कोटेशन्स
व्यंग्य

हिंदू शास्त्रों में 33 करोड़ के करीब देवी-देवता वर्णित हैं। आज की जनसंख्या के आधार पर भी यह तीन मनुष्य पर एक देवता हुए। फिर भी देश की हालत देखने पर वे कहीं और व्यस्त लगते हैं। ...लगता है अब हमें उनके भरोसे रहने के बजाय देश के उद्धार हेतु स्वयं लगना होगा।

-दीप त्रिवेदी

पता नहीं यह मनुष्यरूपी ईश्वर व उसकी काल्पनिक शक्तियों...तथा स्वर्ग-नर्क जैसी कल्पनाओं की शुरुआत कहां से हुई? चाहे जो हो, आज तो यह पांच करोड़ पंडित, पादरी व मौलवियों को रोजगार दिये हुए है।

-दीप त्रिवेदी

लक्ष्मी उल्लू पर बैठती है। ...पर यहां तो हम सब सुबह-शाम एक-दूसरे को उल्लू बनाने में लगे हुए हैं। लक्ष्मी बैठे भी तो किस पर?

-दीप त्रिवेदी

जो कट्टर हैं व अपने विरुद्ध नहीं सुन सकते, उन्हें हम आतंकवादी कहते हैं। क्या इनसे मिलते-जुलते लक्षण हमारे अधिकांश धर्मगुरुओं में नहीं? यदि ऐसा न होता तो सुकरात, जीसस व मन्सूर को मारा क्यों जाता?

-दीप त्रिवेदी

हमारा उद्धार हो भी तो कैसे? जब हमारे जीवन की बागडोर ही सौ रुपये में हाथ देखने वाले, दो-सौ में मुहूर्त व पांच-सौ में मूर्तियां बेचने वालों के हाथ में हो।

-दीप त्रिवेदी

हम रात को ही सो रहे हैं, ऐसा नहीं है। हमारी दिन की नींद तो उससे भी कहीं गहरी है। हम बमुश्किल कभी-कभार क्षणभर को जागते हैं। जागने का अर्थ है आपके मन, शरीर, बुद्धि द्वारा कार्य आपके निर्देश पर हो रहे हैं।

-दीप त्रिवेदी

जनसंख्या Liability भी हो सकती है व Asset भी। यदि हर वयस्क काम करे तो ही जनसंख्या Asset हो सकती है। एक कमाए व चार खायें, यह परिवार ही नहीं, देश के लिए भी घातक है। ...ऐसे में पंडितों व संन्यासियों को पालने का सवाल ही कहां आता है?

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य की बुद्धिमत्ता का तो कहना ही क्या? वह रोज सौ योजनाएं अपने आपको मरवाने हेतु खोज ही लाता है।

-दीप त्रिवेदी

यदि वाकई गंगा में डुबकी लगाते ही ‘पाप’ धुल जाते हैं, तो फिर बेचारे Criminals को क्यों जेलों में ठूंसा जा रहा है। गंगा में डुबकी लगवाकर उनके भी ‘पाप’ क्यों नहीं धो दिये जाते हैं?

-दीप त्रिवेदी

जैसे ही हवाईजहाज का आविष्कार हुआ कि कहने वाले आ गये कि यह हमारे ‘राम’ के पास तो पहले से था। सवाल यह कि इन बातों से हासिल क्या हो रहा? घूमना तो आज भी हमें ‘राईट-ब्रदर्स’ के ईजाद किये हवाईजहाजों में ही पड़ रहा है।

-दीप त्रिवेदी

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