कोटेशन्स
धर्म

जो मनुष्य अपने जीवन के सफलता या असफलताओं की जवाबदारी स्वयं ले...वह धार्मिक। जो यह जवाबदारी पूजा-पाठ, ज्योतिष, वास्तु, परिवार या मित्रों को सौंपे...वह अधार्मिक।

-दीप त्रिवेदी

जीना, शौक से जीना, आनंदपूर्वक जीना, सफलता की ओर कदम बढ़ाना वगैरह कैसे अधार्मिक हो जाता है? अधर्म की तो शुरुआत ही डर कर वस्तुओं के त्याग करने से होती है।

-दीप त्रिवेदी

‘हां’ आस्तिकता है और ‘ना’ नास्तिकता है। आपने जीवन में जितनी चीजों का दृढ़तापूर्वक निषेध कर रखा है...उतने ही आप अधार्मिक। अधार्मिकता का अर्थ ही ईश्वर की रचनाओं का अस्वीकार है।

-दीप त्रिवेदी

भारत के राजनेताओं व धर्मगुरुओं ने पिछले पचास वर्षों में देश की जनता को क्या सुकून पहुंचाया? और उसके सामने हमारे Legendary गायकों जैसे मोहम्मद रफी, किशोरकुमार व लता-आशा ने हमें क्या कुछ नहीं दिया? आज भी कम-से-कम औसत दो घंटे सबको सुकून से जीना उन्हीं की आवाज के सहारे नसीब हो रहा है।

-दीप त्रिवेदी

हिंदू धर्म ने नरमुंडों की माला पहनने वालों से लेकर सोमरस, भांग व नृत्य के शौकीनों को भी भगवान स्वीकारा। क्योंकि हिंदू धर्म वस्तुओं का निषेध नहीं, उन्हें ग्रहण करने के सलीके सिखाने में विश्वास करता है।

-दीप त्रिवेदी

नफरत व तिरस्कार, फिर चाहे वह वस्तु से हो या व्यक्ति से; ‘हिंदू’ धर्म में कोई स्थान नहीं। ...जबकि यह So-called हिंदू संत आपमें व्यर्थ के ‘पापभाव’ पैदा कर अपने आश्रम फैलाये चले जा रहे हैं। कैसे तो आप हिंदू व कैसे तो यह हिंदू संत?

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य के लिए उसके अपने जीवन हेतु सबसे ज्यादा कीमती समय, शक्ति व धन है। धार्मिक क्रियाएं इन तीनों का जमकर शोषण करती हैं।

-दीप त्रिवेदी

असफल मनुष्य धर्म के पाखंड को अपनाता है। यह पाखंड झूठी आशाएं पैदा करता है। झूठी आशाएं खोटे कर्म करवाती हैं। गलत कर्म से ज्यादा दुःख उत्पन्न होता है। ज्यादा दुःख के कारण मनुष्य ज्यादा धर्म के पाखंड अपनाने लगता है। मनुष्य की इतनी असफलता सिर्फ इस कुचक्र में फंसे होने को आभारी है।

-दीप त्रिवेदी

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