आज के समय में धन का प्रभाव इतना तो बढ़ गया है कि अब धनवान में अलग से अन्य कोई गुण होने की आवश्यकता ही नहीं रह गयी है।
-दीप त्रिवेदी
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आज के समय में धन का प्रभाव इतना तो बढ़ गया है कि अब धनवान में अलग से अन्य कोई गुण होने की आवश्यकता ही नहीं रह गयी है।
-दीप त्रिवेदी
हमारे भीतर की आत्मा ही इस जगत की सबसे ज्यादा शक्तिशाली शक्ति है। यह आत्मा ही परमात्मा है। यह सब सुनने-समझने के बावजूद हम मंदिर-मस्जिदों में जाते हैं...तो यह सिवाय स्वयं की आत्मा पर अश्रद्धा के और क्या दर्शाता है?
-दीप त्रिवेदी
जब हम अपना जीवन लाखों मनुष्यों द्वारा बनाई वस्तुओं के भरोसे गुजारते हैं, तो क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं कि मृत्यु से पहले हम कोई ऐसा कार्य कर जाएं जिससे आनेवाले लाखों मनुष्यों का जीवन सुख, शांति, आनंद और समृद्धि से भर जाए?
-दीप त्रिवेदी
हमारे मन व जीवन के सिद्धांत, विज्ञान के सिद्धांतों से कहीं गहरे व ऊंचे हैं। दरअसल विज्ञान की भी सारी खोजें तो मन व जीवन के सिद्धांतों को ही आभारी हैं।
-दीप त्रिवेदी
बच्चों को मां-बाप द्वारा सुनायी जाने वाली हजार शिक्षाप्रद कहानियों में राम व श्रवण जैसे आज्ञाकारी बच्चों की कहानियां अक्सर कुछ ज्यादा ही चाव से सुनायी जाती है। कहीं उनमें से कुछ अपने बच्चों की जवानियां खुदके बुढ़ापे पर निछावर करने की छिपी तमन्ना लिए तो नहीं बैठे हैं?
-दीप त्रिवेदी
बुद्धि लाख समझे कुछ नहीं होता, समझना ‘‘मन’’ को होता है। क्रोध में गलत निर्णय होने के कारण बुद्धि लाख निर्णय कर ले कि अगली बार क्रोध नहीं करना, पर मन ने क्रोध भेजा नहीं कि मनुष्य क्रोधित हुआ नहीं।
-दीप त्रिवेदी
समस्या कितने ही विकराल स्वरूप में प्रकट क्यों न हो जाए, उसका कोई-न-कोई उपाय Time या Space में होता ही है। सवाल बिना घबराये मन की गहराइयों से उसपर चिंतन करने का ही है।
-दीप त्रिवेदी
क्यों कयामत के दिन का इन्तजार कर इन्साफ हेतु खुदा को तकलीफ देने पर तुले हुए हो? क्यों नहीं आज ही आसपास चल रहे गलत कार्यों पर स्वयं लगाम लगा देते?
-दीप त्रिवेदी
जीवन में कोई भी मनुष्य सिर्फ बुरा नहीं हो सकता। बुरे-से-बुरे मनुष्य में भी हजार अच्छाइयां तो छिपी ही रहती हैं। मनुष्यों की सिर्फ अच्छाइयों को देखनेवाला परम शांति से जीता चला जाता है।
-दीप त्रिवेदी
कोई भी शारीरिक प्रतिबंध दो-कौड़ी का है। महत्वपूर्ण वह प्रज्ञा है जिससे आपका मन परिवर्तित हो जाए।
-दीप त्रिवेदी