समय, संजोग व परिस्थिति की मांग पर सबके हित में जब, जो और जैसा भी करने योग्य हो...वह करने की क्षमता रखने वाला धार्मिक; बाकी सब अधार्मिक।
-दीप त्रिवेदी
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समय, संजोग व परिस्थिति की मांग पर सबके हित में जब, जो और जैसा भी करने योग्य हो...वह करने की क्षमता रखने वाला धार्मिक; बाकी सब अधार्मिक।
-दीप त्रिवेदी
क्या पुनर्जन्म होता है? अवश्य...। लेकिन प्रकृति के इस सिद्धांत पर कि यदि आप हैं ही नहीं तो ‘पैदा’ नहीं किये जा सकते; और आप हैं तो मिटाये नहीं जा सकते।
-दीप त्रिवेदी
दुनिया के बुद्धिमानों को धर्म में इतनी अरुचि क्यों हो गयी? क्योंकि बुद्ध, जीसस व कृष्ण के नाम पर उनको इन महापुरुषों की बातों के बदले धर्मगुरुओं ने अपने द्वारा रचित बाइबल व वेद वगैरह उन तक पहुंचाए।
-दीप त्रिवेदी
शुभ-मुहूर्त कोई अलग से देखने की चीज नहीं। समय-संजोग व परिस्थिति बनी नहीं कि वह घड़ी शुभ हुई नहीं। सीधी बात है, मियां-बीबी राजी तो काहे को काजी?
-दीप त्रिवेदी
वक्त ने ऐसी करवट ली कि संतों और व्यवसायियों की परिभाषा ही परिवर्तित हो गयी। पाखंड के नाम पर लाखों को लूटने वाले व्यवसायी आजकल ‘संत’ बने बैठे हैं। जबकि वास्तविक संत तो वे हैं जो अपनी कर्मठता से व्यवसाय फैलाकर लाखों को रोजगार दिये हुए हैं।
-दीप त्रिवेदी
कोई कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, चाहे उसकी आपके प्रति कैसी ही उच्च भावना क्यों न हो...या फिर उसे आप भगवान ही क्यों न मानते हों; उसे भी इतनी सत्ता नहीं कि वह आपके सुख-समृद्धि का कोई स्थायी उपाय कर सके।
-दीप त्रिवेदी
कार्य प्रारंभ करने के बाद उसके ‘‘सफल-समापन’’ से पूर्व ही उस ओर से अपनी चेतना हटाना - असफलता को न्योता देने के समान है।
-दीप त्रिवेदी
दुनिया का कोई भगवान इतने छोटे मन का नहीं हो सकता कि उसे चापलूसी या पूजा की आवश्यकता पड़ जाए। और ऐसा करने से वह खुश हो जाए या आपका कुछ फायदा करा दे, यह तो संभव ही नहीं। ...ऐसा तो सिर्फ शैतान ही हो सकता है।
-दीप त्रिवेदी
हमारा उद्धार हो भी तो कैसे? जब हमारे जीवन की बागडोर ही सौ रुपये में हाथ देखने वाले, दो-सौ में मुहूर्त व पांच-सौ में मूर्तियां बेचने वालों के हाथ में हो।
-दीप त्रिवेदी
‘‘जागृत-व्यक्ति’’ वो है, जिसकी उपस्थिति में उसके आसपास के मनुष्य ही नहीं, घटनायें व कुदरत भी वही करने को मजबूर हो जाए जो वह चाहता है। ...ऐसा जागृत हो जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं।
-दीप त्रिवेदी