कोटेशन्स
धर्म

यदि सर पे टीका लगाने, हाथ में धागा पहनने या पांच वक्त की नमाज पढ़ने या मंदिर, मस्जिद, चर्च हो आने से विश्व की सबसे बड़ी ऊंचाई ‘‘धर्म’’ हासिल हो जाती हो, तो-तो धर्म से सस्ता कुछ नहीं।

-दीप त्रिवेदी

धार्मिक शास्त्र हजारों वर्ष पुराने हैं। वे जाने कबसे मनुष्य के उद्धार में लगे पड़े हैं। फिर भी मनुष्य के दुःख-दर्दों को देखते हुए वे पूरी तरह असफल सिद्ध हुए हैं। अब समय आ गया है...जब नये विचारों को अपनाया जाए।

-दीप त्रिवेदी

आप धार्मिक तल पर कितने गहरे हैं इसका अनुमान इस बात से लग जाता है कि आपको अपने जीवन हेतु और कितने आश्वासनोंें व आशीर्वादों की जरूरत है।

-दीप त्रिवेदी

इस विश्व की सबसे बड़ी समस्या वे पांच करोड़ के करीब पंडित, मौलवी, पादरी, मठाधीश या अन्य धर्म के साधु हैं जो धर्म के नाम पर बिना कुछ किये दूसरों के भरोसे जी रहे हैं। यदि उनसे जबरन खेती भी करवा ली जाए तो मैं वादा करता हूँ कि पूरे विश्व में अनाज के भाव रातों-रात आधे हो जाएंगे।

-दीप त्रिवेदी

‘‘न कुछ पाप है न कुछ पुण्य’’ यह तो स्वयं कृष्ण ने गीता में कई बार कहा। फिर ये संत क्यों रोज-रोज हमें पापों की फेहरिस्त पढ़ा-पढ़ाकर डरा रहे हैं?

-दीप त्रिवेदी

चूंकि आपने घोड़े की तरह अपनी दोनों आंखों के Side में पट्टी बांध रखी है, इसीलिये आपको अपने धर्म व संस्कृति के अलावा कुछ दिखायी ही नहीं दे रहा; और यही कारण है कि आपके धर्मगुरु आपको हरा चश्मा पहनाकर सूखी-घास खिलाये चले जा रहे हैं।

-दीप त्रिवेदी

समय, संजोग व परिस्थिति की मांग पर सबके हित में जब, जो और जैसा भी करने योग्य हो...वह करने की क्षमता रखने वाला धार्मिक; बाकी सब अधार्मिक।

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य-जन्म का मूल्य ही ‘‘कर्म’’ करने में है। और कर्तव्य-कर्मों से तो जीते-जी पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता। अतः कर्म से भागना व जीवन से भागना एक ही बात है।

-दीप त्रिवेदी

दुनिया के बुद्धिमानों को धर्म में इतनी अरुचि क्यों हो गयी? क्योंकि बुद्ध, जीसस व कृष्ण के नाम पर उनको इन महापुरुषों की बातों के बदले धर्मगुरुओं ने अपने द्वारा रचित बाइबल व वेद वगैरह उन तक पहुंचाए।

-दीप त्रिवेदी

हमारे पास अपना सिवाय अपने ‘मन’ के क्या है? बाकी जो भी है वह प्रकृति का दिया हुआ है। और उसे उपयोग करने लायक विज्ञान ने बनाया है। वहीं यदि मन के आनंद की बात की जाए तो वह ‘‘कला’’ में छिपा पड़ा है। समझ नहीं आता कि इस पूरी Process में हमें ‘तथाकथित धर्मों’ की आवश्यकता ही कहां महसूस हो रही है?

-दीप त्रिवेदी

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