मैं तो कहता हूँ बुरे भावों व उनसे किये जाने वाले कर्मों में भी कोई बुराई नहीं। बुरा तो यह कि उससे आप का जीवन दुःख और असफलता से भर जाता है।
-दीप त्रिवेदी
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मैं तो कहता हूँ बुरे भावों व उनसे किये जाने वाले कर्मों में भी कोई बुराई नहीं। बुरा तो यह कि उससे आप का जीवन दुःख और असफलता से भर जाता है।
-दीप त्रिवेदी
कैसे भी विपरीत हालात क्यों न हो, जीवन में ‘‘कर्मों’’ से पीछे कभी मत हटो। शरीर थक जाए तो उसे मन की शक्ति प्रदान करो। मन भी थक जाए तो उसे आत्मबल से खींचो। ...पर हाथ में लिया कार्य तो निपटाकर ही छोड़ो।
-दीप त्रिवेदी
‘‘कर्मवाद’’ व ‘‘भाग्यवाद’’ दो समानांतर लकीरें हैं...जो न मिली हैं - ना कभी मिल सकती हैं।
-दीप त्रिवेदी
‘कर्म करो पर फल की चिंता मत करो’ यह विश्व के सबसे बड़े ज्ञानी ‘‘कृष्ण’’ ने विश्व के सबसे अनूठे ग्रंथ ‘‘भगवद्गीता’’ में कहा उनका सबसे अद्भुत श्लोक है। विडंबना यह कि हमारी सारी पूजाएं, यज्ञ, उपवास, वास्तु, ज्योतिष सब फल की आशा से निकले कर्म हैं
-दीप त्रिवेदी
‘‘कर्म करो पर फल की चिंता मत करो’’...बात कृष्ण की सौ फीसदी सही है। वे यही कह रहे हैं कि जो करो उससे सिर्फ आनंद उत्पन्न होना चाहिए। क्योंकि आनंदपूर्वक किया कर्म ही एक ऐसा कर्म है जिसके प्रतिफल में भी सिर्फ आनंद ही पैदा होता है...और वह भी हाथों-हाथ।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य जन्म लिया है तो कर्म करना एकमात्र ‘‘पूजा’’ है, और कर्तव्य-कर्म निभाना एक मात्र ‘‘ध्यान’’ है। अलग से पूजा या ध्यान वे लोग करते हैं जो कर्मों से विमुख हो चुके हैं।
-दीप त्रिवेदी
क्या आप ‘करने’ और ‘होने’ का फर्क जानते हैं? आपको जीवन में जितना करना पड़ रहा है वह आपकी अशक्ति व गुलामी को दर्शाता है, व जितना आप से ‘‘हो रहा है’’ कायदे से तो बस उतना ही आप जी रहे हैं।
-दीप त्रिवेदी
जो कर्म आपको सुख देता है, जो करने को मन भी मचलता है...वह ‘पाप’ कैसे हो सकता है? मृत्यु पश्चात् तो यूं भी आप कुछ नहीं कर पाने वाले।
-दीप त्रिवेदी
‘आनंद’ सिर्फ उन कर्मों से उत्पन्न होता है, जिनका फल हाथोंहाथ मिलता है। ‘कर्म’ आज व ‘फल’ कल, ऐसे कर्मो से केवल सुख-दुःख उत्पन्न होते हैं।
-दीप त्रिवेदी