यदि हमेशा आनंद में रहना चाहते हो तो जीवन के संघर्षों से भी एक खेल मानकर उलझो। देखें; संघर्ष हमसे जीतता है या हम संघर्ष से?
-दीप त्रिवेदी
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यदि हमेशा आनंद में रहना चाहते हो तो जीवन के संघर्षों से भी एक खेल मानकर उलझो। देखें; संघर्ष हमसे जीतता है या हम संघर्ष से?
-दीप त्रिवेदी
आज के समय में मनुष्य के जीवन को बदल के रख देने वाले ‘‘ज्ञान’’ के सिवाय ‘‘चैरिटी’’ ना तो स्वीकार्य है - ना ही व्यावहारिक। ...यानी सिर्फ ऐसा ज्ञान जो मनुष्य को सफलता की सी़ढियां चढ़ना सिखा दे।
-दीप त्रिवेदी
हिंदू धर्म की बात करूं तो उनके सभी भगवान राजा व क्षत्रिय हैं। ...फिर धर्म का ठेका इन पंडितों व संन्यासियों के पास कब और कैसे चला गया?
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य की बुद्धिमत्ता का तो कहना ही क्या? वह रोज सौ योजनाएं अपने आपको मरवाने हेतु खोज ही लाता है।
-दीप त्रिवेदी
यदि आपको मुहूर्त देखने व राशि मिलाने पर इतना ही भरोसा है तो घर में किसी को ऍटैक आने पर उसे तुरंत अस्पताल क्यों ले जाते हैं? क्यों नहीं पहले मुहूर्त निकलवाकर ही उन्हें घर से निकालते, व Doctor से भी राशि मिलाने के बाद ही उनका Operation करवाते?
-दीप त्रिवेदी
छोटा समुदाय कट्टरता दिखाता है तो समझ में आता है। उनकी Insecurity व Inferiority समझी जा सके, वैसी होती है। पर इतना बड़ा मुस्लिम समुदाय खुले विचारों के साथ खड़ा न होकर अपना नुकसान स्वयं कर रहा है।
-दीप त्रिवेदी
‘‘कर्म करो पर फल की चिंता मत करो’’...बात कृष्ण की सौ फीसदी सही है। वे यही कह रहे हैं कि जो करो उससे सिर्फ आनंद उत्पन्न होना चाहिए। क्योंकि आनंदपूर्वक किया कर्म ही एक ऐसा कर्म है जिसके प्रतिफल में भी सिर्फ आनंद ही पैदा होता है...और वह भी हाथों-हाथ।
-दीप त्रिवेदी
‘‘सत्य’’ पल-पल नया व रूपांतरणीय है। अतः हजारों वर्ष पूर्व कही बातें उस वक्त के ‘‘समय, संजोग व परिस्थितियों’’ को देखकर सही हो सकती हैं, पर वे सब आज के भी सत्य हों, कतई जरूरी नहीं।
-दीप त्रिवेदी
धन की दौड़ से विज्ञान भी अछूता नहीं। पिछले दो-सौ वर्षों की सारी व्यावसायिक सफलताएं विज्ञान की नयी-नयी खोजों को ही आभारी हैं।
-दीप त्रिवेदी
बुद्धि तोड़कर देखती है, क्योंकि उसे सिर्फ वस्तुओं की पहचान है। जबकि मन वस्तुओं को अलग से जानता ही नहीं; वह तरंगों व उनकी गहराइयों को ही समझता है। बस इन दोनों में आपसी Communication न बिठा पाने के कारण ही सभी पूरी तरह असफल हैं।
-दीप त्रिवेदी