कोटेशन्स
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धार्मिक शास्त्र हजारों वर्ष पुराने हैं। वे जाने कबसे मनुष्य के उद्धार में लगे पड़े हैं। फिर भी मनुष्य के दुःख-दर्दों को देखते हुए वे पूरी तरह असफल सिद्ध हुए हैं। अब समय आ गया है...जब नये विचारों को अपनाया जाए।

-दीप त्रिवेदी

एक बार में एक कार्य पर ध्यान ‘योग’ है, फिर वह कार्य कोई भी क्यों न हो? वैसे ही एक बार में अनेक कार्यों पर ध्यान ‘काम’ है, फिर चाहे वे कार्य आप कितने ही महान या आवश्यक मानकर क्यों न कर रहे हों।

-दीप त्रिवेदी

हमारे व बुद्ध, कृष्ण या जीसस में फर्क क्या है? पहले तो वे मन के विकारों से उबरकर उसकी शक्तियों से ओतप्रोत हो गये, और फिर उसी शक्ति को उन्होंने जगत के उद्धार में लगाया। और हम - ऐसे तो निर्गुणी कि खुद ‘अपने उद्धार की शक्ति’ भी नहीं जुटा पा रहे।

-दीप त्रिवेदी

आप एक क्षण को जागकर ध्यान से ब्रह्मांड की विशालता या समुद्र की गहराई को देख लेना, आपके सारे दुःख तिरोहित हो जाएंगे; क्योंकि फिर आपको अपने कुछ ‘‘बड़े’’ या ‘‘विशिष्ट’’ होने का गुमान बचेगा ही नहीं।

-दीप त्रिवेदी

जब भी आप की मंजिल लंबी हो, व यात्रा छोटी-छोटी मंजिलें तय कर काटनी हो, तब मार्ग में मिलने वाली सफलताओं से उत्साहित हो जाना तो अच्छी बात है, पर उस उत्साह में होश खो देना मंजिल से भटकाने वाला सिद्ध होता है।

-दीप त्रिवेदी

प्रकृति में कोई भी मनुष्य परफेक्ट नहीं होता है। हर व्यक्ति का अपना एक स्वभाव और अपना एक क्षेत्र होता है। हम जिन्हें भगवान कहते हैं वे भी जीवनभर विज्ञान के ज्ञान से अनजान ही थे।

-दीप त्रिवेदी

मेहरबानी कर पुरानी व गलत शिक्षाओं के जाल में न पड़ें। यह स्पष्ट समझ लें कि मन के तल पर कोई भी भाव दबाने के सिर्फ दुष्परिणाम आते हैं।

-दीप त्रिवेदी

यदि आप अपनी निगाह लगातार करनेवाले यानी ‘अहंकार’ की जगह, देखनेवाले यानी ‘द्रष्टा’ पर बनाये रखेंगे...तो आपका वस्तुओं, व्यक्तियों व कर्मों से तादात्म्य टूट जाएगा। संसार के सारे दुःखों का मूल इस तादात्म्य में ही छिपा हुआ है।

-दीप त्रिवेदी

प्रेम और क्रोध एक ही ऊर्जा के दो नाम हैं। एक का ठीक तरीके से उपयोग करना सीख जाओ...दूसरे की ऊर्जा स्वतः ही परिणामकारी कर्मों में लग जाएगी।

-दीप त्रिवेदी

यह प्रकृति चारों ओर से दो-विरोधाभासों से संतुलित है। पृथ्वी पर जितने उभार हैं, उतनी ही गहरी खाइयां हैं। जितना विशाल Space है उतना ही विशाल Time है। यहां जितनी Negative शक्ति है उतनी ही Positive शक्ति भी है। ...बस प्रकृति को उसका यह Balance ही उसे टिकाये हुए है। और हमारा यह हाल इसलिए है कि हम अपना यह Balance बिगाड़ चुके हैं।

-दीप त्रिवेदी

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