शुभ-मुहूर्त कोई अलग से देखने की चीज नहीं। समय-संजोग व परिस्थिति बनी नहीं कि वह घड़ी शुभ हुई नहीं। सीधी बात है, मियां-बीबी राजी तो काहे को काजी?
-दीप त्रिवेदी
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शुभ-मुहूर्त कोई अलग से देखने की चीज नहीं। समय-संजोग व परिस्थिति बनी नहीं कि वह घड़ी शुभ हुई नहीं। सीधी बात है, मियां-बीबी राजी तो काहे को काजी?
-दीप त्रिवेदी
आप ईश्वर भरोसे जीने से पूर्व यह तो देख लें कि उसे पक्षपात कर आपका कुछ हित करने की Authority है भी या नहीं?
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य का बचपना तो यह कि जहां सफलता का श्रेय लेने की उसमें होड़ लगी रहती है, वहीं असफलता का मटका किसी और पर फोड़ने की फिराक में भी वह लगा ही रहता है। परिणाम यह कि कभी भी वह घटना का ठीक से आकलन कर नहीं पाता।
-दीप त्रिवेदी
आपके भीतर दो आधार मजबूती से उपस्थित हैं। एक आपका ‘द्रष्टा’ व दूसरा आपका ‘अहंकार’। अहंकार वह जो सब कुछ कर रहा है व द्रष्टा वह जो सबकुछ होता हुआ देख रहा है।
-दीप त्रिवेदी
सत्य सदैव से है व रहेगा। क्योंकि सत्य विश्व की सारी विरोधाभासी शक्तियों व भावों के बीच के सेतु का नाम है। शक्तियां व भावों में दोनों ओर कितने ही उतार-चढ़ाव आ जाएं, सत्य स्थिर ही रहता है।
-दीप त्रिवेदी
जितना आप प्राकृतिक हो के जीते हैं उतनी ही आपको प्रकृति से ऊर्जा मिलती है। ध्यान रहे कि जीवन को सफल बनाने हेतु आपकी अपनी ऊर्जा बहुत कम पड़ती है।
-दीप त्रिवेदी
जो ‘है’ उसका आनंद लेना तो समझ में आता है; पर उसके बिछड़ने का मातम मनाना हमेशा से समझ के परे रहा है।
-दीप त्रिवेदी
क्या विज्ञान कभी जीवन पैदा कर पाएगा? नहीं, सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि पैदा या नष्ट करने की सत्ता यहां किसी के पास नहीं।
-दीप त्रिवेदी
क्या आप अपनी मन-रूपी धरती को स्थिर नहीं रख सकते? रख सकते हैं, यदि आप अपना ध्यान जीवन में आने वाले सुख-दुःखों से हटाकर मात्र अपने ‘‘होनेपन’’ पर स्थिर रख सकें।
-दीप त्रिवेदी
कुदरत की रचना ऐसी है कि जीवन में जो भी हमारे पाने योग्य है या हमारे लिये सुखदायी है वह हमें स्वतः ही मिल सकता है। लेकिन व्यर्थ व दुःखदायी वस्तुओं को पाने की दौड़ में हम उसे ही पाने से चूक जाते हैं।
-दीप त्रिवेदी