कोटेशन्स
बुद्धिमत्ता

नास्तिक और आस्तिक में फर्क क्या है? नास्तिक वह है जो प्रकृति की महासत्ता को पहचानता नहीं; अतः स्वयं की बुद्धि से अर्जित ज्ञान के भरोसे जीवन संवारने में लगा हुआ है। आस्तिक वह है जो बुद्धि लगाता ही नहीं। वह स्वयं को उसके अर्पित कर देता है, प्रकृति उसे जैसा व जो बनाना चाहे बना ले।

-दीप त्रिवेदी

जिस व्यक्ति को उपवास करने या बाल नोचने जैसे खुद को सताने वाले विचार आते हैं, उससे स्वतः ही ऐसे कार्य हो जाते हैं जिससे दूसरों को कष्ट पहुंचे। अब आप ही बताइए कि दूसरों को कष्ट देने वाला ऐसा मनुष्य जीवन में सुखी कैसे रह सकता है?

-दीप त्रिवेदी

यहां ज्यादा-से-ज्यादा आप वह बन सकते हैं जो आपका स्वभाव आपको बनाता चला जाता है। हां, अन्य कुछ बनने के प्रयास में आप तहस-नहस अवश्य हो सकते हैं। अतः मेहरबानी कर बने वहां तक अपने स्वभाव से छेड़-छाड़ मत करें।

-दीप त्रिवेदी

कहते हैं, अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान। ...बात भी सही है; पर बुद्धिमानों की इस दुनिया में ‘‘सहज’’ बनने को ज्यादा लोग तैयार ही कहां होते हैं?

-दीप त्रिवेदी

बेवकूफी व बदमाशी में फर्क क्या है? अन्जाम तो दोनों का बराबरी पर ही भुगतना पड़ता है।

-दीप त्रिवेदी

आप कितना ‘‘सत्य’’ में जी रहे हैं इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि आप अपने साथ घटनेवाली हर अच्छी-बुरी घटना में कितना हाथ अपना देखते हैं व कितना दूसरों का?

-दीप त्रिवेदी

यदि तीर्थ-स्थानों की यात्राएं व जात्राएं इतनी ही शुभ होती तो क्यों उस पर जाने वाले हजारों-लाखों लोग हर वर्ष हादसे का शिकार होते हैं? कहीं मनुष्य जन्म के बावजूद उसे परेशान किये जाने पर भगवान अपना क्रोध तो उन पर नहीं निकाल रहे?

-दीप त्रिवेदी

पूरी दुनिया नास्तिकों से भरी पड़ी है। इसका सबूत यह कि कोई भी व्यक्ति प्रकृति की अपार कृपा Time व Space के Combinationको नहीं पहचानता है। इसी कारण हर कोई अपनी बुद्धि, इच्छाओं व तथाकथित धार्मिक पाखंडों के भरोसे जीवन को सफल बनाने में लगा हुआ है। ...और इसका अंतिम परिणाम हमारे सामने है।

-दीप त्रिवेदी

यदि आप अपनी निगाह लगातार करनेवाले यानी ‘अहंकार’ की जगह, देखनेवाले यानी ‘द्रष्टा’ पर बनाये रखेंगे...तो आपका वस्तुओं, व्यक्तियों व कर्मों से तादात्म्य टूट जाएगा। संसार के सारे दुःखों का मूल इस तादात्म्य में ही छिपा हुआ है।

-दीप त्रिवेदी

जो ‘है’ उसका आनंद लेना तो समझ में आता है; पर उसके बिछड़ने का मातम मनाना हमेशा से समझ के परे रहा है।

-दीप त्रिवेदी

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