समृद्धि के लिए लक्ष्मीपूजन कर लक्ष्मी को परेशान सिर्फ भारत में किया जाता है। ...लगता है इस परेशानी के कारण ही लक्ष्मी भारत से रूठ गयी है। क्या ही अच्छा हो यदि समृद्धि के लिये हम अपने ‘‘कर्मों’’ पर ही आस्था बढ़ाएं।
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समृद्धि के लिए लक्ष्मीपूजन कर लक्ष्मी को परेशान सिर्फ भारत में किया जाता है। ...लगता है इस परेशानी के कारण ही लक्ष्मी भारत से रूठ गयी है। क्या ही अच्छा हो यदि समृद्धि के लिये हम अपने ‘‘कर्मों’’ पर ही आस्था बढ़ाएं।
माना इस विश्व में सफलता से ज्यादा उत्साहित करने वाला और कुछ नहीं होता, लेकिन सफलता मिलती सिर्फ उन्हें है जो निराशा के क्षणों में भी अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं छोड़ते।
कई लोग शुभ-मुहूर्त के चक्कर में समय-संजोग व परिस्थिति बन जाने के बावजूद ‘‘कर्म’’ को टालते हैं, वहीं अन्य कई संजोग न बनने के बावजूद इस चक्कर में कर्म कर डालते हैं। यह सब अपनी मौत मरने के ‘‘गालीबे-Idea’’ अच्छे हैं।
मनुष्य की सबसे बड़ी गरिमा उसकी परम-स्वतंत्रता है, कृपया उसे हमेशा सम्भाल कर रखें। न तो किसी के जीवन में दखल दें और न ही किसी व्यक्ति, धर्म, समाज या शास्त्र को अपने जीवन में दखल देने दें। क्योंकि... आप अकेले, इकलौते व नवीन हैं। आप जैसा कोई न पहले हुआ है और न आगे होगा। अतः आपका एकमात्र कर्तव्य सबसे बचते हुए अपनी इस जीवन-यात्रा को यादगार बनाना है।
हम ‘‘मनुष्य’’ के शरीर, संस्कृति व चेतना के जिस Refined स्वरूप को देख रहे हैं, वह अरबों वर्षों के करोड़ों असफल प्रयास के बाद प्राप्त हुआ है। ऐसे मूल्यवान जीवन को सिर्फ शिक्षा, शादी, बच्चे, कमाने व बुढ़ापे के रोने में नष्ट नहीं किया जा सकता।
भूत या भविष्य का किसी भी स्वरूप में सामने आना या उस बाबत एक क्षण को भी कुछ सोचना ...यही तो ‘अहंकार’ है।
समृद्धि के लिए लक्ष्मीपूजन कर लक्ष्मी को परेशान सिर्फ भारत में किया जाता है। ...लगता है इस परेशानी के कारण ही लक्ष्मी भारत से रूठ गयी है। क्या ही अच्छा हो यदि समृद्धि के लिये हम अपने ‘‘कर्मों’’ पर ही आस्था बढ़ाएं।
कई लोग शुभ-मुहूर्त के चक्कर में समय-संजोग व परिस्थिति बन जाने के बावजूद ‘‘कर्म’’ को टालते हैं, वहीं अन्य कई संजोग न बनने के बावजूद इस चक्कर में कर्म कर डालते हैं। यह सब अपनी मौत मरने के ‘‘गालीबे-Idea’’ अच्छे हैं।
हम ‘‘मनुष्य’’ के शरीर, संस्कृति व चेतना के जिस Refined स्वरूप को देख रहे हैं, वह अरबों वर्षों के करोड़ों असफल प्रयास के बाद प्राप्त हुआ है। ऐसे मूल्यवान जीवन को सिर्फ शिक्षा, शादी, बच्चे, कमाने व बुढ़ापे के रोने में नष्ट नहीं किया जा सकता।
मनुष्य की सबसे बड़ी गरिमा उसकी परम-स्वतंत्रता है, कृपया उसे हमेशा सम्भाल कर रखें। न तो किसी के जीवन में दखल दें और न ही किसी व्यक्ति, धर्म, समाज या शास्त्र को अपने जीवन में दखल देने दें। क्योंकि... आप अकेले, इकलौते व नवीन हैं। आप जैसा कोई न पहले हुआ है और न आगे होगा। अतः आपका एकमात्र कर्तव्य सबसे बचते हुए अपनी इस जीवन-यात्रा को यादगार बनाना है।