कोटेशन्स
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मनुष्य के मन की श्रेष्ठ स्थिति दो विरोधाभासों से ही संतुलित होती है। लेकिन हम बुद्धि के चक्कर में एक को अपनाने व दूसरे को छोड़ने के प्रयास में लग जाते हैं। हमारा अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य सब इसी से परिभाषित है।

-दीप त्रिवेदी

‘हां’ आस्तिकता है और ‘ना’ नास्तिकता है। आपने जीवन में जितनी चीजों का दृढ़तापूर्वक निषेध कर रखा है...उतने ही आप अधार्मिक। अधार्मिकता का अर्थ ही ईश्वर की रचनाओं का अस्वीकार है।

-दीप त्रिवेदी

हम ‘‘मनुष्य’’ के शरीर, संस्कृति व चेतना के जिस Refined स्वरूप को देख रहे हैं, वह अरबों वर्षों के करोड़ों असफल प्रयास के बाद प्राप्त हुआ है। ऐसे मूल्यवान जीवन को सिर्फ शिक्षा, शादी, बच्चे, कमाने व बुढ़ापे के रोने में नष्ट नहीं किया जा सकता।

-दीप त्रिवेदी

सत्य सदैव से है व रहेगा। क्योंकि सत्य विश्व की सारी विरोधाभासी शक्तियों व भावों के बीच के सेतु का नाम है। शक्तियां व भावों में दोनों ओर कितने ही उतार-चढ़ाव आ जाएं, सत्य स्थिर ही रहता है।

-दीप त्रिवेदी

हमारे मन की गहराइयों का प्रकृति से "Auto Tuning'' है। एक बार जिसने उन गहराइयों से जीना चालू कर दिया...फिर उसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता।

-दीप त्रिवेदी

बच्चे की बुद्धि में अच्छा-बुुरा, मेरा-तेरा या पाप-पुण्य नहीं होता। इन सबकी उसपर कंडीशनिंग की जाती है। वैसे ही बच्चे का Liver तीखा या तेल वाला नहीं खा सकता, उसे भी Trained ही करना पड़ता है।

-दीप त्रिवेदी

यह जगत "Three Dimensions Theory" से अस्तित्व में है। हमारे समेत इस जगत का कण-कण सिर्फ इसी Theory से चलायमान है। हर वस्तु व घटना के तीनों Dimensions को समझना मनुष्य के बुद्धिमत्ता की सबसे बड़ी ऊंचाई है।

-दीप त्रिवेदी

सवाल यह कि कृष्ण, जीसस व बुद्ध जैसे अद्भुत व्यक्तित्व से ‘‘बुुद्धिमान’’ दूर क्यों हो गये? क्योंकि अपनी-अपनी दुकानें मजबूत करने हेतु धर्मगुरुओं ने उनके साथ चमत्कार जोड़ दिये। अब बुद्धिमान मनुष्य चाहे जो स्वीकारे पर ‘चमत्कार’ कभी नहीं स्वीकार सकता।

-दीप त्रिवेदी

प्रकृति में ऊर्जा के दो ही केन्द्र बिन्दु हैं, एक ‘क्रोध’ व दूसरा ‘प्रेम’। परंतु दुर्भाग्य से Science... Psychology की दृष्टि से देखना जानता ही नहीं। यहां ऊर्जा उत्पन्न या तो दो वस्तुओं के घर्षण यानी ‘क्रोध’ से होती है, या यह ऊर्जा उत्पन्न दो वस्तुओं के मिलन यानी ‘प्रेम’ से होती है।

-दीप त्रिवेदी

मन का विज्ञान हमारे बुद्धि के ज्ञान से सर्वथा उलटा है। मन के तल पर चूंकि हम गलत कार्य कर पछताते हैं, इसीलिए उसी कार्य को फिर-फिर दोहराते हैं। अतः मन के तल पर पछताना नहीं, समझना हितकर है।

-दीप त्रिवेदी

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