर घटनेवाली अच्छी-बुरी घटना से सीखने की कला जानता है, व पूरे सब्र के साथ घटनेवाली घटना के अंतिम परिणाम का इन्तजार कर सकता है; ‘वह’ जल्द ही जान जाता है कि यहां बुरा कुछ हो ही नहीं सकता।

-दीप त्रिवेदी

हम भी अजीब हैं व हमारे धर्मगुरु भी। हम सिर्फ अपने अहंकार की पूर्ति हेतु अपने धर्म की अच्छाई सुनने उनके पास जाते हैं, व वे सयाने भी इसका ङ्गायदा उठाते हुए हमारा अहंकार सहलाकर अपनी समृद्धि बढ़ाये चले जाते हैं। इससे हम इतने तो अंधे हो जाते हैं कि हमें अपने धर्म की बुराई व दूसरे धर्मों की अच्छाई ही दिखना बंद हो जाती है। यह आपका कितना बड़ा नुकसान है इसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य की Intelligence की Highest ऊंचाई ‘‘मन का विज्ञान’’ समझना है। उससे थोड़ा नीचे की Intelligence "Time & Space" के सिद्धांत व उसके प्रभाव समझने में है। आश्चर्य यह कि यह दो न जानने वाले भी अपने को बुद्धिमान मानते हैं।

-दीप त्रिवेदी

अपनी ही बात को सच्चा मान उसका दृढतापूर्वक साथ तो आप सदियों से देते आ रहे हैं। लेकिन यह क्यों नहीं समझते कि यथायोग्य आलोचना सहे बगैर वक्त के अनुसार राह नहीं पायी जा सकती। मनुष्य की चेतना का यह नियम है कि जो जितना अपने खिलाफ सुनने को तैयार रहता है, उतना ही वह निखरता चला जाता है। अपनी ही कट्टरता के कारण विश्वभर के मुसलमान भाई ‘‘बुद्धिमानों’’ की इस अपार करुणा से करीब-करीब वंचित हैं।

-दीप त्रिवेदी

यह प्रकृति चारों ओर से दो-विरोधाभासों से संतुलित है। पृथ्वी पर जितने उभार हैं, उतनी ही गहरी खाइयां हैं। जितना विशाल Space है उतना ही विशाल Time है। यहां जितनी Negative शक्ति है उतनी ही Positive शक्ति भी है। ...बस प्रकृति को उसका यह Balance ही उसे टिकाये हुए है। और हमारा यह हाल इसलिए है कि हम अपना यह Balance बिगाड़ चुके हैं।

-दीप त्रिवेदी

क्या विज्ञान कभी जीवन पैदा कर पाएगा? नहीं, सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि पैदा या नष्ट करने की सत्ता यहां किसी के पास नहीं।

-दीप त्रिवेदी

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