प्रतिकूल परिस्थितियां आपको तभी तक परेशान करती हैं जब तक आप उसपर ध्यान देते हैं। ध्यान अन्य अनुकूल परिस्थिति पर लगाते ही कष्ट छू हो जाते हैं।
-दीप त्रिवेदी
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प्रतिकूल परिस्थितियां आपको तभी तक परेशान करती हैं जब तक आप उसपर ध्यान देते हैं। ध्यान अन्य अनुकूल परिस्थिति पर लगाते ही कष्ट छू हो जाते हैं।
-दीप त्रिवेदी
राजा वह है जो अपना मालिक स्वयं है। आप तो अपने धर्म, जाति, समाज, विचारों, इच्छाओं व चिंताओं के सेवक हैं।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य जीवन...कुदरत के नियम, उसका अपना स्वभाव, उसकी बुद्धि, मन, हृदय, DNA तथा उसके अपने अनुभवों समेत की सात वस्तुओं से प्रभावित होता है। आठवीं कोई वस्तु या कारण उसे रत्तीभर प्रभावित नहीं करते।
-दीप त्रिवेदी
जिसे अपने से प्रेम नहीं वह विश्व में किसी से प्रेम नहीं कर सकता। और जिसे अपने से प्रेम हो वह कम-से-कम धर्म या शिक्षा के नाम पर किसी को सताएगा तो नहीं ही...।
-दीप त्रिवेदी
पहले तो हम सिर्फ मंदिर में जाकर कुछ चढ़ा आते थे। अब तो पंडितों की लालच इतनी बढ़ गयी है कि वे आश्वासनोंें के नाम पर अंगूठी, धागे व प्रतिष्ठान भी बेचकर गरीब जनता को लूटने में लग गए हैं।
-दीप त्रिवेदी
आप प्रेम हो या व्यवसाय, दान हो या क्रोध, सबकुछ आधे-अधूरे मन से ही करते हैं। ऐसे में आप निर्णायक परिणाम की अपेक्षा ही कैसे रख सकते हैं?
-दीप त्रिवेदी
न शिक्षा, न समाज, न तथाकथित धर्म हमें यह समझा रहे कि जीवन में सरलता, निर्दोषता, स्वार्थहीनता, भोलापन व करुणा इत्यादि का क्या महत्व है। जबकि हकीकत यह है कि संसार की सभी सर्वश्रेष्ठ रचनाएं, सारे आविष्कार व सारी कलाएं ऐसे ‘‘मन’’ वाले व्यक्तियों के जहन से ही निकली है।
-दीप त्रिवेदी
‘आनंद’ सिर्फ उन कर्मों से उत्पन्न होता है, जिनका फल हाथोंहाथ मिलता है। ‘कर्म’ आज व ‘फल’ कल, ऐसे कर्मो से केवल सुख-दुःख उत्पन्न होते हैं।
-दीप त्रिवेदी
प्रकृति में ऊर्जा के दो ही केन्द्र बिन्दु हैं, एक ‘क्रोध’ व दूसरा ‘प्रेम’। परंतु दुर्भाग्य से Science... Psychology की दृष्टि से देखना जानता ही नहीं। यहां ऊर्जा उत्पन्न या तो दो वस्तुओं के घर्षण यानी ‘क्रोध’ से होती है, या यह ऊर्जा उत्पन्न दो वस्तुओं के मिलन यानी ‘प्रेम’ से होती है।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य के ‘आत्मिक दुःख’ दूर कर पाना एकबार को मनोविज्ञान के हाथ में तो है, पर मनुष्य के अपने अहंकार से जनित दुःख दूर कर पाना किसी के वश में नहीं। उसमें तो सिवाय उसके कोई और उसकी सहायता कर ही नहीं सकता।
-दीप त्रिवेदी