यहां ‘तत्व’ व ‘वस्तु’ की कार्यप्रणाली में कोई फर्क नहीं, आखिर वस्तु भी अस्तित्व में है तो तत्व के कारण ही। (तत्व यानी ‘वह’ जिससे हमारे समेत सबकुछ चलायमान है)
-दीप त्रिवेदी
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यहां ‘तत्व’ व ‘वस्तु’ की कार्यप्रणाली में कोई फर्क नहीं, आखिर वस्तु भी अस्तित्व में है तो तत्व के कारण ही। (तत्व यानी ‘वह’ जिससे हमारे समेत सबकुछ चलायमान है)
-दीप त्रिवेदी
विकट परिस्थितियों से जूझने का एक ही सिद्धांत है। ...जो कर सकते हैं - हाथोंहाथ करें, उपाय खत्म होते ही इन्तजार करें...और इन्तजार के बाद भी कोई नया उपाय न सूझे तो उसे स्वीकार कर आगे की सोचें।
-दीप त्रिवेदी
आप सिर्फ इतना क्यों नहीं समझते कि घटनायें बाहर घट रही हैं और आपका जीवन आपके भीतर है। फिर बाहर चाहे जो न क्यों हो जाए, उससे आपका जीवन क्यों प्रभावित होता है? क्योंकि आप उन घटनाओं को जबरदस्ती अपने से जोड़ कर देखते हैं।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य इस ब्रह्मांड का एक मात्र प्राणी है जो सफल और आनंदित हो सकता है । इसीलिये ब्रह्मांड में मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जो असफल और दुःखी भी हो सकता है।
-दीप त्रिवेदी
जिन्होंने भी जीवन में बड़ी सफलता पायी है, उन्होंने जाने-अनजाने दृढ़तापूर्वक मन की चार में से कोई एक राह पकड़ी ही हुई है; आनंद, स्वभाव, सहजता या स्वतंत्रता। और जो पकड़ी है...फिर उसका हरहाल में लगातार साथ दिया है।
-दीप त्रिवेदी
‘‘न कुछ पाप है न कुछ पुण्य’’ यह तो स्वयं कृष्ण ने गीता में कई बार कहा। फिर ये संत क्यों रोज-रोज हमें पापों की फेहरिस्त पढ़ा-पढ़ाकर डरा रहे हैं?
-दीप त्रिवेदी
यहां ज्यादा-से-ज्यादा आप वह बन सकते हैं जो आपका स्वभाव आपको बनाता चला जाता है। हां, अन्य कुछ बनने के प्रयास में आप तहस-नहस अवश्य हो सकते हैं। अतः मेहरबानी कर बने वहां तक अपने स्वभाव से छेड़-छाड़ मत करें।
-दीप त्रिवेदी
जैसे विज्ञान को किसी वस्तु के रूपांतरण हेतु ‘‘ऊर्जा’’ की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही आपको अपना स्वभाव बदलने हेतु भी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यदि आप में ऊर्जा नहीं तो चाहकर भी आप अपने में बदलाव नहीं ला सकते हैं।
-दीप त्रिवेदी
भगवान ने उसके व जगत के बीच हमें माध्यम बनाया है, ताकि हम वह जो भेजे...संसार में बांटें व वह जो चाहें...उसे संसार से बटोरकर उस तक पहुंचाएं।
-दीप त्रिवेदी
गौर करना, सदमा पहुंचने पर यदि आप दुःख की अभिव्यक्ति कर लेते हैं तो उससे छूट जाते हैं, और गलती से दबा दिया तो वह दुःख अपने विकृत स्वरूप में आपका भाग्य हो जाता है।
-दीप त्रिवेदी