कोटेशन्स
धर्म

सवाल यह कि कृष्ण, जीसस व बुद्ध जैसे अद्भुत व्यक्तित्व से ‘‘बुुद्धिमान’’ दूर क्यों हो गये? क्योंकि अपनी-अपनी दुकानें मजबूत करने हेतु धर्मगुरुओं ने उनके साथ चमत्कार जोड़ दिये। अब बुद्धिमान मनुष्य चाहे जो स्वीकारे पर ‘चमत्कार’ कभी नहीं स्वीकार सकता।

-दीप त्रिवेदी

धार्मिक व्यक्ति चीजों को सलीके से अपनाना जानता है; अधार्मिक मारे ‘‘डर’’ के वस्तुओं का ही त्याग करता फिरता है।

-दीप त्रिवेदी

हिंदू धर्म की बात करूं तो उनके सभी भगवान राजा व क्षत्रिय हैं। ...फिर धर्म का ठेका इन पंडितों व संन्यासियों के पास कब और कैसे चला गया?

-दीप त्रिवेदी

हिंदू धर्म की बात की जाए तो उनके अधिकांश अवतार संसारी हैं। ...फिर यह संन्यासी कैसे धार्मिक हो गये?

-दीप त्रिवेदी

हिंदू धर्म जहां के सारे भगवान ‘‘राजा’’ यानी सबको पालने वाले हैं, वह धर्म कैसे दूसरों से मांगकर अपना आश्रम बनाने वाले को धार्मिक मान ले?

-दीप त्रिवेदी

प्रकृति में कुछ भी व्यर्थ नहीं, यदि उसे समय के अनुरूप मन की गहराइयों से अपनाया जाए। इसीलिए हिंदू भगवानों व देवताओं ने यहां की हर रचना से प्यार किया। फिर यह हिंदू संन्यासी अपनी कमजोरियां छिपाने हेतु किन चीजों के तिरस्कार को धर्म कह रहे हैं?

-दीप त्रिवेदी

धर्मगुरु दुनिया को भ्रमित कर अपनी दुकानें चला रहे, यह तो छोटा गुनाह है। उनका बड़ा गुनाह तो यह कि वे श्रेष्ठ मनुष्यों के गुण व उनकी सोच को दबाकर तथा व्यर्थ के चमत्कारों से उनको जोड़ के अपनी दुकान चला रहे हैं।

-दीप त्रिवेदी

हिंदू धर्म की बुनियाद सहिष्णुता पर रखी हुई है। उसने बुद्ध, कबीर, शंकराचार्य, चाणक्य, दयानंद सरस्वती जैसे उनके वर्तमान पाखंड का विरोध करने वाले सभी का सम्मान किया। ना कि जीसस, सुकरात या मन्सूर जैसे सुधारकों को मारा। फिर यह हिंदू कट्टरता कहां से आयी? ...शायद यह अपनी दुकानें बचाने हेतु हिंदू धर्मगुरुओं द्वारा फैलायी जा रही है।

-दीप त्रिवेदी

हम भी अजीब हैं व हमारे धर्मगुरु भी। हम सिर्फ अपने अहंकार की पूर्ति हेतु अपने धर्म की अच्छाई सुनने उनके पास जाते हैं, व वे सयाने भी इसका ङ्गायदा उठाते हुए हमारा अहंकार सहलाकर अपनी समृद्धि बढ़ाये चले जाते हैं। इससे हम इतने तो अंधे हो जाते हैं कि हमें अपने धर्म की बुराई व दूसरे धर्मों की अच्छाई ही दिखना बंद हो जाती है। यह आपका कितना बड़ा नुकसान है इसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते।

-दीप त्रिवेदी

हिंदू जगत ने हमेशा ‘धर्म’ को अपने पूर्ण स्वरूप में स्वीकारा है। क्योंकि मोहरहित ‘भगवान’ ने सोमरस से लेकर नृत्य व पाप के विनाश हेतु हिंसा से लेकर संसार तक किसी का भी तिरस्कार नहीं किया। ...फिर यह हिंदू धर्म के ठेकेदार किस बिना पर संसारी व शौकीनों को पापी व अपने को धार्मिक बता रहे हैं?

-दीप त्रिवेदी

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