कोटेशन्स
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जैसे कइयों की उम्र के साथ बुद्धि चलना बंद हो जाती है, वैसे ही उम्र के साथ कइयों का Liver भी जवाब दे ही जाता है। फिर उन्हें सादा खाकर ही जीना पड़ता है। यहां सवाल यह कि जो भरी जवानी में सादा खा रहे हैं उनका क्या? कुछ नहीं, कमजोर Liver उन्हें रोज की पचासों बीमारियां पकड़ा ही देता है।

-दीप त्रिवेदी

प्रेम सीढ़ी-दर-सीढ़ी ही संभव है। अपने से हो, तो ही मनुष्य आसपास वालों से प्रेम कर सकता है। उनसे प्रेम करे तो सम्पूर्ण मनुष्यता के प्रेम में उतर सकता है। ...पर कई लोग तो सीधे पत्थरों व जानवरों के प्रेम में पड़ जाते हैं। समझ नहीं आता कि यह धोखा वे किसको दे रहे हैं?

-दीप त्रिवेदी

मनुष्य को रोज आने वाली छोटी-मोटी बीमारियां उसकी Immunity कमजोर होने के कारण आती हैं। जबकि व्यवस्थित भोजन व Acid-Alkaline का ठीक-ठीक संतुलन शरीर के कीटाणुओं को बढ़ने ही नहीं देते।

-दीप त्रिवेदी

जीवन साठ वर्ष का है, यह मानकर हम पूरे जीवन को ‘‘एक’’ मानकर जीते हैं। इसी कारण भूतकाल की यादें व भविष्य का डर हमें सताता रहता है। जबकि वास्तव में जीवन खरबों क्षणों के जोड़ का नाम है। अतः हर क्षण-नया क्षण। और जब हर क्षण नया क्षण है...तो कौन-सा भूतकाल व किसका भविष्य?

-दीप त्रिवेदी

कभी आपने सोचा कि मान और अपमान में फर्क ही क्या है? मान वह जो दूसरा आपको देता है व अपमान वह जिससे दूसरा कुछ आप में से छीनने की कोशिश करता है। इस तरह दोनों कर्मों का ‘कर्ता’ तो दूसरा ही है... उससे आपका क्या?

-दीप त्रिवेदी

दूसरों पर हिंसा वही मनुष्य कर पाता है, जो जाने-अनजाने स्वयं को सता रहा हो। बाकी स्वयं से प्रेम करने वाला कभी दूसरों का अहित कर ही नहीं सकता।

-दीप त्रिवेदी

विकासशील राष्ट्रों के प्रतिभाशाली व्यक्तियों को स्वयं ही खुद को International Level पर Promote करना पड़ता है। इससे बेचारों की अच्छी-खासी शक्ति इसी में व्यर्थ हो जाती है।

-दीप त्रिवेदी

मैं आपके उन धर्म गुरुओं में से हूँ जिसने जैसे ही पाया कि मुझ में आगे बढ़ने के कोई गुण जैसे कला, विज्ञान, मेहनत करने की लगन या डिग्री कुछ भी नहीं; तो मैंने आश्वासनों व आशीर्वादों की दुकान खोल ली। ...और देखो आज मेरे पास एकड़ों में जमीन, अपना आश्रम व आप जैसे हजारों बुद्धिमान श्रद्धालु हैं।

-दीप त्रिवेदी

मन की गहराइयों का जादू तो यह कि अनपढ़ कालीदास व कबीर, कवियों के ‘‘महा-कवि’’ हो जाते हैं। ...और अशिक्षित एडीसन सबसे ज्यादा आविष्कार करने वाला वैज्ञानिक हो जाता है। क्या अब भी आप समझते हैं कि मन की गहराइयों का विज्ञान समझे बगैर आप सफलता पा लेंगे?

-दीप त्रिवेदी

‘‘कर्मवाद’’ व ‘‘भाग्यवाद’’ दो समानांतर लकीरें हैं...जो न मिली हैं - ना कभी मिल सकती हैं।

-दीप त्रिवेदी

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