समय के अनुरूप आप अपने को ढालते चले जाएं व परिस्थितियों के साथ स्वयं को बहाते चले जाएं, देखिये आप क्या से क्या हो जाते हैं।
-दीप त्रिवेदी
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समय के अनुरूप आप अपने को ढालते चले जाएं व परिस्थितियों के साथ स्वयं को बहाते चले जाएं, देखिये आप क्या से क्या हो जाते हैं।
-दीप त्रिवेदी
आनंद, शांति, संतोष, करुणा, स्वतंत्रता, ध्यान, वगैरह गुण आपको मन की उन भीतरी कुदरती शक्तियों में ले जाते हैं...जहां से आपके ‘‘ऐतिहासिक व्यक्ति’’ बनने की नींव डलती है।
-दीप त्रिवेदी
‘‘क्रोध’’ व ‘‘प्रेम’’...मनुष्य जीवन में ऊर्जा के यही दो केन्द्र हैं। धर्म, शिक्षा व समाज ने मिलकर इन दोनों को ही मनुष्य में से खत्म कर दिया है। इसी से पूरी मनुष्य जाति मर-मरकर जीने को मजबूर है।
-दीप त्रिवेदी
जैसे कइयों की उम्र के साथ बुद्धि चलना बंद हो जाती है, वैसे ही उम्र के साथ कइयों का Liver भी जवाब दे ही जाता है। फिर उन्हें सादा खाकर ही जीना पड़ता है। यहां सवाल यह कि जो भरी जवानी में सादा खा रहे हैं उनका क्या? कुछ नहीं, कमजोर Liver उन्हें रोज की पचासों बीमारियां पकड़ा ही देता है।
-दीप त्रिवेदी
प्रेम कोरे शब्दों या भावों से नहीं, आपस में करनेवाले व्यवहारों के अंतिम परिणाम से सिद्ध होता है। आपके आसपास सभी प्रसन्न व स्वस्थ - तो आपका प्रेम सच्चा।
-दीप त्रिवेदी
‘‘सत्य’’ शारीरिक तौर पर किया कर्म या भावना में बह के किये कर्म का नाम नहीं। सत्य उस कर्म से आये परिणाम का नाम है। किसी ने यदि आपमें सुधार लाने को गाली दी तो उसने गाली दी ही कहां? ...उसने तो आप में सुधार लाने की चेष्टा की।
-दीप त्रिवेदी
आपके पास क्या और कितना है यह आपके धनी होने का सबूत नहीं...पर हां, आप क्या व कितना और पाना चाहते हैं, यह आपकी दरिद्रता को अवश्य दर्शाता है।
-दीप त्रिवेदी
‘‘भाग्य’’ सिवाय अपनी असफलता छिपाने के एक खूबसूरत बहाने से ज्यादा और कुछ नहीं।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य की बुद्धिमत्ता का तो कहना ही क्या? वह रोज सौ योजनाएं अपने आपको मरवाने हेतु खोज ही लाता है।
-दीप त्रिवेदी
मनुष्य जिस मात्रा में धर्म के विषय में अंधा है ठीक उसी मात्रा में वह जीवन के सारे सत्यों को समझने में भी अंधा होता है। और यही कारण है कि विश्व आंख वाले अंधों से भरा पड़ा है।
-दीप त्रिवेदी