कोटेशन्स
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बुद्धि लाख समझे कुछ नहीं होता, समझना ‘‘मन’’ को होता है। क्रोध में गलत निर्णय होने के कारण बुद्धि लाख निर्णय कर ले कि अगली बार क्रोध नहीं करना, पर मन ने क्रोध भेजा नहीं कि मनुष्य क्रोधित हुआ नहीं।

-दीप त्रिवेदी

कहते हैं, अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान। ...बात भी सही है; पर बुद्धिमानों की इस दुनिया में ‘‘सहज’’ बनने को ज्यादा लोग तैयार ही कहां होते हैं?

-दीप त्रिवेदी

‘भय’ और ‘लोभ’ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक से स्वयं को बचा लो...दूसरे से स्वतः ही छुटकारा मिल जाएगा।

-दीप त्रिवेदी

‘‘वक्त’’ वह धार है जो ‘‘कृष्ण’’ जैसे सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व को भी मौत की नींद सुला देता है। लेकिन उनका जीया जीवन व उनकी कही भगवद्गीता उन्हें अमर बना देती है। मरना आपको भी है, फिर कुछ ऐसा कर के क्यों नहीं मरते कि मर के भी न मरो।

-दीप त्रिवेदी

न शिक्षा, न समाज, न तथाकथित धर्म हमें यह समझा रहे कि जीवन में सरलता, निर्दोषता, स्वार्थहीनता, भोलापन व करुणा इत्यादि का क्या महत्व है। जबकि हकीकत यह है कि संसार की सभी सर्वश्रेष्ठ रचनाएं, सारे आविष्कार व सारी कलाएं ऐसे ‘‘मन’’ वाले व्यक्तियों के जहन से ही निकली है।

-दीप त्रिवेदी

जीवन में जो सफल हैं वो इसलिए नहीं कि वे उच्च शिक्षित हैं, बहुत ज्ञानी हैं या कर्मठ होकर कार्य करने वाले हैं। बल्कि उनकी सफलता का रहस्य यह है कि उन्होंने जीवन में सिर्फ अत्यावश्यक ज्ञान व जरूरत पूरती ही शिक्षा ग्रहण की है ...तथा कार्यों में भी वे यथायोग्य चेष्टा ही कर रहे हैं। ऐसा कर वे अपने बहुमूल्य समय व ऊर्जा की बचत करते हैं, और अंत में वही उन्हें सफलता के मार्ग पर लगाने में सहायक सिद्ध होती है।

-दीप त्रिवेदी

क्या पुनर्जन्म होता है? नहीं और बिल्कुल नहीं। वह इस लिहाज से कि जिसे आप अपना होना मान रहे हैं, जैसे आपका नाम, आपका परिवार, आपका देश, समाज, धर्म या आपकी संपत्ति वह सब तो आपकी मृत्यु के साथ निश्चित ही हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।

-दीप त्रिवेदी

यदि जीवन में कुछ बड़ा कर दिखाने के अहंकार का अनुभव करना हो तो सुबह-शाम करने वाले छोटे-मोटे पचासों अहंकारों को छोड़ना पड़ेगा।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।

-दीप त्रिवेदी

‘‘सत्य’’ शारीरिक तौर पर किया कर्म या भावना में बह के किये कर्म का नाम नहीं। सत्य उस कर्म से आये परिणाम का नाम है। किसी ने यदि आपमें सुधार लाने को गाली दी तो उसने गाली दी ही कहां? ...उसने तो आप में सुधार लाने की चेष्टा की।

-दीप त्रिवेदी

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