कोटेशन्स
धर्म

मनुष्य जिस मात्रा में धर्म के विषय में अंधा है ठीक उसी मात्रा में वह जीवन के सारे सत्यों को समझने में भी अंधा होता है। और यही कारण है कि विश्व आंख वाले अंधों से भरा पड़ा है।

-दीप त्रिवेदी

हर कोई अपनी जाति व धर्म पर गुमान किये फिरता है। मेहरबानी कर एकबार स्वयं को व अपने आसपास वालों को ध्यान से देख लेना - गुमान स्वतः छू हो जाएगा। और तब कहीं जाकर आप विश्व को अपनाकर उन्नति के रास्ते पर लग सकेंगे।

-दीप त्रिवेदी

पूरा विश्व So-called Religious है...चन्द बुद्धिमानों को छोड़कर। फिर इतने क्रोध, दुःख, चिंता, जलन और नफरत कहां से आ रहे? ...क्योंकि इन सभी भावों पर विजय ही तो धार्मिकता है।

-दीप त्रिवेदी

हमें धर्म में इतनी रुचि है कि पहले तो जो हमें जगाने आता है, हम उसी को सुला देते हैं। फिर उसी को भगवान बनाकर उसके आसपास ऐसा धर्म रच डालते हैं जिससे हमें हिंसा, ईर्ष्या, पक्षपात, झूठ, छल या दगाबाजी करने में तो कोई बाधा न पहुंचे; पर साथ ही दो-चार पाखंड कर हमें धार्मिक होने का गुमान भी बना रहे।

-दीप त्रिवेदी

हम धर्मगुरु हैं। हमारा काम क्या है, जो आप करते हैं उसे पाप बताना। ...यानी आपके द्वारा दी जाने वाली दान-दक्षिणा पर आश्रित होने के बावजूद आपको गालियां देना। हमारी यह कला भी चल जाती है... क्योंकि जगत में बुद्धिमानों की कोई कमी नहीं।

-दीप त्रिवेदी

हम धर्मगुरुओं की सबसे बड़ी कारीगरी तो यह कि जो हमें मिटाने आये हमने उन्हीं को आपके सामने भगवान बनाकर पेश कर दिया। अब बताओ, हमारी दुकान बंद हो तो भी कैसे?

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य जीवन के लिये सबसे बड़ा अभिशाप भय, झूठी-आशा व निर्भरता है। तथाकथित धार्मिक पांखड के कारण इन तीनों के अलावा आपको और कुछ नहीं मिलता।

-दीप त्रिवेदी

‘आत्मग्लानि’ से बढ़कर मनुष्य का विनाशक कोई नहीं। यह आपके विश्वास से लेकर अस्तित्व तक सबको खत्म कर देता है। फिर भी मन के विज्ञान से पूरी तरह अनजान यह धर्मगुरु सिर्फ अपनी दुकानें चलाने हेतु रोज-रोज मनुष्य को पाप-भाव से भरे जा रहे हैं।

-दीप त्रिवेदी

ना तो धर्म के नाम पर जागीर बनाने वाले और ना ही धर्म के नाम पर जागीर छोड़ने वाले ‘मोह-रहित’ कहे जा सकते हैं।

-दीप त्रिवेदी

जो सब जगह सबको समान रूप से प्रभावित करता है वही अल्लाह की नेमत है। जैसे सूरज, चांद, हवा, पानी व मनुष्य का जीवन। ऐसे में अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग शास्त्र होना व अपनी भिन्न-भिन्न मान्यताएं होना कैसे धार्मिक हो सकता है?

-दीप त्रिवेदी

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