कोटेशन्स
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सारे बड़े व महत्वपूर्ण कार्य होते हैं, किये नहीं जा सकते। फिर चाहे वह पृथ्वी का घूमना हो या आपका खाना पचाना। वह चाहे हवाओं का बहना हो या आपका सांस लेना। और चाहे वह कोई मीठी धुन बनाना हो या कोई आविष्कार करना हो।

-दीप त्रिवेदी

जीवन में जो भी प्रयत्न कर पाया जाएगा वह कभी भी सुख नहीं देगा। क्योंकि दुःख की शुरुआत तो प्रयत्न करने से ही शुरू हो जाती है। जबकि जो कार्य आपसे आनंदपूर्वक होते हैं व होते चले जाते हैं, उससे आप जो भी हासिल करेंगे वे हमेशा ही परिणामकारी व सुखदायी होंगे।

-दीप त्रिवेदी

यदि आप अपने ‘होनेपन’ व ‘स्वभाव’ को अलग-अलग पहचान लेंगे, तो उसके बाद आपके जीवन में कभी कोई समस्या नहीं आएगी।

-दीप त्रिवेदी

जो कट्टर हैं व अपने विरुद्ध नहीं सुन सकते, उन्हें हम आतंकवादी कहते हैं। क्या इनसे मिलते-जुलते लक्षण हमारे अधिकांश धर्मगुरुओं में नहीं? यदि ऐसा न होता तो सुकरात, जीसस व मन्सूर को मारा क्यों जाता?

-दीप त्रिवेदी

चाहे आपका उससे रिश्ता कुछ भी क्यों न हो, बने वहां तक किसी के जाती जीवन में दखल न दें। क्योंकि अभी आपको स्वयं अच्छे-बुरे की पहचान कहां? जब तक आत्मिक सुख-दुःख व अहंकार के सुख-दुःख का आपको भेद नहीं मालूम, दूसरों के जीवन से दूर ही रहें तो अच्छा है।

-दीप त्रिवेदी

प्रेम और क्रोध एक ही ऊर्जा के दो नाम हैं। एक का ठीक तरीके से उपयोग करना सीख जाओ...दूसरे की ऊर्जा स्वतः ही परिणामकारी कर्मों में लग जाएगी।

-दीप त्रिवेदी

हमारा मन अद्भुत शक्तियों से भरा पड़ा है, साथ ही इसमें हजारों विकार भी हैं। चूंकि हम मन के विकारों को नहीं जीत पाते, इसीलिए उसकी अद्भुत शक्तियों से भी वंचित रह जाते हैं।

-दीप त्रिवेदी

चूंकि मनुष्य की चेतना ने अमीबा से मनुष्य तक का सफर क्रमशः प्रगति के सिद्धांत पर आधारित होकर ही तय किया है, इसलिये ध्यान देना कि हर कोई अपने में कई जानवरों के गुण पाएगा। और उन गुणों से निजात पाना ही मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है।

-दीप त्रिवेदी

प्रकृति में कोई भी मनुष्य परफेक्ट नहीं होता है। हर व्यक्ति का अपना एक स्वभाव और अपना एक क्षेत्र होता है। हम जिन्हें भगवान कहते हैं वे भी जीवनभर विज्ञान के ज्ञान से अनजान ही थे।

-दीप त्रिवेदी

विज्ञान वस्तुओं की सायकोलोजी के रूपांतरण का नाम है। धर्म मनुष्य की सायकोलोजी को रूपांतरित करनेवाले ज्ञान का नाम है। विज्ञान मनुष्य को भौतिक सुख तो दे सकता है, परंतु मानसिक सुख हेतु तो मनुष्य को अपनी सायकोलोजी रूपांतरित करनी ही रही। अतः दोनों का यथायोग्य समन्वय मनुष्य व संसार दोनों के उत्थान का मार्ग है।

-दीप त्रिवेदी

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