धर्म क्या है? मन व जीवन का विज्ञान। बुद्ध, कृष्ण, जीसस क्या हैं? हमारे मन व जीवन के Doctor।
-दीप त्रिवेदी
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धर्म क्या है? मन व जीवन का विज्ञान। बुद्ध, कृष्ण, जीसस क्या हैं? हमारे मन व जीवन के Doctor।
-दीप त्रिवेदी
आदिकाल से धर्मगुरुओं व राजनेताओं की बनती चली आ रही है। दोनों में से कोई ना तो कलाकार है, ना ही वैज्ञानिक। फिर भी सबको दबाकर व लड़वाकर बड़ा बनने की चाह शुरू से ही दोनों में है। इसी से अब उन दोनों का मिलन अटूट हो चुका है।
-दीप त्रिवेदी
यदि हम सिर्फ एक क्षण को भी सोचें कि यह तथाकथित धर्म ‘‘झूठी-आशा’’ देने के बदले में पूरी दुनिया से मनुष्य के कितने कीमती संसाधन व कितना मूल्यवान समय खा रहे हैं; तो सारे मंदिरों, मस्जिदों व चर्चों पर आज ही ताले लग जायें और वहां स्कूल व अस्पताल खुल जाएं।
-दीप त्रिवेदी
पहले तो हम सिर्फ मंदिर में जाकर कुछ चढ़ा आते थे। अब तो पंडितों की लालच इतनी बढ़ गयी है कि वे आश्वासनोंें के नाम पर अंगूठी, धागे व प्रतिष्ठान भी बेचकर गरीब जनता को लूटने में लग गए हैं।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य हिंदू, मुस्लिम, ईसाई या बौद्ध क्यों है? क्योंकि वह व्यक्तित्व-हीनता के कारण भीड़ में अकेले खड़े होने से घबराता है। ...जबकि ‘‘हिंदू’’ बने रहने पर उसे संबल बना रहता है कि उसके साथ सौ-करोड़ लोग हैं। यही सायकोलॉजी मुस्लिम, ईसाई व बौद्धों की भी है।
-दीप त्रिवेदी
कई बातें ऐसी होती हैं जो किसी भी समझदार मनुष्य के लिये समझना मुश्किल हो जाती है। ...जैसे अच्छे कर्म करने पर जो सुविधाएं ईश्वर स्वर्ग में प्रदान करता है, उसे यहां करने पर बुरा कहने वाले ये धर्मगुरु कौन होते हैं?
-दीप त्रिवेदी
जो कट्टर हैं व अपने विरुद्ध नहीं सुन सकते, उन्हें हम आतंकवादी कहते हैं। क्या इनसे मिलते-जुलते लक्षण हमारे अधिकांश धर्मगुरुओं में नहीं? यदि ऐसा न होता तो सुकरात, जीसस व मन्सूर को मारा क्यों जाता?
-दीप त्रिवेदी
धर्म का कोई ताल्लुक ईश्वर, पूजा-पाठ, मंदिर-मस्जिद या चर्चों से नहीं है; धर्म का सीधा ताल्लुक तो सिर्फ मनुष्य के मन को नयी ऊंचाइयां प्रदान करने वाली शिक्षाओं से है।
-दीप त्रिवेदी
पता नहीं यह धार्मिक लोग और उनकी धार्मिक भावनाएं इतनी तो कितनी कमजोर होती हैं कि बात-बात पर आहत हो जाती हैं। ...वैसे यह बात समझी जा सके वैसी भी है; जरा-सा भूकंप आया नहीं कि कमजोर इमारतें ढ़ही नहीं।
-दीप त्रिवेदी
विज्ञान वस्तुओं की सायकोलोजी के रूपांतरण का नाम है। धर्म मनुष्य की सायकोलोजी को रूपांतरित करनेवाले ज्ञान का नाम है। विज्ञान मनुष्य को भौतिक सुख तो दे सकता है, परंतु मानसिक सुख हेतु तो मनुष्य को अपनी सायकोलोजी रूपांतरित करनी ही रही। अतः दोनों का यथायोग्य समन्वय मनुष्य व संसार दोनों के उत्थान का मार्ग है।
-दीप त्रिवेदी