मन के तल पर आत्मविश्वास व क्षमता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मन में विश्वास हो तो बाहर क्षमता झलकती ही है।
-दीप त्रिवेदी
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मन के तल पर आत्मविश्वास व क्षमता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मन में विश्वास हो तो बाहर क्षमता झलकती ही है।
-दीप त्रिवेदी
जैसे Space Shuttles को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने हेतु एक Limit से ऊपर की ऊर्जा आवश्यक होती है; वैसे ही मन को बुद्धि के प्रभाव से मुक्त करने हेतु हमें भी एक Limit से ऊपर की ऊर्जा आवश्यक होती है।
-दीप त्रिवेदी
‘अपने’ मन की कार्यप्रणाली समझने वाला जल्द ही सबके मन समझ जाता है। इसी से वह दूसरों पर राज करता है। हम व्यर्थ ही जीवनभर अपने बजाय दूसरों के मन समझने में लगे रहते हैं।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य के सारे दुःख-दर्दों की जड़ उसके ‘मन’ के उपद्रव हैं। अतः विश्व में से ‘‘दुःख-दर्द’’ गायब करने का एक ही उपाय है कि मनुष्य को ‘मन’ की कार्यप्रणाली बाबत ठीक से शिक्षित किया जाए।
-दीप त्रिवेदी
हमारे पास अपना सिवाय अपने ‘मन’ के क्या है? बाकी जो भी है वह प्रकृति का दिया हुआ है। और उसे उपयोग करने लायक विज्ञान ने बनाया है। वहीं यदि मन के आनंद की बात की जाए तो वह ‘‘कला’’ में छिपा पड़ा है। समझ नहीं आता कि इस पूरी Process में हमें ‘तथाकथित धर्मों’ की आवश्यकता ही कहां महसूस हो रही है?
-दीप त्रिवेदी
मेहरबानी कर पुरानी व गलत शिक्षाओं के जाल में न पड़ें। यह स्पष्ट समझ लें कि मन के तल पर कोई भी भाव दबाने के सिर्फ दुष्परिणाम आते हैं।
-दीप त्रिवेदी
‘मन’ ना सिर्फ प्रकृति के सारे रहस्यों को समझने वाला है, बल्कि उसके प्रभाव को घड़ी के कांटे के साथ विश्व के किसी भी मनुष्य के जीवन में क्या घट सकता है...बताने में भी सक्षम है। ...फिर समझ नहीं आता कि हम हमारे मन में डुबकी लगाने की बजाय किन-किन कार्यों में उलझे पड़े हैं?
-दीप त्रिवेदी
हमें फैसला यह करना है कि मंदिर-मस्जिद-चर्च जाना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि मन के विकार दूर करना?
-दीप त्रिवेदी
क्या आप अपनी मन-रूपी धरती को स्थिर नहीं रख सकते? रख सकते हैं, यदि आप अपना ध्यान जीवन में आने वाले सुख-दुःखों से हटाकर मात्र अपने ‘‘होनेपन’’ पर स्थिर रख सकें।
-दीप त्रिवेदी
हमारे ‘‘मन’’ में उठनेवाली कोई भी तरंग ना तो दबायी जा सकती है, और ना मन में कोई तरंग पैदा ही की जा सकती है। ...उनका सिर्फ रूपांतरण हो सकता है।
-दीप त्रिवेदी